June 25, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 161 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इकसठवाँ अध्याय संन्यासी के धर्म यतिधर्मः पुष्कर कहते हैं — अब मैं ज्ञान और मोक्ष आदि का साक्षात्कार कराने वाले संन्यास धर्म का वर्णन करूँगा। आयु के चौथे भाग में पहुँचकर, सब प्रकार के सङ्ग से दूर हो संन्यासी हो जाय। जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन घर छोड़कर चल दे — संन्यास ले ले। प्राजापत्य इष्टि (यज्ञ) करके सर्वस्व की दक्षिणा दे दे तथा आहवनीयादि अग्नियों को अपने-आपमें आरोपित करके ब्राह्मण घर से निकल जाय। संन्यासी सदा अकेला ही विचरे। भोजन के लिये ही गाँव में जाय। शरीर के प्रति उपेक्षाभाव रखे। अन्न आदि का संग्रह न करे। मननशील रहे। ज्ञान सम्पन्न होवे। कपाल (मिट्टी आदि का खप्पर) ही भोजनपात्र हो, वृक्ष की जड़ ही निवास स्थान हो, लँगोटी के लिये मैला-कुचैला वस्त्र हो, साथ में कोई सहायक न हो तथा सबके प्रति समता का भाव हो-यह जीवन्मुक्त पुरुष का लक्षण है। न तो मरने की इच्छा करे, न जीने की — जीवन और मृत्यु में से किसी का अभिनन्दन न करे ॥ १-५ ॥’ जैसे सेवक अपने स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार वह प्रारब्धवश प्राप्त होनेवाले काल (अन्तसमय) की प्रतीक्षा करता रहे। मार्ग पर दृष्टिपात करके पाँव रखे अर्थात् रास्ते में कोई कीड़ा-मकोड़ा, हड्डी, केश आदि तो नहीं है, यह भलीभाँति देखकर पैर रखे। पानी को कपड़े से छानकर पीये। सत्य से पवित्र की हुईं वाणी बोले । मन से दोष- गुण का विचार करके कोई कार्य करे। लौकी, काठ, मिट्टी तथा बाँस — ये ही संन्यासी के पात्र हैं। जब गृहस्थ के घर से धूआँ निकलना बंद हो गया हो, मुसल रख दिया गया हो, आग बुझ गयी हो, घर के सब लोग भोजन कर चुके हों और जूँठे शराव (मिट्टी के प्याले ) फेंक दिये गये हों, ऐसे समय में संन्यासी प्रतिदिन भिक्षा के लिये जाय। भिक्षा पाँच प्रकार की मानी गयी है — मधुकरी (अनेक घरों से थोड़ा-थोड़ा अन्न माँग लाना), असंक्लृप्त (जिसके विषय में पहले से कोई संकल्प या निश्चय न हो, ऐसी भिक्षा), प्राक्प्रणीत ( पहले से तैयार रखी हुई भिक्षा), अयाचित (बिना माँगे जो अन्न प्राप्त हो जाय, वह) और तत्काल उपलब्ध (भोजन के समय स्वतः प्राप्त ) । अथवा करपात्री होकर रहे — अर्थात् हाथ ही में लेकर भोजन करे और हाथ में ही पानी पीये। दूसरे किसी पात्र का उपयोग न करे। पात्र से अपने हाथरूपी पात्र में भिक्षा लेकर उसका उपयोग करे। मनुष्यों की कर्मदोष से प्राप्त होने वाली यमयातना और नरकपात आदि गति का चिन्तन करे ॥ ६-१० ॥ जिस किसी भी आश्रम में स्थित रहकर मनुष्य को शुद्धभाव से आश्रमोचित धर्म का पालन करना चाहिये। सब भूतों में समान भाव रखे। केवल आश्रम-चिह्न धारण कर लेना ही धर्म का हेतु नहीं है (उस आश्रम के लिये विहित कर्तव्य का पालन करने से ही धर्म का अनुष्ठान होता है) । निर्मली का फल यद्यपि पानी में पड़ने पर उसे स्वच्छ बनानेवाला है, तथापि केवल उसका नाम लेनेमात्र से जल स्वच्छ नहीं हो जाता। इसी प्रकार आश्रम के लिङ्ग धारणमात्र से लाभ नहीं होता, विहित धर्म का अनुष्ठान करना चाहिये। अज्ञानवश संसार- बन्धन में बँधा हुआ द्विज लँगड़ा, लूला, अंधा और बहरा क्यों न हो, यदि कुटिलतारहित संन्यासी हो जाय तो वह सत् और असत् — सबसे मुक्त हो जाता है। संन्यासी दिन या रात में बिना जाने जिन जीवों की हिंसा करता है, उनके वधरूप पाप से शुद्ध होने के लिये वह स्नान करके छः बार प्राणायाम करे । यह शरीररूपी गृह हड्डीरूपी खंभों से युक्त है, नाडीरूप रस्सियों से बँधा हुआ है, मांस तथा रक्त से लिपा हुआ और चमड़ेसे छाया गया है। यह मल और मूत्र से भरा हुआ होने के कारण अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण है। इसमें बुढ़ापा तथा शोक व्याप्त हैं। यह अनेक रोगों का घर और भूख-प्यास से आतुर रहनेवाला है। इसमें रजोगुण का प्रभाव अधिक है। यह अनित्य- विनाशशील एवं पृथिवी आदि पाँच भूतों का निवास स्थान है; विद्वान् पुरुष इसे त्याग दे- अर्थात् ऐसा प्रयत्न करे, जिससे फिर देह के बन्धन में न आना पड़े ॥ ११-१६ ॥ धृति, क्षमा, दम (मनोनिग्रह), चोरी न करना, बाहर-भीतर से पवित्र रहना, इन्द्रियों को वश में रखना, लज्जा [^1] , विद्या, सत्य तथा अक्रोध( क्रोध न करना) – ये धर्म के दस लक्षण हैं। संन्यासी चार प्रकार के होते हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस । इनमें जो-जो पिछला है, वह पहले की अपेक्षा उत्तम है। योगयुक्त संन्यासी पुरुष एकदण्डी हो या त्रिदण्डी, वह बन्धन से मुक्त हो जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( चोरी का (अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( संग्रह न रखना) — ये पाँच ‘यम’ हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर की आराधना — ये पाँच ‘नियम’ हैं। योगयुक्त संन्यासी के लिये इन सबका पालन आवश्यक है। पद्मासन आदि आसनों से उसको बैठना चाहिये ॥ १७- २० ॥ प्राणायाम दो प्रकार का है — एक ‘सगर्भ’ और दूसरा ‘अगर्भ’ मन्त्रजप और ध्यान से युक्त प्राणायाम ‘सगर्भ’ कहलाता है और इसके विपरीत जप ध्यानरहित प्राणायाम को ‘अगर्भ’ कहते हैं। पूरक, कुम्भक तथा रेचक के भेद से प्राणायाम तीन प्रकार का होता है। वायु को भीतर भरने से ‘पूरक’ प्राणायाम होता है, उसे स्थिरतापूर्वक रोकने से ‘कुम्भक’ होता है और फिर उस वायु को बाहर निकालने से ‘रेचक’ प्राणायाम कहा गया है। मात्राभेद से भी वह तीन प्रकार का है — बारह मात्रा का, चौबीस मात्रा का तथा छत्तीस मात्रा का इसमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है। ताल या हृस्व अक्षर को ‘मात्रा’ कहते हैं। प्राणायाम में ‘प्रणव’ आदि मन्त्र का धीरे-धीरे जप करे। इन्द्रियों के संयम को ‘प्रत्याहार’ कहा गया है। जप करने वाले साधकों द्वारा जो ईश्वर का चिन्तन किया जाता है, उसे ‘ध्यान’ कहते हैं; मन को धारण करने का नाम ‘धारणा’ है; ब्रह्म में स्थिति को ‘समाधि’ कहते हैं ॥ २१–२४१/२ ॥ ‘यह आत्मा परब्रह्म है: ब्रह्म-सत्य, ज्ञान और अनन्त है; ब्रह्म विज्ञानमय तथा आनन्दस्वरूप है; वह ब्रह्म तू है; वह ब्रह्म मैं हूँ; परब्रह्म परमात्मा प्रकाशस्वरूप है; वही आत्मा है, वासुदेव है, नित्यमुक्त है; वही ‘ॐ’ शब्दवाच्य सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है; देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकार से रहित तथा जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि से मुक्त जो तुरीय तत्त्व है, वही ब्रह्म है; वह नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप है; सत्य, आनन्दमय तथा अद्वैतरूप है; सर्वत्र व्यापक, अविनाशी ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म ही श्रीहरि है और वह मैं हूँ; आदित्यमण्डल में जो वह ज्योतिर्मय पुरुष है, वह अखण्ड प्रणववाच्य परमेश्वर मैं हूँ’ — इस प्रकार का सहज बोध ही ब्रह्म में स्थिति का सूचक है ॥ २५–२८१/२ ॥ जो सब प्रकार के आरम्भ का त्यागी है- अर्थात् जो फलासक्ति एवं अहंकारपूर्वक किसी कर्म का आरम्भ नहीं करता-कर्तृत्वाभिमान से शून्य होता है, दुःख-सुख में समान रहता है, सबके प्रति क्षमाभाव रखनेवाला एवं सहनशील होता है, वह भावशुद्ध ज्ञानी मनुष्य ब्रह्माण्ड का भेदन करके साक्षात् ब्रह्म हो जाता है। यति को चाहिये कि वह आषाढ़ की पूर्णिमा को चातुर्मास्यव्रत प्रारम्भ करे। फिर कार्तिक शुक्ला नवमी आदि तिथियों से विचरण करे । ऋतुओं की संधि के दिन मुण्डन करावे। संन्यासियों के लिये ध्यान तथा प्राणायाम ही प्रायश्चित्त है ॥ २९-३१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘यतिधर्म का वर्णन’ नामक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥ [^1]: मनुस्मृति में ‘ह्रौ:’ के स्थान में ‘धी:’ पाठ है ‘धी’ का अर्थ है — शास्त्र आदि के तत्त्व का ज्ञान। Content is available only for registered users. 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