July 15, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 299 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय बालादिग्रहहर बालतन्त्र बालग्रहहरबालतन्त्रम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं बालादि ग्रहों को शान्त करने वाले ‘बालतन्त्र’ को कहता हूँ । शिशु को जन्म के दिन ‘पापिनी’ नाम वाली ग्रही ग्रहण कर लेती है । उससे आक्रान्त बालक के शरीर में उद्वेग बना रहता है । वह माँ का दूध पीना छोड़ देता है, लार टपकाता है और बारंबार ग्रीवा को घुमाता है। यह सारी चेष्टा पापिनी ग्रही के कारण से ही होती है। इसके निवारण के लिये पापिनी ग्रही और मातृकाओं के उद्देश्य से उनके योग्य विविध भक्ष्य पदार्थ, गन्ध, माल्य, धूप एवं दीप की बलि प्रदान करे । पापिनी द्वारा गृहीत शिशु के शरीर में धातकी, लोध, मजीठ, तालीसपत्र और चन्दन से लेप करे और गुग्गुल से धूप दे । जन्म के दूसरे दिन ‘भीषणी’ ग्रही शिशु को आक्रान्त करती है। उससे आक्रान्त शिशु की ये चेष्टाएँ होती हैं — वह खाँसी और श्वास से पीड़ित रहता है तथा अङ्गों को बारंबार सिकोड़ता है। ऐसे बालक को बकरी के मूत्र, अपामार्ग और चन्दन के साथ घिसी हुई पिप्पली का सेवन कराना — अनुलेप लगाना चाहिये । ‘गोशृंग, गोदन्त तथा केशों की धूप दे एवं पूर्ववत् बलि प्रदान करे। तीसरे दिन ‘घण्टाली’ नाम की ग्रही बच्चे को ग्रहण करती है। उसके द्वारा गृहीत शिशु की निम्नलिखित चेष्टाएँ होती हैं। वह बारंबार रुदन करता है, जँभाइयाँ लेता है, कोलाहल करता है एवं त्रास, गात्रोद्वेग और अरुचि से युक्त होता है — ऐसे शिशु को केसर, रसाञ्जन, गोदन्त और हस्तिदन्त को बकरी के दूध में पीसकर लेप लगाये । नख, राई और बिल्वपत्र से धूप दे तथा पूर्वोक्त बलि अर्पित करे । चौथी ग्रही ‘ काकोली’ कही गयी है। इससे गृहीत बालक के शरीर में उद्वेग होता है। वह जोर-जोर से रोता है । मुँह से गाज निकालता और चारों दिशाओं में बारंबार देखता है। इसकी शान्ति के लिये मदिरा और कुल्माष ( चना या उड़द) – की बलि दे तथा बालक के गजदन्त, साँप की केंचुल और अश्वमूत्र का प्रलेप करे । तदनन्तर राई, नीम की पत्ती और भेड़िये के केश से धूप दे। ‘हंसाधिका’ पाँचवीं ग्रही है। इससे गृहीत शिशु जँभाई लेता, ऊपर की ओर जोर से साँस खींचता और मुट्ठी बाँधता है। ऐसी ही अन्य चेष्टाएँ भी करता है। ‘हंसाधिका’ को पूर्वोक्त बलि दे । इससे गृहीत शिशु के शरीर में काकड़ासिंगी, बला, लोध, मैनसिल और तालीसपत्र का अनुलेपन करे । ‘ फट्कारी’ छठी ग्रही मानी गयी है । इससे आक्रान्त बालक भय से चिहुँकता, मोह से अचेत होता और बहुत रोता है, आहार का त्याग कर देता है और अपने अङ्गों को बहुत हिलाता- डुलाता है। ‘फट्कारी’ के उद्देश्य से भी पूर्वोक्त बलि प्रदान करे । इससे गृहीत शिशु का राई, गुग्गुल, कूट, गजदन्त और घृत से धूपन और अनुलेपन करे । ‘मुक्तकेशी’ नाम की ग्रही जन्म के सातवें दिन बालक पर आक्रमण करती है । इससे आक्रान्त बालक दुःखातुर रहता है । उसके शरीर से सड़ने की-सी गन्ध आती है । वह जृम्भा, कोलाहल, अत्यधिक रुदन और कास से पीड़ित रहता है । ऐसे बालक को व्याघ्र के नखों की धूप देकर बच, गोमय और गोमूत्र से अनुलिप्त करे । ‘ श्रीदण्डी नाम वाली ग्रही शिशु को आठवें दिन पकड़ती है । इससे ग्रस्त बालक दिशाओं को देखता, जीभ को हिलाता, खाँसता और रोता है । ‘ श्रीदण्डी ‘ के उद्देश्य से पूर्वोक्त पदार्थों की विविध बलि दे । इससे पीड़ित शिशु को हींग, बच, सफेद सर्षप और लहसुन से धूपित तथा अनुलिप्त करे । ‘ऊर्ध्वग्रही’ नवीं महाग्रही है। इससे ग्रस्त बालक उद्वेग और दीर्घ उच्छ्वास से युक्त होता है । वह अपनी दोनों मुट्ठियों को चबाता है । ऐसे शिशु को लाल चन्दन, कूट, बच और सरसों से लेप और वानर के नख एवं रोम से धूपन करे । दसवीं ‘रोदनी’ नाम की ग्रही है। इससे गृहीत शिशु की निम्नलिखित चेष्टाएँ होती हैं । वह सदा रोता है, उसका शरीर नील वर्ण और सुगन्ध से युक्त हो जाता है। ऐसे शिशु को निम्ब का धूप और कूट, बच, राई तथा राल का लेपन करे । ‘रोदनी’ ग्रही के उद्देश्य से लाजा, कुल्माष, वनमूँग और भात की बलि दे। इस प्रकार ये धूपदान आदि की क्रियाएँ शिशु के जन्म के तेरहवें दिन तक की जाती हैं । ( शेष तीन दिनों की सारी क्रियाएँ दसवें दिन के समान समझनी चाहिये । ) ॥ १-१८१/२ ॥ एक मास के शिशु को ‘पूतना’ नाम की ग्रही ग्रहण करती है। उसका स्वरूप शकुनि (पक्षिणी- बकी) – का है। इससे पीड़ित बालक कौए के समान काँव-काँव करता, रोता, लंबी साँसें लेता, आँखों को बारंबार मींचता और मूत्र के समान गन्ध से युक्त होता है। ऐसे बालक को गोमूत्र से स्नान कराना और गोदन्त से धूपित करना चाहिये । ‘पूतना’ के उद्देश्य से ग्राम की दक्षिणदिशा में करञ्जवृक्ष के नीचे एक सप्ताह तक प्रतिदिन पीतवस्त्र, रक्तमाल्य, गन्ध, तैल, दीप, त्रिविध पायसान्न, तिल और पूर्वोक्त पदार्थों की बलि दे । दो मास के शिशु को ‘मुकुटा’ नाम की ग्रही ग्रहण करती है। इससे आक्रान्त शिशु का शरीर पीला और ठण्ढा पड़ जाता है । उसको सर्दी होती है, नाक से पानी गिरता है और मुख सूख जाता है। इस ग्रही के निमित्त पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मालपूए, भात और दीपक की बलि प्रदान करे । इससे ग्रस्त बालक को कृष्णागुरु और सुगन्धबाला आदि से धूपित करे । बालक को तृतीय मास में ‘गोमुखी’ ग्रहण करती है । इससे आक्रान्त शिशु बहुत नींद लेता है, बारंबार मलमूत्र करता है और जोर-जोर से रोता है । ‘गोमुखी’ को पहले यव, प्रियङ्गु, कुल्माष, शाक, भात और दूध की पूर्व दिशा में बलि देनी चाहिये । तदनन्तर मध्याह्नकाल में शिशु को पञ्चभङ्ग 1 या पञ्चपत्र से स्नान कराकर घी से धूपित करे । चतुर्थ मास में ‘पिङ्गला’ नाम की ग्रही बालक को पीड़ित करती है। इससे गृहीत बालक का शरीर सफेद और दुर्गन्धयुक्त होकर सूखने लगता है। ऐसे शिशु की मृत्यु अवश्य हो जाती है । पाँचवीं ‘ललना’ नाम की ग्रही होती है। इससे पीड़ित शिशु का शरीर शिथिल होता है और मुख सूखने लगता है । उसकी देह पीली पड़ जाती है और अपानवायु निकलती है । ‘ललना’ की शान्ति के लिये दक्षिणदिशा में पूर्वोक्त पदार्थों की बलि दे । छठे मास में ‘पङ्कजा’ नाम की ग्रही शिशु को पीड़ित करती है। इससे गृहीत शिशु की चेष्टाएँ रुदन और विकृत स्वर आदि हैं । ‘पङ्कजा’ को भी पूर्वोक्त पदार्थ, भात, पुष्प, गन्ध आदि की बलि प्रदान करे। सातवें महीने में ‘निराहारा’ नाम की ग्रही शिशु को ग्रहण करती है। इससे पीड़ित शिशु दुर्गन्ध और दन्तरोग से युक्त होता है । ‘निराहारा ‘ के निमित्त मिष्टान्न और पूर्वोक्त पदार्थों की बलि दे । आठवें मास में ‘यमुना’ नाम वाली ग्रही शिशु पर आक्रमण करती है। इससे पीड़ित शिशु के शरीर में दाने ( फोड़े-फुन्सियाँ) उभर आते हैं और शरीर सूख जाता है। इसकी चिकित्सा नहीं करानी चाहिये। नवम मास में ‘कुम्भकर्णी’ नाम वाली ग्रही से पीड़ित हुआ बालक ज्वर और सर्दी से कष्ट पाता है तथा बहुत रोता है । ‘कुम्भकर्णी ‘ के शान्त्यर्थ पूर्वोक्त पदार्थ, कुल्माष ( उड़द या चना) आदि पदार्थों की ईशानकोण में बलि दे । दशम मास में ‘तापसी’ ग्रही बालक पर आक्रमण करती है । इससे ग्रस्त बालक आहार का परित्याग कर देता है और आँखें मूँदे रहता है । ‘तापसी ‘ के उद्देश्य से घण्टा, पताका, पिष्टान्न आदि पदार्थों की बलि प्रदान करे । ग्यारहवीं ‘राक्षसी’ नाम की ग्रही है । इससे गृहीत बालक नेत्ररोग से पीड़ित होता है । उसकी चिकित्सा व्यर्थ होती है । बारहवें महीने में चञ्चला ‘ ग्रही शिशु को ग्रहण करती है । इसके द्वारा आक्रान्त बालक दीर्घ निःश्वास और भय आदि चेष्टाओं से युक्त होता है। इस ग्रही के शान्त्यर्थ मध्याह्न के समय पूर्वदिशा में कुल्माष और तिल आदि की बलि दे ॥ १९-३२१/२ ॥ द्वितीय वर्ष में ‘यातना’ नाम की ग्रही शिशु को ग्रहण करती है । इससे शिशु को ‘यातना’ सहनी पड़ती है और उसमें रोदन आदि दोष प्रकट होते हैं । ‘यातना’ ग्रही को तिल के गूदे और पूर्वोक्त पदार्थों की बलि दे । स्नान आदि कर्म पूर्ववत् विधि से करना चाहिये । तृतीय वर्ष में बालक पर ‘रोदिनी’ अधिकार करती है। इससे ग्रस्त बालक काँपता और रोता है तथा उसके पेशाब में रक्त आता है। इसके उद्देश्य से गुड़, भात, तिल का पूआ और पीसे हुए तिल की बनी प्रतिमा दे | बालक को तिलमिश्रित जल से स्नान कराकर पञ्चपत्र और राजफल के छिलके से धूप दे ॥ ३३-३५ ॥ चतुर्थ वर्ष में ‘चटका’ नाम की राक्षसी शिशु को ग्रहण करती है। उससे ग्रस्त हुए बालक को ज्वर आता है और सारे अङ्गों में व्यथा होती है । चटका को पूर्वोक्त पदार्थ एवं तिल आदि की बलि दे और बालक को स्नान कराकर उसके लिये धूपन करे । पञ्चम वर्ष में ‘चञ्चला ‘ शिशु पर अधिकार कर लेती है। इससे पीड़ित बालक ज्वर, भय और अङ्ग – शैथिल्य से युक्त होता है । चञ्चला को भात आदि पदार्थों की बलि दे और बालक को काकड़ासिंगी से धूपित करे। साथ ही पलाश, गूलर, पीपल, बड़ और बिल्वपत्र के जल से उसका अभिषेक किया जाय। छठे वर्ष में ‘ धावनी’ नाम की ग्रही बालक पर आक्रमण करती है। उससे गृहीत बालक का शरीर नीरस होकर सूखने लगता है । उसके अङ्ग अङ्ग में पीड़ा होती है । इसके उद्देश्य से सात दिन तक पूर्वोक्त पदार्थों की बलि और बालक का भृङ्गराज से स्नापन और धूपन करे ॥ ३६-३८१/२ ॥ सप्तम वर्षमें ‘यमुना’ ग्रही से पीड़ित बालक सर्दी, मुक्ता तथा अत्यन्त हास एवं रोदन से युक्त होता है । इस ग्रही के निमित्त पायस और पूर्वोक्त पदार्थ आदि की बलि दे एवं बालक का पूर्ववत् विधि से स्नापन और धूपन करे । अष्टम वर्ष में ‘जातवेदा’ नाम की ग्रही बालक पर अधिकार करती है। इससे पीड़ित बालक भोजन छोड़ देता है और बहुत रोता है । जातवेदा के निमित्त कृसर ( खिचड़ी), मालपूए और दही आदि की बलि प्रदान करे । बालक को स्नान कराके धूपित भी करे । नवम वर्ष में ‘काला’ नाम की ग्रही बालक को पकड़ती है। इससे ग्रस्त बालक अपनी भुजाओं को कँपाता है, गर्जना करता है और भयभीत रहता है । काला के शान्त्यर्थ कृसर, मालपूए, सत्तू, कुल्माष और पायस (खीर) – की बलि दे । दसवें वर्ष में ‘कलहंसी’ बालक को ग्रहण करती है। इससे उसके शरीर में जलन होती है, अङ्ग दुर्बल हो जाते हैं और वह ज्वरग्रस्त रहता है । इसके निमित्त पाँच दिन तक पूरी, मालपूए, दधि और अन्न की बलि देनी चाहिये। बालक का निम्बपत्रों से धूपन और कूट का अनुलेपन करे । ग्यारहवें वर्ष में कुमार को ‘देवदूती’ नाम की ग्रही ग्रहण करती है । इससे वह कठोर वचन बोलता है । ‘देवदूती ‘ के उद्देश्य से पूर्ववत् बलिदान और लेपादिक करे । बारहवें वर्ष में ‘बलिका से आक्रान्त बालक श्वास- रोग से युक्त होता है। इसके निमित्त भी पूर्वोक्त विधि से बलि एवं लेपादि करे। तेरहवें वर्ष में ‘वायवी’ ग्रही का आक्रमण होता है। इससे पीड़ित कुमार मुखरोग तथा अङ्गशैथिल्य से युक्त होता है । वायवी को अन्न, गन्ध, माल्य आदि की बलि दे और बालक को पञ्चपत्र से स्नान करावे । राई और निम्बपत्रों से धूपित करे । चौदहवें वर्ष में ‘ यक्षिणी’ बालक पर अधिकार करती है । इससे वह शूल, ज्वर, दाह आदि से पीड़ित होता है । यक्षिणी के उद्देश्य से पूर्वोक्त विविध भक्ष्य पदार्थों की बलि विहित है । इसकी शान्ति के लिये पूर्ववत् स्नान आदि भी करने चाहिये। पंद्रहवें वर्ष में बालक को ‘मुण्डिका’ ग्रही से कष्ट प्राप्त होता है। उससे पीड़ित बालक के सदा रक्तपात होता रहता है। इसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये ॥ ३९-४७ ॥ सोलहवीं ‘वानरी’ नाम की ग्रही है। इससे पीड़ित नवयुवक भूमि पर गिरता है और सदा निद्रा तथा ज्वर से पीड़ित रहता है । वानरी को तीन दिन तक पायस आदि की बलि दे एवं बालक को पूर्ववत् स्नान आदि कर्म कराये । सत्रहवें वर्ष में ‘गन्धवती’ नाम की ग्रही आक्रमण करती है। इससे ग्रस्त बालक के शरीर में उद्वेग बना रहता है और वह जोर-जोर से रोता है । इस ग्रही को कुल्माष आदि की बलि दे और पूर्ववत् स्नान, धूपन तथा लेपन आदि कर्म करे । दिन की स्वामिनी ग्रही ‘पूतना’ कही जाती है और वर्ष-स्वामिनी ‘सुकुमारी ‘ ॥ ४८-५० ॥ ॐ नमः सर्वमातृभ्यो बालपीडासंयोगं भुञ्ज भुञ्ज चुट चुट स्फोटय स्फोटय स्फुर स्फुर गृह्ण गृह्णाक्रन्दयाऽऽक्रन्दय एवं सिद्धरूपो ज्ञापयति । हर हर निर्दोषं कुरु कुरु बालिकां बालं स्त्रियं पुरुषं वा सर्वग्रहाणामुपक्रमात् । चामुण्डे नमो देव्यै ह्रूं ह्रूं ह्रीं अपसर अपसर दुष्टग्रहान् हूं तद्यथा गच्छन्तु गृह्यकाः, अन्यत्र पन्थानं रुद्रो ज्ञापयति ॥ ५१-५२ ॥ — इस सर्वकामप्रद मन्त्र का बालग्रहों के शान्त्यर्थ प्रयोग करे ॥ ५३ ॥ ॐ नमो भगवति चामुण्डे मुञ्च मुञ्च बालं बालिकां वा बलिं गृह्ण गृह्ण जय जय वस वस ॥ ५४ ॥ — इस रक्षाकारी मन्त्र का सर्वत्र बलिदानकर्म में पाठ किया जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय, पार्वती, लक्ष्मी एवं मातृकागण ज्वर तथा दाह से पीड़ित इस कुमार को छोड़ दें और इसकी भी रक्षा करें। ( इस मन्त्र से भी बालग्रहजनित पीड़ा का निवारण होता है । ) ॥ ५५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘बालादिग्रहहर बालतन्त्र – कथन’ नामक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९९ ॥ 1. पलाश, गूलर, पीपल, वट और बेलके पत्ते ‘पञ्चपत्र’ या ‘पञ्चभङ्ग कहलाते हैं । ‘ Content is available only for registered users. 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