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अक्ष-मालिकोपनिषद्
‘अक्ष-माला’ के भेद, लक्षण, सूत्र एवं प्रतिष्ठा विधिः

शान्ति पाठः । ‘वाक्’ मेरे मन में प्रतिष्ठित हो। ‘मन’ मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे स्वयं-प्रकाश ‘आत्मा’ ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट हो। हे ‘वाक्’ और ‘मन’ तुम दोनों ही वेद-ज्ञान के लिए मेरे आधार बनो। तुम मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो। मैं वेदाभ्यास में दिन-रात व्यतीत करता हूँ। मैं ‘ऋत’ कहूँगा। मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः।
प्रजापति ने गुह से पुछाः हे भगवन् ! ‘अक्ष-माला’ के भेद बताइए। उसके क्या लक्षण हैं ? कितने सूत्र हैं ? इसे किस प्रकार पिरोया या गूँथा जाता है ? इसमें कौन-कौन वर्ण हैं और उनकी प्रतिष्ठा-विधि क्या है ? इसके अधि-देवता कौन-कौन हैं ? इससे क्या-क्या फल प्राप्त होते हैं ? ।।१
गुह ने बतायाः १॰ प्रवाल, २॰ मोती, ३॰ स्फटिक, ४॰ शङ्ख, ५॰ चाँदी, ६॰ सोना, ७॰ चन्दन, ८॰ पुत्र-जीविका, ९॰ कमल और १०॰ रुद्र – ये दस प्रकार की मालाएँ है। इन मालाओं को ‘अ’ से ‘क्ष’ पर्यन्त ५० अक्षरों से अनुभावित करके धारण करना चाहिए। इनमें सोना, चाँदी तथा ताँबे के क्रमशः तीन सूत्र डालने चाहिए। मनके (माला के दाने) के छेद में सोना, दाहिने चाँदी और बाँएँ ताँबे के सूत्र डालने चाहिए। मनकों को मुख-से-मुख तथा पूँछ-से-पूँछ संयुक्त कर उन्हें सूत्रित करना चाहिए।।२
मनकों के अन्दर के स्वर्ण-सूत्र को – ‘ब्राह्म’, दाहिने भाग के रजत-सूत्र को – ‘शैव’ और बाँएँ भाग के ताम्र-सूत्र को – ‘वैष्णव’ समझना चाहिए। मनके के मुख-भाग को – ‘सरस्वती’ और पुच्छ-भाग को – ‘गायत्री’ समझना चाहिए। मनके के छेद को – ‘विद्या’ और सूत्रों की गाँठ (ग्रन्थि) को – ‘प्रकृति’ समझना चाहिए। मनकों पर जो ‘स्वर’ अनुभावित हैं, उन्हें  धवल – श्वेत देखना चाहिए और मनकों पर जो ‘स्पर्श’ अनुभावित हैं, उन्हें पीत तथा शेष जो अनुभावित है, उन्हें रक्त – लाल देखना चाहिए।।३
पहले पूजा-स्थान को गाय के दुग्ध तथा पञ्च-गव्य (गो-दुग्ध, गो-दधि, गो-घृत, गो-मूत्र तथा गो-मय) से शुद्ध करे। फिर उस स्थान पर, ॐ – कार का उच्चारण करते हुए, अष्ट-गन्ध युक्त जल कुशा के द्वारा छिड़के। तब उक्त प्रकार से शुद्ध पूजा-स्थान में, किसी प्रशस्त धातु – ताँबा, चाँदी, स्वर्ण आदि के आधार पर, ‘माला’ को श्रद्धा-पूर्वक रखें। अक्षत तथा पुष्प से आधार-सहित ‘माला’ की पूजा करे। पूजन के बाद ‘माला’ के प्रत्येक मनके को ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक के अक्षरों द्वारा क्रमशः भावित करे।।४
ॐ। अं-कार ! तुम मृत्युञ्जय हो, सर्व-व्यापक हो, पहले मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। आं-कार ! तुम आकर्षणात्मक और सर्व-गत हो, दूसरे मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। इं-कार ! तुम पुष्टिदा और क्षोभकर हो, तीसरे मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ईं-कार ! तुम वाणी को स्वच्छता प्रदान करने वाले – वाक् – प्रसाद – कर और निर्मल हो, चौथे मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। उं-कार ! तुम सर्व-बल-प्रद और श्रेष्ठों में श्रेष्ठ सार-तर हो, पाँचवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ऊं-कार ! तुम उच्चाटन-कर तथा दुःसह हो, छठे मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ऋं-कार ! तुम चञ्चल -चित्तता लाने वाले – संक्षोभ-कर और चञ्चल हो, सातवेँ मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ॠं-कार ! तुम सम्मोहन-कर तथा उज्ज्वल हो, आठवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। लृं-कार ! तुम विद्वेषण-कर एवं सर्वज्ञ हो, नवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ॡं-कार ! तुम मोह-कारी हो, दसवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। एं-कार ! तुम सर्व-वश्य-कर तथा शुद्ध सत्त्ववाले हो, ग्यारहवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ऐं-कार ! तुम शुद्ध-सात्त्विक तथा पुरुष-वश्य-कारक हो, बारहवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ओं-कार ! तुम अखिल वाङ्-मय-स्वरुप और नित्य-शुद्ध हो, तेरहवें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। औं-कार ! तुम सर्व-वाङ्-मय-स्वरुप, वश्य-कर और शान्त हो, १४ वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। अं-कार ! तुम हाथी आदि तक को वश में करने वाले और मोहन करने वाले हो, १५ वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। अः-कार ! तुम मृत्यु-नाश-कर और रुद्र-रुप हो, १६ वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। कं-कार ! तुम सर्व-विष-हर और कल्याण-प्रद हो, १७ वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। खं-कार ! तुम सर्व-क्षोभ-कर और व्यापक हो, १८ वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। गं-कार ! तुम सर्व-विघ्न-शमन-कर्त्ता और महत्तर हो, १९वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। घं-कार ! तुम सौभाग्य देनेवाले और स्तम्भन-कर्त्ता हो, २०वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ङं-कार ! तुम सर्व-विष-नाश-कर और उग्र हो, २१वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। चं-कार ! तुम अभिचार-नाशक और क्रूर हो, २२वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। छं-कार ! तुम भू-नाश-कर और भीषण हो, २३वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। जं-कार ! तुम कृत्या-नाशक और दुर्द्धर्ष हो, २४वे मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। झं-कार ! तुम भूत-नाश-कर हो, २५वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ञं-कार ! तुम मृत्यु का मन्थन करने वाले हो, २६वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। टं-कार ! तुम सभी व्याधियों का हरण करने वाले सौम्य और सुभग हो, २७वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ठं-कार ! तुम चन्द्र-स्वरुप हो, २८वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। डं-कार ! तुम गरुढ़-स्वरुप, विष-नाशक और सुन्दर हो, २९वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ढं-कार ! तुम सभी तरह की सम्पत्तियों को देनेवाले और सौम्य हो, ३०वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। णं-कार ! तुम सर्व-सिद्धि-प्रद और मोह-कर हो, ३१वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। तं-कार ! तुम धन-धान्यादि सम्पत्तियों को देनेवाले और प्रसन्न हो, ३२वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। थं-कार ! तुम धर्म की प्राप्ति कराने वाले और निर्मल हो, ३३वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। दं-कार ! तुम पुष्टि और वृद्धि करने वाले तथा प्रिय-दर्शन हो, ३४वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। धं-कार ! तुम विष-ज्वर के नाशक और विशाल हो, ३५वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। नं-कार ! तुम भोग और मोक्ष को देनेवाले तथा स्वयं शान्त हो, ३६वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। पं-कार ! तुम विष-विघ्नों के नाशक और भव्य हो, ३७वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। फं-कार ! तुम अणिमादि अष्ट-सिद्धि-प्रद और ज्योतिः – स्वरुप हो, ३८वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। बं-कार ! तुम सभी दोषों को हरण करने वाले और शोभन हो, ३९वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। भं-कार ! तुम भूत-बाधा आदि शान्त करनेवाले और भय-नाशक हो, ४०वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। मं-कार ! तुम विद्वेष करने वाले हो मोहित करनेवाले हो, ४१वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। यं-कार ! तुम सर्व-व्यापी और पवित्र हो। ४२वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। रं-कार ! तुम दाह-कर और विशिष्ट-कृत हो, ४३वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। लं-कार ! तुम विश्व का पालन करनेवाले और देव-स्वरुप हो, ४४वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। वं-कार ! तुम सभी को तृप्त करनेवाले और निर्मल हो, ४५वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। शं-कार ! तुम सर्व-फल-प्रद और पवित्र हो, ४६वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। षं-कार ! तुम धर्म, अर्थ और काम के फलों को देनेवाले तथा धवल हो, ४७वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। सं-कार ! तुम सर्व-कारण और सभी वर्णो से सम्बद्ध हो, ४८वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। हं-कार ! तुम सर्व-वाङ्-मय और निर्मल हो, ४९वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ। ळं-कार ! तुम सर्व-शक्ति-प्रद और प्रधान हो, ५०वें मनके में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ। क्षं-कार ! तुम परापर-तत्त्व के बतानेवाले परम ज्योतिः – स्वरुप हो, ५१ वें मनके ‘सुमेरु’ पर प्रतिष्ठित हो जाओ।
फिर इस प्रकार कहे – जो देव-गण पृथ्वी पर स्थित और विचरण-शील हैं, उन्हें नमस्कार। हे भगवन् ! आप सभी इस माला में स्थित हों। आप सभी इस माला का अनुमोदन करें। इसकी शोभा के लिए पितृ-गण भी अनुमोदन करें। यह ज्ञान-मयी ‘अक्ष-मालिका’ है, इसे आज सभी अनुमोदित तथा शोभित करें।।६
पुनः कहे – जो देवता आकाश में स्थित और विचरण – शील हैं, उन्हें नमस्कार। हे भगवन् ! आप सभी इस माला में स्थित हो। आप सभी इस माला का अनुमोदन करें और इसकी शोभा के लिए पितृ-गण भी अनुमोदन करे। यह ज्ञान-मयी ‘अक्ष-मालिका’ है, इसे आप सभी अनुमोदित और शोभित करें।।८
पुनः कहे – इस लोक में जितने मन्त्र हैं, जो भी विद्याएँ हैं, उन्हें नमस्कार। उन सबों की शक्तियाँ इसमें प्रतिष्ठित हो जाएँ।।९
फिर कहे – जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र – संज्ञक देव हैं, उन सगुण देवों को नमस्कार। उनके तेज को नमस्कार। वह तेज यहाँ प्रतिष्ठित हो।।१०
पुनः कहे – जो सांख्यादि दर्शनों में विहित तत्त्व हैं, उन्हें नमस्कार। आप सभी इस माला में स्थित हों और जापक को वर देनेवाले कामधेनु – स्वरुप बनकर शोभित हो।।११
फिर कहे – जगत् में सैकड़ों – हजारों की संख्या में जो शैव, वैष्णव और शाक्त हैं, उन्हें नमस्कार। वे सभी शक्तिवान् अनुग्रह तथा अनुमोदन करें।।१२
पुनः कहे – पितृ-लोक की जो उप-जीव्य शक्तियाँ हैं, उन्हें नमस्कार। आप सभी प्रसन्न होकर हमारी ‘अक्ष-मालिका’ को सुखद बना दें।।१३
फिर ‘अक्ष-मालिका’ में पूर्णत्व की भावना करके शेष आधी माला को भावना से भावित करे। उपर्युक्त प्रकार से १०० मनकों की भावना कर चुकने पर ‘अष्ट-वर्ग’ के लिए आठ मनकों को क्रमशः ‘अं – कं – चं – टं – तं – पं – यं – शं’ की भावना से पूर्वोक्त प्रकार से भावित करे। ‘मेरु’ में ‘क्ष’ भावित रहेगा। इस प्रकार १०८ मनकों की माला पूर्ण रुप से भावित हो जाएगी।।१४
अन्त में उक्त भावना-मय १०८ मनकों की माला की ‘प्रदक्षिणा’ कर निम्न प्रकार बारम्बार नमस्कार करना चाहिए –
“ॐ भगवति मन्त्र – मातृके ! अक्ष – माले ! तुम सभी को वश में करनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार। हे भगवति ! मन्त्र – मातृके ! अक्ष – माले ! तुम सबकी गति का स्तम्भन करनेवाली हो। तुम्हें नमस्कार। हे भगवति ! मन्त्र – मातृके ! अक्ष – माले ! तुम्हीं उच्चारण करनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार।
हे भगवति ! मन्त्र – मातृके ! अक्ष – माले ! तुम विश्व – भूत – मृत्यु को भी जीतनेवाली मृत्युञ्जय – स्वरुपिणी हो। सभी को दीप्त करनेवाली हो। सकल लोकों को बनानेवाली और उनकी रक्षा करनेवाली हो। दिन और रात का प्रवर्तन करनेवाली हो। नद्यन्तर – देशान्तर – लोकान्तर में सञ्चरण करनेवाली हो। सभी के हृदय में निवास और स्फुरण करनेवाली हो। परा – पश्यन्ती – मध्यमा और वैखरी वाणी के रुप में तुम्हीं हो। तुम सर्व – तत्त्वात्मिका, सर्व – विद्यात्मिका, सर्व – शक्त्यात्मिका और सर्व – देवात्मिका हो। तुम वशीष्ठ मुनि के द्वारा आराधिता एवं विश्वामित्र मुनि के द्वारा उप – सेव्यमाना हो। तुमहें बार – बार नमस्कार।।१५

।।फल-श्रुति।।
भगवान् गुह ने कहाः इस अक्ष -मालिकोपनिषद् को प्रातःकाल पढ़नेवाला अपने रात्रि-कृत पाप को नष्ट कर लेता है। सन्ध्या-काल में इसको पढनेवाला अपने दिवस-कृत पाप को निर्मूल कर लेता है। उक्त विधि से अभिमन्त्रित तथा पूजित ‘अक्ष-माला’ से जो ‘जप’ किया जाता है, वह शीघ्र ही सिद्धि-दायक होता है।।१६

टिप्पणी – प्रस्तुत ‘उपनिषद्’ से इस बात की पुष्टि होती है कि सर्व-श्रेष्ठ “मातृका-माला” ही पूर्वोक्त दस मालाओं की मूल है। ये दस मालाएँ वस्तुतः तीसरी श्रेणी की मालाएँ हैं, क्योंकि इन्हें प्रस्तुत करने में न केवल आर्थिक समस्या है, अपितु कर्म-काण्ड भी जटिल है। इसके अतिरिक्त जप-कर्ता का ध्यान स्वर्णादि मनकों के प्रति आकृष्ट रहेगा। पूर्ण एकाग्रता मन्त्र-जप के प्रति कदापि नहीं होगी। दूसरी श्रेणी की “कर-माला” होती है, जिसमें अँगुली के पोरों में जप किया जाता है। उसमें भी अनेक प्रकार की कठिनाइयों का अनुभव जप-कर्ता को होता है, किन्तु सर्व-श्रेष्ठ-सर्व-सिद्धि-दायिनी “मातृका-माला”, जो मूल “अक्ष-मालिका” ही है – उसमें न आर्थिक समस्या है, न कर्म-काण्ड का झंझट और मन ‘मन्त्र-जप’ में सहज ही एकाग्र हो जाता है। अतः जप-कर्ता पाठकों को विशुद्ध “मातृका-माला” का ही अभ्यास करना चाहिए।

(यह उपनिषद ॠग्वेद से सम्बन्धित है। इसमें प्रजापति ब्रह्मा और कुमार कार्तिकेय (गुह) के प्रश्नोत्तर को गूंथा गया है।……………..

 

 

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