June 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 127 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय विभिन्न बलों का वर्णन नानाबलानि शंकरजी कहते हैं — ‘विष्कुम्भ योग’ की तीन घड़ियाँ, ‘शूल योग’ की पाँच ‘गण्ड’ तथा ‘अतिगण्ड योग’ की छः ‘व्याघात’ तथा ‘वज्र योग’ की नौ घड़ियों को सभी शुभ कार्यों में त्याग देना चाहिये। ‘परिघ’, ‘व्यतीपात’ और ‘वैधृति’ योगों में पूरा दिन त्याज्य बतलाया गया है। इन योगों में यात्रा – युद्धादि कार्य नहीं करने चाहिये ॥ १-२ ॥’ देवि! अब मैं मेषादि राशि तथा ग्रहों के द्वारा शुभाशुभ का निर्णय बताता हूँ — जन्म-राशि के चन्द्रमा तथा शुक्र वर्जित होने पर ही शुभदायक होते हैं। जन्म राशि तथा लग्न से दूसरे स्थान में सूर्य, शनि, राहु अथवा मङ्गल हो तो प्राप्त द्रव्य का नाश और अप्राप्त का अलाभ होता है तथा युद्ध में पराजय होती है । चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र- ये दूसरे स्थान में शुभप्रद होते हैं। सूर्य, शनि, मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, राहु- ये तीसरे घर में हों तो शुभ फल देते हैं। बुध, शुक्र चौथे भाव में हों तो शुभ तथा शेष ग्रह भयदायक होते हैं। बृहस्पति, शुक्र, बुध, चन्द्रमा — ये पञ्चम भाव में हों तो अभीष्ट लाभ की प्राप्ति कराते हैं। देवि! अपनी राशि से छठे भाव में सूर्य, चन्द्र, शनि, मङ्गल, बुध — ये ग्रह शुभ फल देते हैं; किंतु छठे भाव का शुक्र तथा गुरु शुभ नहीं होता । सप्तम भाव के सूर्य, शनि, मङ्गल, राहु हानिकारक होते हैं तथा बुध, गुरु, शुक्र सुखदायक होते हैं। अष्टम भाव के बुध और शुक्र-शुभ तथा शेष ग्रह हानिकारक होते हैं। नवम भाव के बुध, शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। दशम भाव के शुक्र, सूर्य लाभकर होते हैं तथा शनि, मङ्गल, राहु, चन्द्रमा — बुध शुभकारक होते हैं। ग्यारहवें भाव में प्रत्येक ग्रह शुभ फल देता है, परंतु दसवें बृहस्पति त्याज्य हैं। द्वादश भाव में बुध-शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। एक दिन रात में द्वादश राशियाँ भोग करती हैं। अब मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ ॥ ३-१२ ॥ (राशियों का भोगकाल एवं चरादि संज्ञा तथा प्रयोजन कह रहे हैं —) मीन, मेष, मिथुन- इनमें प्रत्येक के चार दण्डः वृष, कर्क, सिंह, कन्या — इनमें प्रत्येक के छः दण्ड; तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ- इनमें प्रत्येक के पाँच दण्ड भोगकाल हैं। सूर्य जिस राशि में रहते हैं, उसी का उदय होता है और उसी राशि से अन्य राशियों का भोगकाल प्रारम्भ होता है। मेषादि राशियों की क्रमशः ‘चर’, ‘स्थिर’ और ‘द्विस्वभाव’ संज्ञा होती है। जैसे — मेष, कर्क, तुला, मकर — इन राशियों की ‘चर’ संज्ञा है। इनमें शुभ तथा अशुभ स्थायी कार्य करने चाहिये। वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ — इन राशियों की ‘स्थिर’ संज्ञा है। इनमें स्थायी कार्य करना चाहिये। इन लग्नों में बाहर गये हुए व्यक्ति से शीघ्र समागम नहीं होता तथा रोगी को शीघ्र रोग से मुक्ति नहीं प्राप्त होती । मिथुन, कन्या, धनु, मीन — इन राशियों की ‘द्विस्वभाव’ संज्ञा है। ये द्विस्वभावसंज्ञक राशियाँ प्रत्येक कार्य में शुभ फल देनेवाली हैं। इनमें यात्रा, व्यापार, संग्राम, विवाह एवं राजदर्शन होने पर वृद्धि, जय तथा लाभ होते हैं और युद्ध में विजय होती है। अश्विनी नक्षत्र की बीस ताराएँ हैं और घोड़े के समान उसका आकार है। यदि इसमें वर्षा हो तो एक रात तक घनघोर वर्षा होती है। यदि भरणी में वर्षा आरम्भ हो तो पंद्रह दिन तक लगातार वर्षा होती रहती है ॥ १३-२० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विभिन्न बलों का वर्णन’ नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe