June 2, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 002 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दूसरा अध्याय मत्स्यावतार की कथा वसिष्ठजी ने कहा — अग्निदेव ! आप सृष्टि आदि के कारणभूत भगवान् विष्णु के मत्स्य आदि अवतारों का वर्णन कीजिये । साथ ही ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण को भी सुनाइये, जिसे पूर्वकाल में आपने श्रीविष्णुभगवान् के मुख से सुना था ॥ १ ॥ अग्निदेव बोले — वसिष्ठ ! सुनो, मैं श्रीहरिके मत्स्यावतारका वर्णन करता हूँ। अवतार धारण का कार्य दुष्टों के विनाश और साधु-पुरुषों की रक्षा के लिये होता है। बीते हुए कल्प के अन्त में ‘ब्राह्म’ नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था। मुने! उस समय ‘भू’ आदि लोक समुद्र के जल में डूब गये थे। प्रलय के पहले की बात है। वैवस्वत मनु भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिये तपस्या कर रहे थे। एक दिन जब वे कृतमाला नदी में जल से पितरों का तर्पण कर रहे थे, उनकी अञ्जलि के जल में एक बहुत छोटा-सा मत्स्य आ गया। राजा ने उसे जल में फेंक देने का विचार किया। तब मत्स्य ने कहा — ‘महाराज! मुझे जल में न फेंको। यहाँ ग्राह आदि जल-जन्तुओं से मुझे भय है।” यह सुनकर मनुने उसे अपने कलशके जलमें डाल दिया। मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुनः मनु से बोला — “राजन्! मुझे इससे बड़ा स्थान दो।’ उसकी यह बात सुनकर राजा ने उसे एक बड़े जलपात्र (नाद या कुंडा आदि) में डाल दिया। उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य राजा से बोला — ‘मनो! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो।’ तब उन्होंने पुनः उसे सरोवर के जल में डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवर के बराबर हो गया और बोला — ‘मुझे इससे बड़ा स्थान दो।’ तब मनु ने उसे फिर समुद्र में ही ले जाकर डाल दिया। वहाँ वह मत्स्य क्षणभर में एक लाख योजन बड़ा हो गया। उस अद्भुत मत्स्य को देखकर मनु को बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले — ‘आप कौन हैं? निश्चय ही आप भगवान् श्रीविष्णु जान पड़ते हैं। नारायण! आपको नमस्कार है। जनार्दन ! आप किसलिये अपनी मायासे मुझे मोहित कर रहे हैं ? ‘ ॥ २-१० ॥ मनु के ऐसा कहने पर सबके पालन में संलग्र रहने वाले मत्स्यरूपधारी भगवान् उनसे बोले — ‘राजन्! मैं दुष्टों का नाश और जगत् की रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ हूँ। आज से सातवें दिन समुद्र सम्पूर्ण जगत् को डुबा देगा। उस समय तुम्हारे पास एक नौका उपस्थित होगी। तुम उसपर सब प्रकार के बीज आदि रखकर बैठ जाना । सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे। जबतक ब्रह्मा की रात रहेगी, तबतक तुम उसी नाव पर विचरते रहोगे । नाव आने के बाद मैं भी इसी रूप में उपस्थित होऊँगा । उस समय तुम मेरे सींग में महासर्पमयी रस्सी से उस नाव को बाँध देना ।’ ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य अन्तर्धान हो गये और वैवस्वत मनु उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे। जब नियत समय पर समुद्र अपनी सीमा लाँघकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नौका पर बैठ गये। उसी समय एक सींग धारण करने वाले सुवर्णमय मत्स्यभगवान् का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींग में नाव बाँधकर राजा ने उनसे ‘मत्स्य ‘नामक पुराण का श्रवण किया, जो सब पापों का नाश करने वाला है। मनु भगवान् मत्स्य की नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा स्तुति भी करते थे। प्रलय के अन्त में ब्रह्माजी से वेद को हर लेने वाले ‘हयग्रीव’ नामक दानव का वध करके भगवान् ने वेद-मन्त्र आदि की रक्षा की। तत्पश्चात् वाराहकल्प आने पर श्रीहरि ने कच्छपरूप धारण किया ॥ ११- १७ ॥ ॥ इस प्रकार अग्निदेवद्वारा कहे गये विद्यासार-स्वरूप आदि आग्नेय महापुराणमें ‘मत्स्यावतार वर्णन’ नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe