June 8, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 042 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ बयालीसवाँ अध्याय प्रासाद लक्षण वर्णन प्रासादलक्षणकथनम् भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं सर्वसाधारण प्रासाद (देवालय) का वर्णन करता हूँ, सुनो। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि जहाँ मन्दिर का निर्माण कराना हो, वहाँ के चौकोर क्षेत्र के सोलह भाग करे। उसमें मध्य के चार भागों द्वारा आयसहित गर्भ ( मन्दिर के भीतरी भाग की रिक्त भूमि) निश्चित करे तथा शेष बारह भागों को दीवार उठाने के लिये नियत करे। उक्त बारह भागों में से चार भाग की जितनी लंबाई है, उतनी ही ऊँचाई प्रासाद की दीवारों की होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष दीवारों की ऊँचाई से दुगुनी शिखर की ऊँचाई रखे। शिखर के चौथे भाग की ऊँचाई के अनुसार मन्दिर की परिक्रमा की ऊँचाई रखे। उसी मान के अनुसार दोनों पार्श्व भागों में निकलने का मार्ग (द्वार) बनाना चाहिये। वे द्वार एक-दूसरे के समान होने चाहिये। मन्दिर के सामने के भूभाग का विस्तार भी शिखर के समान ही करना चाहिये जिस तरह उसकी शोभा हो सके, उसके अनुरूप उसका विस्तार शिखर से दूना भी किया जा सकता है। मन्दिर के आगे का सभामण्डप विस्तार में मन्दिर के गर्भसूत्र से दूना होना चाहिये। मन्दिर के पादस्तम्भ आदि भित्ति के बराबर ही लंबे बनाये जायें। वे मध्यवर्ती स्तम्भों से विभूषित हों अथवा मन्दिर के गर्भ का जो मान है, वही उसके मुख मण्डप (सभामण्डप या जगमोहन) का भी रखे। तत्पश्चात् इक्यासी पदों (स्थानों) से युक्त वास्तु मण्डप का आरम्भ करे ॥ १-७ ॥ इनमें पहले द्वारन्यास के समीपवर्ती पदों के भीतर स्थित होनेवाले देवताओं का पूजन करे। फिर परकोटे के निकटवर्ती एवं सबसे अन्त के पदों में स्थापित होनेवाले बत्तीस देवताओं की पूजा करे 1 ॥ ८ ॥ ‘ जितनी बड़ी प्रतिमा हो, उतनी ही बड़ी सुन्दर पिण्डी बनावे। पिण्डी के आधे मान से गर्भ का निर्माण करे और गर्भ के ही मान के अनुसार भित्तियाँ उठावे। भीतों की लंबाई के अनुसार ही उनकी ऊँचाई रखे। विद्वान् पुरुष भीतर की ऊँचाई से दुगुनी शिखर की ऊँचाई करावे। शिखर की अपेक्षा चौथाई ऊँचाई में मन्दिर की परिक्रमा बनवावे। तथा इसी ऊँचाई में मन्दिर के आगे के मुख मण्डप का भी निर्माण करावे ॥ १०-१२ ॥ गर्भ के आठवें अंश के माप का रथकों के निकलने का मार्ग (द्वार) बनावे। अथवा परिधि के तृतीय भाग के अनुसार वहाँ रथकों (छोटे-छोटे रथों)- की रचना करावे तथा उनके भी तृतीय भाग के माप का उन रथों के निकलने के मार्ग (द्वार) -का निर्माण करावे। तीन रथकों पर सदा तीन वामों की स्थापना करे ॥ १३-१४ ॥ शिखर के लिये चार सूत्रों का निपातन करे। शुकनासा 2 के ऊपर से सूत को तिरछा गिरावे । शिखर के आधे भाग में सिंह की प्रतिमा का निर्माण करावे । शुकनासा पर सूत को स्थिर करके उसे मध्य संधि तक ले जाय ॥ १५-१६ ॥ इसी प्रकार दूसरे पार्श्व में भी सूत्रपात करे। शुकनासा के ऊपर वेदी हो और वेदी के ऊपर आमलसार नामक कण्ठसहित कलश का निर्माण कराया जाय। उसे विकराल न बनाया जाय। जहाँ तक वेदी का मान है, उससे ऊपर ही कलश की कल्पना होनी चाहिये। मन्दिर के द्वार की जितनी चौड़ाई हो, उससे दूनी उसकी ऊँचाई रखनी चाहिये। द्वार को बहुत ही सुन्दर और शोभासम्पन्न बनाना चाहिये। द्वार के ऊपरी भाग में सुंदर मङ्गलमय वस्तुओं के साथ गूलर की दो शाखाएँ स्थापित करे (खुदवावे) ॥ १७-१९ ॥ द्वार के चतुर्थांश में चण्ड, प्रचण्ड, विष्वक्सेन और वत्सदण्ड – इन चार द्वारपालों की मूर्तियों का निर्माण करावे । गूलर की शाखाओं के अर्ध भाग में सुंदर रूपवाली लक्ष्मीदेवी के श्रीविग्रह को अङ्कित करें। उनके हाथ में कमल हो और दिग्गज कलशों के जल द्वारा उन्हें नहला रहे हों। मन्दिर के परकोटे की ऊँचाई उसके चतुर्थांश के बराबर हो । प्रासाद के गोपुर की ऊँचाई प्रासाद से एक चौथाई कम हो। यदि देवता का विग्रह पाँच हाथ का हो तो उसके लिये एक हाथ की पीठिका होनी चाहिये ॥ २०-२२ ॥ विष्णु–मन्दिर के सामने एक गरुडमण्डप तथा भौमादि धाम का निर्माण करावे। भगवान् के श्रीविग्रह के सब ओर आठों दिशाओं के ऊपरी भाग में भगवत्प्रतिमा से दुगुनी बड़ी अवतारों की मूर्तियाँ बनावे। पूर्व दिशा में वराह, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में श्रीधर, उत्तर में हयग्रीव, अग्निकोण में परशुराम, नैर्ऋत्यकोण में श्रीराम, वायव्यकोण में वामन तथा ईशानकोण में वासुदेव की मूर्ति का निर्माण करे। प्रासाद- रचना आठ, बारह आदि समसंख्यावाले स्तम्भों द्वारा करनी चाहिये। द्वार के अष्टम आदि अंश को छोड़कर जो वेध होता है, वह दोषकारक नहीं होता है ॥ २३-२६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘प्रासाद आदि के लक्षण का वर्णन’ नामक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥ 1. नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीय पाद, ५६वें अध्याय के ६०० से लेकर ६०३ तक के श्लोकों में भी यही बात कही गयी है। 2. शिखर के चार भाग करके नीचे के दो भागों को ‘शुकनासा’ कहते हैं। उसके ऊपर के तीसरे भाग में वेदी होती है, जिस पर उसका कण्ठमात्र स्थित होता है। सबसे ऊपर के चतुर्थ भाग में ‘आमलसार’ संज्ञक कण्ठ का निर्माण कराया जाना चाहिये। जैसा कि मत्स्यपुराण में कहा है- चतुर्धा शिखरं भव्य अर्थभागद्वयस्य तु । शुकनासं प्रकुर्वीत तृतीये वेदिका मता ॥ कण्ठमामलसारं तु चतुर्थे परिकल्पयेत् ।(269 । 18-19) Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe