July 13, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 276 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय श्री कृष्ण की पत्नियों तथा पुत्रों के संक्षेप से नामनिर्देश तथा द्वादश-संग्रामों का संक्षिप्त परिचय द्वादशसङ्ग्रामाः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ महर्षि कश्यप वसुदेव के रूप में अवतीर्ण हुए थे और नारियों में श्रेष्ठ अदिति का देवकी के रूप में आविर्भाव हुआ था। वसुदेव और देवकी से भगवान् श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ। वे बड़े तपस्वी थे। धर्म की रक्षा, अधर्म का नाश, देवता आदि का पालन तथा दैत्य आदि का मर्दन यही उनके अवतार का उद्देश्य था। रुक्मिणी, सत्यभामा और नग्नजित् कुमारी सत्या — ये भगवान् की प्रिय रानियाँ थीं। इनमें भी सत्यभामा उनकी आराध्य देवी थीं। इनके सिवा गन्धार-राजकुमारी लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, देवी कालिन्दी, जाम्बवती, सुशीला, माद्री, कौसल्या, विजया और जया आदि सोलह हजार देवियाँ भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नियाँ थीं। रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युम्न आदि पुत्र उत्पन्न हुए थे और सत्यभामा ने भीम आदि को जन्म दिया था। जाम्बवती के गर्भ से साम्ब आदि की उत्पत्ति हुई थी। ये तथा और भी बहुत से श्रीकृष्ण के पुत्र थे। परम बुद्धिमान् भगवान् के पुत्रों की संख्या एक करोड़ अस्सी हजार के लगभग थी। समस्त यादव भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित थे। प्रद्युम्न से विदर्भ राजकुमारी रुक्मवती के गर्भ से अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ। अनिरुद्ध को युद्ध बहुत ही प्रिय था। अनिरुद्ध के पुत्र वज्र आदि हुए। सभी यादव अत्यन्त बलवान् थे। यादवों की संख्या कुल मिलाकर तीन करोड़ थी। उस समय साठ लाख दानव मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए थे, जो लोगों को कष्ट पहुँचा रहे थे। उन्हीं का विनाश करने के लिये भगवान् का अवतार हुआ था। धर्म मर्यादा की रक्षा करने के लिये ही भगवान् श्रीहरि मनुष्यरूप में प्रकट होते हैं ॥ १-९ ॥’ देवता और असुरों में अपने दायभाग के लिये बारह संग्राम हुए हैं। उनमें पहला ‘नारसिंह’ और दूसरा ‘वामन’ नाम वाला युद्ध है। तीसरा ‘वाराह संग्राम’ और चौथा ‘अमृत मन्थन’ नामक युद्ध है। पाँचवाँ ‘तारकामय संग्राम’ और छठा ‘आजीवक’ नामक युद्ध हुआ। सातवाँ ‘त्रैपुर’ आठवाँ ‘अन्धकवध ‘ और नवाँ ‘वृत्रविघातक संग्राम’ है। दसवाँ ‘जित्’, ग्यारहवाँ ‘हालाहल’ और बारहवाँ ‘घोर कोलाहल’ नामक युद्ध हुआ है ॥ १०-१२ ॥ प्राचीनकाल में देवपालक भगवान् नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का हृदय विदीर्ण करके प्रह्लाद को दैत्यों का राजा बनाया था। फिर देवासुर संग्राम के अवसर पर कश्यप और अदिति से वामनरूप में प्रकट होकर भगवान् ने बल और प्रताप में बढ़े- चढ़े हुए राजा बलि को छला और इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य दे दिया। ‘वाराह’ नामक युद्ध उस समय हुआ था, जबकि भगवान् ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष को मारा, देवताओं की रक्षा की और जल में डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार किया। उस समय देवाधिदेवों ने भगवान् की स्तुति की ॥ १३-१५ ॥ एक बार देवता और असुरों ने मिलकर मन्दराचल को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (बन्धन की रस्सी) बना समुद्र को मथकर अमृत निकाला, किंतु भगवान् ने वह सारा अमृत देवताओं को ही पिला दिया। (उस समय देवताओं और दैत्यों में घोर युद्ध हुआ था।) तारकामय-संग्राम के अवसर पर भगवान् ब्रह्मा ने इन्द्र, बृहस्पति, देवताओं तथा दानवों को युद्ध से रोककर देवताओं की रक्षा की और सोमवंश को स्थापित किया। आजीवक-युद्ध में विश्वामित्र, वसिष्ठ और अत्रि आदि ऋषियों ने राग-द्वेषादि दानवों का निवारण करके देवताओं का पालन किया। पृथ्वीरूपी रथ में वेदरूपी घोड़े जोतकर भगवान् शंकर उस पर बैठे (और त्रिपुर का नाश करने के लिये चले)। उस समय देवताओं के रक्षक और दैत्यों का विनाश करने वाले भगवान् श्रीहरि ने शंकरजी को शरण दी और बाण बनकर स्वयं ही त्रिपुर का दाह किया। गौरी का अपहरण करने की इच्छा से अन्धकासुर ने रुद्रदेव को बहुत कष्ट पहुँचाया — यह जानकर रेवती में अनुराग रखने वाले श्रीहरि ने उस असुर का विनाश किया (यही आठवाँ संग्राम है)। देवताओं और असुरों के युद्ध में वृत्र का नाश करने के लिये भगवान् विष्णु जल के फेन होकर इन्द्र के वज्र में लग गये। इस प्रकार उन्होंने देवराज इन्द्र और देवधर्म का पालन करने वाले देवताओं को संकट से बचाया। (‘जित्’ नामक दसवाँ संग्राम वह है, जब कि) भगवान् श्री हरि ने परशुराम अवतार धारण कर शाल्व आदि दानवों पर विजय पायी और दुष्ट क्षत्रियों का विनाश करके देवता आदि की रक्षा की। (ग्यारहवें संग्राम के समय) मधुसूदन ने हालाहल विष के रूप में प्रकट हुए दैत्य का शंकरजी के द्वारा नाश कराकर देवताओं का भय दूर किया। देवासुर संग्राम में जो ‘कोलाहल’ नाम का दैत्य था, उसको परास्त करके भगवान् विष्णु ने धर्मपालनपूर्वक सम्पूर्ण देवताओं की रक्षा की। राजा, राजकुमार, मुनि और देवता — सभी भगवान् के स्वरूप हैं। मैंने यहाँ जिनको बतलाया और जिनका नाम नहीं लिया, वे सभी श्री हरि के ही अवतार हैं ॥ १६-२५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘द्वादश संग्रामों का वर्णन’ नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७६ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe