July 17, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 319 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय वागीश्वरी की पूजा एवं मन्त्र आदि वागीश्वरीपूजा भगवान् शिव कहते हैं — स्कन्द! अब मैं मण्डलसहित ‘वागीश्वरी-पूजन’ की विधि बता रहा हूँ। ऊहक (ऊ) को काल (घ) — से संयुक्त करके उसका चन्द्रमा (अनुस्वार) से योग करें तो वह एकाक्षर मन्त्र बनेगा (घूं)। निषादपर ईश्वर (ई) – का योग करके उसे बिन्दु-विसर्ग से समन्वित करे। इस एकाक्षर मन्त्र का उपदेश सबको नहीं देना चाहिये। वागीश्वरीदेवी का ध्यान इस प्रकार करे —’देवी की अङ्गकान्ति कुन्दकुसुम तथा चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है। वे पचास वर्णों का मालामय रूप धारण करती हैं। मुक्ता की माला तथा श्वेतपुष्प के हारों से सुशोभित हैं। उनके चार हाथों में क्रमशः वरद, अभय, अक्षमाला तथा पुस्तक शोभा पाते हैं। वे तीन नेत्रों से युक्त हैं।’ इस प्रकार ध्यान करके उक्त एकाक्षर-मन्त्र का एक लाख जप करे। ‘देवी पैरों से लेकर मस्तकपर्यन्त अथवा कंधों तक ककार से लेकर क्षकार तक की वर्णमाला धारण करती हैं’ इस प्रकार उनके स्वरूपका स्मरण करे ॥ १-४ ॥’ गुरु दीक्षा देने या मन्त्रोपदेश करने के लिये एक मण्डल बनाये। वह सूर्याग्र हो और इन्दु से विभक्त हो। दो भागों में कमल बनाये। वह कमल साधक के लिये हितकर होता है। फिर वीथी और पाया बनाये। चार पदों में आठ कमल बनाये। उनके बाह्यभाग में वीथी और पदिका का निर्माण करे। दो-दो पदों द्वारा प्रत्येक दिशा में द्वार बनाये। इसी तरह उपद्वारों का भी निर्माण करे। कोणों में दो-दो पट्टिकाएँ निर्मित करे। अब नौ कमल (वर्णाब्ज तथा दिशाओं से सम्बद्ध कमल) श्वेतवर्ण के रखे। कर्णिका पर सोने के रंग का चूर्ण गिराकर उसे पीली कर दे। केसरों को अनेक रंगों से रंगकर कोणों को लाल रंग से भरे। व्योम रेखान्तर काला रखे द्वारों का मान इन्द्र के हाथी के मान के अनुसार रखे। मध्यकमल में सरस्वती को, पूर्वगत कमल में वागीशी को, फिर अग्नि आदि कोणों के क्रम से हल्लेखा, चित्रवागीशी, गायत्री, विश्वरूपा, शाङ्करी, मति और धृति को स्थापित करके उन सबका पूजन करे। नाम के आदि में ‘ह्रीं’ तथा नाम के आदि अक्षर को बीज- रूपों में बोलकर पूजा करनी चाहिये। यथा — पूर्व में ‘ह्रीं वां वागीश्यै नमः’ इत्यादि। सरस्वती ही वागीश्वरी के रूप में ध्येय हैं। जप पूरा करके कपिला गाय के घी से हवन करे। ऐसा करने वाला साधक संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं में काव्य- रचना करने वाला कवि होता है और काव्यशास्त्र आदि का विद्वान् हो जाता है ॥ ५-११ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘वागीश्वरी पूजा’ नामक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe