अग्निपुराण – अध्याय 331
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय
उत्कृति आदि छन्द, गण छन्द और मात्रा-छन्दों का निरूपण
छन्दोजातिनिरूपणम्

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरों का ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेद में — ‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्द में से चार-चार घटाते जायें तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं — सौ अक्षरों की ‘अभिकृति’ 1 , छानबे अक्षरों की ‘संस्कृति’ 2 , बानबे अक्षरों की ‘विकृति’ 3 , अठासी अक्षरों की ‘आकृति’ 4 , चौरासी अक्षरों की ‘प्रकृति’ 5 , अस्सी अक्षरों की ‘कृति’ 6 , छिहत्तर अक्षरों की ‘अधिकृति’ 7 , बहत्तर अक्षरों की ‘धृति’ 8 , अड़सठ अक्षरों की ‘अत्यष्टि’ 9 , चौसठ अक्षरों की ‘अष्टि’ 10 , साठ अक्षरों की ‘अतिशक्करी’ 11 , छप्पन अक्षरों की ‘शक्करी’ 12 , बावन अक्षरों की ‘अतिजगती’ 13  तथा अड़तालीस अक्षरों की ‘जगती’ 14  होती है। यहाँ तक केवल वैदिक छन्द हैं। यहाँ से आगे लौकिक छन्द का अधिकार है। ‘गायत्री ‘से लेकर ‘त्रिष्टुप्’ तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दों में गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं — त्रिष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् और गायत्री। गायत्री छन्द में क्रमशः एक-एक अक्षर की कमी होने पर ‘सुप्रतिष्ठा’, ‘प्रतिष्ठा’, ‘मध्या’, ‘अत्युक्तात्युक्त’ तथा ‘आदि’ नामक छन्द होते है ॥ १-४ ॥’

छन्द के चौथाई भाग को ‘पाद’ या ‘चरण’ कहते हैं। [छन्द तीन प्रकार के हैं — गणच्छन्द, मात्रा-छन्द और अक्षरच्छन्द]। पहले ‘गणच्छन्द’ दिखलाया जाता है। चार लघु अक्षरों की ‘गण’ संज्ञा होती है। [‘आर्या’ के लक्षणों की सिद्धि ही इस संज्ञा का प्रयोजन है।] ये गण पाँच हैं। कहीं आदि गुरु (ऽ।।), कहीं मध्य गुरु (।ऽ।), कहीं अन्त्य गुरु (।।ऽ), कहीं सर्वगुरु (ऽऽ) और कहीं चारों अक्षर लघु (।। ।।) होते हैं। [एक ‘गुरु’ दो ‘लघु’ अक्षरों के बराबर होता है; अतः जहाँ सब लघु हैं, वहाँ चार अक्षर तथा जहाँ सब गुरु हैं, वहाँ दो अक्षर दिखाये गये हैं।] अब ‘आर्या’ का लक्षण बताया जाता है। साढ़े सात गणों की, अर्थात् तीस मात्राओं या तीस लघु अक्षरों की आधी ‘आर्या’ होती है। [आर्या में गुरुवर्ण को दो मात्रा या दो लघु मानकर गिनना चाहिये।] ‘आर्या’ छन्द के विषय गणों में जगण (।ऽ।) —का प्रयोग नहीं होता 15 । किंतु छठा गण अवश्य जगण (।ऽ।) होना चाहिये।16  अथवा वह नगण और लघु यानी सब-का-सब लघु भी हो सकता है। जब छठा गण सब-का-सब लघु हो तो उस गण के द्वितीय अक्षर से सुबन्त या तिडन्तलक्षण पदसंज्ञा की प्रवृत्ति होती है।17  यदि छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) हो और सातवाँ गण भी सर्वलघु ही हो, तो सातवें गण के प्रथम अक्षर से ‘पद’ संज्ञा की प्रवृत्ति होती है।18  इसी प्रकार जब आर्या के उत्तरार्ध-भाग में पाँचवाँ गण सर्वलघु हो तो उसके प्रथम अक्षर से ही पद का आरम्भ होता है।19  आर्या के उत्तरार्ध भाग में छठा गण एकमात्र लघु अक्षर का (।) होता है।20  जिस आर्याक पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में तीन-तीन गणों के बाद पहले पाद का विराम होता है, उसे ‘पथ्या’ माना गया है।21  ॥ ५-८ ॥

जिस आर्या के पूर्वार्ध में या उत्तरार्ध में अथवा दोनों में तीन गणों पर पादविराम नहीं होता, उसका नाम ‘विपुला’ होता है। [इस प्रकार इसके तीन भेद होते हैं — १-आदिविपुला, २- अन्त्यविपुला तथा ३-उभयविपुला। इनमें पहली का नाम ‘मुख-विपुला’ दूसरी का ‘जघनविपुला’ तथा तीसरी का ‘महाविपुला’ है। इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं —
१- स्निग्धच्छायालावण्यलेपिनी किंचिदवनतवीणा ।
मुखविपुला सौभाग्यं लभते स्त्रीत्याह माण्डव्यः ॥
२- चित्तं हरन्ति हरिणीदीर्घदृशः कामिनां कलालापैः ।
नीवीविमोचनव्याजकथितजधना जघनविपुला ॥
३- या स्त्री कुचकलशनितम्बमण्डले जायते महाविपुला।
गम्भीरनाभिरतिदीर्घलोचना भवति सा सुभगा ॥
पहले पद्ममें पूर्वार्ध में, दूसरे में उत्तरार्ध में तथा तीसरे में दोनों जगह पाद-विराम तीन गणों से आगे होता है।22  जिस आर्या-छन्द में द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरों के बीच में होने के साथ ही जगण अर्थात् मध्यगुरु (।ऽ।) हों, उसका नाम ‘चपला’ है। तात्पर्य यह है कि ‘चपला’ नामक आर्या में प्रथम गण अन्त्यगुरु (।।ऽ), तृतीय गण दो गुरु (ऽऽ) तथा पञ्चम गण आदिगुरु (ऽ।।) होता है। शेष गण पूर्ववत् रहते हैं। पूर्वार्ध में ‘चपला ‘का लक्षण हो तो उस आर्या का नाम ‘मुखचपला’ 23  होता है। परार्ध में चपला का लक्षण होने पर उसे ‘जघनचपला’ 24  कहते हैं। पूर्वार्ध और परार्ध — दोनों में चपला का लक्षण संघटित होता हो तो उस का नाम ‘महाचपला’ 25  है। जहाँ आर्या के पूर्वार्ध के समान ही उत्तरार्ध भी हो, उसे ‘गीति’ 26  नाम दिया गया है। तात्पर्य यह कि उसके उत्तरार्ध में भी छठा गण मध्यगुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ आर्या के उत्तरार्ध के समान ही पूर्वार्ध भी हो, उसे ‘उपगीति 27 कहते हैं। आर्या के पूर्वोक्त क्रम को विपरीत कर देने पर ‘उद्‌गीति’ 28  नाम पड़ता है। सारांश यह कि उसमें पूर्वार्ध को उत्तरार्ध में और उत्तरार्ध को पूर्वार्ध में रखा जाता है। यदि पूर्वार्ध में आठ गण हों तो ‘आर्यागीति’ 29  नामक छन्द होता है। कोई विशेषता न होने से इसका उत्तरार्ध भी ऐसा ही समझना चाहिये। यहाँ भी छठे गण में मध्यगुरु और सर्वलघु — इन दोनों विकल्पों की प्राप्ति थी, उसके स्थान में केवल एक ‘लघु’ का विधान है ॥ ९-१०३/४

अब ‘मात्रा-छन्द’ बतलाया जाता है। जहाँ विषम, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण में चौदह लघु (मात्राएँ) हों और सम-द्वितीय, चतुर्थ चरणों में सोलह लघु हों तथा इनमें से प्रत्येक चरण के अन्त में रगण (ऽ।ऽ), एक लघु और एक गुरु हो तो ‘वैतालीय’ 30  नामक छन्द होता है। [रगण, लघु और गुरु मिलाकर आठ मात्राएँ होती हैं, इनके सिवा प्रथम-तृतीय पादों में छः-छः मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ चरणों में आठ-आठ मात्राएँ ही शेष रहती हैं। इन्हें जोड़कर ही चौदह-सोलह मात्राओं की व्यवस्था की गयी है। वैतालीय छन्द के अन्त में एक गुरु और बढ़ जाय तो उसका नाम ‘औपच्छन्दसक’ 31  होता है ॥ ११-१२ ॥

पूर्वोक्त वैतालीय छन्द के प्रत्येक चरण के अन्त में जो रगण, लघु और गुरु की व्यवस्था की गयी है, उसकी जगह यदि भगण और दो गुरु हो जायें तो उस छन्द का नाम ‘आपातलिका’ 32  होता है। उपर्युक्त वैतालीय छन्द के अधिकारों में जो रगण आदि के द्वारा प्रत्येक चरण के अन्त में आठ लकारों (मात्राओं) का नियम किया गया है, उनको छोड़कर प्रत्येक चरण में जो ‘लकार’ शेष रहते हैं, उनमें से सम लकार विषम लकार के साथ मिल नहीं सकता। अर्थात् दूसरा तीसरे के और चौथा पाँचवें के साथ संयुक्त नहीं हो सकता; उसे पृथक् ही रखना चाहिये। इससे विषम लकारों का सम लकारों के साथ मेल अनुमोदित होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरणों में लगातार छः लकार पृथक् पृथक् नहीं प्रयुक्त होने चाहिये। प्रथम और तृतीय चरणों में रुचि के अनुसार किया जा सकता है।33  अब ‘प्राच्यवृत्ति’ नामक वैतालीय छन्द का दिग्दर्शन कराया जाता है। जब दूसरे और चौथे चरण में चतुर्थ लकार (मात्रा) पञ्चम लकार के साथ संयुक्त हो तो उसका नाम ‘प्राच्यवृत्ति’ 34  होता है। [यद्यपि सम लकार का विषम लकार के साथ मिलना निषिद्ध किया गया है, तथापि वह सामान्य नियम है; प्राच्यवृत्ति आदि विशेष स्थलों में उस नियम का अपवाद होता है।] शेष लकार पूर्वोक्त प्रकार से ही रहेंगे। जब प्रथम और तृतीय चरण में दूसरा लकार तीसरे के साथ मिश्रित होता है, तब ‘उदीच्यवृत्ति’ 35  नामक वैतालीय कहलाता है। शेष लकार पूर्वोक्त रूप में ही रहते हैं। जब दोनों लक्षणों की एक साथ ही प्रवृत्ति हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादों में पञ्चम लकार के साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणों में तृतीय के साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो ‘प्रवृत्तिक’ 36  नामक छन्द होता है।

जिस वैतालीय छन्द के चारों चरण विषम पादों के ही अनुसार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारों से युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीय से मिला हो, उसे ‘चारुहासिनी’ 37  कहते हैं। जब चारों चरण सम पादों के लक्षण से युक्त हों अर्थात् सबमें सोलह लकार (मात्राएँ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चम से मिला हो तो उसका नाम ‘अपरान्तिका’ 38  है। जिसके प्रत्येक पाद में सोलह लकार हों, किंतु पाद के अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे ‘मात्रासमक’ 39  नामक छन्द कहा गया है। साथ ही इस छन्द में नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस ‘मात्रासमक ‘के चरण में बारहवाँ लकार अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम ‘वानवासिका 40  है। जिसके चारों चरणों में पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूप में ही स्थित रहता है, उसका नाम ‘विश्लोक’ 41  है। जहाँ नवाँ भी लघु हो, वह ‘चित्रा’ 42  नामक छन्द कहलाता है। जहाँ नवाँ लकार दसवें के साथ मिलकर गुरु हो गया हो, वहाँ ‘उपचित्रा’ 43  नामक छन्द होता है। मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा और उपचित्रा — इन पाँचों में जिस किसी भी छन्द के एक-एक पाद को लेकर जब चार चरणों का छन्द बनाया जाय, तब उसे ‘पादाकुवक’ 44  कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरण में सोलह लघु स्वरूप से ही स्थित हों, किसी से मिलकर गुरु न हो गये हों, उस छन्द का नाम ‘गीत्यार्या’ 45  है। इसी गीत्यार्या में जब आधे भाग को सभी मात्राएँ गुरुरू पमें हों और आधे भाग की मात्राएँ लघुरूप में तो उसका नाम ‘शिखा’ 46  होता है।

इसी के दो भेद हैं — पूर्वार्धभाग में लघु-ही-लघु और उत्तरार्ध में गुरु-ही-गुरु हों तो उसका नाम ‘ज्योति 47  बताया गया है। इसके विपरीत पूर्वार्धभाग में सब गुरु और उत्तरार्ध में सब लघु हों तो ‘सौम्या’ 48  नामक छन्द होता है। जब पूर्वार्धभाग में उन्तीस लकार और उत्तरार्ध में इकतीस लकार हों एवं अन्तिम दो लकारों के स्थान में एक-एक गुरु हो तो उसका नाम ‘चूलिका’ 49  होता है। छन्द की मात्राओं से उसके अक्षरों में जितनी कमी हो, उतनी गुरु की संख्या और अक्षरों से जितनी कमी गुरु की संख्या में हो, उतनी लघु की संख्या मानी गयी है। तात्पर्य यह है 50  कि यदि कोई पूछे, इस आर्या में कितने लघु और कितने गुरु हैं तो उस आर्या को लिखकर उसकी सभी मात्राओं की गणना करके कहीं लिख ले फिर अक्षरों की संख्या लिख ले। मात्रा के अङ्कॉ में से अक्षरों के अङ्क घटा दे; जितना बचे, वह गुरु की संख्या हुई। इसी प्रकार अक्षरसंख्या में गुरु की संख्या घटा देने पर जो बचे, वह लघु अक्षरों की संख्या होगी। इस प्रकार वर्ण आदि के अन्तर से गुरु-लघु आदि का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १३-१८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘छन्दोजाति का निरूपण’ नामक तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३१ ॥

1. ‘अभिकृति’ आदि छन्दों के उदाहरण का प्रतीकमात्र यहाँ दिया जाता है, विशेष जानकारी के लिये वेदों में अनुसंधान करना चाहिये। यजुर्वेदे — ‘देवो अग्निः स्विष्टकृत् देवान्यक्षत्’ इत्यादि (२१।५८) ।
2. यजुर्वेदे — ‘देवो अग्निः स्विष्टकृत्, सुद्रविणामन्नः कविः’ इत्यादि।
3. ‘इमे सोमाः सुरामाणाम्’ इत्यादि ।
4. ‘भगा अनुप्रयुक्तामिन्द्रो यातु पुरोगवः’ इत्यादि ।
5. प्रकृतेरुदाहरणम् — ‘सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च’ इत्यादि प्रातराचमनमन्त्रः ।
6. यजुर्वेदे — ‘सुपर्णोऽसि गरुत्मोंस्त्रिः सत्रिवृत्ते शिरो गायत्रम्’ इत्यादि (१७।७२) ।
7. ऋग्वेदे — ‘स हि शर्धो न मारुतं तु विष्वणि’ इत्यादि (१।१२७।६)।
8. ऋग्वेदे — ‘अवमह इन्द्र दादृहि श्रुधि नः शुशोच हि द्यौः०’ इत्यादि (१।१३३।६) ।
9. ऋग्वेदे —- ‘अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिः०’ इत्यादि (१।१३६।२) ।
10. ऋग्वेदे — ‘त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तु विशुष्म’ इत्यादि (२।२२।१) ।
11. ऋग्वेदे —- ‘साकं जातः क्रतुना साकभोजसा ववक्षिथ०’ इत्यादि (२।२२।३) ।
12. ऋग्वेदे —- ‘प्रीस्वस्मै पुरोरथं, इन्द्राय शषमर्चत्०’ इत्यादि ।
13. मन्त्रब्राह्मणे —- ‘मा ते गृहेषु निशि घोष उत्था०’ इत्यादि ।
14. सामवेदे — ‘इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया ।
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसदि, अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥’ (६६)
15. उदाहरण —
द्वीप दन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात् ।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः ॥
16. सा जयति जगत्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णुरतिरुचिरा ।
यादृश्यत गगनतले कंसवधोत्पातविद्युदिव ॥
17. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः ।
पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः ॥
यहाँ ‘मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षर से पद का आरम्भ है।
18. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः प्रलीनसामन्तचक्रनुतचरणः ।
सकलसुकृतैकपुञ्जः श्रीमान् मुञ्जश्चिरं जयति ॥
जयति भुवनैकवीरः सीरायुधतुलितविपुलबलविभवः ।
अनवरतवित्तवितरणनिर्जितचम्पाधिपो मुञ्जः ॥
19.20. स जयति वाक्पतिराजः सकलार्थिमनोरथैककल्पतुरुः ।
प्रत्यर्थिभूतपार्थिवलक्ष्मीहठहरणदुर्ललितः ॥
21. पथ्याशी व्यायामी स्त्रीषु जितात्मा नरो न रोगी स्यात् ।
यदि वचसा मनसा वा दुह्यति नित्यं न भूतेभ्यः ॥
22. ‘पथ्या’ और ‘विपुला’ में सहानवस्थारूप विरोध है; अतः ये दोनों छन्द एक साथ नहीं रह सकते। यदि एक अंश में भी ‘विपुला’ का लक्षण संघटित हुआ तो उसका पथ्यात्व नष्ट हो जाता है; क्योंकि ‘विपुला’ छन्द उभयाश्रय है; वह पूर्वार्ध में, उत्तरार्ध में तथा दोनों में भी रह सकता है। अब ‘विपुला’ का जहाँ अंश भी हो, वहाँ ‘पथ्या’ का प्रवेश नहीं हो सकता। ‘पथ्या’ छन्द एक अंश से भी विकल हो जाय तो वहीं ‘विपुला’ का विषय होता है; अतः वहाँ ‘विपुला’ की प्राप्ति अनिवार्य है। ‘पथ्या’ और ‘चपला’ में कोई विरोध नहीं है; अतः इनमें बाध्य बाधकभाव नहीं होता। इस विषय का संक्षिप्त संग्रह नीचे लिखे श्लोकों में है —
एकैव भवति पथ्या विपुलास्तिस्रस्ततश्चतस्रस्ताः ।
चपलाभेदैस्त्रिभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥
गीतिच्चतुष्टयमित्थं प्रत्येकं षोडशप्रकारं स्यात् ।
साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः ॥
‘एक ‘पथ्या’, तीन ‘विपुला’, कुल चार भेद हुए। इनमें से प्रत्येक छन्द ‘चपला ‘के तीन भेदों से भिन्न होकर बाहर प्रकार का होता है। बारह ये और चार पहले के — यों सोलह हुए। इन सोलहों के ‘गीति’ आदि चार भेदों द्वारा भेद होने से चौंसठ भेद होते हैं। पहले के सोलह और चौंसठ — कुल अस्सी हुए। इस प्रकार ‘आर्या ‘के अस्सी भेद हैं।’
23. पध्यापूर्वक मुखचपला का उदाहरण —
अतिदारुणा द्विजिह्वा परस्य रन्ध्रानुसारिणी कुटिला । दूरात्परिहरणीया नारी नागीव मुखचपला ॥
आदिविपुलापूर्वक मुखचपला का उदाहरण —
यस्याश्च लोचने पिङ्गले भ्रुवौ संगते मुखं दीर्घम् । विपुलोन्नताश्च दन्ताः कान्तासौ भवति मुखचपला ॥
उभयविपुलापूर्वक मुख-चपला का उदाहरण —
विपुलाभिजातवंशोद्भवापि रूपातिरेकरम्यापि । निस्सार्यते गृहाद् वल्लभापि यदि भवति मुखचपला ॥
24. पथ्यापूर्वक जघनचपला का उदाहरण —
यत्पादस्य कनिष्ठा न स्पृशति महीमनामिका वाप । सा सर्वधूर्तभोग्या भवेदवश्यं जघनचपला ॥
अन्त्यविपुलापूर्वक जघनचपला का उदाहरण —
यस्याः पादाङ्गुष्ठं व्यतीत्य याति प्रदेशिनी दीर्घा । विपुले कुले प्रसूतापि सा ध्रुवं जघनचपला स्यात् ॥
महाविपुलापूर्वक जघनचपला का उदाहरण —
मकरध्वजद्मनि दृश्यते स्फुटं तिलकलाञ्छनं यस्याः । विपुलान्वयाभिजातापि जायते जघनचपलासौ ॥
25. पथ्यापूर्वक महाचपला का उदाहरण —
हृदयं हरन्ति नार्यो मुनेरपि भ्रूकटाक्षविक्षेपैः। दोर्मूलनाभिदेशं निदर्शयन्त्यो महाचपलाः ॥
विपुलापूर्वक महाचपला का उदाहरण —
चिबुके कपोलदेशेऽपि कूपिका दृश्यते स्मिते यस्याः । विपुलान्वयप्रसूतापि जायते सा महाचपला ॥
26. पथ्या-गीतिका उदाहरण —
मधुरं वीणारणितं पञ्चमसुभगश्च कोकिलालापः । गीतिः पौरवधूनामधुना कुसुमायुधं प्रबोधयति ॥
आदिविपुला-गीति —
इयमपरा विपुला गीतिरुच्यते सर्वलोकहितहेतोः । यदनिष्टमात्मनस्तत्परेषु भवतापि मा क्वचित् कारि ॥
पथ्या महाचपला-गीतिका उदाहरण —
कामं चकास्ति गीतिर्मृगीदृशां सीधुपानचपलानाम् । मुखं च मुक्तलज्जं निरर्गलोल्लापमणितरमणीयम् ॥
महाविपुला – महाचपला-गीतिका उदाहरण —
पञ्चेषुवल्लभः पञ्चमध्वनिस्तत्र भवति यदि विपुलः । चपलं करोति कामाकुलं मनः कामिनामसौ गीतिः ॥
27. पथ्योपगीतिका उदाहरण —
गान्धर्वं मकरध्वजदेवस्यास्त्रं जगद्विजयि । इति समवेक्ष्य मुमुक्षुभिरुपगीतिस्त्यज्यते देशः ॥
महाविपुलोपगीतिका उदाहरण —
विपुलोपगीतिझंकारमुखरिते भ्रमरमालानाम् । रैवतकोपवने वस्तुमस्तु सततं मम प्रीतिः ॥
पथ्या-महाचपलोपगीतिका उदाहरण —
विषयामिषाभिलाषः करोति चित्तं सदा चपलम् । वैराग्यभावनानां तथोपगीत्या भवेत् स्वस्थम् ॥
महाविपुला महाचपलोपगीतिका उदाहरण —
विपुलोपगीति संत्यज्यतामिदं स्थानकं भिक्षो । विषयाभिलाषदोषेण बाध्यते चञ्चलं चेतः ॥
28. पथ्योद्गीतिका उदाहरण —
व्याध इवोद्गीतिरवैः प्रथमं तावन्मनो हरसि । दुर्नयकर विश्राम्यसि पश्चात् प्राणेषु विप्रियैः शल्यैः ॥
महाविपुलोद्गीतिका उदाहरण —
एषा तवापरोद्गीतिरत्र विपुला परिभ्रमति । तद्वल्लभापि यत्कीर्तिरखिलदिक्पालपार्श्वमुपयाति ॥
पथ्यामहाचपलोद्गीतिका उदाहरण —
उद्गीतिरत्र नित्यं प्रवर्तते कामचपलानाम् । तस्मान्मुने विमुञ्च प्रदेशमेतं समेतमेताभिः ॥
महाविपुला महाचपलोद्गीतिका उदाहरण –
विपुला पयोधर श्रोणिमण्डले चक्षुषोश्चपला । उद्गीतिशालिनी कामिनी च सा बर्णिनां मनो हरति ॥
29. पथ्या आर्यागीतिका उदाहरण —
अजमजरममरमेकं प्रत्यक्चैतन्यमीश्वरं ब्रह्म परम् । आत्मानं भावयती भवमुक्तिः स्यादितीयमार्यागीतिः ॥
महाविपुला आर्यागीतिका उदाहरण —
विपुलाभिलाषमृगतृष्णिका ध्रुवं हन्ति हरिणमिव हतहृदयम् । विपुलात्ममोक्षसुखकाङ्क्षिभिस्ततस्त्यज्यते विषयरससङ्गः ॥
पथ्या जघनचपलार्यागीतिका उदाहरण —
वाताहतोर्मिमालाचपलं सम्प्रेक्ष्य विषयसुखमल्पतरम् । मुक्त्वा समस्तसङ्गं तपोवनान्याश्रयन्ति तेनात्मविदः ॥
महाविपुला महाचपला आर्यागीतिका उदाहरण —
चपलानि चक्षुरादीनि चित्तहारी च हन्त हतविषयगणः । एकान्तशीलिनां योगिनामतो भवति परमसुखसम्प्राप्तिः ॥
30. वैतालीय छन्द के विभिन्न उदाहरण —
(क) क्षुत्क्षीणशरीरसंचया व्यक्तीभूतशिरोऽस्थिपञ्जराः । केशैः परुषैस्तवारयो वैतालीयतनुं वितन्वते ॥
(ख) तव तन्वि कटाक्षवीक्षितैः प्रसरद्भिः श्रवणान्तगोचरैः । विशिखैरिव तीक्ष्णकोटिभिः प्रहतः प्राणिति दुष्करं नरः ॥
(ग) शवशोणितपङ्कचर्चितं पुरुषान्त्रग्रथितोर्ध्वमूर्धजम् । वपुरातपवह्निदीपितं वैतालीयमिदं विलोक्यताम् ॥
31. औपच्छन्दसकका उदाहरण —-
वाक्यैर्मधुरैः प्रतार्य पूर्वं यः पश्चादभि संदधाति मित्रम् । तं दुष्टमतिं विशिष्टगोष्ठ्यामौपच्छन्दसकं वदन्ति बाह्यम् ॥
32. आपातलिकाका उदाहरण —
पिङ्गलकेशी कपिलाक्षी वाचाटा विकटोन्नतदन्ती । आपातलिका पुनरेषा नृपतिकुलेऽपि न भाग्यमुपैति ॥
33. वैतालीय छन्द में इसका उदाहरण —
समरशिरसि सह्यते द्विषां नवनिशितायुधवृष्टिरग्रतः । कुवलयदलदीर्घचक्षुषां प्रमदानां न कटाक्षवीक्षितम् ॥
औपच्छन्दसक में —
परयुवतिषु पुत्रभावमादौ कृत्वा प्रार्थयते पुनः पतित्वम् । इदमपरमिहोच्यते विशेषादौपच्छन्दसकं खलस्य वृत्तम् ॥
आपातलिका में —
अभिरमयति किंनरकण्ठी हंसगतिः श्रवणायतनेत्रा । विशदकमलकोमलगात्री युवतिरियं हृदयं तरुणानाम् ॥
34. प्राच्यवृत्ति का उदाहरण —
विपुलार्थसुवाचकाक्षराः कस्य नाम न हरन्ति मानसम् । रसभावविशेषपेशलाः प्राच्यवृत्तिकविकाव्यसम्पदः ॥
35. उदीच्यवृत्ति का उदाहरण —
अवाचकमनूर्जिताक्षरं श्रुतिदुष्टं यतिकष्टमक्रमम् । प्रसादरहितं च नेष्यते कविभिः काव्यमुदीच्यवृत्तिभिः ॥
36. . इदं भरतवंशभूभृतां श्रयतां श्रुतिमनोरसायनम् । पवित्रमधिकं शुभोदयं व्यासवक्त्रकथितं प्रवृत्तकम् ॥
37. मनाक्प्रसृतदन्तदीधिति: स्मरोल्लसितगण्डमण्डला । कटाक्षललिता तु कामिनी मनो हरति चारुहासिनी ॥
38. स्थिरविलासनतमौक्तिकावली कमलकोमलाङ्गी मृगेक्षणा । हरति कस्य हृदयं न कामिनः सुरतकेलिकुशलापरान्तिका ॥
39. अश्मश्रुमुखो विरलैर्दन्तैर्गम्भीराक्षो मितनासाग्रः । निर्मांसहनुः स्फुटितैः केशैर्मात्रासमकं लभते दुःखम् ॥
40. मन्मथचापध्वनिरमणीयः सुरतमहोत्सवपटहनिनादः । वनवासस्त्रीस्वनितविशेषः कस्य न चित्तं रमयति पुंसः ॥
41. भ्रातर्गुणरहितं विश्लोकं दुर्नयचरणकदर्थितलोकम् । जातं महितकुलेऽप्यविनीतं मित्रं परिहर साधुविगीतम् ॥
42. यदि वाञ्छसि परपदमारोढुं मैत्रीं परिहर सह वनिताभिः । मुह्यति मुनिरपि विषयासङ्गाच्चित्रा भवति हि मनसो वृत्तिः ॥
43. यच्चित्तं गुरुसत्तमुदारं विद्याभ्यासमहाव्यसनं च । पृथ्वी तस्य गुणैरुपचित्रा चन्द्रमरीचिनिभैर्भवतीयम् ॥
44. अलिवाचालितविकसितचूते काले मदनसमागमदूते । स्मृत्वा कान्तां परिहृतसार्थः पादाकुलकं धावति पान्थः ॥ (इसमें मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका और उपचित्रा के चरण हैं ।)
45. मदकलखगकुलकलरवमुखरिणि विकसितसरसिजपरिमलसुरभिणि । गिरिवरपरिसरसरसि महति खलु रतिरतिशयमिह मम हृदि विलसति ॥
46. यदि सुखमनुपममपरमभिलषसि परिहर युवतिषु रतिमतिशयमिह । आत्मज्योतिर्योगाभ्यासाद् दृष्ट्वा दुःखच्छेदं कुर्या: ॥
47. सौम्यां दृष्टिं देहि स्नेहाद् देहेऽस्माकं मानं मुक्त्वा । शशधरमुखि सुखमुपनय मम हृदि मनसिजरुजमपहर लघुतरमिह ॥
48. रतिकरमलयमरुति शुभशशभृति समभिहतहिममहसि मधुसमये । प्रवससि पथिक विरहितं कथमिह तु परिहृतयुवतिरतिचपलतया ॥
49. ‘ एकोनत्रिंशदन्ते’ इत्यादि की व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है — इकतीस मात्राएँ एवं अन्त में गुरु होने से ‘चूलिका’ का आधा भाग सम्पन्न होता है। इस प्रकार इसके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनों में ही इकतीस – इकतीस मात्राएँ होती हैं तथा अन्तिम दो मात्राएँ गुरु के रूप में रहती हैं। इस छन्द में पाद की व्यवस्था नहीं है। इसका उदाहरण इस प्रकार है —
घनपरिमलमिलदलिकुलमुखरितनिखिलकमलवनमलयजवने
जनयति मनसि मम तु शशिमुखि मुदमतिशयितमिह मधुररयमधुना ॥
50. उदाहरणार्थ यह ‘आर्या’ छन्द प्रस्तुत है —
स्तनयुगलमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाः । चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम् ॥
इसमें मात्रासंख्या ५७ है, इसमें से अक्षरसंख्या चालीस घटी, शेष बचा १७ । इतने गुरुवर्ण हैं । अक्षरसंख्या ४० में १७ गुरुसंख्या घटा दी गयी । शेष २३ लघुसंख्या है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये ।

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