June 10, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 052 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ बावनवाँ अध्याय चौंसठ योगिनी आदि की प्रतिमाओं के लक्षण का वर्णन देवीप्रतिमालक्षणम् श्रीभगवान् बोले — ब्रह्मन् ! अब मेँ चाँसठ योगिनियों का वर्णन करूँगा। इनका स्थान क्रमशः पूर्वदिशा से लेकर ईशानपर्यन्त है। इनके नाम इस प्रकार हैं — १. अक्षोभ्या, २. रूक्षकर्णी, ३. राक्षसी, ४. क्षपणा, ५. क्षमा, ६. पिङ्गाक्षी, ७. अक्षया, ८. क्षेमा, ९. इला, १०. नीलालया, ११. लोला, १२. रक्ता (या लक्ता), १३. बलाकेशी, १४. लालसा, १५. विमला, १६. दुर्गा (अथवा हुताशा ), १७. विशालाक्षी, १८. ह्रींकारा (या हुंकारा), १९. वडवामुखी, २०. महाक्रूरा, २१. क्रोधना, २२. भयंकरी, २३. महानना, २४ सर्वज्ञा, २५. तरला, २६ तारा, २७. ऋग्वेदा, २८. हयानना, २९. सारा, ३०. रससंग्राही (अथवा सुसंग्राही या रुद्रसंग्राही), ३१. शबरा ( या शम्बरा), ३२. तालजङ्घिका ३३. रक्ताक्षी, ३४. सुप्रसिद्धा, ३५. विद्युजिह्वा, ३६. करङ्किणी, ३७. मेघनादा, ३८. प्रचण्डा, ३९. उग्रा, ४०. कालकर्णी, ४१. वरप्रदा, ४२. चण्डा (अथवा चन्द्रा), ४३. चण्डवती (या चन्द्रावली), ४४. प्रपञ्चा, ४५. प्रलयान्तिका, ४६. शिशुवक्त्रा, ४७. पिशाची, ४८. पिशितासवलोलुपा, ४९. धमनी, ५०. तपनी, ५१. रागिणी (अथवा वामनी), ५२. विकृतानना, ५३. वायुवेगा, ५४. बृहत्कुक्षि, ५५. विकृता, ५६. विश्वरूपिका, ५७. यमजिह्वा, ५८. जयन्ती, ५९. दुर्जया, ६०. जयन्तिका ( अथवा यमान्तिका), ६१. विडाली, ६२. रेवती, ६३. पूतना तथा ६४ विजयान्तिका ॥ १-८ ॥ ‘ योगिनियाँ आठ अथवा चार हाथों से युक्त होती हैं। इच्छानुसार शस्त्र धारण करती हैं तथा उपासकों को सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं। भैरव के बारह हाथ हैं। उनके मुख में ऊँचे दाँत हैं तथा वे सिर पर जटा एवं चन्द्रमा धारण करते हैं। उन्होंने एक ओर के पाँच हाथों में क्रमश: खड्ग, अंकुश, कुठार, बाण तथा जगत् को अभय प्रदान करने वाली मुद्रा धारण कर रखी है। उनके दूसरी ओर के पाँच हाथ धनुष, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, पाशकार्द्ध एवं वर की मुद्रा से सुशोभित हैं। शेष दो हाथों में उन्होंने गजचर्म ले रखा है। हाथी का चमड़ा ही उनका वस्त्र है और वे सर्पमय आभूषणों से विभूषित हैं। प्रेत पर आसन लगाये मातृकाओं के मध्यभाग में विराजमान हैं। इस रूप में उनकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। भैरव के एक या पाँच मुख बनाने चाहिये ॥ ९-११ ॥ पूर्व दिशा से लेकर अग्निकोण तक विलोम-क्रम से प्रत्येक दिशा में भैरव को स्थापित करके क्रमशः उनका पूजन करे। बीज मन्त्र को आठ दीर्घ स्वरों में से एक-एक के द्वारा भेदित एवं अनुस्वारयुक्त करके उस उस दिशा के भैरव के साथ संयुक्त करे और उन सबके अन्त में ‘नमः’ पद को जोड़े। यथा — ॐ ह्रां भैरवाय नमः – प्राच्याम् । ॐ ह्रीं भैरवाय नमः – ऐशान्याम्। ॐ ह्रूं भैरवाय नमः – उदीच्याम् । ॐ ह्रें भैरवाय नमः – वायव्ये । ॐ ह्रैं भैरवाय नमः – प्रतीच्याम् । ॐ ह्रों भैरवाय नमः – नैर्ऋत्याम् । ॐ ह्रौं भैरवाय नमः – अवाच्याम् । ॐ ह्रः भैरवाय नमः – आग्नेय्याम् । इस प्रकार इन मन्त्रों द्वारा क्रमशः उन दिशाओं में भैरव का पूजन करे। इन्हीं में से छः बीजमन्त्र द्वारा षडङ्गन्यास एवं उन अङ्गों का पूजन भी करना चाहिये 1 ॥ १२ ॥ उनका ध्यान इस प्रकार है — मन्दिराग्निदलारुढं सुवर्णरसकान्वितम्। नादविन्द्विन्दुसंयुक्तंमातृनाथाङ्गदीपितम् ॥ १३ ॥ भैरवजी मन्दिर अथवा मण्डल के आग्नेयदल (अग्निकोणस्थ दल) – में विराजमान सुवर्णमयी रसना से युक्त, नाद, बिन्दु एवं इन्दु से सुशोभित तथा मातृकाधिपति के अङ्ग से प्रकाशित हैं। (ऐसे भगवान् भैरव का मैं भजन करता हूँ।) वीरभद्र वृषभ पर आरूढ हैं। वे मातृकाओं के मण्डल में विराजमान और चार भुजाधारी हैं। गौरी दो भुजाओं से युक्त और त्रिनेत्रधारिणी हैं। उनके एक हाथ में शूल और दूसरे में दर्पण है। ललितादेवी कमल पर विराजमान हैं। उनके चार भुजाएँ हैं। वे अपने हाथों में त्रिशूल, कमण्डलु, कुण्डी और वरदान की मुद्रा धारण करती हैं। स्कन्द की अनुचरी मातृकागणों के हाथों में दर्पण और शलाका होनी चाहिये ॥ १३-१५ ॥ चण्डिका देवी के दस हाथ हैं। वे अपने दाहिने हाथों में बाण, खड्ग, शूल, चक्र और शक्ति धारण करती हैं और बायें हाथों में नागपाश, ढाल, अंकुश, कुठार तथा धनुष लिये रहती हैं। वे सिंह पर सवार हैं और उनके सामने शूल से मारे गये महिषासुर का शव है ॥ १६-१७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘चौसठ योगिनी आदि की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन’ नामक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥ 1. यथा – ॐ ह्रां हृदयाय नमः । ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ ह्रूं शिखायै वषट्। ॐ ह्रैं कवचाय हुम्। ॐ ह्रौं, नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐह्र: अस्त्राय फट् । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe