June 30, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 198 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय मास सम्बन्धी व्रत मासव्रतानि अग्निदेव कहते हैं — मुनिश्रेष्ठ! अब मैं मास व्रतों का वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। आषाढ़ से प्रारम्भ होने वाले चातुर्मास्य में अभ्यङ्ग (मालिश और उबटन) – का त्याग करे। इससे मनुष्य उत्तम बुद्धि प्राप्त करता है। वैशाख में पुष्परेणु तक का परित्याग करके गोदान करने वाला राज्य प्राप्त करता है। एक मास उपवास रखकर गोदान करने वाला इस भीमव्रत के प्रभाव से श्रीहरिस्वरूप हो जाता है। आषाढ़ से प्रारम्भ होने वाले चातुर्मास्य में नियमपूर्वक प्रातः स्नान करने वाला विष्णुलोक को जाता है। माघ अथवा चैत्र मास की तृतीया को गुड़-धेनु का दान दे, इसे ‘गुड़व्रत’ कहा गया है। इस महान् व्रत का अनुष्ठान करने वाला शिवस्वरूप हो जाता है। मार्गशीर्ष आदि मासों में ‘नक्तव्रत’ (रात्रि में एक बार भोजन) करने वाला विष्णुलोक का अधिकारी होता है। ‘एकभुक्त व्रत का पालन करने वाला उसी प्रकार पृथक् रूप से द्वादशीव्रत का भी पालन करे। ‘फलव्रत’ करने वाला चातुर्मास्य में फलों का त्याग करके उनका दान करे ॥ १-५ ॥’ श्रावण से प्रारम्भ होने वाले चातुर्मास्य में व्रतों के अनुष्ठान से व्रतकर्ता सब कुछ प्राप्त कर लेता है। चातुर्मास्य व्रतों का इस प्रकार विधान करे — आषाढ़ के शुक्लपक्ष की एकादशी को उपवास रखे। प्रायः आषाढ़ में प्राप्त होनेवाली कर्क संक्रान्ति में श्रीहरि का पूजन करे और कहे — इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव । निर्विघ्नां सिद्धिमायातु प्रसन्ने त्वयि केशव ॥ गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यद्यपूर्णे म्रिये ह्यहं । तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥ ‘भगवन्! मैंने आपके सम्मुख यह व्रत ग्रहण किया है। केशव ! आपकी प्रसन्नता से इसकी निर्विघ्न सिद्धि हो । देवाधिदेव जनार्दन ! यदि इस व्रत के ग्रहण के अनन्तर इसकी अपूर्णता में ही मेरी मृत्यु हो जाय, तो आपके कृपा प्रसाद से यह व्रत सम्पूर्ण हो।’ व्रत करने वाला द्विज मांस आदि निषिद्ध वस्तुओं और तेल का त्याग करके श्रीहरि का यजन करे। एक दिन के अन्तर से उपवास रखकर त्रिरात्रव्रत करनेवाला विष्णुलोक को प्राप्त होता है। ‘चान्द्रायण व्रत’ करने वाला विष्णुलोक का और ‘मौन व्रत’ करने वाला मोक्ष का अधिकारी होता है। ‘प्राजापत्य व्रत’ करने वाला स्वर्गलोक को जाता है। सत्तू और यव का भक्षण करके, दुग्ध आदि का आहार करके, अथवा पञ्चगव्य एवं जल पीकर कृच्छ्रव्रतों का अनुष्ठान करने वाला स्वर्ग को प्राप्त होता है। शाक, मूल और फल के आहारपूर्वक कृच्छ्रव्रत करने वाला मनुष्य वैकुण्ठ को जाता है। मांस और रस का परित्याग करके जौ का भोजन करने वाला श्रीहरि के सांनिध्य को प्राप्त करता है ॥ ६-१२१/२ ॥ अब मैं ‘कौमुदव्रत’ का वर्णन करूँगा। आश्विन के शुक्लपक्ष की एकादशी को उपवास रखे। द्वादशी को श्रीविष्णु के अङ्गों में चन्दनादि का अनुलेपन करके कमल और उत्पल आदि पुष्पों से उनका पूजन करे। तदनन्तर तिल-तैल से परिपूर्ण दीपक और घृतसिद्ध पक्वान्न का नैवेद्य समर्पित करे। श्रीविष्णु को मालतीपुष्पों की माला भी निवेदन करे। ‘ॐ नमो वासुदेवाय’ – इस मन्त्र से व्रत का विसर्जन करे । इस प्रकार ‘कौमुदव्रत का अनुष्ठान करने वाला धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थी को हस्तगत कर लेता है। मासोपवास व्रत करने वाला श्रीविष्णु का पूजन करके सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥ १३-१६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मास सम्बन्धी व्रत का वर्णन’ नामक एक सौ अट्ठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९८ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe