अग्निपुराण – अध्याय 298
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय
गोनसादि-चिकित्सा
गोनसादि चिकित्सा

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जाति के सर्पों के विष की चिकित्सा का वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’ — इस मन्त्र से अभिमन्त्रित ताम्बूल के प्रयोग से मन्त्रवेत्ता मण्डली (गोनस) सर्प के विष का हरण करता है। लहसुन अङ्कोल, त्रिफला, कूट, वच और त्रिकटु — इनका सर्पविष में पान करे। सर्पविष में स्नुहीदुग्ध, गोदुग्ध, गोदधि और गोमूत्र में पकाया हुआ गोघृत पान करना चाहिये। राजिलजातीय सर्प के डँस लेने पर सैन्धवलवण, पीपल, घृत, मधु, गोमयरस और साही की आँत का भक्षण करना चाहिये। सर्पदष्ट मनुष्य को पीपल, शर्करा, दुग्ध, घृत और मधु का पान करना चाहिये। त्रिकटु, मयूरपिच्छ, विडाल की अस्थि और नेवले का रोम — इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण बना ले। फिर भेड़ के दूध में भिगोकर उसकी धूप देने से सभी प्रकार के विषों का विनाश होता है। पाठा, निर्गुण्डी और अङ्कोल के पत्र को समान भाग में लेकर तथा सबके समान लहसुन लेकर बनाया हुआ धूप भी विषनाशक है। अगस्त्य के पत्तों को काँजी में पकाकर उसकी भाप से डँसे हुए स्थान को सेंका जाय, इससे विष उतर जाता है ॥ १-७ ॥’

मूषक सोलह प्रकार के कहे गये हैं। कपास का रस तेल के साथ पान करने से ‘मूषक-विष’ का नाश होता है। फलिनी (फलिहारी) के फूलों का सौंठ और गुड़ के साथ भक्षण करना चाहिये। यह विषरोगनाशक है। लूताएँ (मकड़ी) बीस प्रकार की कही गयी हैं। इनके विष की सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये। पद्म, पद्माक, काष्ठ, पाटला, कूट, तगर, नेत्रबाला, खस, चन्दन, निर्गुण्डी, सारिवा और शेलु (लिसोडा) — ये लूता-विषहारीगण हैं। गुञ्ज, निर्गुण्डी और अङ्कोल के पत्र, सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी, करञ्ज की छाल — इनको पकाकर ‘लुताविष ‘ से पीड़ित मनुष्य का पूर्वोक्त ओषधियों से युक्त जल के द्वारा सेचन करे ॥ ८-१३ ॥

अब ‘वृश्चिक विष’ का अपहरण करने वाली ओषधियों को सुनो। मञ्जिष्ठा, चन्दन, त्रिकटु तथा शिरीष, कुमुद के पुष्प — इन चारों योगों को एकत्रित करना चाहिये। ये योग लेप आदि करने पर वृश्चिक-विष का विनाश करते हैं। ‘ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि विवि च्छिन्द च्छिन्द किरि किरि भिन्द भिन्द खड्गेन च्छेदय च्छेदय शूलेन भेदय भेदय चक्रेण दारय दारय ॐ ह्रूं फट् ।’ इस मन्त्र से अभिमन्त्रित अगद (औषध) विषार्त मनुष्य को दे। यह गर्दभ आदि के विष का विनाश करता है। त्रिफला, खस, नागरमोथा, नेत्रबाला, जटामांसी, पद्मक और चन्दन — इनको बकरी के दूध के साथ पिलाने पर गर्दभ आदि के विषों का नाश होता है। शिरीष का पञ्चाङ्ग और त्रिकटु गोजर के विष का हरण करता है। स्नुहीदुग्ध के साथ सिरस की छाल ‘उन्दूरज दर्दुर’ (मेढक) के विष का शमन करती है। त्रिकटु और तगरमूल घृत के साथ प्रयुक्त होने पर ‘मत्स्यविष’ का नाश करते हैं। यवक्षार, त्रिकटु, वच, हींग, बायबिडंग, सैन्धवलवण, तगर, पाठा, अतिबला और कूट — ये सभी प्रकार के ‘कीट-विषों’ का विनाश करते हैं। मुलहठी, त्रिकटु, गुड़ और दुग्धका — इनका योग ‘पागल कुत्ते के विष का हरण करता है ॥ १४-१७ ॥

‘ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ सुप्रभायै नमः’ — यह ओषधि उखाड़ने का मन्त्र है। भगवान् ब्रह्मा ने सुप्रभादेवी को आदेश दे रखा है कि मानवगण जो ओषधियाँ बिना विधि-विधान के ग्रहण करते हैं, तुम उन ओषधियों का प्रभाव ग्रहण करो। इसलिये पहले सुप्रभादेवी को नमस्कार करके ओषधि के चारों ओर मुट्ठी से जौ बिखेर कर पूर्वोक्त मन्त्र का दस बार जप करके ओषधि को नमस्कार करे और कहे — ‘तुम ऊर्ध्वनेत्रा हो; मैं तुम्हें उखाड़ता हूँ।’ इस विधि से ओषधि को उखाड़े और निम्नाङ्कित मन्त्र से उस का भक्षण करे —

नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च।
आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्णः पराजयम् ।
अनेन सत्यवाक्येन अगदो मेऽस्तु सिद्ध्यतु ॥

‘पुरुषसिंह भगवान् गोपाल को बारंबार नमस्कार है। युद्ध में अपनी पराजय की बात श्रीकृष्ण ही जानते हैं — इस सत्य वाक्य के प्रभाव से यह अगद मुझे सिद्धिप्रद हो।’ स्थावर विष की ओषधि आदि में निम्नलिखित मन्त्र का प्रयोग करना चाहिये —

‘ॐ नमो वैदूर्यमात्रे तत्र रक्ष रक्ष मां सर्वविषेभ्यो गौरि गान्धारि चाण्डालि मातङ्गिनि स्वाहा हरिमाये।’

विष का भक्षण कर लेने पर पहले वमन कराके विषयुक्त मनुष्य का शीतल जल से सेचन करे। तदनन्तर उसको मधु और घृत पिलाये और उसके बाद विरेचन कराये ॥ १८-२४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गोनसादि-चिकित्सा-कथन’ नामक दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९८ ॥

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