June 6, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 026 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ छब्बीसवाँ अध्याय मुद्राणां लक्षणानि नारदजी कहते हैं — मुनिगण! अब मैं मुद्राओं का लक्षण बताऊँगा। सांनिध्य [^1] (संनिधापिनी) आदि [^2] मुद्रा के प्रकार-भेद हैं। पहली मुद्रा अञ्जलि [^3] है, दूसरी वन्दनी [^4] है और तीसरी हृदयानुगा है। बायें हाथ की मुट्ठी से दाहिने हाथ के अँगूठे को बाँध ले और बायें अङ्गुष्ठ को ऊपर उठाये रखे। सारांश यह है कि बायें और दाहिने- दोनों हाथों के अँगूठे ऊपर की ओर ही उठे रहें। यही ‘हृदयानुगा’ मुद्रा है। (इसी को कोई ‘संरोधिनी [^5] और कोई निष्ठुरा [^6] कहते हैं)। व्यूहार्चन में ये तीन मुद्राएँ साधारण हैं। अब आगे ये असाधारण (विशेष) मुद्राएँ बतायी जाती हैं। दोनों हाथों में अँगूठे से कनिष्ठा तक की तीन अँगुलियों को नवाकर कनिष्ठा आदि को क्रमशः मुक्त करने से आठ मुद्राएँ बनती हैं। ‘अ क च ट त प य श’ — ये जो आठ वर्ग हैं, उनके जो पूर्व बीज (अं कं चं टं इत्यादि) हैं, उनको ही सूचित करनेवाली उक्त आठ मुद्राएँ हैं — ऐसा निश्चय करे। फिर पाँचों अँगुलियों को ऊपर करके हाथ को सम्मुख करने से जो नवीं मुद्रा बनती है, वह नवम बीज ( क्षं) के लिये है ॥ १-४ ॥’ दाहिने हाथ के ऊपर बायें हाथ को उतान रखकर उसे धीरे-धीरे नीचे को झुकाये। यह वराह की मुद्रा मानी गयी है। ये क्रमशः अङ्गों की मुद्राएँ हैं। बायीं मुट्ठी में बँधी हुई एक-एक अँगुली को क्रमशः मुक्त करे और पहले की मुक्त हुई अँगुली को फिर सिकोड़ ले। बायें हाथ में ऐसा करने के बाद दाहिने हाथ में भी यही क्रिया करे।बायीं मुट्ठी के अँगूठे को ऊपर उठाये रखे। ऐसा करने से मुद्राएँ सिद्ध होती हैं ॥ ५-७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मुद्रालक्षण-वर्णन’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥ See Also:- मुद्रा लक्षण – मुद्रा प्रकरण [^1]: . दोनों हाथों के अंगूठों को ऊपर करके मुट्ठी बाँधकर दोनों मुट्ठियों को परस्पर सटाने से ‘संनिधापिनी मुद्रा’ होती है। [^2]: . ‘आदि’ पद से आवाहनी’ आदि मुद्राओं को ग्रहण करना चाहिये। उनके लक्षण ग्रन्थान्तर से जानने चाहिये। [^3]: . यहाँ अञ्जलि को प्रथम मुद्रा कहा गया है।’ अञ्जलि’ और ‘वन्दनी’ – दोनों मुद्राएँ प्रसिद्ध है अतः उनका विशेष लक्षण यहाँ नहीं दिया गया है। तथापि मन्त्रमहार्णव में अञ्जलि को ही ‘ अञ्जलिमुद्रा’ कहते हैं, यह परिभाषा दी गयी है – ‘अञ्जल्यञ्जलिमुद्रा स्यात्।’ [^4]: . हाथ जोड़कर नमस्कार करना ही ‘वन्दनी’ मुद्रा है। ईशानशिवगुरुदेव पद्धति में इसका लक्षण इस प्रकार दिया गया है- ‘बद्ध्वाञ्जलि पङ्कजकोशकल्पं यद्दक्षिणज्येष्ठिकया तु वामाम् । ज्येष्ठं समक्रम्य तु वन्दनीय मुद्रा नमस्कारविधी प्रयोज्या ॥’ अर्थात् कमल-मुकुल के समान अञ्जलि बाँधकर जब दाहिने अंगूठे से बायें अंगूठे को दबा दिया जाय तो ‘वन्दिनी मुद्रा’ होती है। इसका प्रयोग नमस्कार के लिये होना चाहिये (उत्तरार्ध क्रियापाद, सप्तम पटल ९) । [^5]: . यहाँ मूल में ‘हृदयानुगा’ मुद्रा का जो लक्षण दिया गया है, वही अन्यत्र ‘संरोधिनी मुद्रा’ का लक्षण है। मन्त्रमहार्णव में ‘संनिधापिनी मुद्रा का लक्षण देकर कहा है – अन्तः प्रवेशिताङ्गुष्ठा सैव संरोधिनी मता।’ अर्थात् संनिधापिनी को ही यदि उसकी मुट्ठियों के भीतर अङ्गुष्ठ का प्रवेश हो तो ‘संरोधिनी’ कहते हैं। हृदयानुगा में बायीं मुट्ठी के भीतर दाहिनी मुट्ठी का अंगूठा रहता है और बायाँ अंगूठा खुला रहता है, परंतु संरोधिनी में दोनों ही अँगूठे मुट्ठी के भीतर रहते हैं, यही अन्तर है। [^6]: . ईशानशिवगुरुदेव मिश्र ने शब्दान्तर से यही बात कही है। उन्होंने संनिरोधिनी को निष्ठुरा की संज्ञा दी है- संलग्नमुष्टयोः करयोः स्थितोर्ध्वज्येष्ठायुगं यत्र समुन्नताग्रम् । सा संनिधापिन्यथ सैव गर्भाङ्गुष्ठा भवेच्चेदिह निष्ठुराख्या ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe