July 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 292 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बानबेवाँ अध्याय गवायुर्वेद गवायुर्वेदः धन्वन्तरि कहते हैं — सुश्रुत ! राजा को गौओं और ब्राह्मणों का पालन करना चाहिये। अब मैं ‘गोशान्ति ‘ का वर्णन करता हूँ। गौएँ पवित्र एवं मङ्गलमयी हैं। गौओं में सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है। गौओं का गोबर और मूत्र अलक्ष्मी (दरिद्रता) के नाश का सर्वोत्तम साधन है। उनके शरीर को खुजलाना, सींगों को सहलाना और उनको जल पिलाना भी अलक्ष्मी का निवारण करने वाला है। गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, दधि, घृत और कुशोदक यह ‘षडङ्ग’ (पञ्चगव्य) पीने के लिये उत्कृष्ट वस्तु तथा दुःस्वप्नों आदि का निवारण करने वाला है। गोरोचना विष और राक्षसों को विनाश करती है। गौओं को ग्रास देने वाला स्वर्ग को प्राप्त होता है। जिसके घर में गौएँ दुःखित होकर निवास करती हैं, वह मनुष्य नरकगामी होता है। दूसरे की गाय को ग्रास देने वाला स्वर्ग को और गोहित में तत्पर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। गोदान, गो-माहात्म्य- कीर्तन और गोरक्षण से मानव अपने कुल का उद्धार कर देता है। यह पृथ्वी गौओं के श्वास से पवित्र होती है। उनके स्पर्श से पापों का क्षय होता है। ‘एक दिन गोमूत्र, गोमय, घृत, दूध, दधि और कुश का जल एवं एक दिन उपवास चाण्डाल को भी शुद्ध कर देता है। पूर्वकाल में देवताओं ने भी समस्त पापों के विनाश के लिये इसका अनुष्ठान किया था। इनमें से प्रत्येक वस्तु का क्रमशः तीन तीन दिन भक्षण करके रहा जाय, उसे ‘महासान्तपन व्रत’ कहते हैं। यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करने वाला और समस्त पापों का विनाश करने वाला है। केवल दूध पीकर इक्कीस दिन रहने से ‘कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत’ होता है। इसके अनुष्ठान से श्रेष्ठ मानव सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्तकर पापमुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं। तीन दिन गरम गोमूत्र, तीन दिन गरम घृत, तीन दिन गरम दूध और तीन दिन गरम वायु पीकर रहे। यह ‘तप्तकृच्छ व्रत’ कहलाता है, जो समस्त पापों का प्रशमन करने वाला और ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराने वाला है। यदि इन वस्तुओं को इसी क्रम से शीतल करके ग्रहण किया जाय, तो ब्रह्माजी के द्वारा कथित ‘शीतकृच्छ’ होता है, जो ब्रह्मलोकप्रद है। ॥ १-११ ॥ एक मासत क गोव्रती होकर गोमूत्र से प्रतिदिन स्नान करे, गोरस से जीवन चलावे, गौओं का अनुगमन करे और गौओं के भोजन करने के बाद भोजन करे। इससे मनुष्य निष्पाप होकर गोलोक को प्राप्त करता है। गोमती विद्या के जप से भी उत्तम गोलोक की प्राप्ति होती है। उस लोक में मानव विमान में अप्सराओं के द्वारा नृत्य गीत से सेवित होकर प्रमुदित होता है। गौएँ सदा सुरभिरूपिणी हैं। वे गुग्गुल के समान गन्ध से संयुक्त हैं। गौएँ समस्त प्राणियों की प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम मङ्गलमयी हैं। गौएँ परम अन्न और देवताओं के लिये उत्तम हविष्य हैं। वे सम्पूर्ण प्राणियों को पवित्र करने वाले दुग्ध और गोमूत्र का वहन एवं क्षरण करती हैं और मन्त्रपूत हविष्य से स्वर्ग में स्थित देवताओं को तृप्त करती हैं। ऋषियों के अग्निहोत्र में गौएँ होमकार्य में प्रयुक्त होती हैं। गौएँ सम्पूर्ण मनुष्यों की उत्तम शरण हैं। गौएँ परम पवित्र, महामङ्गलमयी, स्वर्ग की सोपानभूत, धन्य और सनातन (नित्य) हैं। श्रीमती सुरभि पुत्री गौओं को नमस्कार है। ब्रहासुताओं को नमस्कार है। पवित्र गौओं को बारंबार नमस्कार है। ब्राह्मण और गौएँ — एक ही कुल की दो शाखाएँ हैं। एक के आश्रय में मन्त्र की स्थिति है और दूसरी में हविष्य प्रतिष्ठित है। देवता, ब्राह्मण, गौ, साधु और साध्वी स्त्रियों के बल पर यह सारा संसार टिका हुआ है, इसी से वे परम पूजनीय हैं। गौएँ जिस स्थान पर जल पीती हैं, वह स्थान तीर्थ है। गङ्गा आदि पवित्र नदियाँ गोस्वरूपा ही हैं। सुश्रुत। मैंने यह गौओं के माहात्म्य का वर्णन किया; अब उनकी चिकित्सा सुनो ॥ १२-२२ ॥ गौओं के श्रृङ्गरोगों में सोठ, खरेटी और जटामांसी को सिलपर पीसकर उसमें मधु, सैन्धव और तैल मिलाकर प्रयोग करे। सभी प्रकार के कर्णरोगों में मञ्जिष्ठा, हींग और सैन्धव डालकर सिद्ध किया हुआ तैल प्रयोग करना चाहिये या लहसुन के साथ पकाया हुआ तैल प्रयोग करना चाहिये। दन्तशूल में बिल्वमूल, अपामार्ग, धान की पाटला और कुटज का लेप करे। वह शूलनाशक है। दन्तशूल का हरण करने वाले द्रव्यों और कूट को घृत में पकाकर देने से मुखरोगों का निवारण होता है। जिह्वा रोगों में सैन्धव लवण प्रशस्त है। गलग्रह-रोग में सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी और त्रिफला विहित है। हृद्रोग, वस्तिरोग, वातरोग और क्षयरोग में गौओं को घृतमिश्रित त्रिफला का अनुपान प्रशस्त बताया गया है। अतिसार में हल्दी, दारुहल्दी और पाठा (नेमुक) दिलाना चाहिये। सभी प्रकार के कोष्ठगत 1 रोगों में, शाखा (पैर-पुच्छादि) गत रोगों में एवं कास, श्वास एवं अन्य साधारण रोगों में सोंठ, भारङ्गी देनी चाहिये। हड्डी आदि टूटने पर लवणयुक्त प्रियङ्गु का लेप करना चाहिये। तैल वातरोग का हरण करता है। पित्तरोग में तैल में पकायी हुई मुलहठी, कफरोग में मधुसहित त्रिकटु (सोंठ, मिर्च और पीपल) तथा रक्तविकार में मजबूत नखों का भस्म हितकर है। भग्नक्षत में तैल एवं घृत में पकाया हुआ हरताल दे। उड़द, तिल, गेहूँ, दुग्ध, जल और घृत — इनका लवणयुक्त पिण्ड गोवत्सों के लिये पुष्टिप्रद है। विषाणी बल प्रदान करने वाली है। ग्रहबाधा के विनाश के लिये धूप का प्रयोग करना चाहिये। देवदारु, वचा, जटामांसी, गुग्गुल, हिंगु और सर्षप — इनकी धूप गौओं के ग्रहजनित रोगों का नाश करने में हितकर है। इस धूप से धूपित करके गौओं के गले में घण्टा बाँधना चाहिये। असगन्ध और तिलों के साथ नवनीत का भक्षण कराने से गौ दुग्धवती होती है। जो वृष घर में मदोन्मत्त हो जाता है, उसके लिये हिङ्गु परम रसायन है ॥ २३-३५ ॥ पञ्चमी तिथि को सदा शान्ति के निमित्त गोमय पर भगवान् लक्ष्मी-नारायण का पूजन करे। यह ‘अपरा शान्ति’ कही गयी है। आश्विन के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को श्रीहरि का पूजन करे। श्रीविष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, सूर्य, अग्नि और लक्ष्मी का घृत से पूजन करे। दही भलीभाँति खाकर गोपूजन करके अग्नि की प्रदक्षिणा करे। गृह के बहिर्भाग में गीत और वाद्य को ध्वनि के साथ वृषभयुद्ध का आयोजन करे। गौओं को लवण और ब्राह्मणों को दक्षिणा दे। मकरसंक्रान्ति आदि नैमित्तिक पर्वों पर भी लक्ष्मीसहित श्रीविष्णु को भूमिस्थ कमल के मध्य में और पूर्व आदि दिशाओं में कमल-केसर पर देवताओं की पूजा करे। कमल के बहिर्भाग में मङ्गलमय ब्रह्मा, सूर्य, बहुरूप, बलि, आकाश, विश्वरूपका तथा ऋद्धि, सिद्धि, शान्ति और रोहिणी आदि दिग्धेनु, चन्द्रमा और शिव का कृशर (खिचड़ी) से पूजन करे। दिक्पालों की कलशस्थ पद्मपत्र पर अर्चना करे। फिर अग्नि में सर्वप, अक्षत, तण्डुल और खैर-वृक्ष की समिधाओं का हवन करे। ब्राह्मण को सौ-सौ भर सुवर्ण और काँस्य आदि धातु दान करे। फिर क्षीरसंयुक्त गौओं की पूजा करके उन्हें शान्ति के निमित्त छोड़े ॥ ३६-४३ ॥ अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। शालिहोत्र ने सुश्रुत को ‘अश्वायुर्वेद’ और पालकाप्य ने अङ्गराज को ‘गवायुर्वेद’ का उपदेश किया था ॥ ४४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गवायुर्वेद का कथन’ नामक दो सौ बानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९२ ॥ 1. स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। हृदुण्डकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥ (सु० चि० अ० २) Content is available only for registered users. 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