June 9, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 049 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ उनचासवाँ अध्याय मत्स्यादि दशावतारों की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन मत्स्यादिदशावतारप्रतिमालक्षणवर्णनम् भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हें मत्स्य आदि दस अवतार विग्रहों का लक्षण बताता हूँ। मत्स्य भगवान् की आकृति मत्स्य के समान और कूर्म भगवान् की प्रतिमा कूर्म (कच्छप)- के आकार की होनी चाहिये। पृथ्वी के उद्धारक भगवान् वराह को मनुष्याकार बनाना चाहिये, वे दाहिने हाथ में गदा और चक्र धारण करते हैं। उनके बायें हाथ में शङ्ख और पद्म शोभा पाते हैं। अथवा पद्म के स्थान पर वाम भाग में पद्मा देवी सुशोभित होती हैं। लक्ष्मी उनके बायें कूर्पर (कोहनी) – का सहारा लिये रहती हैं। पृथ्वी तथा अनन्त चरणों के अनुगत होते हैं। भगवान् वराह की स्थापना से राज्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। नरसिंह का मुँह खुला हुआ है। उन्होंने अपनी बायीं जाँघ पर दानव हिरण्यकशिपु को दबा रखा है और उस दैत्य के वक्ष को विदीर्ण करते दिखायी देते हैं। उनके गले में माला है और हाथों में चक्र एवं गदा प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १-४ ॥’ वामन का विग्रह छत्र एवं दण्ड से सुशोभित होता है अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज बनाया जाय। परशुराम के हाथों में धनुष और बाण होना चाहिये। वे खड्ग और फरसे से भी शोभित होते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के श्रीविग्रह को धनुष, बाण, खड्ग और शङ्ख से सुशोभित करना चाहिये। अथवा वे द्विभुज माने गये हैं। बलरामजी गदा एवं हल धारण करने वाले हैं, अथवा उन्हें भी चतुर्भुज बनाना चाहिये। उनके बायें भाग के ऊपर वाले हाथ में हल धारण करावे और नीचे वाले में सुन्दर शोभा वाली शङ्ख, दायें भाग के ऊपर वाले हाथ में मुसल धारण करावे और नीचे वाले हाथ में शोभायमान सुदर्शन चक्र ॥ ५-७ ॥ बुद्धदेव की प्रतिमा का लक्षण यों है। बुद्ध ऊँचे पद्ममय आसन पर बैठे हैं। उनके एक हाथ में वरद और दूसरे में अभय की मुद्रा है। वे शान्तस्वरूप हैं। उनके शरीर का रंग गोरा और कान लम्बे हैं। वे सुन्दर पीत वस्त्र से आवृत हैं। कल्की भगवान् धनुष और तूणीर से सुशोभित हैं। म्लेच्छों के संहार में लगे हैं। वे ब्राह्मण हैं। अथवा उनकी आकृति इस प्रकार बनावे – वे घोड़े की पीठ पर बैठे हैं और अपने चार हाथों में खड्ग, शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करते हैं ॥ ८-९ ॥ ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हें वासुदेव आदि नौ मूर्तियों के लक्षण बताता हूँ। दाहिने भाग के ऊपर वाले हाथ में उत्तम चक्र – यह वासुदेव की मुख्य पहचान है। उनके एक पार्श्व में ब्रह्मा और दूसरे भाग में महादेवजी सदा विराजमान रहते हैं। वासुदेव की शेष बातें पूर्ववत् हैं। वे शङ्ख अथवा वरद की मुद्रा धारण करते हैं। उनका स्वरूप द्विभुज अथवा चतुर्भुज होता है। बलराम के चार भुजाएँ हैं। वे दायें हाथ में हल और मुसल तथा बायें हाथ में गदा और पद्म धारण करते हैं। प्रद्युम्न दायें हाथ में चक्र और शङ्ख तथा बायें हाथ में धनुष-बाण धारण करते हैं। अथवा द्विभुज प्रद्युम्न के एक हाथ में गदा और दूसरे में धनुष है। वे प्रसन्नतापूर्वक इन अस्त्रों को धारण करते हैं। या उनके एक हाथ में धनुष और दूसरे में बाण है। अनिरुद्ध और भगवान् नारायण का विग्रह चतुर्भुज होता है ॥ १०-१३ ॥ ब्रह्माजी हंस पर आरूढ होते हैं। उनके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। उदर-मण्डल विशाल है। लंबी दाढ़ी और सिर पर जटा-यही उनकी प्रतिमा का लक्षण है। वे दाहिने हाथों में अक्षसूत्र और स्रुवा एवं बायें हाथों में कुण्डिका और आज्यस्थाली धारण करते हैं। उनके वाम भाग में सरस्वती और दक्षिण भाग में सावित्री हैं। विष्णु के आठ भुजाएँ हैं। वे गरुड़ पर आरूढ़ हैं। उनके दाहिने हाथों में खड्ग, गदा, बाण और वरद की मुद्रा है। बायें हाथों में धनुष, खेट, चक्र और शङ्ख हैं। अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज भी है। नृसिंह के चार भुजाएँ हैं। उनकी दो भुजाओं में शङ्ख और चक्र हैं तथा दो भुजाओं से वे महान् असुर हिरण्यकशिपु का वक्ष विदीर्ण कर रहे हैं ॥ १४-१७ ॥ वराह के चार भुजाएँ हैं। उन्होंने शेषनाग को अपने करतल में धारण कर रखा है। वे बायें हाथ से पृथ्वी को और वाम भाग में लक्ष्मी को धारण करते हैं। जब लक्ष्मी उनके साथ हों, तब पृथ्वी को उनके चरणों में संलग्न बनाना चाहिये। त्रैलोक्यमोहन मूर्ति श्रीहरि गरुड़ पर आरूढ़ हैं। उनके आठ भुजाएँ हैं। वे दाहिने हाथों में चक्र, शङ्ख, मुसल और अंकुश धारण करते हैं। उनके बायें हाथों में शङ्ख, शार्ङ्गधनुष, गदा और पाश शोभा पाते हैं। वाम भाग में कमलधारिणी कमला और दक्षिण भाग में वीणाधारिणी सरस्वती की प्रतिमाएँ बनानी चाहिये। भगवान् विश्वरूप का विग्रह बीस भुजाओं से सुशोभित है। वे दाहिने हाथों में क्रमशः चक्र, खड्ग, मुसल, अंकुश, पट्टिश, मुद्गर, पाश, शक्ति, शूल तथा बाण धारण करते हैं। बायें हाथों में शङ्ख, शार्ङ्गधनुष, गदा, पाश, तोमर, हल, फरसा, दण्ड, छुरी और उत्तम ढाल लिये रहते हैं। उनके दाहिने भाग में चतुर्भुज ब्रह्मा तथा बायें भाग में त्रिनेत्रधारी महादेव विराजमान हैं। जलशायी जल में शयन करते हैं। इनकी मूर्ति शेषशय्या पर सोयी हुई बनानी चाहिये। भगवती लक्ष्मी उनकी एक चरण की सेवा में लगी हैं। विमला आदि शक्तियाँ उनकी स्तुति करती हैं। उन श्रीहरि के नाभिकमल पर चतुर्भुज ब्रह्मा विराज रहे हैं ॥ १८-२४ ॥ हरिहर मूर्ति इस प्रकार बनानी चाहिये – वह दाहिने हाथ में शूल तथा ॠष्टि धारण करती है और बायें हाथ में गदा एवं चक्र शरीर के दाहिने भाग में रुद्र के चिह्न हैं और वाम भाग में केशव के । दाहिने पार्श्व में गौरी तथा वाम पार्श्व में लक्ष्मी विराज रही हैं। भगवान् हयग्रीव के चार हाथों में क्रमश: शङ्ख, चक्र, गदा और वेद शोभा पाते हैं। उन्होंने अपना बायाँ पैर शेषनाग पर और दाहिना पैर कच्छप की पीठ पर रख छोड़ा है। दत्तात्रेय के दो बाँहें हैं। उनके वामाङ्क में लक्ष्मी शोभा पाती है। भगवान् के पार्षद विष्वक्सेन अपने चार हाथों में क्रमशः चक्र, गदा, हल और शङ्ख धारण करते हैं ॥ २५-२७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मत्स्यादि दशावतारों की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन’ नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe