अग्निपुराण – अध्याय 273
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय
सूर्यवंश का वर्णन
सूर्य्यवंशकीर्त्तनं

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं तुमसे सूर्यवंश तथा राजाओं के वंश का वर्णन करता हूँ। भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए हैं। ब्रह्माजी के पुत्र का नाम मरीचि है। मरीचि से कश्यप तथा कश्यप से विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ है। सूर्य की तीन स्त्रियाँ हैं — संज्ञा, राज्ञी और प्रभा। इनमें से ‘राज्ञी’ रैवत की पुत्री हैं। उन्होंने ‘रेवन्त’ नाम वाले पुत्र को जन्म दिया है। सूर्य की ‘प्रभा’ नाम वाली पत्नी से ‘प्रभात’ नाम वाला पुत्र हुआ। ‘संज्ञा’ विश्वकर्मा की पुत्री है। उनके गर्भ से वैवस्वत मनु तथा जुड़वीं संतान यम और यमुना की उत्पत्ति हुई है। (संज्ञा की छाया को भी, जो स्त्रीरूप में प्रतिष्ठित थी, ‘छाया संज्ञा’ कहते हैं।) छाया-संज्ञा ने सूर्य के अंश से सावर्णि मनु तथा शनैश्चर नामक पुत्र को और तपती एवं विष्टि नाम वाली कन्याओं को जन्म दिया। तदनन्तर (अश्वारूपधारिणी) संज्ञा से दोनों अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई ॥ १-४ ॥’

वैवस्वत मनु के दस पुत्र हुए, जो उन्हीं के समान तेजस्वी थे। उनके नाम इस प्रकार हैं — इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, नृग, सत्पुरुषों में श्रेष्ठ दिष्ट, करूष और पृषभ्र — ये दसों महाबली राजा अयोध्या में हुए। मनु की इला नाम वाली एक कन्या भी थी, जिसके गर्भ से बुध के अंश से पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा को उत्पन्न करके इला पुरुषरूप में परिणत हो गयी। उस समय उसका नाम सुद्युम्न हुआ। सुद्युम्न से उत्कल, गय और विनताश्व — इन तीन राजाओं का जन्म हुआ। उत्कल को उत्कलप्रान्त (उड़ीसा) का राज्य मिला, विनताश्व का पश्चिमदिशा पर अधिकार हुआ तथा राजाओं में श्रेष्ठ गय पूर्वदिशा के राजा हुए, जिनकी राजधानी गयापुरी थी। राजा सुद्युम्न वसिष्ठ ऋषि के आदेश से प्रतिष्ठानपुर [^1]  में आ गये और उसी को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने वहाँ का राज्य पाकर उसे पुरूरवा को दे दिया। नरिष्यन्त के पुत्र ‘शक’ नाम से प्रसिद्ध हुए। नाभाग से परमवैष्णव अम्बरीष का जन्म हुआ। वे प्रजाओं का अच्छी तरह पालन करते थे। राजा धृष्ट से धार्ष्टक वंश का विस्तार हुआ। सुकन्या और आनर्त — ये दो शर्याति की संतानें हुई। आनर्त से ‘रेव’ नामक नरेश की उत्पत्ति हुई। आनर्तदेश में उनका राज्य था और कुशस्थली उनकी राजधानी थी। रेव के पुत्र रैवत हुए, जो ‘ककुद्मी’ नाम से प्रसिद्ध और धर्मात्मा थे। वे अपने पिता के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे, अतः कुशस्थली का राज्य उन्हीं को मिला ॥ ५-१२ ॥

एक समय की बात है वे अपनी कन्या रेवती को साथ लेकर ब्रह्माजी के पास गये और वहाँ संगीत सुनने लगे। वहाँ ब्रह्माजी के समय से दो ही घड़ी बीती, किंतु इतने ही में मर्त्यलोक के अंदर अनेक युग समाप्त हो गये। संगीत सुनकर वे बड़े वेग से अपनी पुरी को लौटे, परंतु अब उसपर यदुवंशियों का अधिकार हो गया था। उन्होंने कुशस्थली की जगह द्वारका नाम की पुरी बसायी थी, जो बड़ी मनोरम और अनेक द्वारों से सुशोभित थी। भोज, वृष्णि और अन्धकवंश के वासुदेव आदि वीर उसकी रक्षा करते थे। वहाँ जाकर रैवत ने अपनी कन्या रेवती का बलदेवजी से विवाह कर दिया और संसार की अनित्यता जानकर सुमेरु पर्वत के शिखर पर जाकर तपस्या करने लगे। अन्त में उन्हें विष्णुधाम की प्राप्ति हुई ॥ १३-१६ ॥

नाभाग के दो पुत्र हुए, जो वैश्या के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। वे (अपनी विशेष तपस्या के कारण) ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। करूष के पुत्र ‘कारूष’ नाम से प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए, जो युद्ध में मतवाले हो उठते थे। पृषध्र ने भूल से अपने गुरु की गाय की हिंसा कर डाली थी, अतः वे शापवश शूद्र हो गये। मनुपुत्र इक्ष्वाकु के पुत्र विकुक्षि हुए, जो (कुछ काल के लिये) देवताओं के राज्य पर आसीन हुए थे। विकुक्षि के पुत्र ककुत्स्थ हुए। ककुत्स्थ का पुत्र सुयोधन नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके पुत्र का नाम ‘पृथु’ था। पृथु से विश्वगश्व [^2]  का जन्म हुआ। उसका पुत्र आयु और आयु का पुत्र युवनाश्व हुआ। युवनाश्व से श्रावन्तकी [^3]  उत्पत्ति हुई, जिन्होंने पूर्वदिशा में श्रावन्तिकी[^4]  नाम की पुरी बसायी। श्रावन्त से बृहदश्व और बृहदश्व से कुवलाश्व नामक राजा का जन्म हुआ। इन्होंने पूर्वकाल में धुन्धु नाम से प्रसिद्ध दैत्य का वध किया था, अतः उसी के नाम पर ये ‘धुन्धुमार’ कहलाये। धुन्धुमार से तीन पुत्र हुए। वे तीनों ही राजा थे। उनके नाम थे — दृढाश्व, दण्ड और कपिल। दृढाश्व से हर्यश्व और प्रमोदक ने जन्म ग्रहण किया। हर्यश्व से निकुम्भ और निकुम्भ से संहताश्व की उत्पत्ति हुई। संहताश्व के दो पुत्र हुए — अकृशाश्व तथा रणाश्च। रणाश्व के पुत्र युवनाश्व और युवनाश्व के पुत्र राजा मांधाता हुए। मांधाता के भी दो पुत्र हुए, जिनमें एक का नाम पुरुकुत्स था और दूसरे का नाम मुचुकुन्द ॥ १७-२४ ॥

पुरुकुत्स से त्रसद्दस्यु का जन्म हुआ। वे नर्मदा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। उनका दूसरा नाम ‘सम्भूत’ भी था। सम्भूत के सुधन्वा और सुधन्वा के पुत्र त्रिधन्वा हुए। त्रिधन्वा के तरुण और तरुण के पुत्र सत्यव्रत थे। सत्यव्रत से सत्यरथ हुए, जिनके पुत्र हरिश्चन्द्र थे। हरिश्चन्द्र से रोहिताश्व का जन्म हुआ, रोहिताश्व से वृक हुए, वृक से बाहु और बाहु से सगर की उत्पत्ति हुई। सगर की प्यारी पत्नी प्रभा थी, जो प्रसन्न हुए और्व मुनि की कृपा से साठ हजार पुत्रों की जननी हुई तथा उनकी दूसरी पत्नी भानुमती ने राजा से एक ही पुत्र को उत्पन्न किया, जिसका नाम असमञ्जस था। सगर के साठ हजार पुत्र पृथ्वी खोदते समय भगवान् कपिल के क्रोध से भस्म हो गये। असमञ्जस के पुत्र अंशुमान् और अंशुमान् के दिलीप हुए। दिलीप से भगीरथ का जन्म हुआ, जिन्होंने गङ्गा को पृथ्वी पर उतारा था। भगीरथ से नाभाग और नाभाग से अम्बरीष हुए। अम्बरीष के सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीप के पुत्र श्रुतायु हुए। श्रुतायु के ऋतुपर्ण और ऋतुपर्ण के पुत्र कल्माषपाद थे। कल्माषपाद से सर्वकर्मा और सर्वकर्मा से अनरण्य हुए। अनरण्य के निघ्न और निघ्न के पुत्र दिलीप हुए। राजा दिलीप के रघु और रघु के पुत्र अज थे। अज से दशरथ का जन्म हुआ। दशरथ के चार पुत्र हुए वे सभी भगवान् नारायण के स्वरूप थे। उन सबमें ज्येष्ठ श्रीरामचन्द्रजी थे। उन्होंने रावण का वध किया था। रघुनाथजी अयोध्या के सर्वश्रेष्ठ राजा हुए। महर्षि वाल्मीकि ने नारदजी के मुँह से उनका प्रभाव सुनकर (रामायण के नाम से) उनके चरित्र का वर्णन किया था। श्रीरामचन्द्रजी के दो पुत्र हुए, जो कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले थे। वे सीताजी के गर्भ से उत्पन्न होकर कुश और लव के नाम से प्रसिद्ध हुए। कुश से अतिथि का जन्म हुआ। अतिथि के पुत्र निषध हुए। निषध से नल की उत्पत्ति हुई (ये सुप्रसिद्ध राजा दमयन्तीपति नल से भिन्न हैं); नल से नभ हुए। नभ से पुण्डरीक और पुण्डरीक से सुधन्वा उत्पन्न हुए। सुधन्वा के पुत्र देवानीक और देवानीक के अहीनाश्व हुए। अहीनाश्व से सहस्राश्च और सहस्राश्व से चन्द्रालोक हुए। चन्द्रालोक से तारापीड, तारापीड से चन्द्रगिरि और चन्द्रगिरि से भानुरथ का जन्म हुआ। भानुरथ का पुत्र श्रुतायु नाम से प्रसिद्ध हुआ। ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा सूर्यवंश का विस्तार करने वाले माने गये हैं ॥ २५-३९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सूर्यवंश का वर्णन नामक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७३ ॥

[^1]: गङ्गा-यमुना के संगम के समीप बसा हुआ वर्तमान झूसी ग्राम ही पहले का ‘प्रतिष्ठानपुर’ है।
[^2]: विष्णुपुराण में ‘विष्वगश्व’ नाम मिलता है और श्रीमद्भागवत में ‘विश्वरन्धि’।
[^3]: -[^4]:  विष्णुपुराण में ‘शावस्त’ तथा ‘शावस्ती’ नाम मिलते हैं।

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