अग्निपुराण – अध्याय 018
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
अठारहवाँ अध्याय
स्वायम्भुव मनु के वंश का वर्णन
स्वायम्भुववंशवर्णनम्

अग्निदेव कहते हैं — मुने! स्वायम्भुव मनु से उनकी तपस्विनी भार्या शतरूपा ने प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न की। वह कमनीया कन्या (देवहूति) कर्दम ऋषि की भार्या हुई। राजा प्रियव्रत से सम्राट् कुक्षि और विराट नामक सामर्थ्यशाली पुत्र उत्पन्न हुए। उत्तानपाद से सुरुचि के गर्भ से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुनीति के गर्भ से ध्रुव का जन्म हुआ। हे मुने! कुमार ध्रुव ने सुन्दर कीर्ति बढ़ाने के लिये तीन हजार1  दिव्य वर्षों तक तप किया। उस पर प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उसे सप्तर्षियों के आगे स्थिर स्थान (ध्रुवपद) दिया। ध्रुव के इस अभ्युदय को देखकर शुक्राचार्य ने उनके सुयश का सूचक यह श्लोक पढ़ा —

अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहोऽद्भुतम् ।
यमद्य पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः ॥ ५ ॥

‘अहो ! इस ध्रुव की तपस्या का कितना प्रभाव है, इसका शास्त्र-ज्ञान कितना अद्भुत है, जिसे आज सप्तर्षि भी आगे करके स्थित हैं।’ ॥ १-५ ॥ उस ध्रुव से उनकी पत्नी शम्भु ने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्र उत्पन्न किये। श्लिष्ट से उसकी पत्नी सुच्छाया ने क्रमशः रिपु, रिपुंजय, पुष्य, वृकल और वृकतेजा-इन पाँच निष्पाप पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। रिपु के वीर्य से बृहती ने चाक्षुष और सर्वतेजा को अपने गर्भ में स्थान दिया ॥ ६-७ ॥

चाक्षुष वीरण प्रजापति की कन्या पुष्करिणी के गर्भ से मनु को जन्म दिया। मनु से नड्वला के गर्भ से दस उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए। [उनके नाम ये हैं ] ऊरु, पूरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न और अभिमन्यु । ऊरु के अंश से आग्नेयी ने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक महान् तेजस्वी छः पुत्र उत्पन्न किये। अङ्ग से सुनीथा ने एक ही संतान वेन को जन्म दिया। वह प्रजाओं की रक्षा न करके सदा पाप में ही लगा रहता था। उसे मुनियों ने कुशों से मार डाला। तदनन्तर ऋषियों ने संतान के लिये वेन के दायें हाथ का मन्थन किया। हाथ का मन्थन होने पर राजा पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियों ने कहा — ‘ये महान् तेजस्वी राजा अवश्य ही समस्त प्रजा को आनन्दित करेंगे तथा महान् यश प्राप्त करेंगे।’ क्षत्रियवंश के पूर्वज वेन कुमार राजा पृथु अपने तेज से सबको दग्ध करते हुए-से धनुष और कवच धारण किये हुए ही प्रकट हुए थे; वे सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करने लगे ॥ ८-१४ ॥

राजसूय यज्ञ में दीक्षित होने वाले नरेशों में वे सबसे पहले भूपाल थे। उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। स्तुतिकर्म में निपुण अद्भुतकर्मा सूत और मागधों ने उनका स्तवन किया। वे प्रजाओं का रञ्जन करने के कारण ‘राजा’ नाम से विख्यात हुए। उन्होंने प्रजाओं की जीवन रक्षा के निमित्त अन्न की उपज बढ़ाने के लिये गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन किया। उस समय एक साथ ही देवता, मुनिवृन्द, गन्धर्व, अप्सरागण, पितर, दानव, सर्प, लता, पर्वत और मनुष्यों आदि के द्वारा अपने-अपने विभिन्न पात्रों में दुही जाने वाली पृथिवी ने सबको इच्छानुसार दूध दिया, जिससे सबने प्राण धारण किये। पृथु के जो दो धर्मज्ञ पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम थे अन्तर्धि और पालित अन्तर्धान (अन्तर्धि) के अंश से उनकी शिखण्डिनी नाम वाली पत्नी ने ‘हविर्धान’ को जन्म दिया। अग्निकुमारी धिषणा ने हविर्धान के अंश से छः पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम ये हैं – प्राचीनबर्हिष्, शुक्र, गय, कृष्ण, व्रज और अजिन । राजा प्राचीनवर्हिष् प्रायः यज्ञ में ही लगे रहते थे, जिससे उस समय पृथिवी पर दूर-दूर तक पूर्वाग्र कुश फैल गये थे। इससे वे ऐश्वर्यशाली राजा ‘प्राचीनबर्हिष्’ नाम से विख्यात हुए। वे एक महान् प्रजापति थे ॥ १५-२१ ॥

प्राचीनवर्हिष से उनकी पत्नी समुद्र-कन्या सवर्णा ने दस पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। वे सभी ‘प्रचेता’ नाम से प्रसिद्ध हुए और सब के सब धनुर्वेद में पारंगत थे। वे एक समान धर्म का आचरण करते हुए समुद्र के जल में रहकर दस हजार वर्षों तक महान् तप में लगे रहे। अन्त में भगवान् विष्णु से प्रजापति होने का वरदान पाकर वे संतुष्ट हो जल से बाहर निकले। उस समय प्रायः समस्त भूमण्डल और आकाश बड़े-बड़े सघन वृक्षों से व्याप्त हो गया था। यह देख उन्होंने अपने मुख से प्रकट अग्नि और वायु के द्वारा सब वृक्षों को जला दिया। तब वृक्षों का यह संहार देख राजा सोम इन प्रचेताओं के पास जाकर बोले — “आप लोग अपना कोप शान्त करें; ये वृक्षगण आपको एक ‘मारिषा’ नामवाली सुन्दरी कन्या अर्पण करेंगे। यह कन्या तपस्वी मुनि कण्डु के अंश से प्रम्लोचा अप्सरा के गर्भ से [स्वेद-बिन्दु के रूप में] प्रकट हुई है। मैंने ही भविष्य की बातें जानकर इसे कन्यारूप में उत्पन्न कर पाला- पोसा है। इसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न होंगे, जो प्रजा की वृद्धि करेंगे ” ॥ २२-२७ ॥

प्रचेताओं ने उस कन्या को ग्रहण किया। तत्पश्चात् उसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न हुए। दक्ष ने चर, अचर, द्विपद और चतुष्पद आदि प्राणियों की मानसिक सृष्टि करके अन्त में बहुत सी स्त्रियों को उत्पन्न किया। उनमें से दस को तो उन्होंने धर्मराज को अर्पण किया और तेरह कन्याएँ कश्यप को दीं। सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को चार अरिष्टनेमि को, दो बहुपुत्र को और दो कन्याएँ अङ्गिरा को दीं। पूर्वकाल में मानसिक संकल्प से सृष्टि होती थी। उसके बाद उन दक्ष कन्याओं से मैथुन द्वारा देवता और नाग आदि प्रकट हुए। अब मैं धर्मराज से उनकी दस पत्नियों के गर्भ से जो संतानें हुई, उस धर्मसर्ग का वर्णन करूंगा। विश्वा नामवाली पत्नी से विश्वेदेव प्रकट हुए। साध्या ने साध्यों को जन्म दिया। मरुत्वती से मरुत्वान् और वसु से वसुगण प्रकट हुए। भानु से भानु और मुहूर्ता से मुहूर्त नामक पुत्र उत्पन्न हुए। धर्मराज के द्वारा लम्बा से घोष नामक पुत्र हुआ और यामि नामक पत्नी से नागवीथी नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। पृथिवी का सम्पूर्ण विषय भी मरुत्वती से ही प्रकट हुआ। संकल्पा के गर्भ से संकल्पों की सृष्टि हुई। चन्द्रमा से उनकी नक्षत्ररूपिणी पत्नीयों के गर्भ से आठ पुत्र हुए ॥ २८-३४ ॥

उनके नाम ये हैं — आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास — ये आठ वसु हैं। आपके वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनि नामक पुत्र हुए। ध्रुव का पुत्र लोकान्तकारी काल हुआ और सोम का पुत्र वर्चा हुआ। धर की पत्नी मनोहरा के गर्भ से द्रविण, हुतहव्यवह, शिशिर, प्राण और रमण उत्पन्न हुए। अनिल का पुत्र पुरोजव और अनल (अग्नि) का अविज्ञात था। अग्नि का पुत्र कुमार हुआ, जो सरकंडों की ढेरी पर उत्पन्न हुआ। उसके पीछे शाख, विशाख और नैगमेय नामक पुत्र हुए। कुमार कृत्तिका के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ‘कार्तिकेय’ कहलाये तथा कृत्तिका के दूसरे पुत्र सनत्कुमार नामक यति हुए। प्रत्यूष से देवल का जन्म हुआ और प्रभास से विश्वकर्मा का। ये विश्वकर्मा देवताओं के बढ़ई थे और हजारों प्रकार की शिल्पकारी का काम करते थे। उनके ही निर्माण किये हुए शिल्प और भूषण आदि के सहारे आज भी मनुष्य अपनी जीविका चलाते हैं। सुरभी ने कश्यपजी के अंश से ग्यारह रुद्रों को उत्पन्न किया तथा हे साधुश्रेष्ठ! सती ने अपनी तपस्या एवं महादेवजी के अनुग्रह से सम्भावित होकर चार पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम हैं — अजैकपाद, अहिर्बुध्य, त्वष्टा और रुद्र। त्वष्टा के पुत्र महायशस्वी श्रीमान् विश्वरूप हुए। हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली — ये ग्यारह रुद्र प्रधान हैं। यों तो सैकड़ों-लाखों रुद्र हैं, जिनसे यह चराचर जगत् व्याप्त है ॥ ३५-४५ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वैवस्वत मनु के वंश का वर्णन’ नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

1. श्रीमद्भागवत के वर्णनानुसार ध्रुव केवल छः मास तपस्या करके सिद्धि के भागी हुए थे। इस अग्निपुराण में तपस्याकाल बहुत अधिक कहा गया है। कल्पभेद से दोनों ही वर्णन संगत हो सकते हैं।

1. श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ८

2. श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय १३

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