अग्निपुराण – अध्याय 083
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तिरासीवाँ अध्याय
निर्वाण दीक्षा के अन्तर्गत अधिवासन की विधि
निर्वाणदीक्षाकथनम्

भगवान् शंकर कहते हैं — षडानन स्कन्द ! तदनन्तर निर्वाण- दीक्षा में पाशबन्धन-शक्ति के लिये और ताड़न आदि के लिये मूल मन्त्र आदि का दीपन करे। उस समय प्रत्येक के लिये एक-एक या तीन-तीन आहुति देकर मन्त्रों का दीपन- कर्म सम्पन्न करे। आदि में प्रणव और अन्त में ‘हूं फट्’ लगाकर बीच में बीज, गर्भ एवं शिखाबन्ध स्वरूप तीन ‘हूं’ का उच्चारण करे। इससे मूल मन्त्र का दीपन होता है, यथा — ॐ हूं हूं हूं हूं फट्।’ इसी से हृदय का दीपन होता है। यथा — ॐ हूं हूं हूं हूं फट् हृदयाय नमः।’ फिर ‘ॐ हूं हूं हूं हूं फट् शिरसे स्वाहा।’ आदि कहकर सिर आदि अङ्गों का दीपन करे। समस्त क्रूर कर्मों में इसी तरह मूलादि का दीपन करना उचित है। शान्तिकर्म, पुष्टिकर्म और वशीकरण में आदिगत प्रणव- मन्त्र के अन्त में ‘वषट्’ जोड़कर उसी मन्त्र द्वारा प्रत्येक का दीपन करे । ‘वषट्’ और ‘वौषट्’ से युक्त तथा सम्पूर्ण काम्य- कर्मो के ऊपर स्थित शम्बर-मन्त्रों द्वारा आप्यायन आदि सभी कर्मों में हवन करना चाहिये ॥ १-५ ॥’

तत्पश्चात् अपने वामभाग में स्थित और मण्डल में विराजमान शुद्ध शरीरवाले शिष्य का पूजन करके, एक उत्तम सूत्र में सुषुम्णा नाड़ी की भावना करके, मूल मन्त्र से उसको शिखाबन्ध तक ले जाकर, वहाँ से फिर पैरों के अँगूठे तक ले आवे। तत्पश्चात् संहार- क्रम से उसे पुनः मुमुक्षु शिष्य की शिखा के समीप ले जाय और वहीं उसे बाँध दे। पुरुष के दाहिने भाग में और नारी के वामभाग में उस सूत्र को नियुक्त करना चाहिये। इसके बाद शिष्य के मस्तक पर शक्तिमन्त्र से पूजित शक्ति को संहारमुद्रा द्वारा लाकर उक्त सूत्र में उसी मन्त्र से जोड़ दे। सुषुम्णा नाड़ी को लेकर मूल मन्त्र से उसका सूत्र में न्यास करे और हृदय-मन्त्र से उसकी पूजा करे। तदनन्तर कवच- मन्त्र से अवगुण्ठित करके हृदय मन्त्र द्वारा तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ नाड़ी के संनिधान के लिये दी जाती हैं। शक्ति के संनिधान के लिये भी इसी तरह आहुति देने का विधान है ॥ ६-१० ॥

तदनन्तर ‘ॐ हां तत्त्वाध्वने नमः ।’, ‘ ॐ हां पदाध्वने नमः ।’, ‘ॐ हां वर्णाध्वने नमः ।’, ‘ॐ हां मन्त्राध्वने नमः ।’, ‘ॐ हां कलाध्वने नमः ।’, ‘ॐ हां भुवनाध्वने नमः । — इन मन्त्रों से पूर्वोक्त सूत्र में छ: प्रकार के अध्वाओं का न्यास करके अस्त्र-मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित जल से शिष्य का प्रोक्षण करे। फिर अस्त्र-मन्त्र के जपपूर्वक पुष्प लेकर उसके द्वारा शिष्य के हृदय में ताड़न करे। इसके बाद हूंकारयुक्त रेचक प्राणायाम के योग से वहाँ शिष्य के शरीर में प्रवेश करके, उसके भीतर हंस –बीज में स्थित जीवचैतन्य को अस्त्र-मन्त्र पढ़कर वहाँ से विलग करे। इसके बाद ‘ॐ हः हूं फट् ।’ इस शक्तिसूत्र से तथा ‘हां हां स्वाहा।’ इस मन्त्र से संहारमुद्रा द्वारा उक्त नाड़ीभूत सूत्र में उस विलग हुए जीवचैतन्य को नियुक्त करे। ‘ॐ हां हां हामात्मने नमः।’ इस मन्त्र का जप करते हुए जीवात्मा के व्यापक होने की भावना करे। फिर कवच मन्त्र से उसका अवगुण्ठन करे और उसके सांनिध्य के लिये हृदय- मन्त्र से तीन बार आहुतियाँ दे ॥ ११-१८ ॥

तत्पश्चात् विद्यादेह का न्यास करके उसमें शान्त्यतीतकला का अवलोकन करे। उस कला के अन्तर्गत इतर तत्त्वों से युक्त आत्मा का चिन्तन करे। ‘ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय नमः।’ इस मन्त्र से उक्त कला का अवलोकन करे। दो तत्त्व, एक मन्त्र, एक पद, सोलह वर्ण, आठ भुवन, क, ख आदि बीज और नाड़ी, दो कलाएँ, विषय, गुण और एकमात्र कारणभूत सदाशिव – इन सबका श्वेतवर्णा शान्त्यतीतकला में अन्तर्भाव करके ‘ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय हूं फट् ।’ इस मन्त्र से प्रताड़न करे। संहारमुद्रा द्वारा उक्त कलापाश को लेकर सूत्र के मस्तक पर रखे और उसकी पूजा करे । तदनन्तर उसके सांनिध्य के लिये पूर्ववत् तीन आहुतियाँ दे । शान्त्यतीतकला का अपना बीज है – ‘हूं’। दो तत्व, दो अक्षर, बीज, नाड़ी, क, ख- ये दो अक्षर दो गुण, दो मन्त्र, कमल में विराजमान एकमात्र कारणभूत ईश्वर, बारह पद, सात लोक और एक विषय – इन सबका कृष्णवर्णा शान्तिकला के भीतर चिन्तन करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् ताड़न करके सूत्र के मुखभाग में इन सबका नियोजन करे। इसके बाद सांनिध्य के लिये अपने बीज मन्त्र द्वारा तीन आहुतियाँ दे शान्तिकला का अपना बीज है – ‘हूं हूं ‘ ॥ १९-२७ ॥

सात तत्त्व, इक्कीस पद, छ: वर्ण, एक शम्बर, पचीस लोक, तीन गुण एक विषय, रुद्ररूप कारणतत्त्व, बीज, नाड़ी और क, ख ये दो कलाएँ —  इन सबका अत्यन्त रक्तवर्णवाली विद्याकला में अन्तर्भाव करके आवाहन और संयोजनपूर्वक पूर्वोक्त सूत्र के हृदयभाग में स्थापित करके अपने मन्त्र से पूजन करे और इन सबकी संनिधि के लिये पूर्ववत् तीन आहुतियाँ दे । आहुति के लिये बीज- मन्त्र इस प्रकार है — ‘हूं हूं हूं।’ चौबीस तत्त्व, पचीस वर्ण, बीज, नाड़ी, क, ख —ये दो कलाएँ, बाईस पद, साठ लोक, साठ कला, चार गुण, तीन मन्त्र, एक विषय तथा कारणरूप श्रीहरि का शुक्लर्णा प्रतिष्ठा कला में अन्तर्भाव करके ताड़न आदि करे। फिर इन सबका पूर्वोक्त सूत्र के नाभिभाग में संयोजन करके संनिधिकरण के लिये तीन आहुतियाँ दे। उसके लिये बीज-मन्त्र इस प्रकार है — ‘हूं हूं हूं हूं।’ एक सौ आठ भुवन या लोक, अट्ठाईस पद, बीज, नाड़ी और समीर की दो-दो संख्या, दो इन्द्रियाँ, एक वर्ण, एक तत्त्व, एक विषय, पाँच गुण, कारणरूप कमलासन ब्रह्मा और चार शम्बर- इन सबका पीतवर्णा निवृत्तिकला में अन्तर्भाव करके ताड़न करे। इन्हें ग्रहण करके सूत्र के चरणभाग में स्थापित करने के पश्चात् इनकी पूजा करे और इनके सांनिध्य के लिये अग्नि में तीन आहुतियाँ दे । आहुति के लिये बीज-मन्त्र यों है — ‘हूं हूं हूं हूं हूं’ ॥ २८-३५ ॥

