July 11, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 270 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तरवाँ अध्याय विष्णु पञ्जर स्तोत्र का कथन विष्णु पञ्जरम् पुष्कर कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ परशु राम। पूर्वकाल में भगवान् ब्रह्मा ने त्रिपुर संहार के लिये उद्यत शंकर की रक्षा के लिये ‘विष्णुपञ्जर’ नामक स्तोत्र का उपदेश किया था। इसी प्रकार बृहस्पति ने बल दैत्य का वध करने के लिये जाने वाले इन्द्र की रक्षा के लिये उक्त स्तोत्र का उपदेश दिया था। मैं विजय प्रदान करने वाले उस विष्णु पञ्जर का स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो ॥ १-२ ॥’ ‘मेरे पूर्वभाग में चक्रधारी विष्णु एवं दक्षिणपाश्वं में गदाधारी श्री हरि स्थित हैं। पश्चिम भाग में शार्ङ्गपाणि विष्णु और उत्तर भाग में नन्दक खड्गधारी जनार्दन विराज मान हैं। भगवान् इषीकेश दिक्कोणों में एवं जनार्दन मध्यवर्ती अवकाश में मेरी रक्षा कर रहे हैं। वराहरूप धारी श्री हरि भूमि पर तथा भगवान् नृसिंह आकाश में प्रतिष्ठित होकर मेरा संरक्षण कर रहे हैं। जिसके किनारे के भागों में छुरे जुड़े हुए हैं, वह यह निर्मल ‘सुदर्शन चक्र’ घूम रहा है। यह जब प्रेतों तथा निशाचरों को मारने के लिये चलता है, उस समय इसकी किरणों की ओर देखना किसी के लिये भी बहुत कठिन होता है। भगवान् श्री हरि की यह ‘कौमोदकी’ गदा सहस्रों ज्वालाओं से प्रदीप्त पावक के समान उज्वल है। यह राक्षस, भूत, पिशाच और डाकिनियों का विनाश करने वाली है। भगवान् वासुदेव के शार्ङ्ग धनुष की टंकार मेरे शत्रुभूत मनुष्य, कूष्माण्ड, प्रेत आदि और तिर्यग्योनिगत जीवों का पूर्णतया संहार करे। जो भगवान् श्री हरि को खड्गधारामयी उज्वल ज्योत्स्ना में स्नान कर चुके हैं, वे मेरे समस्त शत्रु उसी प्रकार तत्काल शान्त हो जाएँ, जैसे गरुड के द्वारा मारे गये सर्प शान्त हो जाते हैं’ ॥ ३-८ ॥ ‘जो कूष्माण्ड, यक्ष, राक्षस, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, शिकारी पक्षी, सिंह आदि पशु एवं हँसने वाले सर्प हों, वे सब-के-सब सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण के शङ्खनाद से आहत हो सौम्यभाव को प्राप्त हो जायें। जो मेरी चित्तवृत्ति और स्मरणशक्ति का हरण करते हैं, जो मेरे बल और तेज का नाश करते हैं तथा जो मेरी कान्ति या तेज को विलुप्त करने वाले हैं, जो उपभोग सामग्री को हर लेने वाले तथा शुभ लक्षणों का नाश करने वाले हैं, वे कूष्माण्डगण श्री विष्णु के सुदर्शन चक्र के वेग से आहत होकर विनष्ट हो जायें। देवाधि देव भगवान् वासुदेव के संकीर्तन से मेरी बुद्धि, मन और इन्द्रियों को स्वास्थ्यलाभ हो। मेरे आगे-पीछे, दायें-बायें तथा कोणवर्तिनी दिशाओं में सब जगह जनार्दन श्री हरि का निवास हो। सबके पूजनीय, मर्यादा से कभी च्युत न होने वाले अनन्तरूप परमेश्वर जनार्दन के चरणों में प्रणत होने वाला कभी दुखी नहीं होता। जैसे भगवान् श्री हरि पर ब्रह्म हैं, उसी प्रकार वे परमात्मा केशव भी जगत्स्वरूप हैं — इस सत्य के प्रभाव से तथा भगवान् अच्युत के नाम कीर्तन से मेरे त्रिविध पापों का नाश हो जाय ॥ ९-१५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विष्णुपञ्जर स्तोत्र का कथन’ नामक दो सौ सत्तस्वाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७० ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe