June 9, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 048 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ अड़तालीसवाँ अध्याय चतुर्विंशति मूर्तिस्तोत्र एवं द्वादशाक्षर स्तोत्र चतुर्विंशतिमूर्तिस्तोत्रकथनम् श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथों में पद्य, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले हैं ।1 नारायण शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं, मैं प्रदक्षिणापूर्वक उनके चरणों में नतमस्तक होता हूँ । माधव गदा, चक्र, शङ्ख और पद्म धारण करनेवाले हैं, मैं उनको नमस्कार करता हूँ । गोविन्द अपने हाथों में क्रमश: चक्र, गदा, पद्म और शङ्ख धारण करने वाले तथा बलशाली हैं । श्रीविष्णु गदा, पद्म, शङ्ख एवं चक्र धारण करते हैं, वे मोक्ष देने वाले हैं । मधुसूदन शङ्ख, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं । मैं उनके सामने भक्तिभाव से नतमस्तक होता हूँ । त्रिविक्रम क्रमशः पद्य, गदा, चक्र एवं शङ्ख धारण करते हैं । भगवान् वामन के हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म शोभा पाते हैं, वे सदा मेरी रक्षा करें ॥ १-४ ॥ ‘ श्रीधर कमल, चक्र, शाङ्ग धनुष एवं शङ्ख धारण करते हैं । वे सबको सद्गति प्रदान करने वाले हैं । हृषीकेश गदा, चक्र, पद्म एवं शङ्ख धारण करते हैं, वे हम सबकी रक्षा करें । वरदायक भगवान् पद्मनाभ शङ्ख, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं । दामोदर के हाथों में पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र शोभा पाते हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ । गदा, शङ्ख, चक्र और पद्म धारण करने वाले वासुदेव ने ही सम्पूर्ण जगत् का विस्तार किया है । गदा, शङ्ख, पद्म और चक्र धारण करने वाले संकर्षण आप लोगों की रक्षा करें ॥ ५-७ ॥ वाद (युद्ध)-कुशल भगवान् प्रद्युम्न चक्र, शङ्ख, गदा और पद्य धारण करते हैं । अनिरुद्ध चक्र, गदा, शङ्ख और पद्म धारण करने वाले हैं, वे हम लोगों की रक्षा करें । सुरेश्वर पुरुषोत्तम चक्र, कमल, शङ्ख और गदा धारण करते हैं, भगवान् अधोक्षज पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण करने वाले हैं । वे आप लोगों की रक्षा करें । नृसिंहदेव चक्र, कमल, गदा और शङ्ख धारण करने वाले हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ । श्रीगदा, पद्म, चक्र और शङ्ख धारण करने वाले अच्युत आप लोगों की रक्षा करें । शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण करने वाले बालवटुरूपधारी वामन, पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण करने वाले जनार्दन रक्षा करें । शङ्ख, पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शङ्ख, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करने वाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देने वाले हों ॥ ८-१२ ॥ आदिमूर्ति भगवान् वासुदेव हैं । उनसे संकर्षण प्रकट हुए । संकर्षण से प्रद्युम्न और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध का प्रादुर्भाव हुआ । इनमें से एक-एक क्रमशः केशव आदि मूर्तियों के भेद से तीन-तीन रूपों में अभिव्यक्त हुआ । (अतः कुल मिलाकर बारह स्वरूप हुए)।1 तात्पर्य यह है कि वासुदेव से केशव, नारायण और माधव की, संकर्षण से गोविन्द, विष्णु और मधुसदन की, प्रद्युम्न से त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर की तथा अनिरुद्ध से हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदर की अभिव्यक्ति हुई । चौबीस-मूर्तियों की स्तुति से युक्त इस द्वादशाक्षर स्तोत्र का जो पाठ अथवा श्रवण करता है, वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त कर लेता है 2 ॥ १३-१५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘श्रीहरि की चौबीस मूर्तियों के स्तोत्र का वर्णन’ नामक अड़तालीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥ 1. तात्पर्य यह है कि वासुदेव से केशव, नारायण और माधव की, संकर्षण से गोविन्द, विष्णु और मधुसदन की, प्रद्युम्न से त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर की तथा अनिरुद्ध से हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदर की अभिव्यक्ति हुई । 2. इस अध्याय में बारह श्लोक स्तुति के हैं । प्रत्येक श्लोक में भगवान् की दो-दो मूर्तियों का स्तवन हुआ तथा इन बारहों श्लोकों के आदि का एक-एक अक्षर जोड़ने से ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ यह द्वादशाक्षर मन्त्र बनता है । इसीलिये इसे द्वादशाक्षर-स्तोत्र एवं चौबीस मूर्तियों का स्तोत्र कहते हैं । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe