अग्निपुराण – अध्याय 312
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ बारहवाँ अध्याय
त्वरिता-विद्या से प्राप्त होने वाली सिद्धियों का वर्णन
त्वरिता-विद्या

अग्निदेव कहते हैं — मुने। अब मैं विद्या प्रस्ताव का वर्णन करूँगा, जो धर्म, काम आदि की सिद्धि प्रदान करने वाला है। नौ कोष्ठों के विभाग से विद्याभेद की उपलब्धि होती है। अनुलोम-विलोमयोग, समास-व्यासयोग, कर्णाविकर्णयोग, अध-ऊर्ध्व-विभागयोग तथा त्रित्रिकयोग से देवी के द्वारा जिसके शरीर की सुरक्षा सम्पादित हुई है, वह साधक सिद्धिदायक मन्त्रों तथा बहुत-से निर्गत प्रस्तावों को जानता है। शास्त्र-शास्त्र में मन्त्र बताये गये हैं, किंतु वहाँ उनके प्रयोग दुर्लभ हैं। प्रथम गुरु वर्ण ही होता है। उसका पूर्वकाल में वर्णन नहीं हुआ है। वहाँ प्रस्ताव में एकाक्षर, द्वयक्षर तथा त्र्यक्षर मन्त्र प्रकट हुए। चार-चार खड़ी तथा पड़ी रेखाएँ खींचे। इस प्रकार नौ कोष्ठ होते हैं। मध्यकोष्ठ से आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रम से मन्त्र के अक्षरों का उनमें न्यास करे।’

तदनन्तर प्रस्ताव भेदन करे। प्रस्तावक्रमयोग से जो प्रस्ताव को प्राप्त करता है, उस साधक की मुट्ठी में सारी सिद्धियाँ आ जाती हैं। सारी त्रिलोकी उसके चरणों में झुक जाती है। वह नौ खण्डों में विभक्त जम्बूद्वीप की सम्पूर्ण भूमि पर अधिकार प्राप्त कर लेता है। कपाल (खप्पर) पर अथवा श्मशान के वस्त्र (शव के ऊपर से उतारे हुए कपड़े) पर सब ओर शिवतत्त्व लिखकर मन्त्रवेत्ता पुरुष बाहर निकले और मध्यभाग में कर्णिका के ऊपर अभीष्ट व्यक्तिविशेष का भोजपत्र पर नाम लिखकर रख दे। फिर खैर की लकड़ी से तैयार किये गये अङ्गारों द्वारा उस भोजपत्र को तपाकर दोनों पैरों के नीचे दबा दे। यह प्रयोग एक ही सप्ताह में चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिभुवन को भी चरणों में ला सकता है। वज्रसम्पुट गर्भ से युक्त द्वादशारचक्र के मध्य में द्वेष्य व्यक्ति का नाम लिखकर रखे। उस नाम को ‘सदाशिव’ मन्त्र से विदर्भित (कुशों द्वारा मार्जित) कर दे। उक्त द्वादशारचक्र तथा नाम आदि का उल्लेख हल्दी से दीवार पर, काष्ठफलक पर अथवा शिलापट्ट पर करना चाहिये। ऐसा करने से शत्रु के मुख, गमनशक्ति तथा सेना का भी स्तम्भन (अवरोध) हो जाता है ॥ १-१२ ॥

श्मशान के वस्त्र पर विषमिश्रित रक्त से षट्‌कोणचक्र का उल्लेख कर उसके मध्य में शत्रु का नाम लिखे। फिर उस चक्र को चारों ओर शक्तिबीज से योजित करके उस पर डंडा रख दे। फिर साधक श्मशानभूमि पर रखे हुए उस शत्रु पर शीघ्र दण्ड से प्रहार करे। यह प्रयोग उस शत्रु-राजा के राष्ट्र को खण्डित कर देता है। इसी तरह चक्राकार मण्डल बनाकर उसके मध्यभाग में शत्रु के नाम को स्थापित कर दे। चक्र की धारा में शक्तिबीज का न्यास करे। शत्रु का नाम लेकर उसपर भावना द्वारा उक्त चक्रधार से प्रहार करे। इससे शत्रु का हरण होता है। इसी प्रकार खङ्ग के मध्यभाग में गरुडबीज के साथ शत्रु का नाम लिखकर उसका पूर्ववत् विदर्भीकरण करे। उक्त नाम श्मशानभूमि की चिता के कोयले से लिखना चाहिये। उसपर चिता के भस्म से प्रहार करे। ऐसा करने से साधक एक ही सप्ताह में शत्रु के देश को अपने अधिकार में कर लेता है। वह छेदन, भेदन और मारण में शिव के समान शक्तिशाली हो जाता है। तारक (फट्)- को नेत्र कहा गया है। उसका शान्ति पुष्टिकर्म में नियोग करे। यह दहनादि प्रयोग शाकिनी को भी आकर्षित कर लेता है। पूर्वोक्त नौ चक्रों में मध्यगत मन्त्राक्षर से लेकर पश्चिम दिशावर्ती कोष्ठ तक के दो अक्षरों को वक्रतुण्ड मन्त्र के साथ जपने से कुष्ठ आदि जितने भी चर्मगत रोग हैं, उन सबका नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। (यह अध- ऊर्ध्व विभागयोग है।) मध्यकोष्ठ से उत्तरवर्ती कोष्ठ तक के दो अक्षर वाले मन्त्र को ‘करालीबन्ध’ के साथ जप करे तो वह द्वपक्षरी विद्या, यदि साक्षात् शिव प्रतिवादी हों तो उनसे भी अपनी रक्षा करवाती है। इसी प्रकार पश्चिमगत मन्त्राक्षर को आदि में रखकर उत्तर कोष्ठ तक के मन्त्राक्षरों को ‘वक्रतुण्ड मन्त्र’ के साथ जप किया जाय तो ज्वर तथा खाँसी का नाश होता है। उत्तरकोष्ठ से लेकर मध्यकोष्ठ तक के मन्त्राक्षरों का एक-एक साथ जप किया जाय तो साधक की इच्छा से वट के बीज में गुरुता (भारीपन) आ सकती है। इसी तरह पूर्वादि-मध्यमान्त अक्षरों के जप से वह तत्काल उसमें लघुता (हल्कापन) ला सकता है।

भोजपत्र पर गोरोचना द्वारा वज्र से व्याप्त भूपुरचक्र लिखकर, अनुलोमक्रम से स्थित मन्त्र-बीजों को लिखकर, उसे मन्त्रवत् धारण करके साधक अपने शरीर की रक्षा करे। भावपूर्वक सुवर्ण में मढ़ाकर धारण किया गया यह ‘रक्षायन्त्र’ मृत्यु का भी नाश करने वाला होता है। वह विघ्न, पाप तथा शत्रुओं का दमन करने वाला है तथा सौभाग्य और दीर्घायु देने वाला है। यह रक्षायन्त्र’ धारण किया जाय तो वह जुआ तथा युद्ध में भी विजयदायक होता है। इन्द्र की सेना के साथ संग्राम हो तो उसमें भी वह विजय दिलाता है, इसमें संशय नहीं है। यह ‘रक्षायन्त्र’ वन्ध्या को भी पुत्र देने वाला तथा दूसरी चिन्तामणि के समान मनोवाञ्छा की पूर्ति करने वाला है। इससे रक्षित हुआ मनुष्य परराष्ट्रों पर भी अधिकार पाता है तथा राज्य और पृथ्वी को जीत लेता है। ‘फट् स्त्रीं शें हूं’ इन चार अक्षरों का एक लाख जप करने से यक्ष आदि भी वशीभूत हो जाते हैं ॥ १३-२५ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘त्वरिता विद्या से प्राप्त होने वाली सिद्धियों का वर्णन’ नामक तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१२ ॥

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