July 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 307 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सातवाँ अध्याय त्रैलोक्यमोहन आदि मन्त्र त्रैलोक्य मोहनमन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — मुने! अब मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये ‘त्रैलोक्यमोहन’ नामक मन्त्र का वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ ॐ श्रीं ह्रीं ह्रूं ओम्, ॐ नमः पुरुषोत्तम पुरुषोत्तमप्रतिरूप लक्ष्मीनिवास सकलजगत् क्षोभण सर्वस्त्रीहृदयदारण त्रिभुवनमदोन्मादकर सुरमनुजसुन्दरीजनमनांसि तापय तापय दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावयाकर्षयाकर्षय परमसुभग सर्वसौभाग्यकर कामप्रदामुकं (शत्रुम्) हन हन चक्रेण गदया खङ्गेन सर्वबाणैर्भिन्द भिन्द पाशेन कट्ट कट्ट अङ्कुशेन ताडय ताडय त्वर त्वर किं तिष्ठसि यावत्तावत् समीहितं मे सिद्धं भवति हूं फट्, नमः ॥ २ ॥ [^1] ‘ ॐ पुरुषोत्तम त्रिभुवनमदोन्मादकर हूं फट् हृदयाय नमः । सुरमनुजसुन्दरीमनांसि तापय तापय शिरसे स्वाहा। दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावय कवचाय हुम्। आकर्षयाकर्षय महाबल हुं फट् नेत्रत्रयाय वौषट्। त्रिभुवनेश्वर सर्वजनमनांसि हन हन दारय दारय ॐ मम वशमानयानय हुं फट् अस्त्राय फट्। त्रैलोक्यमोहन हृषीकेशाप्रतिरूप सर्वस्त्री हृदयाकर्षण आगच्छ-आगच्छ नमः। (सर्वाङ्गे) व्यापकम् ॥ ३ ॥ इस प्रकार मूलमन्त्रयुक्त व्यापक न्यास बताया गया। फिर पूजन तथा पचास हजार की संख्या में जप करके अभिषेक करे। तत्पश्चात् वैदिक विधि से स्थापित कुण्डाग्नि में सौ बार आहुति दे। दही, घी, खीर, सधृत चरु तथा औटाये हुए दूध की पृथक्- पृथक् बारह बारह आहुतियाँ मूलमन्त्र से दे। फिर अक्षत, तिल और यव की एक हजार आहुतियाँ देने के पश्चात् त्रिमधु, पुष्प, फल, दही तथा समिधाओं की सौ-सौ बार आहुतियाँ दे ॥ ४-६ ॥ तदनन्तर पूर्णाहुति होम करके हुतावशिष्ट सघृत चरु का प्राशन करे — कराये। फिर ब्राह्मण- भोजन कराकर आचार्य को उचित दक्षिणा आदि से संतुष्ट करे। यों करने से मन्त्र सिद्ध होता है। स्नान करके विधिवत् आचमन करे और मौनभाव से यागमन्दिर में जाकर पद्मासन से बैठे और तान्त्रिक विधि के अनुसार शरीर का शोषण करे। पहले राक्षसों तथा विघ्नकारक भूतों का दमन करने के लिये सम्पूर्ण दिशाओं में सुदर्शन का न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि वह सुदर्शन अस्त्र पाँच क्लेशों के बीजभूत, धूम्रवर्ण एवं प्रचण्ड अनिलरूप मेरे सम्पूर्ण पाप को, जो नाभि में स्थित है, शरीर से अलग कर रहा है। फिर हृदयकमल में स्थित ‘रं’ बीज का स्मरण करके ऊपर, नीचे तथा अगल-बगल में फैली हुई अग्नि की ज्वालाओं से उस पाप-पुञ्ज को जलाकर भस्म कर दे। फिर मूर्धा (ब्रहारन्ध्र) में अमृत का चिन्तन करके सुषुम्णानाड़ी के मार्ग से आती हुई अमृत की धाराओं से अपने शरीर को बाहर और भीतर से भी आप्लावित करे ॥ ७-११ ॥ इस प्रकार शुद्धशरीर होकर मूलमन्त्र से तीन बार प्राणायाम करे। फिर मस्तक और मुख पर तथा गुह्यभाग, ग्रीवा, सम्पूर्ण दिशा, हृदय, कुक्षि एवं समस्त शरीर में हाथ रखकर उनमें शक्ति का न्यास करे। इसके बाद सूर्यमण्डल से सम्परात्मा का आवाहन करके ब्रह्मरन्ध्र के मार्ग से हृदय-कमल में लाकर चिन्तन करे। वे परात्मा समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न हैं। प्रणव का उच्चारण करते हुए परात्मा का स्मरण करना चाहिये ॥ १२-१४ ॥ उनके स्मरण के लिये गायत्री मन्त्र इस प्रकार है — ‘त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे। स्मराय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्। इति।’ परात्मा का अर्चन करने के पश्चात् यज्ञसम्बन्धी द्रव्यों और शुद्ध पात्र का प्रोक्षण करे। विधिपूर्वक आत्मपूजा करके वेदी पर उसकी अर्चना करे ॥ १५-१६ ॥ कूर्म-अनन्त आदि के रूप में कल्पित पीठ पर कमल एवं गरुड़ के आसन पर विराजमान त्रैलोक्य मोहन भगवान् विष्णु सर्वाङ्गसुन्दर हैं और वय के अनुरूप लावण्य तथा यौवन को प्राप्त हैं। उनके अरुणनयन मद से घूर्णित हो रहे हैं। वे परम उदार तथा स्मर से विह्वल हैं। दिव्य माला, वस्त्र और अनुलेप उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मुख पर मन्दहास्य की छटा छिटक रही है। उनके परिवार और परिकर अनेक हैं। वे लोक पर अनुग्रह करने वाले, सौम्य तथा सहस्रों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं। उन्होंने हाथों में पाँच बाण धारण कर रखे हैं। उनकी समस्त इन्द्रियाँ पूर्णकाम हैं। उनके आठ भुजाएँ हैं। देवाङ्गनाएँ उन्हें घेरकर खड़ी हैं। उनकी दृष्टि लक्ष्मीदेवी के मुख पर गड़ी है। ऐसे भगवान् का भजन करे। उनके आठ हाथों में क्रमशः चक्र, शङ्ख, धनुष, खङ्ग, गदा, मुसल, अङ्कुश और पाश शोभा पाते हैं। आवाहन आदि के द्वारा उनकी अर्चना करके अन्त में उनका विसर्जन करना चाहिये ॥ १७-२१ ॥ यह भी चिन्तन करे कि भगवान् अपने ऊरु तथा जंघा पर श्रीलक्ष्मीजी को बैठाये हुए हैं और वे दोनों हाथों से पति का आलिङ्गन करके स्थित हैं। उनके बायें हाथ में कमल है। वे शरीर से हृष्ट- पुष्ट हैं तथा श्रीवत्स और कौस्तुभ से सुशोभित हैं। भगवान् के गले में वनमाला है और शरीर पर पीताम्बर शोभा पाता है। इस प्रकार चक्र आदि आयुधों से सम्पन्न श्रीहरि का पूजन करे ॥ २२-२३ ॥ ‘ॐ सुदर्शन महाचक्रराज दह दह सर्वदुष्टभयं कुरु कुरु छिन्द छिन्द विदारय विदारय परमन्त्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतानि त्रासय त्रासय हूं फट् स्वाहा’ इस मन्त्र से चक्र सुदर्शन की पूजा करे। ‘ॐ महाजलचराय हुं फट् स्वाहा। पाञ्चजन्याय नमः ।’ — इस मन्त्र से शङ्ख की पूजा करे। ‘महाखङ्ग तीक्ष्ण छिन्द छिन्द हुं फट् स्वाहा खङ्गाय नमः।’ इससे खङ्ग की पूजा करे।’ ‘शार्ङ्गाय सशराय नमः।’ [^2] इससे धनुष और बाण की पूजा करे। ‘ॐ भूतग्रामाय विद्महे। चतुर्विधाय धीमहि। तन्नो ब्रहा प्रचोदयात्।’ — यह भूतग्राम [^3] गायत्री है। ‘संवर्तक मुशल पोथय पोथय हुं फट् स्वाहा।’ इस मन्त्र से मुशल [^4] की पूजा करे। ‘पाश बन्ध बन्धाकर्षयाकर्षय हुं फट्’ — इस मन्त्र से पाश का [^5] पूजन करे। ‘ अङ्कुश कट्ट हूं फट्’ [^6] — इससे अङ्कुश की पूजा करे। भगवान् की भुजाओं में स्थित अस्त्रों का तत्तत् अस्त्र-सम्बन्धी इन्हीं मन्त्रों से क्रमशः पूजन करे ॥ २४-२७ ॥ ‘ॐ पक्षिराजाय हुं फट्’ इस मन्त्र से पक्षिराज गरुड की पूजा करे। कर्णिका में पहले अङ्ग-देवताओं का विधिवत् पूजन करे। फिर पूर्व आदि दलों में लक्ष्मी आदि शक्तियों तथा चामरधारी तार्क्ष्य आदि की अर्चना करे। शक्तियों की पूजा का प्रयोग अन्त में करना चाहिये। पहले देवेश्वर इन्द्र आदि दण्डीसहित पूजनीय हैं। लक्ष्मी और सरस्वती पीतवर्ण की हैं। रति, प्रीति और जया — ये शक्तियाँ श्वेतवर्णा हैं। कीर्ति तथा कान्ति श्वेतवर्णा हैं। तुष्टि तथा पुष्टि — ये दोनों श्यामवर्णा हैं। इनमें स्मरभाव (प्रेममिलन की उत्कण्ठा) उदित रहती है। लोकेश (ब्रह्माजी तथा दिक्पाल) पर्यन्त देवताओं की पूजा करके अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिये भगवान् विष्णु की पूजा करनी चाहिये। निम्नाङ्कित मन्त्र का ध्यान और जप करे। उसके द्वारा होम और अभिषेक करे। (मन्त्र यों है —) ‘ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं ह्रूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।’ — इस मन्त्र द्वारा पूर्ववत् पूजन आदि करने से साधक सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। जल तथा सम्मोहनी वृक्ष के पुष्प द्वारा उक्त मन्त्र से नित्य तर्पण करे। ब्रह्मा, इन्द्र, श्रीदेवी, दण्डी, बीजमन्त्र तथा त्रैलोक्यमोहन विष्णु का पूजन करके उक्त मन्त्र का तीन लाख जप करने के पश्चात् कमलपुष्प, बिल्वपत्र तथा घी से एक लाख होम करे। उक्त हवन-सामग्री में चावल, फल, सुगन्धित चन्दन आदि द्रव्य और दूर्वा भी मिला ले। इन सबके द्वारा हवनकर्म सम्पादित करके मनुष्य दीर्घ आयु की उपलब्धि करता है। उस जप, अभिषेक तथा होमादि क्रिया से संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु उपासक को अभीष्ट फल प्रदान करते हैं ॥ २८-३६ ॥ ॐ नमो भगवते वराहाय भूर्भुवः स्वः पतये भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा।’– यह वराह भगवान् का मन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार है — ॐ नमो हृदयाय नमः। भगवते शिरसे स्वाहा। वराहाय शिखायै वषट्। भूर्भुवः स्वः पतये कवचाय हुम्। भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा अस्त्राय फट्।’ इस प्रकार पञ्चाङ्ग- न्यासपूर्वक वराह मन्त्र का प्रतिदिन दस हजार बार जप करने से मनुष्य दीर्घ आयु तथा राज्य प्राप्त कर सकता है ॥ ३७-३८ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘त्रैलोक्यमोहनमन्त्र का वर्णन’ नामक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०७ ॥ [^1]: इस मन्त्र का भावार्थ — ‘ॐ श्रीं ह्रीं ह्रूं ओम् सच्चिदानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम ! पुरुषोत्तमप्रतिरूप ! लक्ष्मीनिवास ! आप अपने सौन्दर्य से सम्पूर्ण जगत् को क्षुब्ध कर देने में समर्थ हैं। समस्त स्त्रियों के हृदय को दरण-उन्मथित कर देने वाले हैं। त्रिभुवन को मदोन्मत्त कर देने की शक्ति रखते हैं। देवसुन्दरियों तथा मानवसुन्दरियों के मन को (प्रीति-अग्नि में) तपाइये, तपाइये; उनके राग को उद्दीप्त कीजिये, उद्दीप्त कीजिये; सोखिये, सोखिये; मारिये, मारिये; उनका स्तम्भन कीजिये; स्तम्भन कीजिये; द्रवित कीजिये, द्रवित कीजिये; आकर्षित कीजिये, आकर्षित कीजिये। परम सौभाग्यनिधे! सर्वसौभाग्यकारी प्रभो! आप सबकी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण करने वाले हैं। मेरे ‘अमुक’ शत्रु का हनन कीजिये, हनन कीजिये। चक्र से, गदा से और खङ्ग से; समस्त बाणों से बेधिये, बेधिये। पाश से आवृत कीजिये, बाँध लीजिये। अङ्कुश से ताडित कीजिये, ताडित कीजिये। जल्दी कीजिये, जल्दी कीजिये। क्यों रुकते या ठहरते हैं? जबतक मेरा सारा मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक यत्नशील रहिये। हुं फट् नमः ॥’ [^2]: ‘महाशार्ङ्गाय सशराय हुं फट् स्वाहा, शार्ङ्गाय नमः ।’ — यह सर्वसम्मत शार्ङ्गधनुष-सम्बन्धी मन्त्र है। (शारदातिलक से) [^3]: यह ‘भूतग्राम-गायत्री’ क्रम प्राप्त गदामन्त्र के लिये आयी जान पड़ती है। इससे गदा का पूजन करना चाहिये। ‘शारदातिलक ‘में कौमोदकी गदा के मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार उद्धृत हुआ है — ‘महाकौमोदकि महाबले सर्वासुरान्तकि प्रसीद प्रसीद हुं फट् स्वाहा, कौमोदक्यै नमः ।’ [^4]: ‘संवर्तक महामुशल पोथय पोथय हुं फट् स्वाहा, मुशलाय नमः ।’ — यह पूरा-पूरा ‘मुशल-मन्त्र’ है। [^5]: पाश का सर्वसम्मत मन्त्ररूप ‘शारदातिलक ‘ में इस प्रकार वर्णित हुआ है — ‘महापाश बन्ध बन्ध आकर्षयाकर्षय हुं फट् स्वाहा, पाशाय नमः ।’ [^6]: अङ्कुश-मन्त्र भी अपने पूर्णरूप में इस प्रकार उपलब्ध होता है —- ‘महाङ्कुश कट्ट कट्ट हुं फट् स्वाहा, अङ्कुशाय नमः ।’ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe