July 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 297 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय विषहारी मन्त्र तथा औषध विषहृन्मन्त्रौषधम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ॐ नमो भगवते रुद्राय च्छिन्द-च्छिन्द विषं ज्वलितपरशुपाणये स्वाहा।’ इस मन्त्र से और ‘ॐ नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकमुत्थापयोत्थापय, दष्टकं कम्पय कम्पय जल्पय जल्पय सर्पदष्टमुत्थापयोत्थापय लल लल बन्ध बन्ध मोचय मोचय वररुद्र गच्छ गच्छ वध वध त्रुट त्रुट बुक वुक भीषय भीषय मुष्टिना विषं संहर संहर ठ ठ।’ इस ‘पक्षिरुद्र मन्त्र ‘ से सर्पदष्ट मनुष्य को अभिमन्त्रित करने पर उसके विष का नाश हो जाता है। ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय विषं स्थावरजङ्गमं कृत्रिमाकृत्रिमं विषमुपविषं नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम धम दम दम वम वम मेघान्धकारधारावर्षकर्ष निर्विषीभव संहर संहर गच्छ गच्छ आवेशय आवेशय विषोत्थापनरूपं मन्त्राद् विषधारणम्’ ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा ॐ ह्रां ह्रीं खीं सः ठं द्रौं ह्रीं ठः।’ यह मन्त्र जप आदि के द्वारा सिद्ध होने पर सदैव सर्पों को बाँध लेता है। ‘गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’ यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थों को सिद्ध करने वाला है। इसमें आदि के एक, दो, तीन और चौथा अक्षर बीज के रूप में होगा। इससे हृदय, सिर, शिखा और कवच का न्यास होगा। फिर ‘कृष्णचक्राय अस्वाय फट्’ बोलने से पञ्चाङ्गन्यास की क्रिया पूरी होगी। ‘ॐ नमो भगवते रुद्राय प्रेताधिपतये हुलु हुलु गर्ज गर्ज नागान् भ्रामय भ्रामय मुञ्च मुञ्च मोहय मोहय कट्ट कट्ट आविश आविश सुवर्णपतङ्ग रुद्रो ज्ञापयति स्वाहा ॥ १-५ ॥’ यह ‘पातालक्षोभ मन्त्र’ है। इस के द्वारा रोगी को अभिमन्त्रित करने से यह उसके लिये विषनाशक होता है। दंशक सर्प के डँस लेने पर जलते काष्ठ, तप्त शिला, आग की ज्वाला अथवा गरम कोकनद (कमल) आदि के द्वारा दंश- स्थान को जला दे-सेंक देः इससे विष का उपशमन होता है। शिरीषवृक्ष के बीज और पुष्प, आक के दूध और बीज एवं सोंठ, मिर्च तथा पीपल — ये पान, लेपन और अञ्जन आदि के द्वारा विष का नाश करते हैं। शिरीष पुष्प के रस से भावित सफेद मिर्च पान, नस्य और अञ्जन आदि के द्वारा विष का उपसंहार करती है, इसमें संशय नहीं है। कड़वी तोरई, वच, हींग तथा शिरीष और आक का दूध, त्रिकटु और मेषाम्भ — इनका नस्य आदि के रूप में प्रयोग होने पर ये विष का हरण करते हैं। अङ्कोल और कड़वी तुम्बी के सर्वाङ्ग के चूर्ण से नस्य लेने से विष का अपहरण होता है। इन्द्रायण, चितंक, द्रोण (गूमा), तुलसी, धतूरा और सहा — इनके रस में त्रिकटु के चूर्ण को भिगोकर खाने से विष का नाश होता है। कृष्णपक्ष की पञ्चमी को लाया हुआ शिरीष का पञ्चाङ्ग विषहारी है ॥ ६-१२ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘विषहारी मन्त्रौषध का कथन’ नामक दो सौ सत्तानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe