June 13, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 071 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ इकहत्तरवाँ अध्याय गणपतिपूजन की विधि गणेशपूजाविधिः भगवान् महेश्वर ने कहा — कार्तिकेय ! मैं विघ्नों के विनाश के लिये गणपतिपूजा की विधि बतलाता हूँ, जो सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थो को सिद्ध करनेवाली है। ‘गणंजयाय स्वाहा० ‘ – हृदय, ‘एकदंष्ट्राय हुं फट्’ – सिर, ‘अचलकर्णिने नमो नमः । – शिखा, ‘गजवक्त्राय नमो नमः ।’-कवच, ‘महोदराय चण्डाय नमः ।’ – नेत्र एवं ‘सुदण्डहस्ताय हुं फट् । ‘ – अस्त्र है। इन मन्त्रों द्वारा अङ्गन्यास करे। गण, गुरु, गुरु पादुका, शक्ति, अनन्त और धर्म- इनका मुख्य कमल – मण्डल के ऊर्ध्व तथा निम्न दलों में पूजन करे एवं कमलकर्णिका में बीज की अर्चना करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या एवं विघ्ननाशिनी — इन नौ पीठशक्तियों की भी पूजा करे। फिर चन्दन के चूर्ण का आसन समर्पित करे। ‘यं’ शोषकवायु, ‘रे’ अग्नि, ‘लं’ प्लव (पृथिवी) तथा ‘वं’ अमृत का बीज माना गया है। ‘ॐ लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।’– यह गणेश गायत्री- मन्त्र है। गणपति, गणाधिप, गणेश, गणनायक, गणक्रीड, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, धूम्रवर्ण तथा इन्द्र आदि दिक्पाल – इन सबका गणपति की पूजा में अङ्गरूप से पूजन करे ॥ १-८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गणपतिपूजा-विधिकथन’ नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe