July 17, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 316 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सोलहवाँ अध्याय त्वरिता आदि विविध मन्त्र एवं कुब्जिका विद्याका कथन नानामन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — मुने। पहले ‘हूं’ रखे, फिर ‘खे चच्छे’ — ये तीन पद जोड़कर मन्त्र की शोभा बढ़ावे। तत्पश्चात् ‘क्षः स्त्रीं हूं क्षे’ लिखकर अन्त में ‘फट्’ जोड़ दे। (कुल मिलाकर) ‘हूं खेच च्छे क्षः स्त्रीं ह्रूं क्षे ह्रीं फट्।’ यह दशाक्षरा त्वरिता-विद्या हुई। यह विद्या समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाली तथा विष, सर्पादि का मर्दन करने वाली है। ‘खे च च्छे’ यह त्र्यक्षर विद्या काल (अथवा काले साँप) के डँसे हुए को भी जीवन देने वाली है ॥ १-२ ॥’ ‘ॐ हूं खे क्षः’ — इस चतुरक्षरी विद्या का प्रयोग विष एवं सर्पदंश की पीड़ा को नष्ट करने वाला है। (पाठान्तर ‘विषशत्रुप्रमर्दनः’ के अनुसार उक्त विद्या का प्रयोग विष एवं शत्रु की बाधा को दूर करने वाला है।) ‘स्त्रीं हूं फट्’ — इस विद्या का प्रयोग पाप तथा रोग आदि पर विजय दिलाता है। ‘खे च’ — इस द्वयक्षर मन्त्र का प्रयोग शत्रु एवं दुष्ट आदि की बाधा को दूर करता है। ‘हूं स्त्रीं ॐ’ — इस मन्त्र का प्रयोग स्त्री आदि को वश में करने वाला है। ‘खे स्त्रीं खे’ — इस मन्त्र का प्रयोग कालसर्प द्वारा डँसे गये मनुष्य के जीवन की रक्षा करता है तथा शत्रुओं पर विजय दिलाता है। ‘क्षः स्त्रीं क्षः’ — इसका प्रयोग वशीकरण तथा विजय का साधक है ॥ ३-५ ॥ कुब्जिका-विद्या ‘ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रें हसौः ॐ नमो भगवति हसखफ्रें कुब्जिके हस्रूं हस्रूं अघोरे घोरे अघोरमुखि छ्रां छ्रीं किणि किणि विच्चे हसौः हसखफ्रें श्रीं ह्रीं ऐं’ [^1] — यह श्रीमती कुब्जिका विद्या सब कार्यों को सिद्ध करने वाली मानी गयी है ॥ ६ ॥ अब उन मन्त्रों का वर्णन किया जायगा, जिनका उपदेश भगवान् शंकर ने स्कन्द को दिया था ॥ ७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘त्वरिता आदि नाना मन्त्रों का तथा कुब्जिका विद्या का वर्णन’ नामक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१६ ॥ [^1]: यह मन्त्र अग्निपुराण की विभिन्न पोथियों में विभिन्न रूप से छपा है। कोई भी शुद्ध नहीं है, अतः ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’ (अष्टम श्वास) में जो इसका शुद्ध पाठ मिलता है, वही यहाँ रखा गया है। वहीं इसका विनियोग-वाक्य इस प्रकार दिया गया है — ‘अस्य श्रीकुब्जिका मन्त्रस्य रुद्र ऋषिर्गायत्री छन्दः कुब्जिका देवता हसौः बीजं हसखफ्रें शक्तिः हसूं कीलकम्, श्रीविद्याङ्गत्वेन विनियोगः।’ पूनावाले अग्निपुराण में इस मन्त्र का पाठ यों है — ‘ऐं ह्रीं श्रीं स्फ्र्यै भगवति अम्बिके कुब्जिके स्फ्यै स्फं स्फम् ऊं उं उं रण नमो घोरमुखिच्छां छीं किणि किणि बिच्छू स्फों ह्में श्रीं ह्रीम् ऐं।’ यही मन्त्र बहुल पाठान्तर के साथ चौखम्बा वाले संस्करण में भी है। दोनों जगह का पाठ अशुद्ध ही है। पिछले १४३, १४४ अध्यायों में भी कुब्जिका का प्रसङ्ग द्रष्टव्य है। Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe