July 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 334 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय समवृत्त का वर्णन समवृत्तनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — ‘यति’ नाम है विच्छेद या विराम का। [ पाद के अन्त में श्लोकार्थ पूरा होने पर तथा कहीं-कहीं पाद के मध्य में भी ‘यति’ होती है। जिसके प्रत्येक चरण में क्रमशः तगण और यगण हों, उसका नाम ‘तनुमध्या’ 1 है। [यह गायत्री छन्द का वृत्त है। जिसके प्रत्येक चरण में जगण, सगण और एक गुरु हो, उसे ‘कुमारललिता’ 2 कहते हैं। [यह उष्णिक् छन्द का वृत्त है। इसमें तीन, चार अक्षरों पर विराम होता है।] दो भगण और दो गुरु से जिसके चरण बनते हों, वह ‘चित्रपदा’ 3 है। [यह अनुष्टुप् छन्द का वृत्त है, इसमें पादान्त में ही यति होती है। जिसके प्रत्येक पाद में दो मगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘विद्युन्माला 4 है। [इसमें चार-चार अक्षरों पर विराम होता है। यह भी अनुष्टुप् का ही वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरण में भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु हो, उसको ‘माणवकाक्रीडितक 5 कहते हैं। [इसमें भी चार-चार अक्षरों पर विराम होता है।] जिसके प्रति चरण में रगण, नगण और सगण हो, वह ‘हलमुखी’ 6 नामक छन्द है। [इसमें तीन, पाँच, छः अक्षरों पर विराम होता है, यह बृहती छन्द का वृत्त है।] ॥ १-२ ॥’ जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और एक मगण हो, वह ‘भुजङ्गशिशुभृता’ 7 नामक छन्द है। [इसमें सात और दो अक्षरोंपर विराम है। यह भी बृहती में ही है।] मगण, नगण और दो गुरु से युक्त पादवाले छन्द को ‘हंसरुत’ 8 कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरण में मगण, सगण, जगण और एक गुरु हों, वह ‘शुद्धविराट्’ 9 नामक छन्द कहा गया है। [यहाँ से इन्द्रवज्रा के पहले तक के छन्द पड्डि छन्द के अन्तर्गत हैं; इसमें पादान्त में विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, यगण और एक गुरु हों, वह ‘पणव’ 10 नामक छन्द है। [इसमें पाँच-पाँच पर विराम होता है। रगण, जगण, रगण और एक गुरुयुक्त चरण वाले छन्द का नाम ‘मयूरसारिणी’ 11 है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। मगण, भगण, सगण और एक गुरुयुक्त चरणवाला छन्द ‘मत्ता’ 12 कहलाता है। [इसमें चार-छः पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पाद में तगण, दो जगण और एक गुरु हो, उसका नाम ‘उपस्थिता’ 13 है। [इसमें दो-आठ पर विराम होता है। भगण, मगण, सगण और एक गुरु से युक्त पादवाला छन्द ‘रुक्मवती’ 14 कहलाता है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों उसका नाम ‘इन्द्रवज्रा’ 15 है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। यहाँ से ‘वंशस्थ के पहले तक के छन्द बृहती के अन्तर्गत हैं।] जगण, तगण, जगण और दो गुरु से युक्त पादों वाला छन्द ‘उपेन्द्रवज्रा’ 16 कहलाता है। [इसमें भी पादान्त में विराम होता है।] जब एक ही छन्द में इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा — दोनों के चरण लक्षित हों, तब उस छन्द का नाम ‘उपजाति’ 17 होता है। [इन दोनों के मेल से जो उपजाति बनती है, उसके प्रस्तार से चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार ‘वंशस्थ’ और ‘इन्द्रवज्रा’ तथा ‘शालिनी’ और ‘वातोर्मी ‘ के मेल से भी उपजाति छन्द होता है।] ॥ ३-५ ॥ तीन भगण और दो गुरु से युक्त पाद वाले वृत्त का नाम ‘दोधक 18 है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में भगण, तगण, तगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘शालिनी” है। इसमें चार और सात अक्षरों पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पाद में मगण, भगण, तगण एवं दो गुरु हों, उसे ‘वातोर्मी छन्द नाम दिया गया है। इसमें भी चार-सात पर विराम होता है। प्रत्येक चरण में मगण, भगण, तगण, नगण, एक लघु और एक गुरु होने से ‘भ्रमरीविलसिता’ 19 (या भ्रमरविलसिता) नामक छन्द होता है। इसमें भी चार और सात अक्षरों पर ही विराम होता है। जिसके प्रति पाद में रगण, नगण, रगण, एक लघु और गुरु हों, उसे ‘रथोद्धता’ 20 कहते हैं। इसमें भी पूर्ववत् चार और सात अक्षरों पर विराम होता है। रगण, नगण, भगण और दो गुरु से युक्त पाद वाले छन्द को ‘स्वागता’ 21 कहते हैं। [इसमें पादान्त में विराम होता है। जिसके प्रत्येक पाद में दो नगण, सगण और दो गुरु हों, उसे ‘वृत्ता’ 22 (या ‘वृन्ता’) कहते हैं। [इसमें चार-सात पर विराम होता है।] जिसके चरण रगण, जगण, रगण, एक लघु और एक गुरु से युक्त हों, उसे ‘श्येनी’ 23 नामक छन्द कहा गया है। [इसमें पादान्त में विराम होता है।] जगण, रगण, जगण एवं दो गुरु से युक्त चरण वाले छन्द का नाम ‘रम्या’ 24 एवं ‘विलासिनी’ है। [यहाँ पादान्त में ही विराम होता है।] ॥ ६-८ ॥ यहाँ से ‘जगती’ छन्द का अधिकार आरम्भ होता है [और ‘प्रहर्षिणी’ के पहले तक रहता है]। जिसके प्रत्येक चरण में जगण, तगण, जगण और रगण हों, उस छन्द का नाम ‘वंशस्था’ 25 है। [यहाँ पादान्त में विराम होता है। दो तगण, जगण तथा रगण से युक्त चरणों वाले छन्द को ‘इन्द्रवंशी’ 26 कहते हैं। [यहाँ भी पादान्त में ही विराम होता है। जिसके प्रत्येक पाद में चार सगण हों, उसका नाम ‘तोटक’ 27 बताया गया है। जिसके प्रत्येक पाद में नगण, भगण, भगण और रगण हों, उसका नाम ‘द्रुतविलम्बित’ 28 है। [‘तोटक’ और ‘द्रुतविलम्बित’ दोनों में पादान्त विराम ही माना गया है। जिसके सभी चरणों में दो-दो नगण, एक-एक मगण तथा एक-एक यगण हों, उस छन्द का नाम ‘श्रीपुट’ 29 है। इसमें आठ और चार अक्षरों पर विराम होता है। जगण, सगण, जगण, सगण से युक्त पादों वाले छन्द को ‘जलोद्धतगति’ 30 कहते है। इसमें छः-छः अक्षरों पर विराम होता है। दो नगण, एक मगण तथा एक रगण से युक्त चरण वाले छन्द का नाम ‘तत’ 31 है। नगण, यगण, नगण, यगण से युक्त पाद वाला छन्द ‘कुसुमविचित्रा’ 32 कहलाता है । [इसमें भी छः- छः अक्षरों पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और दो रगण हों, उसका नाम ‘चञ्चलाक्षिका’ 33 है। [इसके भीतर सात पाँच पर विराम होता है।] प्रत्येक पाद में चार यगण होने से ‘भुजंगप्रयात ‘ 34 और चार रगण होनेसे ‘स्रग्विणी’ 35 नामक छन्द होता है। [इन दोनों में पादान्तविराम माना गया है। जिसके प्रत्येक चरण में सगण, जगण तथा दो सगण हों, उसकी ‘प्रमिताक्षरा’ 36 संज्ञा होती है। [इसमें भी पादान्तविराम ही अभीष्ट है। भगण, मगण, सगण, मगण से युक्त चरणों वाले छन्द को ‘कान्तोत्पीडा’ 37 कहते हैं। [इसमें भी पादान्त-विराम माना गया है।] दो मगण और दो यगणयुक्त चरण वाले छन्द को ‘वैश्वदेवी’ 38 नाम दिया गया है। इसमें पाँच-सात अक्षरों पर विराम होता है। यदि प्रत्येक पाद में नगण, जगण, भगण और यगण हों तो उस छन्द का नाम ‘नवमालिनी’ 39 होता है। यहाँ तक ‘जगती’ छन्द का अधिकार है ॥ ९-१३ ॥ [अब ‘अतिजगती’ छन्द के अवान्तर भेद बतलाते हैं] जिसके प्रत्येक चरण में मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु हों, उसकी ‘प्रहर्षिणी’ 40 संज्ञा है। इसमें तीन और दस अक्षरों पर विराम होता है। जगण, भगण, सगण, जगण तथा एक गुरु से युक्त चरण वाले छन्द का नाम ‘रुचिरा’ 41 है। इसमें चार तथा नौ अक्षरों पर विराम माना गया है। मगण, तगण, यगण, सगण और एक गुरुयुक्त पाद वाले छन्द को ‘मत्तमयूर’ 42 कहते हैं। इसमें चार और नौ अक्षरों पर विराम होता है। तीन नगण, एक सगण और एक गुरु से युक्त पाद वाले छन्द की ‘गौरी’ 43 संज्ञा है। [अब शक्करी के अन्तर्गत विविध छन्दों का वर्णन किया जाता है — जिसके प्रत्येक पाद में मगण, तगण, नगण, सगण तथा दो गुरु हों और पाँच एवं नौ अक्षरों पर विराम होता हो, उसका नाम ‘असम्बाधा’ 44 है। जिसके प्रतिपाद में दो नगण, रगण, सगण और एक लघु और एक गुरु हों तथा सात-सात अक्षरों पर विराम होता हो, वह ‘अपराजिता’ 45 नामक छन्द है। दो नगण, भगण, नगण, एक लघु और एक गुरु से युक्त पाद वाले छन्द को ‘प्रहरणकलिता’ 46 कहते हैं। इसमें सात-सात पर विराम होता है। तगण, भगण, दो जगण और दो गुरु से युक्त पाद वाले छन्द की ‘वसन्ततिलका’ 47 संज्ञा है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। किसी-किसी मुनि के मत में इसका नाम ‘सिंहोन्नता’ और ‘उद्धर्षिणी’ भी है ॥ १४-१७ ॥ [इसके आगे ‘अतिशक्करी’ का अधिकार है। जिसके प्रत्येक पाद में चार नगण और एक सगण हों, उसका नाम ‘चन्द्रावती’ 48 है। [इसमें सात आठ पर विराम होता है। इसीमें जब छः और नौ अक्षरों पर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’ 49 होता है। आठ और सात पर विराम होने से यह छन्द ‘मणिगणनिकर’ 50 कहलाता है। दो नगण, मगण और दो यगण से युक्त चरणों वाले छन्द को ‘मालिनी’ 51 कहते हैं। इसमें भी आठ और सात अक्षरों पर ही विराम होता है। भगण, रगण, तीन नगण और एक गुरु से युक्त चरणवाले छन्द को ‘ऋषभगजविलसित’ 52 नाम दिया गया है। इसमें सात-नौ अक्षरों पर विराम होता है। [यह ‘अष्टि’ छन्द के अन्तर्गत है। यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु तथा एक गुरु से युक्त चरणों वाले छन्द को ‘शिखरिणी’ 53 कहते हैं। इसमें छः तथा ग्यारह अक्षरों पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ-नौ अक्षरों पर विराम हो उसका नाम ‘पृथ्वी’ 54 है — यह पूर्वकाल में आचार्य पिङ्गल ने कहा है। मगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु तथा एक गुरु से युक्त पद वाले छन्द को ‘वंशपत्रपतित’ 55 कहते हैं। इसमें दस-सात पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु हों और छः, चार एवं सात अक्षरों पर विराम हो, उसका नाम ‘हरिणी’ 56 है। [शिखरिणी से मन्दाक्रान्ता तक का छन्द ‘अत्यष्टि’ के अन्तर्गत है। मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरु से युक्त पादों वाले छन्द को ‘मन्दाक्रान्ता’ 57 कहते हैं। इसमें चार, छः और सात अक्षरों पर विराम होता है। जिसके पादों में मगण, तगण, नगण तथा तीन यगण हों, वह ‘कुसुमितलतावेल्लिता’ 58 छन्द है। [यह ‘धृति’ छन्द के अन्तर्गत है। इसमें पाँच, छः तथा सात अक्षरों पर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरण में मगण, सगण, जगण, भगण, दो तगण और एक गुरु हों, उसका नाम ‘शार्दूलविक्रीडित’ 59 है। इसमें बारह तथा सात अक्षरों पर विराम होता है। [यह छन्द ‘अतिधृति के अन्तर्गत है] ॥ १८-२३१/२ ॥ ‘सुवदना’ 60 छन्द ‘कृति’ के अन्तर्गत है। इसके प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। इसमें सात, सात, छःपर विराम होता है। जब कृति के प्रत्येक पाद में क्रमशः गुरु और लघु अक्षर हों तो उसे ‘वृत्त छन्द’ 61 कहते हैं। मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगण से युक्त चरणों वाले छन्द का नाम ‘स्रग्धरा’ 62 है। इसमें सात-सात के तीन विराम होते हैं। [यह ‘प्रकृति’ छन्द के अन्तर्गत है। जिसके प्रत्येक चरण में भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण तथा एक गुरु हों और दस-बारह अक्षरों पर विराम होता हो, उसे ‘सुभद्रक छन्द 63 कहते हैं। [यह ‘आकृति’ छन्द के अन्तर्गत है। नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, एक लघु और एक गुरु से युक्त पाद वाले छन्द की ‘अश्वललिता 64 संज्ञा है। इसमें ग्यारह बारह पर विराम होता है। [यह ‘विकृति’ के अन्तर्गत है] ॥ २४-२५ ॥ जिसके प्रत्येक चरण में दो मगण, एक तगण, चार नगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ और पंद्रह पर विराम हो, उसे ‘मत्तक्रीडा 65 [या मत्ताक्रीडा] कहते हैं। [यह भी ‘विकृति ‘में ही है। जिसके पृथक् पृथक् सभी पादों में भगण, तगण, नगण, सगण, फिर दो भगण, नगण और यगण हों तथा पाँच, सात, बारह पर विराम होता हो, उसकी ‘तन्वी 66 संज्ञा है। [यह ‘संस्कृति’ छन्द के अन्तर्गत है। जिसके प्रत्येक चरण में भगण, मगण, सगण, भगण, चार नगण और एक गुरु हों तथा पाँच-पाँच, आठ और सात पर विराम होता हो, उस छन्द का नाम ‘क्रौञ्चपदा’67 है। [यह ‘अभिकृति’ के अन्तर्गत है। जिसके प्रतिपाद में दो मगण, तगण, तीन नगण, रगण, सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ, ग्यारह और सात पर विराम होता हो, उस छन्द को ‘भुजंगविजृम्भित’ 68 कहते हैं। [यह ‘उत्कृति’ छन्द के अन्तर्गत है। जिसके प्रत्येक पाद में एक मगण, छः नगण, एक सगण और दो गुरु हों तथा नौ, छः-छः एवं पाँच अक्षरों पर विराम होता हो, उसको ‘अपहाव’ 69 या ‘उपहाव’ नाम दिया गया है। [यह भी ‘उत्कृति’ में ही है] ॥ २६-२८ ॥ [अब ‘दण्डक’ जाति का वर्णन किया जाता है- जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और सात रगण हों, उसका नाम ‘दण्डक’ 70 है; इसी को ‘चण्डवृष्टिप्रपात’ भी कहते हैं। [इसमें पादान्त में विराम होता है। उक्त छन्द में दो नगण के सिवा रगण में वृद्धि करने पर ‘व्याल’, ‘जीमूत’ आदि नाम वाले ‘दण्डक’ बनते हैं। ‘चण्डप्रपात ‘के बाद अन्य जितने भी भेद होते हैं, वे सभी दण्डक- प्रस्तार ‘प्रचित’ 71 कहलाते हैं। अब ‘गाथा- प्रस्तार’ का वर्णन करते हैं ॥ २९-३० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘समवृत्तनिरूपण’ नामक तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३४ ॥ 1. उदाहरण — धन्या त्रिषु नीचा कन्या तनुमध्या । श्रोणीस्तनगुर्वी रामा रमणीया ॥ 2. उदाहरण — यदीह पतिसेवारता भवति योषा । कुमारललितासौ सदैव नमनीया ॥ 3. उदाहरण — यस्य मुखे प्रियवाणी चेतसि सज्जनता च । चित्रपदापि च लक्ष्मीस्तं पुरुषं न जहाति ॥ 4. उदाहरण — विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात् । ध्यानोत्पन्नं निस्सामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत् ॥ 5. उदाहरण — माणवकाक्रीडितकं यः कुरुते वृद्धवयाः । हास्यमसौ याति जने भिक्षुरिव स्त्रीचपलः ॥ 6. उदाहरण — गण्डयोरतिशयकृशं यन्मुखं प्रकटदशनम् । आयतं कलहनिरतं तां स्त्रियं त्यज हलमुखीम् ॥ 7. उदाहरण — इयमधिकतरं रम्या विकचकुवलयश्यामा । रमयति हृदयं यूनां भुजगशिशुभृता नारी ॥ 8. उदाहरण — अभ्यागामिशिशुलक्ष्मीमञ्जीरक्वणिततुल्यम् । तीरे राजति नदीनां रम्यं हंसरुतमेतत् ॥ 9. विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा । अस्मद्वंशपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः ॥ 10. मीमांसारसममृतं पीत्वा शास्त्रोक्तिः पटुरितरा भाति । एवं संसदि विदुषां मध्ये जल्पामो जयपणबन्धत्वात् ॥ 11. उदाहरण — या वनान्तराण्युपैति कृष्णं द्रष्टुमुत्सुका शिखण्डमौलिम् । बर्हिणं विलोक्य राधिका मे सा मयूरसारिणी प्रणम्या ॥ 12. उदाहरण — स्वैरालापैः श्रुतिपुटपेयैर्गीतैः शौरेश्चरित विशेषैः । श्यामप्रेम्णा व्रजवनितानां मध्ये मत्ता विलसति कापि ॥ 13. उदाहरण — एषा जगदेकमनोहरा कन्या कनकोज्ज्वलदीधितिः । लक्ष्मीरिव दानवसूदनं पुण्यैर्नरनाथमुपस्थिता ॥ 14. उदाहरण — पादतले पद्मोदर गौरे राजति यस्या ऊर्ध्वगरेखा । सा भवति स्त्री लक्षणयुक्ता रुक्मवती सौभाग्यवती च ॥ 15. उदाहरण — ये दुष्टदैत्या इह भूमिलोके द्वेषं व्यधुर्गोद्विजदेवसंघे । तानिन्द्रवज्रादपि दारुणाङ्गानजीघतद् यः सततं नमस्ते ॥ 16. उदाहरण — भवन्नखाः कुन्ददलश्रियो ये नमन्ति लक्ष्मीस्तनलेखनेऽपि । उपेन्द्रवज्राधिककर्कशत्वं कथं गतास्ते रिपुदारणायाम् ॥ 17. उदाहरण — तत्रोपजातिर्विविधा विदग्धैः संयोज्यते तु व्यवहारकाले । अतः प्रयत्नः प्रथमं विधेयो नृपेण पुंरत्नपरीक्षणाय ॥ 18. दोधकमर्थविरोधकमग्रं स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम् । स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुञ्चति यो नृपतिः स सुखी स्यात् ॥ 19. शस्त्रश्यामा स्निग्धमुग्धायताक्षी पीनश्रोणिर्दक्षिणावर्तनाभिः । मध्ये क्षामा पीवरोरुस्तनी या श्लाघ्या भर्तुः शालिनी कामिनी सा ॥ 20. यात्युत्सेकं सपदि प्राप्य किंचित् स्याद् वा यस्याश्चपला चित्तवृत्तिः । या दीर्घाङ्गी स्फुटशब्दाट्टहासा त्याज्या सा स्त्री द्रुतवातोर्मिमाला ॥ 21. किं ते वक्त्रं चलदलकचितं किं वा पद्मं भ्रमरविलसितम् । इत्येवं मे जनयति मनसि भ्रान्तिं कान्ते परिसर सरसि ॥ 22. या करोति विविधैर्नरैः समं संगतिं परगृहे रता च या । म्लानयत्युभयतोऽपि बान्धवान् मार्गधूलिरिव सा रथोद्धता ॥ 23. आहवं प्रविशतो यदि राहुः पृष्ठतश्चरति वायुसमेतः । प्राणवृत्तिरपि यस्य शरीरे स्वागता भवति तस्य जयश्रीः ॥ 24. द्विजगुरुपरिभवकारी यो नरपतिरतिधनलुब्धात्मा । ध्रुवमिह निपतति पापोऽसौ फलमिव पवनहतं वृन्तात् ॥ 25. क्रूरदृष्टिरायताग्रनासिका चञ्चला कठोरतीक्ष्णनादिनी । युद्धकाङ्क्षिणी सदामिषप्रिया श्येनिकेव सा विगर्हिताङ्गना ॥ 26. विलासिनीविलासमोहितानां नृणां हृदि क्व सत्त्वशालि धैर्यम् । स उर्वशीवशीकृतो नरेन्द्रस्तदर्थमुन्मना चचार भूमौ ॥ 27. विशुद्धवंशस्थमुदारचेष्टितं गुणप्रियं मित्रमुपात्तसज्जनम् । विपत्तिमग्नस्थ करावलम्बनं करावलम्बनं करोति यः प्राणपरिक्रयेण सः ॥ 28. कुर्वीत यो देवगुरुद्विजन्मनामुर्वीपतिः पालनमर्थलिप्सया । तस्येन्द्रवंशेऽपि गृहीतजन्मनः संजायते श्रीः प्रतिकूलवर्तिनी ॥ 29. अमुना यमुनाजलकेलिकृता सहसा तरसा परिरभ्य धृता । हरिणा हरिणाकुलनेत्रवती न ययौ नवयौवनभारवती ॥ 30. द्रुतगति: पुरुषो धनभाजनं भवति मन्दगतिश्च सुखोचितः । द्रुतविलम्बितखेलगतिर्नृपः सकलराज्यसुखं प्रियमश्नुते ॥ 31. न विचलति कथंचिन्न्यायमार्गाद् वसुनि शिथिलमुष्टिः पार्थिवो यः । अमृतपुट इवासौ पुण्यकर्मा भवति जगति सेव्यः सर्वलोकैः ॥ 32. भनक्ति समरे बहूनपि रिपून् हरिः प्रभुरसौ भुजोर्जितबलः । जलोद्धतगतिर्यथैव मकरस्तरङ्गनिकरं करेण परितः ॥ 33. कुरु करुणमियं गाढोत्कण्ठिका यदुतनय चकोरी कामाधिका । विरहदहनसङ्गादङ्गैः कृशा पिबतु तव मुखेन्दोर्बिम्बं दृशा ॥ 34. धृतनवहारं विगतविकारं सदयमुदारं विमलविचारम् । विरचितवेषं विवुधविशेषं वरयति शय्या कुसुमविचित्रा ॥ 35. अतिसुरभिरभाजि पुष्पश्रियामतनुतरतयेव संतानकः । तरुणपरभृतः स्वनं रागिणामतनुत रतये वसन्तानकः ॥ 36. पुरः साधुवद्भाति मिथ्या विनीतः परोक्षे करोत्यर्थनाशं हताशः । भुजंगप्रयातोपमं यस्य चित्तं त्यजेत्तादृशं दुश्चरित्रं कुमित्रम् ॥ 37. यो रणे युद्ध्यते निर्भरं निर्भयस्त्यागिता यस्य सर्वस्वदानावधिः । तं नरं वीरलक्ष्मीर्यश: स्रग्विणी नूनमभ्येति सत्कीर्तिशुक्लांशुका ॥ 38. परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिषिञ्चती श्रवणयोरमृतम् । प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती तव भारती हरति मे हृदयम् ॥ 39. कान्तकरैराप्ता यदि कान्तोत्पीडां सा मनुते क्रीडां मुदित स्वान्ता स्यात् । स्नेहवती मान्या गृहिणी सम्राज्ञी गेहगता देवी सदृशी सा नित्यम् ॥ 40. धन्यः पुण्यात्मा जायते कोऽपि वंशे तादृक् पुत्रोऽसौ येन गोत्रं पवित्रम् । गोविप्रज्ञातिस्वामिकार्ये प्रवृत्तः शुद्धं श्राद्धादौ वैश्वदेवी भवेद् यः ॥ 41. धवलयशोऽङ्कुशेन परिवीता सकलजनानुरागघुसृणाक्ता । दृढगुणबद्धकीर्तिकुसुमौधै स्तव नवमालिनीव नृपलक्ष्मीः ॥ 42. श्रीवृन्दावननवकुञ्जकेलिसद्मा पद्माक्षी मुररिपुसङ्गशालिनी च । श्रीराधा प्रियतममुष्टिमेयमध्या मद्ध्याने भवतु मनः प्रहर्षिणी मे ॥ 43. मृगत्वचा रुचिरतराम्बरक्रियः कपालभृत् कपिलजटाग्रपल्लवः । ललाटदृग्दहनतृणीकृतस्मरः पुनातु वः शिशुशशिशेखरः शिवः ॥ 44. व्यूढोरस्कः सिंहसमानानतमध्यः पीनस्कन्धो मांसलहस्तायतबाहुः । कम्बुग्रीवः स्निग्धशरीरस्तनुलोमा भुङ्क्ते राज्यं मत्तमयूराकृतिनेत्रः ॥ 45. सकलभुवनजनगणनतपादा निजपदभजनशमितविषादा । विजितसरसिरुहनयनपद्मा भवतु सकलमिह जगति गौरी ॥ 46. भङ्क्त्वा दुर्गाणि द्रुमवनमखिलं छित्त्वा हत्वा तत्सैन्यं करितुरगबलं हित्वा । येनासम्बाधा स्थितिरजनि विपक्षाणां सर्वोर्वीनाथः स जयति नृपतिर्मुञ्जः ॥ 47. फणिपतिवलयं जटामुकुटोज्ज्वलं मनसिजमथनं त्रिशूलविभूषितम् । स्मरसि यदि सखे शिवं शशिशेखरं भवति तव तनुः परैरपराजिता ॥ 48. सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणम् । प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम् ॥ 49. उद्धर्षिणी जनदृशां स्तनभारगुर्वी नीलोत्पलद्युतिमलिम्लुचलोचना च । सिंहोन्नतत्रिकतटी कुटिलालकान्ता कान्ता वसन्ततिलका नृपवल्लभासौ ॥ 50. पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् ॥ विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विचरति पथिकमनसि शरदि सरः ॥ 51. नवविकसितकुवलयदलनयनं अमृतमधुररसमयमृदुवचनम् । मधुरिपुरुचिरजलजयुगचरणं परिसर शरणममशरणशरणम् ॥ 52. कथमपि निपतितमतिमहति पदे नरमनुसरति न फलमनुपचितम् । अपि वरयुवतिषु कुचतटनिहतः स्पृशति न वपुरिह मणिगणनिकरः ॥ 53. अतिविपुलललाटं पीवरोर: कपाटं सुघटितदशनोष्ठं व्याघ्रतुल्यप्रकोष्ठम् । पुरुषमशनिलेखालक्षणं वीरलक्ष्मीरतिसुरभियशोभिर्मालिनीवाभ्युपैति ॥ 54. आयतबाहुदण्डमुपचितपृथुहृदयं पीनकटिप्रदेशमृषभगजविलसितम् ॥ वीरमुदारसत्त्वमतिशयगुणरसिकं श्रीरतिचञ्चलापि न परिहरति पुरुषम् ॥ 55. यश: शेषीभूते जगति नरनाथे गुणनिधौ प्रवृत्ते वैराग्ये विषयरसनिष्क्रान्तमनसाम् । इदानीमस्माकं घनतरुलतां निर्झरवतीं तपस्तप्तुं चेतो भवति गिरिमालां शिखरिणीम् ॥ 56. हताः समिति शत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतश्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः । त्वया कृतपरिग्रहे क्षितिपवीर सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता ॥ 57. अद्य कुरुष्व कर्म सुवृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत् । जीवितमल्पकालकलनालघुतरतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव ॥ 58. कुवलयदलश्यामा पीनोन्नतस्तनशालिनी चकितहरिणीनेत्रच्छायामलिम्लुचलोचना । मनसिजधनुर्ज्यानिर्घोषैरिव श्रुतिपेशलैर्मनसि ललना लीलालापैः करोति ममोत्सवम् ॥ 59. प्रत्यादिष्टं समरशिरसः कां दिशं प्रप्य नष्टं त्वं निःशेषं कुरु रिपुबलं मार्गमासाद्य सद्यः । किं नाश्रौषीः परिणतधियां नीतियोग्योपदेशं मन्दाक्रान्ता भवति फलिनी नारिलक्ष्मीः क्षयाय ॥ 60. धन्या नामैताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजत्परभृतकलालापकोलाहलिन्यः । मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझंकाररम्या ग्रामान्तस्रोत:परिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयन्ति ॥ 61. कम्बुग्रीवमुदग्रबाहुशिखरं रक्तान्तदीर्घेक्षणं शालप्रांशुशरीरमायतभुजं विस्तीर्णवक्षःस्थलम् । कीलस्कन्धमनुद्धतं परिजने गम्भीरसत्यस्वरं राज्यश्रीः समुपैति वीरपुरुषं शार्दूलविक्रीडितम् ॥ 62. या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घे च नयने । श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने सम्प्राप्ता साम्प्रतं मे नयनपथमसौ दैवात् सुवदना ॥ 63. जन्तुमात्रदुःखकारिकर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व । विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनां हिताय ॥ 64. रेखाभ्रूः शुभ्रदन्तद्युतिहसितशरच्चन्द्रिका चारुमूर्तिर्माद्यन्मातङ्गलीलागतिरतिविपुलाभोगतुङ्गस्तनी या । रम्भास्तम्भोपमोरूरलिमलिनघनस्निग्धधम्मिल्लहस्ता राधायै रक्तकण्ठी दिशतु नवमुदं स्रग्धरा कापि गोपी ॥ 65. भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभरावनम्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः । ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुराङ्गनापरिवृताः ॥ 66. पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावनितया वशीकृतमिदम् । सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपामरयशः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम् ॥ 67. हृद्यं मद्यं पीत्वा नारी स्खलितगतिरतिशयरसिकहृदया मत्ताक्रीडालोलैरङ्गैर्मुदमखिलविटजनमनसि कुरुते । वीतक्रीडाश्लीलालापै: श्रवणसुखसुभगसुललितवचना नृत्यैर्गीतैर्भूविक्षेपैः कलभणितविविधविहगकुलरुतैः ॥ 68. चन्द्रमुखी सुन्दरघनजघना कुन्दसमानशिखरदशना या निष्कलवीणा श्रुतिसुखवचना त्रस्तकुरङ्गतरलनयनान्ता । निर्मुखपीनोन्नतकुचकलशा मत्तगजेन्द्रललितगतिभासा निर्भरलीलाचरितविततये नन्दकुमार भवतु तव तन्वी ॥ 69. या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना दीर्घतराभिः स्थूलशिराभिः परिवृतवपुरतिशयकुटिलगतिः । आयतजङ्घा निम्नकपोला लघुतरकुचयुगपरिचितहृदया सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधिसुखमभिलषिता ॥ 70. ये संनद्धानेकानीकैर्नरतुरगकरिपरिवृतैः समं तव शत्रवो युद्ध श्रद्धालुब्धात्मानस्त्वदभिमुखमपगतभियः पतन्ति धृतायुधाः । ये त्वां दृष्ट्वा संग्रामाग्रे नृपतिवर कृपणमनसश्चलन्ति दिगन्तरं किं वा सोढुं शक्यन्ते कैर्बहुभिरपि सविषविषमं भुजंगविजृम्भितम् ॥ 71. श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम् । सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिरकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ॥ 72. दण्डक का उदाहरण ― इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी त्रिदशविजयिवीर्य दृष्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते । जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदस्पर्शपूताश्रये भुवननिमितपादपद्माभिनानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥ 73. प्रचित दण्डक का उदाहरण: प्रथमकथितदण्डकश्चण्डवृष्टि प्रपाताभिधानो मुनेः पिङ्गलाचार्यनाम्नोमतः प्रचित इति ततः परं दण्डकानामियं जातिरेकैकरेफाभिवृद्ध्या यथेष्टं भवेत् । स्वरुचिविरचितसंज्ञया तद्विशेषैरशेषैः पुनः काव्यमन्येऽपि कुर्वन्तु वागीश्वराः । भवति यदि समानसंख्याक्षरैर्यत्र पादव्यवस्था ततो दण्डकः पूज्यतेऽसौ जनैः ॥ अग्निपुराणम् चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः समवृत्तनिरूपणं ॥ अग्निरुवाच ॥ यतिविच्छेद इत्युक्तस्तत्तन्मध्यान्तयौ गणौ । यौसः कुमारलालिता तौ गौ चित्रपदा स्मृता ॥ १ ॥ विद्युन्माला मममागणैर्भूतगणैर्भवेत् । माणवकाक्रीड़ितकं वनौ हलमुखी वसः ॥ २ ॥ स्याद्भुजङ्गशिशुसूतानौ मेहनं मरुतं ननौ। भवेच्छुद्धविराड्वृत्तं प्रतिपादं समौ जगौ ॥ ३ ॥ पणवोमलयोमः स्याज्जौ गौ मयूरसारिणी । सत्तामभसगा वृत्तं भजताद्युपरिस्थिता ॥ ४ ॥ रुक्मवती भससगाविन्द्रावज्रा तजौ जगौ । जतौ जगौ गूपपूर्व्वावाद्यन्ताद्युपजातयः ॥ ५ ॥ दोधकं भगभागौ स्यात् शालिनी मतभागगौ । यतिः समुद्रा ऋषयः वातोर्म्मी मभतागगौ ॥ ६ ॥ चतुःस्वरा स्याद्भ्रमरी विलासिता मभौनलौ । समुद्रा अथ ऋषयो वनौ लौगौ रथोद्धता ॥ ७ ॥ सामताधनभागौगोवृत्ताननसमाश्च सः । श्येनी वजवनागः स्याद्रम्या नपरगागगः ॥ ८ ॥ जगती वंशस्था वृत्तं जतौ जावथ तौ जवौ । इन्द्रवंशा तोटकं सैरचतुर्भिः प्रतिपादतः ॥ ९ ॥ भवेद्द्रुतविलम्बिता नभौ भवावथौ नलौ । स्यौ श्रीपुठो वसुवेदा जलोगतिजलौ जमौ ॥ १० ॥ जसौ वसर्व्ववश्चाथ ततं ननमराः स्मृतं । कुशुमविचित्रान्यौ द्यौ नौ नौ रौ स्याच्चलाम्बिका ॥ ११ ॥ भुजङ्गप्र्यातं थैः स्याच्चतुभिः स्राग्विनीभवैः । प्रमिताक्षरा गजौ सौ कान्तोत्पीड़ा मतौ समौ ॥ १२ ॥ वैश्वदेवी ममयायाः पञ्चाङ्गा नवमालिनी । नजौ भयौ प्रतिपादं गणा यदि जगत्यपि ॥ १३ ॥ प्रहर्षणी मवजवा गोपतिर्बह्निदिक्षु च । रुचिरा जभसजगा च्छिन्ना वेदैर्ग्रहैः स्मृता ॥ १४ ॥ मत्तमयूरं मतया सगौ वेदग्रहे यतिः । गौरीनलनसागः स्यादसम्बाधा नतौ नगौ ॥ १५ ॥ गोग इन्द्रियनवकौ ननौ वसनगाः स्वराः । स्वराश्चापराजिता स्यान्ननभाननगाः स्वराः ॥ १६ ॥ द्विःप्रहरणकलिता वसन्ततिलका नभौ । जौ गौ सिंहोन्नता सा स्यान्मुनेरुद्धर्षणी च सा ॥ १७ ॥ चन्द्रावर्त्ता ननौ सोमावर्त्तर्तुनवकः स्मृतः । मणिगुणनिकरा सौ मालिनौ नौ मयौ ययः ॥ १८ ॥ यतिर्वसुस्वरा भौ वौ नतलमित्रसग्रहाः । ऋषभगजविलासितं ज्ञेया शिखरिणी जगौ ॥ १९ ॥ रसभालभृगुरुद्राः पृथ्वीजसजसा जनौ । गोवसुग्रहविच्छिन्ना पिह्गलेनेरिता पुरा ॥ २० ॥ वंशपत्रपतितं स्याद् भवना भौ नगौ सदिक् । हरिणी नसमारः सो नगौ रसचतुःस्वराः ॥ २१ ॥ मन्दाक्रान्ता नभनतं तगौगछिरसस्वराः । कुसुमितलता वेल्लिता मतना यययाः शराः ॥ २२ ॥ रथाः स्व्राः प्रतिरथससजाः सततश्च गः । शार्दूलविक्रीड़ितं स्यादादित्यमुनयो यतिः ॥ २३ ॥ कृतिः सुवदना मोरो भनया भनगाः सुराः । यतिर्मुनिरसाश्चाथ इति वृत्तं क्रमात् स्मृतम् ॥ २४ ॥ स्रग्ध्रा मरतानोमोयपौ त्रिःसप्तका यतिः । समुद्रकं भरजानोवनगा दशभास्कराः ॥ २५ ॥ अस्वललितं नजभा जभजा भनमीशतः । मत्ताक्रीड़ा ममनना नौनग्नौ गोष्टमातिथिः ॥ २६ ॥ तन्वी भनतसाभोभो लयो वाणसुरार्क्ककाः । क्रौञ्चपदा भमतता नौ नौ वाण्शराष्टतः ॥ २७ ॥ भुजङ्गविजृम्भितं ममतना ननवासनौ । गष्टेशमुनिभिश्छेदो ह्युहाराख्यमीदृशम् ॥ २८ ॥ मननानतानः सो गगौ ग्रहरसो रसात् । नौ सप्तरोदण्डदः स्याच्चण्डवृष्टिप्रघातकं ॥ २९ ॥ रेफवृद्ध्या णणवा स्युर्व्यालजीमूतमुख्यकाः । शेषे वै प्रचिता ज्ञेया गाथाप्रस्तार उच्यते ॥ ३० ॥ ॥ इत्यादिमहापुराणे आग्नेये समवृत्तनिरूपणं नाम चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३४ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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