June 2, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 005 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ पाँचवाँ अध्याय श्रीरामावतार-वर्णन के प्रसङ्ग में रामायण – बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायण का वर्णन करूँगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकिजी को सुनाया था। इसका पाठ भोग और मोक्ष दोनों को देनेवाला है ॥ १ ॥ देवर्षि नारद कहते हैं — वाल्मीकिजी ! भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं। ब्रह्माजी के पुत्र हैं मरीचि । मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य और सूर्य से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। उसके बाद वैवस्वत मनु से इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुई। इक्ष्वाकु वंश में ककुत्स्थ नामक राजा हुए। ककुत्स्थ के रघु रघु के अज और अज के पुत्र दशरथ हुए उन राजा दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिये साक्षात् भगवान् विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए।’ उनकी बड़ी रानी कौसल्या के गर्भ से श्रीरामचन्द्रजी का प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ। महर्षि ऋष्यशृङ्ग ने उन तीनों रानियों को यज्ञसिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खाने से इन चारों कुमारों का आविर्भाव हुआ। श्रीराम आदि सभी भाई अपने पिता के ही समान पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वामित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालने वाले निशाचरों का नाश करने के लिये राजा दशरथ से प्रार्थना की ( कि आप अपने पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दें)। तब राजा ने मुनि के साथ श्रीराम और लक्ष्मण को भेज दिया। श्रीरामचन्द्रजी ने वहाँ जाकर मुनि से अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा पायी और ताड़का नाम वाली निशाचरी का वध किया। फिर उन बलवान् वीर ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञविघातक राक्षस सुबाहु को दल-बल सहित मार डाला। इसके बाद वे कुछ काल तक मुनि के सिद्धाश्रम में ही रहे । तत्पश्चात् विश्वामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मणसहित श्रीराम मिथिला- नरेश का धनुष – यज्ञ देखने के लिये गये ॥ २-९ ॥ [ अपनी माता अहल्या के उद्धार की वार्ता सुनकर संतुष्ट हुए ] शतानन्दजी ने निमित्त – कारण बनकर श्रीराम से विश्वामित्र मुनि के प्रभाव का[^1] वर्णन किया। राजा जनक ने अपने यज्ञ में मुनियों सहित श्रीरामचन्द्रजी का पूजन किया। श्रीराम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनन्तर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिसके विवाह के लिये पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया। श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गुरुजनों के मिथिला में पधारने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया । उस समय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश – कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया। राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे । उनकी दो कन्याएँ थीं – श्रुतकीर्ति और माण्डवी । इनमें माण्डवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया। तदनन्तर राजा जनक से भली-भाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजी ने वसिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग में जमदग्निनन्दन परशुराम को जीतकर वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ जाने पर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित् की राजधानी को चले गये ॥ १०-१५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘श्रीरामायण-कथा के अन्तर्गत बालकाण्ड में आये हुए विषय का वर्णन’ सम्बन्धी पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥ [^1]: यहाँ मूल में, ‘प्रभावत: ‘ पद ‘प्रभावः’ के अर्थ में है । यहाँ ‘तसि’ प्रत्यय पञ्चम्यन्त का बोधक नहीं है। सार्वविभक्तिक ‘तसि’ के नियमानुसार प्रथमान्त पद से यहाँ ‘तसि’ प्रत्यय हुआ है, ऐसा मानना चाहिये । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe