अग्निपुराण – अध्याय 293
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय
मन्त्र-विद्या
मन्त्रपरिभाषा:

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली मन्त्र विद्या का वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर उसका श्रवण कीजिये। द्विजश्रेष्ठ। बीस से अधिक अक्षरों वाले मन्त्र ‘मालामन्त्र’ दस से अधिक अक्षरों वाले ‘मन्त्र’ और दस से कम अक्षरों वाले ‘बीजमन्त्र’ कहे गये हैं। ‘मालामन्त्र’ वृद्धावस्था में सिद्धिदायक होते हैं, ‘मन्त्र’ यौवनावस्था में सिद्धिप्रद 1  है। पाँच अक्षर से अधिक तथा दस अक्षर तक के मन्त्र बाल्यावस्था में सिद्धि प्रदान करते हैं। अन्य मन्त्र अर्थात् एक से लेकर पाँच अक्षर तक के मन्त्र सर्वदा और सबके लिये सिद्धिदायक होते हैं 2  ॥ १-२१/२ ॥’

मन्त्रों की तीन जातियाँ होती हैं — स्त्री, पुरुष और नपुंसक। जिन मन्त्रों के अन्त में ‘स्वाहा’ पद का प्रयोग हो, वे स्त्रीजातीय हैं। जिनके अन्त में ‘नमः’ पद जुड़ा हो, वे मन्त्र नपुंसक हैं। शेष सभी मन्त्र पुरुषजातीय हैं। वे वशीकरण और उच्चाटन कर्म में प्रशस्त माने गये हैं। क्षुद्रक्रिया तथा रोग के निवारणार्थ अर्थात् शान्तिकर्म में स्त्रीजातीय मन्त्र 3  उत्तम माने गये हैं। इन सबसे भिन्न (विद्वेषण एवं अभिचार आदि) कर्म में नपुंसक मन्त्र उपयोगी बताये गये हैं ॥ ३-४१/२

मन्त्रों के दो भेद हैं — ‘आग्नेय’ और ‘सौम्य’। जिनके आदि में ‘प्रणव’ लगा हो, वे ‘आग्नेय’ हैं और जिनके अन्त में ‘प्रणव’ का योग है, वे ‘सौम्य’ कहे गये हैं। इनका जप इन्हीं दोनों के काल में करना चाहिये (अर्थात् सूर्य-नाड़ी चलती हो तो ‘आग्नेय मन्त्र’ का और चन्द्र-नाड़ी चलती हो तो ‘सौम्य मन्त्रों’ का जप करे)।4 जिस मन्त्र में तार (ॐ), अन्त्य (क्ष), अग्नि (र), वियत् (ह) — इनका बाहुल्येन प्रयोग हो, वह ‘आग्नेय’ माना गया है। शेष मन्त्र ‘सौम्य’ कहे गये हैं।5  ये दो प्रकार के मन्त्र क्रमशः क्रूर और सौम्य कर्मों में प्रशस्त माने गये हैं। 6  ‘आग्नेय मन्त्र’ प्रायः अन्त में ‘नमः’ पद से युक्त होने पर ‘सौम्य’ हो जाता है और ‘सौम्य मन्त्र भी अन्त में ‘फट्’ लगा देने पर ‘आग्नेय’ हो जाता है।7  यदि मन्त्र सोया हो या सोकर तत्काल ही जगा हो तो वह सिद्धिदायक नहीं होता है। जब वाम नाड़ी चलती हो तो वह ‘आग्नेय मन्त्र’ के सोने का समय है और यदि दाहिनी नाड़ी (नासिका के दाहिने छिद्र से साँस) चलती हो तो वह उसके जागरण का काल है। ‘सौम्य मन्त्र’ के सोने और जागने का समय इसके विपरीत है। अर्थात् वाम नाड़ी (साँस) उसके जागरण का और दक्षिण नाड़ी उसके शयन का काल है। जब दोनों नाड़ियाँ साथ-साथ चल रही हों, उस समय आग्नेय और सौम्य दोनों मन्त्र जगे रहते हैं। (अतः उस समय दोनों का जप किया जा सकता है’।)8  दृष्ट नक्षत्र, दुष्ट राशि तथा शत्रुरूप आदि अक्षरवाले मन्त्रोंको अवश्य त्याग देना चाहिये 9  ॥ ५-९१/२

(नक्षत्र-चक)
राज्यलाभोपकाराय प्रारभ्यारिः स्वरः कुरून् ॥
गोपालकुकुटीं प्रायात् फुल्लावित्युदिता लिपिः । 10

(साधक के नाम के प्रथम अक्षर को तथा मन्त्र के आदि अक्षर को लेकर गणना करके यह जानना है कि उस साधक के लिये वह मन्त्र अनुकूल है या प्रतिकूल ? इसी के लिये उपर्युक्त श्लोक एक संकेत देता है — ‘राज्य ‘ से लेकर ‘फुल्लौ’ तक लिपि का ही संकेत है। इत्युदिता लिपिः’ इस प्रकार लिपि कही गयी है। ‘नारायणीय तन्त्र में इसकी व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अश्विनी से लेकर उत्तरभाद्रपदा तक के छब्बीस नक्षत्रों में ‘अ’ से लेकर ‘ह’ तक के अक्षरों को बाँटना है। किस नक्षत्र में कितने अक्षर लिये जायेंगे, इसके लिये उपर्युक्त श्लोक संकेत देता है। ‘रा’ से ‘ल्ली’ तक छब्बीस अक्षर हैं; वे छब्बीस नक्षत्रों के प्रतीक हैं। तन्त्रशास्त्रियों ने अपने संकेतवचनों में केवल व्यञ्जनों को ग्रहण किया है और समस्त व्यञ्जनों को कवर्ग, टवर्ग, पवर्ग तथा यवर्ग में बाँटा है। संकेत लिपि का जो अक्षर जिस वर्ग का प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ अक्षर है, उससे उतनी ही संख्याएँ ली जायेंगी। संयुक्ताक्षरों में से अन्तिम अक्षर ही गृहीत होगा। स्वरों पर कोई संख्या नहीं है। उपर्युक्त श्लोक में पहला अक्षर ‘रा’ है। यह यवर्ग का दूसरा अक्षर है, अतः उससे दो संख्या ली जायगी। इस प्रकार ‘रा’ यह संकेत करता है कि अश्विनी नक्षत्र में दो अक्षर ‘अ आ’ गृहीत होंगे। दूसरा अक्षर है ‘ज्य’, यह संयुक्ताक्षर है, इसका अन्तिम अक्षर ‘य’ गृहीत होगा। वह अपने वर्ग का प्रथम अक्षर है, अतः एक का बोधक होगा। इस प्रकार पूर्वोक्त ‘ज्य ‘के संकेतानुसार भरणी नक्षत्र में एक अक्षर ‘इ’ लिखा जायगा। इस बात को ठीक समझने के लिये निम्नाङ्कित्त चक्र देखिये —


यह वर्णमाला नक्षत्रों के साथ क्रमशः जोड़नी चाहिये। केवल ‘अं अः – ये दो अन्तिम स्वर रेवती नक्षत्र के साथ सदा जुड़े रहते है 11  ॥ १०-१११/२

(इनके द्वारा जन्म, सम्पद्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र तथा अतिमित्र — इन तारों का विचार किया जाता है। जहाँ साधक के नाम का आदि अक्षर है, वहाँ से लेकर मन्त्र के आदि अक्षर तक गिने। उसमें नौ का भाग देकर शेष के अनुसार जन्मादि तारों को जाने।)

(बारह राशियों में वर्णों का विभाजन)
वालं गौरं खुरं शोणं शमी शोभेति भेदिताः ।
लिप्यर्णा राशिषु ज्ञेयाः षष्ठे शार्दीश्च योजयेत् ॥ १२ ॥

(जैसा कि पूर्व श्लोक में संकेत किया है, उसी तरह ‘वा’ से लेकर ‘भा’ तक के बारह अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों तथा ४ आदि संख्याओं की ओर संकेत करते हैं) वा ४ लं ३ गौ ३ रं २ खु २ रं २ शो ५ णं ५ भा ४। इन संख्याओं में विभक्त हुए अकार आदि अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों में स्थित जानने चाहिये। ‘श ष स ह’ इन अक्षरों को (तथा स्वरान्त्य वर्णों ‘अं अः’ को) छठी कन्याराशि में संयुक्त करना चाहिये।12  क्षकारका मीनराशिमें प्रवेश है’।13  यथा —

राशि-ज्ञान का उपयोग — साधक के नाम का आदि अक्षर जहाँ हो, उस राशि से मन्त्र के आदि अक्षर की राशि तक गिने। जो संख्या हो, उसके अनुसार फल जाने। यदि संख्या छठी, आठवीं अथवा बारहवीं हो तो वह निन्द्य है। इन बारह संख्याओं को ‘बारह भाव’ कहते हैं। उनकी विशेष संख्यासंज्ञा इस प्रकार है — तन, धन, सहज, सुहृद्, पुत्र, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय। मन्त्र के अक्षर यदि मृत्यु, शत्रु तथा व्यय भाव के अन्तर्गत हैं तो वे अशुभ हैं।
(सिद्धादि मन्त्र-शोधन-प्रकार)

चौकोर स्थान पर पाँच रेखाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर तथा पाँच रेखाएँ उत्तर से दक्षिण की और खींचे। इस प्रकार सोलह कोष्ठ बनाये। इनमें क्रमशः सोलह स्वरों को लिखा जाय। तदनन्तर उसी क्रम से व्यञ्जन-वर्ण भी लिखे। तीन आवृत्ति पूर्ण होने पर चौथी आवृत्ति में प्रथम दो कोष्ठों के भीतर क्रमशः ‘ह’ और ‘क्ष’ लिखकर सब अक्षरों की पूर्ति कर ले। इन सोलह में प्रथम कोष्ठ की चार पङ्क्तियाँ ‘सिद्ध’, दूसरे कोष्ठ की चार पङ्क्तियाँ ‘साध्य’, तीसरे कोष्ठ की चार पङ्क्तियाँ ‘सुसिद्ध’ तथा चौथे कोष्ठ की चार पङ्क्तियाँ ‘अरि’ मानी गयी हैं। जिस साधक के नाम का आदि अक्षर जिस चतुष्क में पड़े, वही उसके लिये ‘सिद्ध चतुष्क’ है, वहाँ से दूसरा उसके लिये ‘साध्य’, तीसरा ‘सुसाध्य’ और चौथा चतुष्क ‘अरि’ है। जिस चतुष्क के जिस कोष्ठ में साधक का नाम है, वह उसके लिये ‘सिद्ध-सिद्ध’ कोष्ठ है। फिर प्रदक्षिणक्रम से उस चतुष्क का दूसरा कोष्ठ ‘सिद्धसाध्य’, ‘सिद्ध सुसिद्ध’ तथा ‘सिद्ध अरि’ है। इसी चतुष्क में यदि मन्त्र का भी आदि अक्षर हो तो इसी गणना के अनुसार उसके भी ‘सिद्ध-सिद्ध’, ‘सिद्ध-साध्य’ आदि भेद जान लेने चाहिये। यदि इस चतुष्क में अपने नाम का आदि अक्षर हो और द्वितीय चतुष्क में मन्त्र का आदि अक्षर हो तो पूर्व चतुष्क के जिस कोष्ठ में नाम का आदि अक्षर है, उस दूसरे चतुष्क में भी उसी कोष्ठ से लेकर प्रादक्षिण्य-क्रम से ‘साध्यसिद्ध’ आदि भेद की कल्पना करनी चाहिये। इस प्रकार सिद्धादि की कल्पना करे। सिद्ध मन्त्र अत्यन्त गुणों से युक्त होता है। ‘सिद्ध-मन्त्र’ जपमात्र से सिद्ध अर्थात् सिद्धिदायक होता है; ‘साध्य मन्त्र’ जप, पूजा और होम आदि से सिद्ध होता है। ‘सुसिद्ध मन्त्र’ चिन्तनमात्र से सिद्ध हो जाता है, परंतु ‘अरि मन्त्र’ साधक का नाश कर देता है। जिस मन्त्र में दुष्ट अक्षरों की संख्या अधिक हो, उसकी सभी ने निन्दा की है ॥ १३-१५ ॥

शिष्य को चाहिये कि वह अभिषेकपर्यन्त दीक्षा में विधिवत् प्रवेश लेकर गुरु के मुख से तन्त्रोक्त विधि का श्रवण करके गुरु से प्राप्त हुए अभीष्ट मन्त्र की साधना करे। जो धीर, दक्ष, पवित्र, भक्तिभाव से सम्पन्न, जप-ध्यान आदि में तत्पर रहने वाला, सिद्ध, तपस्वी, कुशल, तन्त्रवेत्ता, सत्यवादी तथा निग्रह-अनुग्रह में समर्थ हो, वह ‘गुरु’ कहलाता है। जो शान्त (मन को वश में रखने वाला), दान्त (जितेन्द्रिय), पटु (सामर्थ्यवान्), ब्रह्मचारी, हविष्यान्नभोजी, गुरु की सेवामें संलग्न और मन्त्रसिद्धि के प्रति उत्साह रखने वाला हो, वह ‘योग्य’ शिष्य है। उसको तथा अपने पुत्र को मन्त्र का उपदेश देना चाहिये। शिष्य विनयी तथा गुरु को धन देने वाला हो। ऐसे शिष्य को गुरु मन्त्र का उपदेश दे और उसकी सुसिद्धि के लिये स्वयं भी एक सहस्र की संख्या में जप करे। अकस्मात् कहीं से सुना हुआ, छल अथवा बल से प्राप्त किया हुआ, पुस्तक के पन्ने में लिखा हुआ अथवा गाथा में कहा गया मन्त्र नहीं जपना चाहिये। यदि ऐसे मन्त्र का जप किया जाय तो वह अनर्थ उत्पन्न करता है। जो जप, होम तथा अर्चना आदि भूरि क्रियाओं द्वारा मन्त्र की साधना में संलग्न रहता है, उसके मन्त्र स्वल्पकालिक साधन से ही सिद्ध हो जाते हैं। जिसने एक मन्त्र को भी विधिपूर्वक सिद्ध कर लिया है, उसके लिये इस लोक में कुछ भी असाध्य नहीं है; फिर जिसने बहुत-से मन्त्र सिद्ध कर लिये हैं, उसके माहात्म्य का किस प्रकार वर्णन किया जाय ? वह तो साक्षात् शिव ही है। एक अक्षर का मन्त्र दस लाख जप करने से सिद्ध हो जाता है। मन्त्र में ज्यों-ज्यों अक्षर की वृद्धि हो, त्यों-ही- त्यों उसके जप की संख्या में कमी होती है। इस नियम से अन्य मन्त्रों के जप की संख्या के विषय में स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिये। बीज मन्त्र की अपेक्षा दुगुनी-तिगुनी संख्या में मालामन्त्रों के जप का विधान है। जहाँ जप की संख्या नहीं बतायी गयी हो, वहाँ मन्त्र जपादि के लिये एक सौ आठ या एक हजार आठ संख्या जाननी चाहिये। सर्वत्र जप से दशांश हवन एवं तर्पण का विधान मिलता है ॥ १६-२५ ॥

जहाँ किसी द्रव्य-विशेष का उल्लेख न हो, वहाँ होम में घृत का उपयोग करना चाहिये। जो आर्थिक दृष्टि से असमर्थ हो, उसके लिये होम के निमित्त जप की संख्या से दशांश जप का ही सर्वत्र विधान मिलता है। अङ्ग आदि के लिये भी जप आदि का विधान है। सशक्ति मन्त्र के जप से मन्त्रदेवता साधक को अभीष्ट फल देते हैं। वे साधक के द्वारा किये गये ध्यान, होम और अर्चन आदि से तृप्त होते हैं। उच्चस्वर से जप की अपेक्षा उपांशु (मन्दस्वर से किया गया) जप दसगुना श्रेष्ठ कहा गया है। यदि केवल जिह्वा हिलाकर जप किया जाय तो वह सौ गुना उत्तम माना गया है। मानस (मन के द्वारा किये जाने वाले) जप का महत्त्व सहस्रगुना उत्तम कहा गया है। मन्त्र- सम्बन्धी कर्म का सम्पादन पूर्वाभिमुख अथवा दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। मौन होकर विहित आहार ग्रहण करते हुए प्रणव आदि सभी मन्त्रों का जप करना चाहिये। देवता तथा आचार्य के प्रति समान दृष्टि रखते हुए आसन पर बैठकर मन्त्र का जप करे। कुटी, एकान्त एवं पवित्र स्थान, देवमन्दिर, नदी अथवा जलाशय — ये जप करने के लिये उत्तम देश हैं। मन्त्र-सिद्धि के लिये जौ की लप्सी, मालपूए, दुग्ध एवं हविष्यान्न का भोजन करे। साधक मन्त्रदेवता का उनकी तिथि, वार, कृष्णपक्ष की अष्टमी-चतुर्दशी तथा ग्रहण आदि पर्वों पर पूजन करे। अश्विनीकुमार, यमराज, अग्नि, धाता, चन्द्रमा, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, सर्प, पितर, भग, अर्यमा, सूर्य, त्वष्टा, वायु, इन्द्राग्नि, मित्र, इन्द्र, जल, निऋति, विश्वेदेव, विष्णु, वसुगण, वरुण, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य और पूषा — ये क्रमशः अश्विनी आदि नक्षत्रों के देवता हैं। प्रतिपदा से लेकर चतुर्दशीपर्यन्त तिथियों के देवता क्रमशः निम्नलिखित हैं — अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, स्कन्द, सूर्य, महेश, दुर्गा, यम, विश्वदेव, विष्णु, कामदेव और ईश, पूर्णिमा के चन्द्रमा और अमावस्या के देवता पितर हैं। शिव, दुर्गा, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी और कुबेर — ये क्रमशः रविवार आदि वारों के देवता हैं। अब मैं ‘लिपिन्यास‘ का वर्णन करता हैं ॥ २६-३६१/२

साधक निम्नलिखित प्रकार से लिपि (मातृका) न्यास करे — ‘ॐ अं नमः, केशान्तेषु । ॐ आं नमः, मुखे । ॐ ईं नमः, दक्षिणनेत्रे । ॐ ईं नमः, वामनेत्रे। ॐ उं नमः, दक्षिणकर्णे। ॐ ऊं नमः, वामकर्णे। ॐ ऋं नमः, दक्षिणनासापुटे। ॐ ॠं नमः, वामनासापुटे। ॐ लृं नमः, दक्षिणकपोले। ॐ ॡं नमः, वामकपोले। ॐ एं नमः, ऊर्ध्वोष्ठे। ॐ ऐं नमः, अधरोष्ठे। ॐ ओं नमः, ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ। ॐ औं नमः, अधोदन्तपङ्क्तौ। ॐ अं नमः, मूर्ध्नि। ॐ अः नमः, मुखवृत्ते। ॐ कं नमः, दक्षिणबाहुमूले। ॐ खं नमः, दक्षिणकूर्परे। ॐ गं नमः, दक्षिणमणिबन्धे। ॐ घं नमः, दक्षिणहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ङं नमः, दक्षिण हस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ चं नमः, वामबाहुमूले । ॐ छं नमः, वामकूर्परे। ॐ जं नमः, वाममणिबन्धे। ॐ झं नमः, वामहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ञं नमः, वामहस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ टं नमः, दक्षिणपादमूले। ॐ ठं नमः, दक्षिणजानुनि। ॐ डं नमः, दक्षिणगुल्फे । ॐ ढं नमः, दक्षिणपादाङ्गुलिमूले। ॐ णं नमः, दक्षिणपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ तं नमः, वामपादमूले। ॐ थं नमः, वामजानुनि। ॐ दं नमः, वामगुल्फे। ॐ धं नमः, वामपादाङ्गुलिमूले। ॐ नं नमः, वामपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ पं नमः, दक्षिणपार्श्वे। ॐ फं नमः, वामपार्श्वे। ॐ बं नमः, पृष्ठे। ॐ भं नमः, नाभौ। ॐ मं नमः, उदरे। ॐ यं त्वगात्मने नमः, हृदि। ॐ रं असृगात्मने नमः, दक्षांसे। ॐ लं मांसात्मने नमः, ककुदि। ॐ वं मेदात्मने नमः, वामांसे। ॐ शं अस्थ्यात्मने नमः, हृदयादि दक्षहस्तान्तम्। ॐ षं मज्जात्मने नमः, हृदयादि-वामहस्तान्तम्। ॐ सं शुक्रात्मने नमः, हृदयादि-दक्षपादान्तम् । ॐ हं आत्मने नमः, हृदयादिवामपादान्तम्। ॐ लं परमात्मने नमः, जठरे। ॐ क्षं प्राणात्मने नमः, मुखे।’ इस प्रकार आदि में ‘प्रणव’ और अन्त में ‘नमः’ पद जोड़कर लिपीश्वरों मातृकेश्वरों का न्यास किया जाता है ॥ ३७-४० ॥

श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, तिथीश, स्थाणुक, हर, झिण्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर तथा महासेन — ये सोलह ‘स्वर-मूर्तिदेवता’ हैं। क्रोधीश, चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र, चतुरानन, अजेश, सर्वेश, सोमेश, लाङ्गलि दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलाण्ड, द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाकी, खड्गीश, बक, श्वेत, भृगु, नकुली, शिव तथा संवर्तक — ये ‘व्यञ्जन-मूर्तिदेवता’ माने गये हैं ॥ ४१-४६ ॥

उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रों का उनकी शक्तियों सहित क्रमशः न्यास करे। (श्रीविद्यार्णव- तन्त्र में इनकी शक्तियों के नाम इस प्रकार दिये गये हैं — पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सुदीर्घमुखी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा, कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उल्कामुखी, श्रामुखी तथा विद्यामुखी — ये रुद्रों की ‘स्वर-शक्तियाँ’  हैं। महाकाली, महासरस्वती, सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति, आत्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी, पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्खिनी, गर्जिनी, कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वज्रिका, जया, सुमुखी, रेवती, माधवी, वारुणी, वायवी, रक्षीविदारिणी, सहजा, लक्ष्मी, व्यापिनी और महामाया — ये ‘व्यञ्जनस्वरूपा रुद्रशक्तियाँ’ कही गयी हैं।

इनके न्यास की विधि इस प्रकार है — ‘हसौं अं श्री कण्ठाय पूर्णोदर्यै नमः। हसौं आं अनन्ताय विरजायै नमः।’ इत्यादि। इसी तरह अन्य स्वरशक्तियों का न्यास करना चाहिये। व्यञ्जन- शक्तियों के न्यास के लिये यही विधि है। यथा — ‘हसौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः। हसौं खं चण्डीशाय महासरस्वत्यै नमः ।’ इत्यादि। साधक को चाहिये कि उदयादि अङ्गों का भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग होने पर ही सिद्धिदायक होते हैं। हृल्लेखा को व्योम-बीज से युक्त करके इन अङ्गों का न्यास करना चाहिये। हृदयादि अङ्ग मन्त्रों को अन्त में जोड़कर बोलना चाहिये। यथा — ‘ह्रां हृदयाय नमः। ह्रीं शिरसे स्वाहा। ह्रूं शिखायै वषट्। ह्रें कवचाय हुम्। ह्रों नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्रः अस्त्राय फट्।’ यह ‘षडङ्गन्यास’ कहा गया है। पञ्चाङ्गन्यास में नेत्र को छोड़ दिया जाता है। निरङ्ग-मन्त्र का उसके स्वरूप से ही अङ्गन्यास करके क्रमशः वागीश्वरी देवी (ह्रीं) का एक लाख जप करे तथा यथोक्त (दशांश) तिलों की आहुति दे। लिपियों की अधिष्ठात्री देवी वागीश्वरी अपने चार हाथों में अक्षमाला, कलश, पुस्तक और कमल धारण करती हैं। कवित्व आदि की शक्ति प्रदान करती हैं। इसलिये जपकर्म के आदि में सिद्धि के लिये उनका न्यास करे। इससे अकवि भी निर्मल कवि होता है। मातृका-न्यास से सभी मन्त्र सिद्ध होते हैं ॥ ४७-५१ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मन्त्र-परिभाषा का वर्णन’ नामक दो सौ तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९३ ॥

1. ‘महाकपिल’ पञ्चरात्र में तथा ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’ में मालामन्त्रों को ‘वृद्ध‘, मन्त्रों को ‘युवा’ तथा पाँच से अधिक और दस अक्षर तक के मन्त्रों को ‘बाल’ बताया गया है। ‘भैरवी-तन्त्र’ में सात अक्षर वाले मन्त्र को ‘बाल’, आठ अक्षर वाले मन्त्र को ‘कुमार’, सोलह अक्षरों के मन्त्र को ‘तरुण’ तथा चालीस अक्षरों के मन्त्र को ‘प्रौढ़’ बताया गया है। इससे ऊपर अक्षर-संख्या वाला मन्त्र ‘वृद्ध’ कहा गया है।
2. ‘शारदातिलक’ की टीका में उद्धृत ‘प्रयोगसार’ में शब्दभेद से यही बात कही गयी है। ‘ श्रीनारायणीय-तन्त्र’ में तो ठीक ‘अग्निपुराण’ की आनुपूर्वी ही प्रयुक्त हुई है।
3. ‘कुल प्रकाश-तन्त्र ‘में स्त्रीजातीय मन्त्रों को शान्तिकर्म में उपयोगी बताया गया है। शेष बातें अग्निपुराण के ही अनुसार हैं —
स्त्रीमन्त्रा वह्निजायान्ता हृदयान्ता नपुंसकाः ।
शेषाः पुमांस इत्युक्ताः स्त्रीमन्त्राश्चादिशान्तिके ॥
नपुंसकाः स्मृता मन्त्रा विद्वेषे चाभिचारके।
पुमांसः स्युः स्मृताः सर्वे वध्योच्चाटनकर्मसु ॥

(श्रीविद्यार्णवतन्त्र २ उच्छास)
‘प्रयोगसार’ में ‘वषट्’ और ‘फट्’ जिनके अन्त में लगें, वे ‘पुँल्लिङ्ग ‘वौषट्’ और ‘स्वाहा’ अन्त में लगें, वे ‘स्त्रीलिङ्ग’ तथा ‘डुं नमः’ जिनके अन्त में लगें, वे ‘नपुंसक लिङ्ग’ मन्त्र कहे गये हैं।
4. ‘श्रीनारायणीय – तन्त्र’ में भी यह बात इसी आनुपूर्वी में कही गयी है।
5. ‘शारदातिलक’ में सौम्य मन्त्रों की भी सुस्पष्ट पहचान दी गयी है — जिसमें ‘सकार’ अथवा ‘वकार ‘का बाहुल्य हो, वह ‘सौम्य-मन्त्र’ है। जैसा कि वचन है — ‘सौम्या भूयिष्ठेन्द्वमृताक्षराः ।’
(२।६१)
6. ‘शारदातिलक ‘ में भी ‘विज्ञेयाः क्रूरसौम्ययोः’ कहकर — इसी बातकी पुष्टि की गयी है। ईशानशम्भु ने भी यही बात कही है —
‘स्यादाग्नेयैः क्रूरकार्यंप्रसिद्धिः सौम्यैः सौम्यं कर्म कुर्याद् यथावत् ‘।
7. ईशानशम्भु ने भी ऐसा ही कहा है — आग्नेयोऽपि स्यात्तु सौम्यो नमोऽन्तः सौम्योऽपि स्यादग्निमन्त्रः फडन्तः ।
‘नारायणीय-तन्त्र ‘ में यही बात यों कही गयी है —
आग्नेयमन्त्रः सौम्यः स्यात् प्रायशोऽन्ते नमोऽन्वितः ।
सौम्यमन्त्रस्तथाऽऽग्नेयः फटकारेणान्वितोऽन्ततः ॥

8. ‘बृहन्नारायणीय-तन्त्र’ में इसी भाव की पुष्टि निम्नाङ्कित श्लोकों द्वारा की गयी है —
सुप्तः प्रबुद्धमात्रो वा मन्त्रः सिद्धिं न यच्छति ।
स्वापकालो वामवहो जागरो दक्षिणावहः ॥
आग्नेयस्य मनोः सौम्यमन्त्रस्यैतद्विपर्ययः ।
प्रबोधकालं जानीयादुभयोरुभयावहः ॥
स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः ।

इसमें स्पष्ट कहा गया है कि मन्त्र जब सो रहा हो, उस समय उसका जप अनर्थ फलदायक होता है। ‘नारायणीय-तन्त्र’ में ‘स्वाप’ और ‘जागरणकाल ‘ को और भी स्पष्टता के साथ बताया गया है। वामनाड़ी, इडानाड़ी और चन्द्रनाड़ी एक वस्तु है तथा दक्षिणनाड़ी, सूर्यनाड़ी एवं पिङ्गलानाड़ी एक अर्थ के वाचक पद हैं। पिङ्गलानाड़ी में श्वासवायु चलती हो तो ‘आग्नेय मन्त्र’ प्रबुद्ध होते हैं, इडानाड़ी में श्वासवायु चलती हो तो ‘सोममन्त्र’ जाग्रत् रहते हैं। पिङ्गला और इडा दोनों में श्वासवायु की स्थिति हो अर्थात् यदि सुषुम्णा में श्वासवायु चलती हो तो सभी मन्त्र प्रबुद्ध (जाग्रत्) होते हैं। प्रबुद्ध मन्त्र ही साधकों को अभीष्ट फल देते हैं। यथा —
पिङ्गलायां गते वायौ प्रबुद्धा ह्यग्निरूपिणः ।
इडां गते तु पवने बुध्यन्ते सोमरूपिणः ॥
पिङ्गलेडागते व्रायौ प्रबुद्धाः सर्व एव हि ।
प्रबुद्धा मनवः सर्वे साधकानां फलन्त्युमे ॥

9. जैसा कि ‘भैरवी-तन्त्र’ में कहा गया है-
दुष्टर्क्षराशिमूले भूतादिवर्णप्रचुरमन्त्रकम् ।
सम्यक् परीक्ष्य तं यत्नाद् वर्जयेन्मतिमान् नरः ॥

10. ‘श्रीरुद्रयामल’ में तथा ‘नारायणीय तन्त्र’ में भी यह श्लोक आया है, जो लिपि (अक्षर) का संकेतमात्र है। इसमें शब्दार्थ अपेक्षित नहीं है। ‘शारदातिलक’ में दूसरा श्लोक संकेत के लिये प्रयुक्त हुआ है। इसमें छब्बीस नक्षत्रों में अक्षरों के विभाजन का संकेत है, जो ज्यौतिष की प्रक्रिया से भिन्न है।
11. ‘शारदातिलक’ में भी यही बात कही गयी है — ‘स्वरान्त्यौ तु रेवत्यंशगतौ सदा ‘ ॥ (२।१२५)
12. ‘शारदातिलक’ २। १२७ में यह श्लोक कुछ पाठान्त रके साथ ऐसा ही है। उसकी संस्कृत व्याख्या में यही भाव व्यक्त किया गया है।
13. जैसा कि आचार्यों ने कहा है — ‘अमः शवर्गलेभ्यश्च संजाता कन्यका मता ।’ तथा ‘चतुर्भिर्यादिभिः सार्धं स्यात् क्षकारस्तु मीनगः ।’

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