July 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 303 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीनवाँ अध्याय अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि अङ्गाक्षरार्च्चनम् अग्निदेव कहते हैं — जब चन्द्रमा जन्म-नक्षत्र पर हों और सूर्य सातवीं राशि पर हो तो उसे ‘पूषा का काल’ (पौष्णः कालः) समझना चाहिये। उस समय श्वास की परीक्षा करे। जिसके कण्ठ और ओष्ठ अपने स्थान से चलित हो रहे हों, जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी और जीभ काली पड़ गयी हो, उसका जीवन अधिक से अधिक सात दिन और रह सकता है ॥ १-२ ॥ तार (ॐ), मेष (न), विष (म), दन्ती (ओ), दीर्घस्वरयुक्त ‘न’ तथा ‘र’ (ना रा), ‘य णा’, रस (य) — यह भगवान् विष्णु का अष्टाक्षर- मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) है। 1 इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है— “क्रुद्धोल्काय स्वाहा हृदयाय नमः। महोल्काय स्वाहा शिरसे स्वाहा। वीरोल्काय स्वाहा शिखायै वषट्। द्युल्काय स्वाहा कवचाय हुम्। सहस्रोल्काय स्वाहा अस्त्राय फट्।” 2 इन मन्त्रों को क्रमशः पढ़ते हुए हृदय, सिर, शिखा, दोनों भुजा तथा सम्पूर्ण दिग्भाग में न्यास करे ॥ ३१/२ ॥’ कनिष्ठा से लेकर कनिष्ठा तक आठ अँगुलियों के तीनों पर्वों में अष्टाक्षर मन्त्र के पृथक् पृथक् आठ अक्षरों को ‘प्रणव’ तथा ‘नमः’ से सम्पुटित करके बोलते हुए अङ्गुष्ठ के अग्रभाग से उनका क्रमशः न्यास करे। 3 तर्जनी में, मध्यमा से युक्त अङ्गुष्ठ में, करतल में तथा पुनः अङ्गुष्ठ में प्रणव का न्यास ‘उत्तार’ कहलाता है। अतः पूर्वोक्त न्यास के पश्चात् ‘बीजोत्तारन्यास’ करे। अष्टाक्षर मन्त्र के वर्णों का रंग यों समझे — आदि के पाँच अक्षर क्रमशः रक्त, गौर, धूम्र, हरित और सुवर्णमय कान्तिवाले हैं तथा अन्तिम तीन वर्ण श्वेत हैं। इस रूप में इन वर्णों की भावना करके इनका क्रमशः न्यास करना चाहिये। न्यास के स्थान हैं — हृदय, मुख, नेत्र, मूर्धा, चरण, तालु, गुह्य तथा हस्त आदि ॥ ४-७ ॥ हाथों में और अङ्गों में बीजन्यास करके फिर अङ्गन्यास करे। 4 जैसे अपने शरीर में न्यास किया जाता है, उसी तरह देवविग्रह में भी करना चाहिये। किंतु देवशरीर में करन्यास नहीं किया जाता है। देवविग्रह के हृदयादि अगों में विन्यस्त वर्णों का गन्ध-पुष्पों द्वारा पूजन करे। देवपीठ पर धर्म आदि, अग्नि आदि तथा अधर्म आदि का भी यथास्थान न्यास करे। फिर उसपर कमल का भी न्यास करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ पीठ पर ही कमल के दल, केसर, किञ्जल्क का व्यापक सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल तथा अग्निमण्डल — इन तीन मण्डलों का पृथक् पृथक् क्रमशः न्यास करे। वहाँ सत्त्व आदि तीन गुणों का तथा केसरों में स्थित विमला आदि शक्तियों का भी चिन्तन करे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं — विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या तथा ईशाना। ये आठ शक्तियाँ आठ दिशाओं में स्थित हैं और नवीं अनुग्रहा शक्ति मध्य में विराजमान है। योगपीठ की अर्चना करके उसपर श्रीहरि का आवाहन और पूजन करे ॥ १०-१२ ॥ पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पीताम्बर तथा आभूषण — ये पाँच उपचार हैं। इन सबका मूल (अष्टाक्षर) मन्त्र से समर्पण किया जाता है। पीठ के पूर्व आदि चार दिशाओं में वासुदेव आदि चार मूर्तियों का तथा अग्नि आदि कोणों में क्रमशः श्री, सरस्वती, रति और शान्ति का पूजन करे ॥ १३-१४ ॥ इसी प्रकार दिशाओं में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म का तथा विदिशाओं (कोणों) – में मुसल,खड्ग, शार्ङ्गधनुष तथा वनमाला की क्रमशः अर्चना करे ॥ १५ ॥ मण्डल के बाहर गरुड की पूजा करके भगवान् नारायण देव के सम्मुख विराजमान विष्वक्सेन तथा सोमेश का मध्यभाग में और आवरण से बाहर इन्द्र आदि परिचारकवर्ग के साथ भगवान् का सम्यक् पूजन करने से साधक को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है ॥ १६-१७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अष्टाक्षर पूजा विधि वर्णन’ नामक तीन सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०३ ॥ 1. ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र ‘ के अनुसार इस मन्त्र का विनियोग-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये — ॐ अस्य श्रीअष्टाक्षरमहामन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। (द्रष्टव्यः सप्तविंश श्वास, श्लोक १३-१४) 2. इन मन्त्रों के अन्त में ‘स्वाहा’ पद जोड़ने के विषय में ‘त्रैलोक्यमोहन-तन्त्र’ का निम्नाङ्कित वचन प्रमाण है — ‘क्रुद्धोल्कादिपदैर्वह्निजायान्तैर्जातिसंयुतैः ।’ ‘तन्त्रप्रकाश’ में भी ऐसा ही कहा गया है — ‘एषां विभक्तियुक्तानां भवेदन्तेऽग्निवल्लभा ।’ 3. ‘नारायणीयतन्त्र’ में भी ऐसा ही कहा है — कनिष्ठादितदन्तानामङ्गुलीनां त्रिपर्वसु । ज्येष्ठाग्रेण नमस्ताररुद्धानष्टाक्षरान् न्यसेत् ॥ इति ॥ 4. ‘शारदातिलक’ पञ्चदश पटल के श्लोक पाँच की व्याख्या के अनुसार हाथों में सृष्टि, स्थिति एवं संहार के क्रम से न्यास करना चाहिये। दाहिनी तर्जनी से लेकर वाम तर्जनी तक मन्त्र के आठ अक्षरों का न्यास ‘सृष्टिन्यास’ है। दोनों तर्जनी से आरम्भ कर दोनों कनिष्ठापर्यन्त दो आवृत्ति में इन आठ अक्षरों का न्यास ‘स्थितिन्यास’ है। दाहिनी कनिष्ठा से लेकर वाम कनिष्ठापर्यन्त न्यास ‘संहारन्यास’ है। ‘क्रुद्धोल्काय’ इत्यादि से मूल में जो हृदयादि न्यास कहा है, वही ‘अङ्गन्यास’ है। इस प्रकार कराङ्गन्यास करके पुनः अङ्गन्यास की विधि ‘शारदातिलक’ की व्याख्या में स्पष्ट की गयी है। यथा — ‘षडङ्गन्यास’ की विधि से छः अक्षरों का अङ्गों में क्रमशः न्यास करके शेष दो अक्षरों का उदर और पृष्ठ में न्यास करना चाहिये। प्रयोग इस प्रकार है — ‘ॐ हृदयाय नमः। नं शिरसे स्वाहा। मों शिखायै वषट्। नां कवचाय हुम्। रां नेत्राभ्यां वौषट् । यं अस्त्राय फट् । णां उदराय नमः। यं पृष्ठाय नमः ।’ इति । ईशानशिव गुरुदेव का वचन भी ऐसा ही है। अस्य स्याद्धृदयं तारः शिरोनार्णः शिखा च मो । नावर्णः कवचं शस्त्रं रावर्णो नयनं परः ॥ उदरं पृष्ठमन्त्यौ च वर्णो हि नमसा युतौ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe