June 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 098 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ अट्ठानबेवाँ अध्याय गौरी प्रतिष्ठा की विधि गौरीप्रतिष्ठाकथनम् भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द ! अब मैं पूजासहित गौरी की प्रतिष्ठा का वर्णन करूँगा, सुनो। पूर्ववत् मण्डप आदि की रचना करके देवी की स्थापना एवं शय्याधिवासन करे। पूर्वोक्त मन्त्रों और मूर्त्यादिकों का न्यास करके आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व का परमेश्वर में स्थापन करे। तदनन्तर पराशक्ति का न्यास, होम और जप पूर्ववत् करके क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी पिण्डी का संधान करे। सर्वव्यापिनी पिण्डी का ध्यान करके वहाँ रत्न आदि का न्यास करे। इस विधि से पिण्डी की स्थापना करके उसके ऊपर देवी को स्थापित करे ॥ १-४ ॥’ वे देवी परमशक्तिस्वरूपा हैं। उनका अपने ही मन्त्र से सृष्टि- न्यासपूर्वक स्थापन करे। तदनन्तर पीठ में क्रियाशक्ति का और देवी के विग्रह में ज्ञानशक्ति का न्यास करे। इसके बाद सर्वव्यापिनी शक्ति का आवाहन करके देवी की प्रतिमा में उसका नियोजन करे। फिर ‘शिवा’ नामवाली अम्बिका देवी का स्पर्शपूर्वक पूजन कर1 ॥ ५-६ ॥ पूजा के मन्त्र इस प्रकार हैं — ॐ आं आधारशक्तये नमः । ॐ कूर्माय नमः । ॐ कन्दाय नमः । ॐ ह्रीं नारायणाय नमः । ॐ ऐश्वर्याय नमः । ॐ अधश्छदनाय नमः । ॐ पद्मासनाय नमः ।’ तदनन्तर केसरों की पूजा करे। तत्पश्चात् ‘ॐ ह्रीं कर्णिकायै नमः । ॐ क्षं पुष्कराक्षेभ्यो नमः ।’ — इन मन्त्रों द्वारा कर्णिका एवं कमलाक्षों का पूजन करे। इसके बाद ‘ॐ हां पुष्ट्यै नमः । ॐ ह्रीं ज्ञानायै नमः । ॐ हुं क्रियायै नमः ।’ – इन मन्त्रों द्वारा पुष्टि, ज्ञाना एवं क्रियाशक्ति का पूजन करे ॥ ७-१० ॥ ‘ॐ नालाय नमः । ॐ रं धर्माय नमः । ॐ रुं ज्ञानाय नमः । ॐ वैराग्याय नमः । ॐ अधर्माय नमः । ॐ रं अज्ञानाय नमः । ॐ अवैराग्याय नमः । ॐ अनैश्वर्याय नमः ।’ —इन मन्त्रों द्वारा नाल आदि की पूजा करे। ॐ ह्रूं वाचे नमः । ॐ ह्रूं रागिण्यै नमः । ॐ ह्रूं ज्वालिन्यै नमः । ॐ ह्रौं शमायै नमः । ॐ ह्रूं ज्येष्ठायै नमः । ॐ ह्रौं रौं क्रौं नवशक्त्यै नमः । — इन मन्त्रों द्वारा वाक् आदि शक्तियों की पूजा करे। ‘ॐ गौं गौर्यासनाय नमः । ॐ गौं गौरीमूर्तये नमः ।’ अब गौरी का मूलमन्त्र बताया जाता है — ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा गौर्यै नमः । ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा । ॐ गूं शिखायै वषट् । ॐ गैं कवचाय हुम् । ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ गः अस्त्राय फट् । ॐ गौं विज्ञानशक्तये नमः ।’ — इन मन्त्रों से शिखा आदि की पूजा करे ॥ ११-१५ ॥ ॐ गूं क्रियाशक्तये नमः । – इस मन्त्र से क्रियाशक्ति की पूजा करे। पूर्वादि दिशाओं में इन्द्रादि देवताओं का पूजन करे। इनके मन्त्र पहले बताये गये हैं। ॐ सुं सुभगायै नमः — इससे सुभगा का, ‘ॐ ह्रीं ललितायै नमः ।’ से ललिता का पूजन करे। ‘ॐ ह्रीं कामिन्यै नमः ।’ ‘ॐ हूँ काममालिन्यै नमः ।’ — इन मन्त्रों से गौरी की प्रतिष्ठा, पूजा और जप करने से उपासक सब कुछ पा लेता है 2 ॥ १६-१७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गौरी-प्रतिष्ठा विधि का वर्णन’ नामक अट्ठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥ 1. पाठान्तर के अनुसार ‘अमुकेशी’ इत्यादि नाम से उनका स्पर्शपूर्वक पूजन करे यथा — ‘रामेश्वर्यै नमः। कृष्णेश्यै नमः।’ इत्यादि । 2. सोमशम्भु की ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’ में इन मन्त्रों के स्वरूप और बीज कुछ भिन्न रूप में मिलते हैं। अतः उन्हें अविकल रूप में यहाँ उद्धृत किया जाता है — ॐ आं आधारशक्तये नमः ॐ ईं कन्दराय नमः । ॐ ॐ नालाय नमः ॐ ऋं धर्माय नमः । ॐ ॠं ज्ञानाय नमः । ॐ लृं वैराग्याय नमः ॐ ॡं ऐश्वर्याय नमः । ॐ ऋं अधर्माय नमः । ॐ ॠं अज्ञानाय नमः । ॐ लृं अवैराग्याय नमः । ॐ ॡं अनैश्चर्यांय नमः । ॐ अः ऊर्ध्वच्छदनाय नमः । ॐ हां पद्माय नमः । ॐ हं केसरेभ्यो नमः । ॐ हं कर्णिकायै नमः । ॐ हं पुष्करेभ्यो नमः । ॐ हं प्राञ्च्यै नमः । ॐ ह्रीं ज्ञानवत्यै नमः । ॐ हूं क्रियायै नमः । ॐ ह्लृं वामायै नमः । ॐ ह्लृं वागीश्वर्यैं नमः । ॐ ह्रीं ज्यालिन्यै नमः । ॐ ह्रों ज्येष्ठायै नमः । ॐ ह्रौं रौद्र्यै नमः इति सर्वशक्तयः ॥ ॐ गां गौर्यासनाय नमः । ॐ गों गौरीमूर्तये नमः । ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा ।— इति मूलमन्त्रः । गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट् । गैं कवचाय हुम्। गौं नेत्रेभ्यो वौषट् । गः अस्त्राय फट् । ॐ सीं ज्ञानशक्तये नमः । ॐ सूं क्रियाशक्तये नमः । लोकपालमन्त्रास्तु पूर्वोक्ता: । ॐ स्हें सुभगायै नमः । ॐ स्हैं ललितायै नमः । ॐ स्हं कामिन्यै नमः । ॐ स्हौं काममालिन्यै नमः। इत्येता गौरीसमानसख्यः । Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe