June 17, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 111 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय प्रयाग-माहात्म्य प्रयागमाहात्म्यं अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं प्रयाग का माहात्म्य बताता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा उत्तम है। प्रयाग में ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा बड़े-बड़े मुनिवर निवास करते हैं। नदियाँ, समुद्र, सिद्ध, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी उस तीर्थ में वास करती हैं। प्रयाग में तीन अग्निकुण्ड हैं। उनके बीच में गङ्गा सब तीर्थों को साथ लिये बड़े वेग से बहती हैं। वहाँ त्रिभुवन- विख्यात सूर्यकन्या यमुना भी हैं। गङ्गा और यमुना का मध्यभाग पृथ्वी का ‘जघन’ माना गया है और प्रयाग को ऋषियों ने जघन के बीच का ‘उपस्थ ‘भाग’ बताया है ॥ १-४ ॥’ प्रतिष्ठान (झूसी) सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवती तीर्थ — ये ब्रह्माजी के यज्ञ की वेदी कहे गये हैं। प्रयाग में वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं। उस तीर्थ के स्तवन और नाम – कीर्तन से तथा वहाँ की मिट्टी का स्पर्श करनेमात्र से भी मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। प्रयाग में गङ्गा और यमुना के संगम पर किये हुए दान, श्राद्ध और जप आदि अक्षय होते हैं ॥ ५-७ ॥ ब्रह्मन् ! वेद अथवा लोक- किसी के कहने से भी अन्त में प्रयागतीर्थ के भीतर मरने का विचार नहीं छोड़ना चाहिये । प्रयाग में साठ करोड़, दस हजार तीर्थों का निवास है; अतः वह सबसे श्रेष्ठ है। वासुकि नाग का स्थान, भोगवती तीर्थ और हंसप्रपतन — ये उत्तम तीर्थ हैं। कोटि गोदान से जो फल मिलता है, वही इनमें तीन दिनों तक स्नान करनेमात्र से प्राप्त हो जाता है। प्रयाग में माघमास में मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि ‘गङ्गा सर्वत्र सुलभ हैं; किंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर संगम — इन तीन स्थानों में उनका मिलना बहुत कठिन है।’ प्रयाग में दान देने से मनुष्य स्वर्ग में जाता है और इस लोक में आने पर राजाओं का भी राजा होता है ॥ ८-१२ ॥ अक्षयवट के मूल के समीप और संगम आदि में मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य भगवान् विष्णु के धाम में जाता है। प्रयाग में परम रमणीय उर्वशी – पुलिन, संध्यावट, कोटितीर्थ, दशाश्वमेध घाट, गङ्गा- यमुना का उत्तम संगम, रजोहीन मानसतीर्थ तथा वासरक तीर्थ — ये सभी परम उत्तम हैं ॥ १३-१४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘प्रयाग-माहात्म्य वर्णन’ नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe