अग्निपुराण – अध्याय 286
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ छियासीवाँ अध्याय
मृत्युञ्जय योगों का वर्णन
कल्पसागरः

भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं — सुश्रुत ! अब मैं मृत्युञ्जय-कल्पों का वर्णन करता हूँ, जो आयु देने वाले एवं सब रोगों का मर्दन करने वाले हैं। मधु, घृत, त्रिफला और गिलोय का सेवन करना चाहिये। यह रोग को नष्ट करने वाली है तथा तीन सौ वर्ष तक की आयु दे सकती है। चार तोले, दो तोले अथवा एक तोले की मात्रा में त्रिफला का सेवन वही फल देता है। एक मास तक बिल्व तैल का नस्य लेने से पाँच सौ वर्ष की आयु और कवित्व-शक्ति उपलब्ध होती है। भिलावा एवं तिल का सेवन रोग, अपमृत्यु और वृद्धावस्था को दूर करता है। वाकुची के पञ्चाङ्ग के चूर्ण को खैर (कत्था) के क्वाथ के साथ छः मास तक प्रयोग करने से रोगी कुष्ठ पर विजयी होता है। नीली कटसरैया के चूर्ण का मधु या दुग्ध के साथ सेवन हितकर है। खाँडयुक्त दुग्ध का पान करने वाला सौ वर्षों की आयु प्राप्त करता है। प्रतिदिन प्रातःकाल मधु, घृत और सोंठ का चार तोले की मात्रा में सेवन करने वाला मनुष्य मृत्युविजयी होता है। ब्राह्मी के चूर्ण के साथ दूध का सेवन करने वाले मनुष्य के चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं पड़ती हैं और उसके बाल नहीं पकते हैं; वह दीर्घजीवन लाभ करता है। मधु के साथ उच्चटा (भुईं आँवला) को एक तोले की मात्रा में खाकर दुग्धपान करने वाला मनुष्य मृत्यु पर विजय पाता है। मधु, घी अथवा दूध के साथ मेउड़ के रस का सेवन करने वाला रोग एवं मृत्यु को जीतता है। छः मास तक प्रतिदिन एक तोलेभर पलाश-तैल का मधु के साथ सेवन करके दुग्धपान करने वाला पाँचे सौ वर्षों की आयु प्राप्त करता है। दुग्ध के साथ काँगनी के पत्तों के रस का या त्रिफला का प्रयोग करे। इससे मनुष्य एक हजार वर्षों की आयु प्राप्त कर सकता है। ‘इसी प्रकार मधु के साथ घृत और चार तोलेभर शतावरी-चूर्ण का सेवन करने से भी सहस्रों वर्षों की आयु प्राप्त हो सकती है। घी अथवा दूध के साथ मेउड़ की जड़ का चूर्ण या पत्रस्वरस रोग एवं मृत्यु का नाश करता है। नीम के पञ्चाङ्ग चूर्ण को खैर के क्वाथ (काढ़े) की भावना देकर भृङ्गराज के रस के साथ एक तोलाभर सेवन करने से मनुष्य रोग को जीतकर अमर हो सकता है। रुदन्तिकाचूर्ण घृत और मधु के साथ सेवन करने से या केवल दुग्धाहार से मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है। हरीतकी के चूर्ण को भृङ्गराजरस की भावना देकर एक तोले की मात्रा में घृत और मधु के साथ सेवन करने वाला रोगमुक्त होकर तीन सौ वर्षों की आयु प्राप्त कर सकता है। गेठी, लोहचूर्ण, शतावरी समान भाग से भृङ्गराज रस तथा घी के साथ एक तोला मात्रा में सेवन करने से मनुष्य पाँच सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। लौहभस्म तथा शतावरी को भृङ्गराज के रस में भावना देकर मधु एवं घी के साथ लेने से तीन सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है। ताम्रभस्म, गिलोय, शुद्ध गन्धक समान भाग घीकुँवार के रस में घोटकर दो-दो रत्ती की गोली बनाये। इसका घृत से सेवन करने से मनुष्य पाँच सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। असगन्ध, त्रिफला, चीनी, तैल और घृत में सेवन करने वाला सौ वर्ष तक जीता है। गदहपूर्ना का चूर्ण एक पल मधु, घृत और दुग्ध के साथ भक्षण करने वाला भी शतायु होता है। अशोक की छाल का एक पल चूर्ण मधु और घृत के साथ खाकर दुग्धपान करने से रोगनाश होता है। निम्ब के तैल की मधुसहित नस्य लेने से मनुष्य सौ वर्ष जीता है और उसके केश सदा काले रहते हैं। बहेड़े के चूर्ण को एक तोला मात्रा में शहद, घी और दूध से पीने वाला शतायु होता है। मधुरादिगण की ओषधियों और हरीतकी को गुड़ और घृत के साथ खाकर दूध के सहित अन्न भोजन करने वालों के केश सदा काले रहते हैं तथा वह रोगरहित होकर पाँच सौ वर्षों का जीवन प्राप्त करता है। एक मास तक सफेद पेठे के एक पल चूर्ण को मधु, घृत और दूध के साथ सेवन करते हुए दुग्धान्न का भोजन करने वाला नीरोग रहकर एक सहस्र वर्ष की आयु का उपभोग करता है। कमलगन्ध का चूर्ण भाँगरे के रस की भावना देकर मधु और घृत के साथ लिया जाय तो वह सौ वर्षों की आयु प्रदान करता है। कड़वी तुम्बी के एक तोलेभर तेल का नस्य दो सौ वर्षों की आयु प्रदान करता है। त्रिफला, पीपल और सोंठ इनका प्रयोग तीन सौ वर्षों की आयु प्रदान करता है। इनका शतावरी के साथ सेवन अत्यन्त बलप्रद और सहस्र वर्षों की आयु प्रदान करने वाला है। इनका चित्रक के साथ तथा सोंठ के साथ विडंग का प्रयोग भी पूर्ववत् फलप्रद है। त्रिफला, पीपल और सोंठ इनका लोह, भृङ्गराज, खरेटी, निम्ब पञ्चाङ्ग, खैर, निर्गुण्डी, कटेरी, अडूसा और पुनर्नवा के साथ या इनके रस की भावना देकर या इनके संयोग से बटी या चूर्ण का निर्माण करके उसका घृत, मधु, गुड़ और जलादि अनुपानों के साथ सेवन करने से पूर्वोक्त फल की प्राप्ति होती है। ‘ॐ ह्रूं सः’ [^1]  इस मन्त्र से अभिमन्त्रित योगराज मृतसंजीवनी के समान होता है। उसके सेवन से मनुष्य रोग और मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। देवता, असुर और मुनियों ने इन कल्प सागरों का सेवन किया है ॥ १-२३ ॥ गजायुर्वेद का वर्णन पालकाप्य ने अङ्गराज (लोमपाद) से किया था ॥ २४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मृत्युञ्जय कल्प-कथन’ नामक दो सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८६ ॥

[^1]: ‘ ॐ ह्रूं सः ‘ — ऐसा पाठ ही प्रतियों में उपलब्ध है। परंतु मृत्युञ्जय मन्त्र ‘ॐ जूं सः’ ऐसा है।

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.