इस प्रकार सूत्रगत पाँच कलाओं को लेकर शिष्य के शरीर में उनका संयोजन करे। सबीजादीक्षा में समयाचार- पाश से, देहारम्भक धर्म से, मन्त्रसिद्धि के फल से तथा इष्टापूर्तादि धर्म से भी भिन्न चैतन्यरोधक सूक्ष्म प्रबन्धक का कलाओं के भीतर चिन्तन करे। इसी क्रम से अपने मन्त्र द्वारा तीन-तीन आहुतियाँ देते हुए तर्पण और दीपन करे। ॐ हूं शान्त्यतीत-कलापाशाय स्वाहा।’ इत्यादि मन्त्र से तर्पण करे। ‘ॐ हूं हूं शान्त्यतीतकलापाशाय हूं हूं फट्।’– इत्यादि मन्त्र से दीपन करे। पूर्वोक्त सूत्र को व्याप्ति- बोध के लिये पाँच कला- स्थानों में सुरक्षापूर्वक रखकर उस पर कुकुम आदि के द्वारा साङ्ग- शिव का पूजन करे। फिर कला–मन्त्रों के अन्त में ‘हूं फट्।’– इन पदों को जोड़कर उनका उच्चारण करते हुए क्रमशः पाशों का भेदन करके नमस्कारान्त कला मन्त्रों द्वारा ही उनके भीतर प्रवेश करे। साथ ही उन कलाओं का ग्रहण एवं बन्धन भी करे। ‘ॐ हूं हूं हूं शान्त्यतीतकलां गृह्णामि बध्नामि च । – इत्यादि मन्त्रों द्वारा कलाओं के ग्रहण एवं बन्धन आदि का प्रयोग होता है। पाश आदि का वशीकरण (या भेदन), ग्रहण और बन्धन तथा पुरुष के प्रति सम्पूर्ण व्यापारों का निषेध – यह बारंबार प्रत्येक कला के लिये आवश्यक कर्तव्य है ॥ ३६-४४ ॥

तदनन्तर शिष्य को बिठाकर, पूर्वोक्त सूत्र को उसके कंधे से लेकर उसके हाथ में दे और भूले- भटके पापों का नाश करने के लिये सौ बार मूल- मन्त्र से हवन करे। अस्त्र – सम्बन्धी मन्त्र के सम्पुट में पुरुष के और प्रणव के सम्पुट में स्त्री के सूत्र को रखकर उसे हृदय मन्त्र से सम्पुटित करके उसी मन्त्र से उसकी पूजा करे। साङ्ग- शिव से सूत्र को सम्पात – शोधित करके कलश के नीचे रखे और उसकी रक्षा के लिये इष्टदेव से प्रार्थना करे। शिष्य के हाथ में फूल देकर कलश आदि का पूजन एवं प्रणाम करने के अनन्तर याग मन्दिर के मध्यभाग से बाहर जाय । वहाँ तीन मण्डल बनाकर मुक्ति की इच्छा रखनेवाले शिष्यों को उत्तराभिमुख बिठावे और भोग की अभिलाषा रखनेवाले शिष्यों को पूर्वाभिमुख ॥ ४५-४९ ॥

पहले कुशयुक्त हाथ से तीन चुल्लू पञ्चगव्य पिलावे । बीच में कोई आचमन न करे। तत्पश्चात् दूसरी बार प्रत्येक शिष्य को तीन या आठ ग्रास चरु दे। मुक्तिकामी शिष्य को पलाश के दोने में और भोगेच्छु को पीपल के पत्ते से बने हुए दोने में चरु देकर उसे हृदय मन्त्र के उच्चारणपूर्वक दाँतों के स्पर्श के बिना खिलाना चाहिये। चरु देकर गुरु स्वयं हाथ धो शुद्ध होकर पवित्र जल से उन शिष्यों को आचमन करावे। इसके बाद हृदय-मन्त्र से दातुन करके उसे फेंक दे। [^1]  उसका मुखभाग शुभ दिशा की ओर हो तो उसका शुभ फल होता है। न्यूनता आदि दोष को दूर करने के लिये मूल- मन्त्र से एक सौ आठ बार आहुति दे स्थण्डिलेश्वर (वेदी पर स्थापित पूजित शिव) को सम्पूर्ण कर्म समर्पित करे। तदनन्तर इनकी पूजा और विसर्जन करके चण्डेश का पूजन करे ॥ ५०-५४ ॥

तत्पश्चात् निर्माल्य को हटाकर चरु के शेष भाग को अग्नि में होम दे। कलश और लोकपालों का पूजन एवं विसर्जन करके गण और अग्नि का भी, यदि वे बाह्य दिशा में रक्षित हों तो, विसर्जन करे। मण्डल से बाहर लोकपालों को भी संक्षेप से बलि अर्पित करके भस्म और शुद्ध जल के द्वारा स्नान करने के पश्चात् यागमण्डप में प्रवेश करे। वहाँ गृहस्थ साधकों को कुश की शय्या पर अस्त्र-मन्त्र से रक्षित करके सुलावे। उनका सिरहाना पूर्व की ओर होना चाहिये। जो साधक या शिष्य विरक्त हों उन्हें हृदय-मन्त्र से उत्तम भस्ममयी शय्या पर सुलावे उन सबके मस्तक दक्षिण दिशा की ओर होने चाहिये। सभी शिष्य अस्त्र-मन्त्र से रक्षित होकर शिखा मन्त्र से अपनी-अपनी शिखा बाँध लें। तदनन्तर गुरु उन्हें स्वप्न मानव का परिचय देकर सो जाने की आज्ञा प्रदान करे और स्वयं मण्डल से बाहर चला जाय ॥ ५५-५९ ॥

इसके बाद ‘ॐ हिलि हिलि शूलपाणये नमः स्वाहा।’ इस मन्त्र से पञ्चगव्य और चरु का प्राशन करके दन्तधावन ले आचमन करे। फिर भगवान् शिव का ध्यान करके पवित्र शय्या पर आकर दीक्षागत क्रियाकाण्ड का स्मरण करते हुए गुरु शयन करे। [^2]  इस प्रकार दीक्षाधिवासन की विधि संक्षेप से बतायी गयी ॥ ६०-६२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘निर्वाण दीक्षा के अन्तर्गत अधिवासन की विधि का वर्णन’ नामक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥

[^1]: ‘दन्तकाष्ठं हृदा कृत्वा प्रक्षिपेत् क्षोभने शुभम्।’ इस पंक्ति के स्थान में सोमशम्भु की ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली में इस प्रकार पाठ उपलब्ध होता है —
दन्तकाष्ठं हृदा दत्त्वा तद्दन्ताग्रविचर्वितम् ॥
धौतमूर्ध्वमुखं भूमौ क्षेपयेत्पातमुन्नयेत् । प्राक्पश्चिमोत्तरे चोर्ध्वं वदने पातमुत्तमम् ॥
सर्वेषामेव शिष्याणामितरास्यमशोभनम् । अशोभननिषेधार्थं शतमस्त्रेण होमयेत् ॥ ( ७९७-७९९ )
अर्थात् ‘इसके बाद हृदय-मन्त्र से दन्तकाष्ठ देकर उसे चबाने को कहे। शिष्य के दन्ताग्रभाग से जब वह अच्छी तरह चर्वित हो जाय (कंच लिया जाय तो उसे धोकर उसका मुखभाग ऊपर की ओर रखते हुए पृथ्वी पर फेंकवा दे। जब वह गिर जाय तो उसके सम्बन्ध में निम्नाङ्कित प्रकार से शुभाशुभ का विचार करे। यदि उस दातुन का मुखभाग पूर्व, पश्चिम, उत्तर अथवा ऊर्ध्व दिशा को ओर हो तो उसका वह गिरना उत्तम माना गया है। इसके सिवा दूसरी दिशा की ओर उसका मुख हो तो वह सभी शिष्यों के लिये अशुभ होता है अशुभ का निवारण करने के लिये अस्त्र-मन्त्र से सौ आहुतियाँ दे।’

[^2]: दीक्षागत क्रियाकाण्ड के स्मरणीय स्वरूप का वर्णन सोमशम्भु की ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली में इस प्रकार मिलता है —
मन्त्राणां दीपनं प्रोक्तं ततः सूत्रावलम्बनम् ।
सुषुम्णानाडिसंयोगं शिष्यचैतन्ययोजनम् ॥

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