July 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 308 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ आठवाँ अध्याय त्रैलोक्यमोहिनी लक्ष्मी एवं भगवती दुर्गा के मन्त्रों का कथन त्रैलोक्यमोहनीलक्ष्म्यादि पूजा अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! वान्त (श्), वह्नि (र), वामनेत्र (ईकार) और दण्ड (अनुस्वार) — इनके योग से ‘श्रीं’ बीज बनता है जो ‘श्री’ देवी का मन्त्र है और सब सिद्धियों को देने वाला है। ( इसका अङ्गन्यास इस प्रकार करना चाहिये —) (प्रथम प्रकार) महाश्रिये महाविद्युत्प्रभे स्वाहा, हृदयाय नमः। श्रियै देवि विजये स्वाहा, शिरसे स्वाहा। गौरि महाबले बन्ध-बन्ध स्वाहा, शिखायै वषट्। धृतिः स्वाहा, कवचाय हुम्। महाकाये पद्महस्ते हूं फट्, अस्त्राय फट्। (दूसरा प्रकार) ‘श्रियै स्वाहा, हृदयाय नमः। श्रीं फट्, शिरसे स्वाहा। श्रीं नमः’ शिखायै वषट्। श्रियै प्रसीद नमः। कवचाय हुम्। श्रीं फट्, अस्वाय फट्।’ [इसी तरह अन्यान्य प्रकार भी तन्त्र ग्रन्थों में कहे गये हैं। ॥ १-२ ॥ ‘ — इस प्रकार ‘श्री’ मन्त्र के नौ अङ्गन्यास बतलाये गये हैं। उनमें से किसी एक का आश्रय ले। 1 पद्माक्ष की माला से पूर्वोक्त मन्त्र का तीन लाख या एक लाख बार जप ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। साधक लक्ष्मी अथवा विष्णु के मन्दिर में श्रीदेवी का पूजन करके धन प्राप्त कर सकता है। खदिरकाष्ठ से प्रज्वलित अग्नि में घृतमिश्रित तण्डुलों की एक लाख आहुतियाँ दे। इससे राजा वशीभूत हो जाता है तथा लक्ष्मी की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। श्रीमन्त्र से अभिमन्त्रित सर्षपजल से अभिषेक करने पर सब प्रकार की ग्रहबाधा शान्त होती है। एक लाख बिल्वफलों का होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति और धन की वृद्धि होती है ॥ ३-५१/२ ॥ साधक चार द्वारों से युक्त निम्नाङ्कित ‘शक्रवेश्म’ का चिन्तन करे — पूर्वद्वार पर क्रीडा में संलग्न दोनों भुजाओं को ऊपर उठाये हुए श्वेत कमल को धारण करने वाली श्यामवर्णा वामनाकृति बलाकी का ध्यान करे। दक्षिणद्वार पर ऊपर उठाये हुए एक हाथ में रक्तकमल धारण करने वाली श्वेताङ्गी वनमालिनी का चिन्तन करे। पश्चिमद्वार पर दोनों हाथों को ऊपर उठाकर श्वेत पुण्डरीक को धारण करने वाली हरितवर्णा विभीषिका नाम वाली श्रीदूती का ध्यान करे। उत्तरद्वार पर शाङ्करी को धारणा करे। ‘शक्रवेश्म ‘के मध्य में अष्टदल कमल का निर्माण करे। कमलदलों पर क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का ध्यान करे। उनकी अङ्गकान्ति क्रमशः अञ्जन, दुग्ध, केसर और सुवर्ण के समान है। वे सुन्दर वस्त्रों से विभूषित हैं। उस अष्टदल कमल के आग्नेय आदि दलों पर गुग्गुलु, कुरण्टक, दमक और सलिल — नामक दिग्गजों की धारणा करे। ये चारों स्वर्ण-कलशों को धारण करने वाले हैं। कमल की कर्णिका में श्रीदेवी का स्मरण करे। वे चार भुजाओं से युक्त हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्ण के समान है। उनकी ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओं में कमल है तथा दक्षिणहस्त में अभयमुद्रा और वामहस्त में वरमुद्रा सुशोभित हो रही है। वे शुभ्र एवं सुवासित वस्त्र तथा गले में एक श्वेत माला धारण करती हैं। उन श्रीदेवी का ध्यान एवं सपरिवार पूजन करके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है 2 ॥ ६-१४१/२ ॥ पूर्वोक्त उपासना के समय द्रोणपुष्प, कमल और बिल्वपत्र को सिर पर धारण न करे। पञ्चमी और सप्तमी के दिन क्रमशः लवण और आँवले का परित्याग कर दे। साधक खीर का भोजन करके श्रीसूक्त का जप करे तथा श्रीसूक्त से ही श्रीदेवी का अभिषेक करे। आवाहन से लेकर विसर्जनपर्यन्त सभी उपचार अर्पण श्रीसूक्त की ऋचाओं से करता हुआ ध्यानपूर्वक श्रीदेवी का पूजन करे। बिल्व, घृत, कमल और खीर ये वस्तुएँ एक साथ या अलग-अलग भी श्रीदेवी के निमित्त होम में उपयुक्त हैं। यह होम लक्ष्मी की प्राप्ति एवं वृद्धि करने वाला है ॥ १५-१७ ॥ विषं (म), हि, मज्जा (ष), काल (म), अग्नि (र), अत्रि (द), निष्ठ (इ), नि, स्वाहा (महिषमर्दिनि स्वाहा) यह भगवती महिषमर्दिनी (महालक्ष्मी) का अष्टाक्षर-मन्त्र कहा गया है। ॥ १८ ॥ ‘ॐ ह्रीं महामहिषमर्दिनि स्वाहा।’ — यह मूलमन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार करे — ‘महिषमर्दिनि हूं फट्, हृदयाय नमः। महिषशत्रूत्सादिनि हुं फट्, शिरसे स्वाहा। महिषं भीषय हुं फट्, शिखायै वषट्। महिषं हन हन देवि हुं फट्, कवचाय हुम्। महिषसूदनि हुं फट्, अस्त्राय फट् ।’ यह अङ्गों सहित ‘दुर्गाहृदय’ कहा गया है, जो सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करने वाला है। दुर्गादेवी का निम्नाङ्कित प्रकार से पीठ एवं अष्टदल- कमल पर पूजन करे ॥ १९-२० ॥ ‘ॐ ह्रीं दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा’ — यह दुर्गा का मन्त्र है। अष्टदलपद्म पर दुर्गा, वरवर्णिनी,आर्या, कनकप्रभा, कृत्तिका, अभयप्रदा, कन्यका और सुरूपा — इन शक्तियों के क्रमशः आदि के सस्वर अक्षरों में बिन्दु लगाकर उन्हीं बीजमन्त्रों से युक्त नाममन्त्रों द्वारा यजन करे। यथा— ‘दुं दुर्गायै नमः’ इत्यादि। इनके साथ क्रमशः चक्र, शङ्ख, गदा, खङ्ग, बाण, धनुष, अङ्कुश और खेट — इन अस्त्रों की भी अर्चना करे। अष्टमी आदि तिथियों पर लोकेश्वरी दुर्गा की पूजा करे। दुर्गा की यह उपासना पूर्ण आयु, लक्ष्मी, (आत्मरक्षा) एवं युद्ध में विजय प्रदान करने वाली है। साध्य के नाम से युक्त मन्त्र से तिल का होम ‘वशीकरण’ करने वाला है। कमलों के हवन से ‘विजय’ प्राप्त होती है। शान्ति की कामना करने वाला दूर्वा से हवन करे। पलाश-समिधाओं से पुष्टि, काकपक्ष के हवन से मारण एवं विद्वेषणकर्म सिद्ध होते हैं। यह मन्त्र सभी प्रकार की ग्रहबाधा एवं भय का हरण करता है ॥ २१-२६ ॥ ‘ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा’ — यह अङ्गसहित ‘जय दुर्गा’ बतलायी गयी है। यह साधक की रक्षा करती है। ‘मैं श्यामाङ्गी, त्रिनेत्रभूषिता, चतुर्भुजा, शङ्ख, चक्र, शूल एवं खङ्गधारिणी रौद्ररूपिणी रणचण्डीस्वरूपा हूँ’ — ऐसा ध्यान करे। युद्ध के प्रारम्भ में इस ‘जयदुर्गा ‘ का जप करे। विजय के लिये खङ्ग आदि पर दुर्गा का पूजन करे ॥ २७-२९ ॥ ‘ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते चराचररक्षिणि स्वाहा’ — युद्ध के निमित्त इस मन्त्र का जप करे। इससे योद्धा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है ॥ ३०-३१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘लक्ष्मी आदि की पूजा का वर्णन’ नामक तीन सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०८ ॥ 1. ‘शारदातिलक’ ८ । २ की टीका में अग्निपुराणोक्त द्विविध अङ्गन्यास इसी प्रकार उद्धृत किये गये हैं। परंतु मूल में ‘षड् दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात्।’ कहा है; उसके अनुसार, ‘श्रीं हृदयाय नमः । श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखायै वषट्। श्रैं कवचाय हुम्। श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। श्रः अस्त्राय फट् ।’ इस प्रकार न्यास करे। 2. शक्रवेश्म यन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है — Content is available only for registered users. 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