July 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 296 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छियानबेवाँ अध्याय पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान पञ्चाह्गरुद्रविधानम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘पञ्चाङ्ग रुद्र-विधान ‘का वर्णन करता हूँ। यह परम उत्तम तथा सब कुछ प्रदान करने वाला है। ‘शिवसंकल्प’ इसका हृदय, ‘पुरुष सूक्त‘ शीर्ष, ‘अद्भ्यः सम्भूतः० (यजु० ३१ । १७) आदि सूक्त शिखा और ‘आशुः शिशानः’ आदि अध्याय इसका कवच है। शतरुद्रिय-संज्ञक रुद्र के ये पाँच अङ्ग हैं। रुद्रदेव का ध्यान करके इसके पञ्चाङ्गभूत रुद्रों का क्रमशः जप करे। ‘यज्ञ्जाग्रतो०’ आदि छः ऋचाओं का शिवसंकल्प-सूक्त (यजु० ३४ । १- ६) इसका हृदय है। इसके शिवसंकल्प ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द कहे गये हैं। ‘सहस्रशीर्षां०’ (यजु० ३१) से प्रारम्भ होने वाला पुरुषसूक्त इसका शीर्षस्थानीय है। इसके नारायण ऋषि, पुरुष देवता और अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द जानने चाहिये। ‘अद्भ्यः सम्भूतः०’ आदि सूक्त के उत्तरगामी नर ऋषि हैं। इनमें क्रमशः पहले तीन मन्त्रों का त्रिष्टुप् छन्द, फिर दो मन्त्रों का अनुष्टुप् छन्द और अन्तिम मन्त्र का त्रिष्टुप् छन्द है तथा पुरुष इसके देवता हैं। ‘आशुः शिशानः०’ (यजु० १७ । ३३) आदि सूक्त में बारह मन्त्रों के इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द हैं। इन सत्रह ऋचाओं के सूक्त के ऋषि ‘प्रतिरथ’ कहे गये हैं, किंतु देवता भिन्न-भिन्न माने गये हैं।’ कुछ मन्त्रों के पुरुवित् देवता हैं। अवशिष्ट देवतासम्बन्धी मन्त्रों का छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। ‘असौ यस्ताम्रो०’ (यजु० १६ । ६) मन्त्र के पुरुलिङ्गोक्त देवता और पंक्ति छन्द हैं। ‘मर्माणि ते०’ (यजु० १७ । ४९) मन्त्र का त्रिष्टुप् छन्द और लिङ्गोक्त देवता हैं। सम्पूर्ण रुद्राध्याय के परमेष्ठी ऋषि, ‘देवानाम्’ इत्यादि मन्त्रों के प्रजापति ऋषि और तीनों ऋचाओं के कुत्स ऋषि हैं। ‘मा नो महान्तमुत मा नो०’ (यजुर्वेद १६ । १५) और ‘मा नस्तोके०’ (यजु० १६ । १६) आदि दो मन्त्रों के एकमात्र उमा तथा अन्य मन्त्रों के रुद्र और रुद्रगण देवता हैं। सोलह ऋचाओं वाले आद्य अनुवाक के रुद्र देवता हैं। प्रथम मन्त्र का छन्द गायत्री, तीन ऋचाओं का अनुष्टुप्, तीन ऋचाओं का पंक्ति, सात ऋचाओं का अनुष्टुप् और दो मन्त्रों का जगती छन्द है। ‘नमो हिरण्यबाहवे०’ (यजु० १६ । १७) मन्त्र से लेकर ‘नमो वः किरिकेभ्यः०’ (यजु० १६ । ४६) तक रुद्रगण की तीन अशीतियाँ हैं। रुद्रानुवाक के पाँच ऋचाओं के रुद्र देवता हैं। बीसवीं ऋचा भी रुद्रदेवता-सम्बन्धिनी है। पहली ऋचा का छन्द बृहती, दूसरी का त्रिजगती, तीसरी का त्रिष्टुप् और शेष तीन का अनुष्टुप् छन्द है। श्रेष्ठ आचरण से युक्त पुरुष इसका ज्ञान पाकर उत्तम सिद्धि का लाभ करता है। ‘ त्रैलोक्य-मोहन’ मन्त्र से भी विष-व्याधि आदि का विनाश होता है। वह मन्त्र इस प्रकार ‘इं श्रीं ह्रीं ह्रूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।’ (त्रैलोक्य मोहन विष्णु को नमस्कार है) निम्नाङ्कित आनुष्टुभ नृसिंह-मन्त्र से भी विष- व्याधि का विनाश होता है ॥ १-१६ ॥ (आनुष्टुभ नृसिंह-मन्त्र) ॐ हूं इं उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ ‘जो उग्र, वीर, सर्वतोमुखी तेज से प्रज्वलित, भयंकर तथा मृत्यु की भी मृत्यु होते हुए भी भक्तजनों के लिये कल्याण स्वरूप हैं, उन महाविष्णु नृसिंह का मैं भजन करता हूँ।’ हृदयादि पाँच अङ्गों के न्यास से युक्त यही मन्त्र समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाला है। श्रीविष्णु के द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्र भी विष-व्याधि का नाश करने वाले हैं। ‘कुब्जिका त्रिपुरा गौरी चन्द्रिका विषहारिणी।’– यह प्रसादमन्त्र विषहारक तथा आयु और आरोग्य का वर्धक है। सूर्य और विनायक के मन्त्र भी विषहारी कहे गये हैं। इसी तरह समस्त रुद्रमन्त्र भी विष का नाश करनेवाले हैं ॥ १७-२१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पञ्चाङ्ग रुद्रविधान’ नामक दो सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९६ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe