अग्निपुराण – अध्याय 313
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ तेरहवाँ अध्याय
नाना मन्त्रों का वर्णन
नानामन्त्राः

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विनायक (गणेश) के पूजन की विधि बताऊँगा। योगपीठ पर प्रथम तो आधारशक्ति की पूजा करे। फिर अग्नि आदि कोणों तथा पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य — इन आठ की अर्चना करे। तदनन्तर कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका, केसर और सत्त्वादि तीन गुणों की और पद्मासन की पूजा करे। इसके बाद तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, सुयशा (भोगदा), कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या तथा विघ्ननाशिनी — इन नौ शक्तियों की पूजा करे। तत्पश्चात् गणेशजी की मूर्ति का अथवा मूर्ति के अभाव में ध्यानोक्त गणपतिमूर्ति का पूजन करे। इसके बाद हृदयादि अङ्गों की पूजा करनी चाहिये। पूजन के प्रयोगवाक्य इस प्रकार हैं — ‘गणंजयाय हृदयाय नमः। एकदन्ताय उत्कटाय शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने शिखायै वषट्। गजवक्त्राय हुं फट् कवचाय हुम्। महोदराय दण्डहस्ताय अस्त्राय फट्।’1  — इन पाँच अङ्गों में से चार की तो पूर्वादि चार दिशाओं में और पाँचवें की मध्यभाग में पूजा करे ॥ १-४ ॥

तदनन्तर गणंजय, गणाधिप, गणनायक, गणेश्वर, वक्रतुण्ड, एकदन्त, उत्कट, लम्बोदर, गजवक्त्र और विकटानन — इन सबकी पद्मदलों में पूजा करे। फिर मध्यभाग में ‘हूं विघ्ननाशनाय नमः । महेन्द्राय धूम्रवर्णाय नमः।’ — यों बोलकर विघ्ननाशन एवं धूम्रवर्ण की पूजा करे। फिर बाह्यभाग में विघ्नेश का पूजन करे ॥ ५-६ ॥

अब मैं ‘त्रिपुराभैरवी ‘ के पूजन की विधि बताऊँगा। इसमें आठ भैरवों का पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं— असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव। ब्राह्मी आदि मातृकाएँ भी पूजनीय हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं — ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा तथा महालक्ष्मी)। ‘अकार’ आदि ह्रस्व स्वरों के बीज को आदि में रखकर भैरवों की पूजा करनी चाहिये तथा ‘आकार’ आदि दीर्घ अक्षरों के बीज को आदि में रखकर ‘ब्राह्मी’ आदि मातृकाओं की अर्चना करनी चाहिये। 2  अग्नि आदि चार कोणों में चार वटुकों का पूजन कर्तव्य है। समयपुत्र वटुक, योगिनीपुत्र वटुक, सिद्धपुत्र वटुक तथा चौथा कुलपुत्र बटुक — ये चार बटुक हैं। इनके अनन्तर आठ क्षेत्रपाल पूजनीय हैं। इनमें ‘हेतुक’ क्षेत्रपाल प्रथम है और ‘त्रिपुरान्त’ द्वितीय। तीसरे ‘अग्निवेताल’ चौथे ‘अग्निजिह्व’ पाँचवें ‘कराल’ तथा छठे ‘काललोचन’ हैं। सातवें ‘एकपाद’ तथा आठवें ‘भीमाक्ष’ कहे गये हैं। (ये सभी क्षेत्रपाल यक्ष हैं।) इन सबका पूजन करके त्रिपुरादेवी के प्रेतरूप पद्मासन की पूजा करे। यथा — ‘ऐं क्षैं प्रेतपद्मासनाय नमः । ॐ ऐं ह्रीं हसौः त्रिपुरायै प्रेतपद्मासनसमास्थितायै नमः ।’
— इस मन्त्र से प्रेतपद्मासन पर विराजमान त्रिपुराभैरवी की पूजा 3  करे। उनका ध्यान इस प्रकार है — ‘त्रिपुरादेवी’ बायें हाथ में अभय एवं पुस्तक (विद्या) धारण करती हैं तथा दायें हाथ में वरदमुद्रा एवं माला (जपमालिका)। देवी बाणसमूह से भरा तरकस और धनुष भी लिये रहती हैं।’ मूलमन्त्र से हृदयादि न्यास करे 4 ॥ ७-१२ ॥

(अब प्रयोगविधि बतायी जाती है —) गोसमूह के मध्य में स्थित हो, श्मशान आदि के वस्त्र पर चिता के कोयले से अष्टदलकमल का चक्र लिखे या लिखावे। उसमें द्वेषपात्र का नाम लिखकर लपेट दे। फिर चिता की राख को सानकर एक मूर्ति बनावे। उसमें द्वेषपात्र की स्थिति का चिन्तन करके उक्त यन्त्र को नीले रंग के डोरे से लपेटकर मूर्ति के पेट में घुसेड़ दे। ऐसा करने से उस व्यक्ति का उच्चाटन हो जाता है ॥ १३-१४ ॥

ज्वालामालिनी-मन्त्र
‘ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते स्वाहा।’
इस मन्त्र का जप करते हुए युद्ध में जाने वाले पुरुष को प्रत्यक्ष विजय प्राप्त होती है ॥ १५-१६ ॥

श्रीमन्त्र
‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः ॥ १७ ॥

चतुर्दल कमल में उत्तरादि दल के क्रम से क्रमशः घृणिनी, सूर्या, आदित्या और प्रभावती — इन चार श्रीदेवियों का उक्त मन्त्र से पूजन करके मन्त्र जपने से श्री की प्राप्ति होती है। ये सभी श्रीदेवियाँ सुवर्णगिरि के समान परम सुन्दर कान्ति वाली हैं ॥ १८ ॥

गौरी मन्त्र
‘ॐ ह्रीं गौर्यै नमः ।’

— इस मन्त्र द्वारा जप, होम, ध्यान तथा पूजन किया जाय तो यह साधक को सब कुछ प्रदान करने वाला है। गौरीदेवी की अङ्गकान्ति अरुणाभ गौर है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे दाहिने दो हाथों में पाश तथा वरदमुद्रा धारण करती हैं और बायें दो हाथों में अङ्कुश एवं अभय। शुद्ध चित्त से गौरीदेवी की प्रार्थना (आराधना) करने वाला बुद्धिमान् पुरुष सौ वर्षों तक जीवित रहता है तथा उसे चोर आदि का भय नहीं प्राप्त होता है। युद्धस्थल में इस मन्त्र से अभिमन्त्रित जल को पी लेने से अपने ऊपर क्रोध से भरा हुआ पुरुष भी प्रसन्न हो जाता है। इस मन्त्र से अञ्जन और तिलक लगाने पर वशीकरण सिद्ध होता है तथा जिह्वाग्र पर इसके लेख से (अथवा जप से भी) कवित्व-शक्ति प्रस्फुटित होती है। इसके जप से स्त्री-पुरुष के जोड़े वश में हो जाते हैं। इसके जप से सूक्ष्म योनियों के भी दर्शन होते हैं। स्पर्श करनेमात्र से मनुष्य वश में हो जाता है। इस मन्त्र द्वारा तिल की आहुति देने पर सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस मन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित करके अन्न का भोजन करने वाले पुरुष के पास सदा श्री (धन-सम्पत्ति) बनी रहती है। इसके आदि में लक्ष्मी-बीज (श्रीं) और वैष्णव-बीज (क्लीं) जोड़ दिया जाय तो यह ‘अर्धनारीश्वर- मन्त्र’ हो जाता है। अनङ्गरूपा, मदनातुरा, पवनवेगा, भुवनपाला, सर्वसिद्धिदा, अनङ्गमदना और अनङ्गमेखला — ये शक्तियाँ हैं। इनके नाममन्त्रों के जप से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। कमल के दलों में हीं, स्वर, कादि व्यञ्जन लिखकर बीच में अभीष्ट स्त्री का नाम लिखे। षट्‌कोण-चक्र या कलश में भी लिख सकते हैं। लिखकर उसके उद्देश्य से जप करने पर ‘वशीकरण’ होता है ॥ १९-२६ ॥

नित्यक्लिन्ना-मन्त्र
‘ॐ ह्रीं ऐं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।5

किसी-किसी ने इस मन्त्र को पञ्चदशाक्षर भी माना है। उस दशा में ‘स्वाहा’ से पहले ‘ऐं ह्रीं’ जोड़ा जाता है। यह छः अङ्गों वाला मूलमन्त्र है (तीन बीज और तीन पद मिलाकर छः अङ्ग होते हैं)। लाल रंग के त्रिकोण-चक्र में अष्टदल कमल का चिन्तन करके उसमें ‘द्राविणी’ आदि का पूजन करे। पूर्वादि दिशाओं में ‘द्राविणी’ आदि चार शक्तियों तथा ईशानादि कोणों में ‘अपरा’ आदि चार शक्तियों का चिन्तन-पूजन करना चाहिये। उनके क्रमानुसार नाम यों जानने चाहिये — द्राविणी, वामा, ज्येष्ठा, आह्लादकारिणी, अपरा, क्षोभिणी, रौद्री तथा गुणशक्ति। देवी का ध्यान इस प्रकार करे — ‘वे रक्तवर्णा हैं और उसी रंग के वस्त्राभूषण धारण करती हैं। उनके दो हाथों में पाश और अड्कुश है, दो हाथों में कपाल तथा कल्पवृक्ष हैं तथा दो हाथों से उन्होंने वीणा ले रखी है।’ नित्या, अभया, मङ्गला, नववीरा, सुमङ्गला, दुर्भगा और मनोन्मनी तथा द्रावा — इन आठ देवियों का पूर्वादि दिशा के कमल-दलों में पूजन करे। [‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में ये नाम इस प्रकार मिलते हैं — नित्या, सुभद्रा, समङ्गला, वनचारिणी, सुभगा, दुर्भगा, मनोन्मनी तथा रुद्ररूपिणी। इनके बाह्यभाग में पाँच दलों में कामदेवों का पूजन होता है। ‘ॐ ह्रीं अनङ्गाय नमः। ॐ ह्रीं स्मराय नमः। ॐ ह्रीं मन्मथाय नमः। ॐ ह्रीं माराय नमः। ॐ ह्रीं कामाय नमः।’ — ये ही पाँच काम हैं। कामदेवों के हाथों में पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण का चिन्तन करे। इनके भी बाह्यभाग में दस दलों में क्रमशः रति-विरति, प्रीति-विप्रीति, मति-दुर्मति, धृति-विधृति, तुष्टि-वितुष्टि — इन पाँच कामवल्लभाओं का पूजन करे ॥ २७-३३ ॥

‘ॐ छं (ऐं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं (स्वाहा) अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षः ॐ छं (ऐं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।’ यह ‘नित्यक्लिन्ना— विद्या’ है ॥ ३४ ॥

सिंहासन पर आधारशक्ति तथा पद्म का पूजन करके उसके दलों में हृदय आदि अङ्गों की स्थापना एवं पूजन करने के अनन्तर मध्यकर्णिका में देवी की पूजा करनी चाहिये ॥ ३५ ॥

गौरीमन्त्र (२)
‘ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा ॥ ३६ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नाना प्रकारके मन्त्रों का वर्णन’ नामक तीन सी तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१३ ॥

1. श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में पञ्चाङ्गन्यास के जो प्रयोगवाक्य दिये गये हैं, वे यहाँ के मूलभाग से कुछ भिन्नता रखते हैं। उनमें करन्यास एवं अङ्गन्यास एक साथ निर्दिष्ट हैं, यथा — ‘अङ्गुष्ठयोः गणंजयाय स्वाहा हृदयाय नमः। तर्जन्योः एकदंष्ट्राय हुं फट् शिरसे स्वाहा। मध्यमयोः अचलकर्णिने नमो नमः शिखायै वषट्। अनामिकयोः गजवक्त्राय नमो नमः कवचाय हुम्। कनिष्ठिकयोः महोदराय चण्डाय हुं फट् अस्त्राय फट्।’ इसमें करन्यासगत वाक्यों में करतल करपृष्ठ को और अङ्गन्यासगत वाक्यों में नेत्र को छोड़ दिया गया है। षडङ्गपक्ष में हृदयादि अङ्गों का न्यास अथवा पूजन बीजमन्त्र से करना चाहिये। यथा — ‘गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट्। गैं कुवचाय हुम्। गौं नेत्रत्रयाय वौषट्। गः अस्त्राय फट्।’ इनमें से चार अङ्गों का तो आराध्य देवता के चारों दिशाओं में और नेत्र तथा अस्त्र का मध्यवर्ती स्थान-देवता के अग्रभाग में पूजन करना चाहिये।

2. ‘शारदातिलक’ के नवम पटल में कहा गया है कि आठ मातृकाओं का कमल के आठ दलों में पूजन करे । मातृकाएँ अपने-अपने भैरव अङ्क में विराजती हैं । ‘दीर्घाद्या मातरः प्रोक्ता ह्रस्वाद्या भैरवाः स्मृताः । — अर्थात् दीर्घस्वरों को बीज के रूप में नाम के आदि में लगाकर मातृकाओं की पूजा करनी चाहिये और ह्रस्व अक्षरों को आदि में बीज के रूप में जोड़कर भैरवों का पूजन होना चाहिये ।’ यहाँ ह्रस्व और दीर्घ अक्षर पारिभाषिक लिये गये हैं । इनका परिचय देते हुए राघवभट्ट ने ‘शा० ति० ‘ की ‘पदार्थादेश’ नामक टीका में लिखा है कि ‘अ इ उ ऋ लृ ए ओ अं’ — ये आठ अक्षर ‘ह्रस्व ‘ के नाम से उपयोग में लाये जाते हैं और ‘आ ई ऊ ॠ ॡ ऐ औ अ:’ — ये आठ अक्षर दीर्घ-स्वर के नाम से। इनके प्रयोगवाक्य ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ में इस प्रकार दिये गये हैं — ‘ आं ब्राह्मयै नमः । अं असिताङ्गभैरवाय नमः । ईं माहेश्वर्यै नमः। इं रुरुभैरवाय नमः । ऊं कौमार्यै नमः । उं चण्डभैरवाय नमः । ऋं वैष्टणव्यै नमः । ॠं क्रोधभैरवाय नमः । ॡं वारायै नमः, लृं उन्मत्तभैरवाय नमः। ऐं इन्द्राण्यै नमः । एं कपालिभैरवाय नमः । औँ चामुण्डायै नमः । ओं भीषणभैरवाय नमः । अः महालक्ष्म्यै नमः । अं संहारभैरवाय नमः।’ — इस प्रकार भैरव के अङ्क में स्थित मातृकाओं का प्रदक्षिणक्रम से पूजन करना चाहिये । ‘

3. ‘ श्रीविद्यार्णवतन्त्र’ के २५ वें श्वास में त्रिपुरादेवी के पूजन का क्रम इस प्रकार बताया गया है — प्रातः कृत्य और प्राणायाम करके पीठन्यास करे । अन्यत्र बताये हुए क्रम से आधारशक्ति आदि की अर्चना के पश्चात् हृदयकमल के पूर्वादि केसरों में इच्छा, ज्ञाना, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया और नन्दा का पूजन करे तथा मध्य भाग में मनोन्मनी का । उसके ऊपर ‘ऐं परायै अपरायै परापरायै हसौः सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः । ‘ — इस प्रकार न्यास करके मस्तक पर दक्षिणामूर्ति ऋषि का, मुख में पङ्क्ति छन्द का, हृदय में त्रिपुरभैरवी देवता का, गुह्य में वाग्भव बीज का, चरणों में तार्तीय शक्ति का तथा सर्वाङ्ग में कामराज कीलक का न्यास करे । तत्पश्चात् वाग्भवबीज (हस्रैं नमः) — का नाभि से चरणपर्यन्त, कामबीज (ह सकल रीं नम:) – का हृदय से नाभिपर्यन्त तथा तार्तीय बीज (हस्रौः ) – का सिर से हृदयपर्यन्त न्यास करे। इसी तरह आद्यबीज का दाहिने हाथ में, द्वितीय बीज का बायें हाथ में तथा तृतीय बीज का दोनों हाथों में न्यास करे । इसी क्रम से मस्तक, मूलाधार और हृदय में उक्त तीनों बीजों का न्यास करना चाहिये । दायें कान, बायें कान और चिबुक में भी उक्त तीनों बीजों का क्रमशः न्यास करे। फिर आगे बताये जाने वाले तीन-तीन अङ्गों में क्रमशः तीनों बीजों का न्यास करे। यह ‘नवयोनिन्यास ‘ है । यथा — दायाँ गाल, बायाँ गाल और मुख । दायाँ नेत्र, बायाँ नेत्र और नासिका । दायाँ कंधा, बायाँ कंधा और पेट । दायीं कोहनी, बायीं कोहनी और कुक्षि । दायाँ घुटना, बायाँ घुटना और लिङ्ग । दायाँ पैर, बायाँ पैर तथा गुह्य भाग । दायाँ पार्श्व, बायाँ पार्श्व और हृदय । दायाँ स्तन, बायाँ । स्तन और कण्ठ ।

4. मूलमन्त्र बीजत्रयात्मक है । यथा — हस्रैं नमः । हस कल रीं नमः । हसौः नमः ।

5. अग्निपुराण की छपी प्रतियों में ‘ॐ ह्रीं छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं’ — ऐसा पाठ मिलता है; परंतु अन्य तन्त्रों में ‘छं’ की जगह ‘ऐं’ मिलता है। उद्धारस्थल में ‘वाग्भवं’ कहा गया है, जो ‘ऐं’ का ही वाचक है और अन्त में अग्निवधू (स्वाहा) का ही उल्लेख है; अतः वही रूप लिया गया है।

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