अग्निपुराण – अध्याय 338
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय
नाटकनिरूपण
नाटकनिरूपणम्

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! ‘रूपक ‘के सत्ताईस भेद माने गये हैं [^1]  — नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीगदित, नाट्यरासक, रासक, उल्लाप्य तथा प्रेक्षण। लक्षण दो प्रकार के होते हैं — सामान्य और विशेष। सामान्य लक्षण रूपक के सभी भेदों में व्याप्त होते हैं और विशेष लक्षण किसी-किसी में दृष्टिगोचर होते हैं। रूपक के सभी भेदों में पूर्वरङ्ग के [^2]  निवृत्त हो जाने पर देश-काल, रस, भाव, विभाव अनुभाव, अभिनय, अङ्क और स्थिति — ये उनके सामान्य लक्षण हैं; क्योंकि इनका सर्वत्र उपसर्पण देखा जाता है। विशेष लक्षण यथावसर बताया जायगा। यहाँ पहले सामान्य लक्षण कहा जाता है; ‘नाटक’ को धर्म, अर्थ और काम का साधन माना गया है; क्योंकि वह करण है। उसकी इतिकर्तव्यता (कार्यारम्भ की विधि) यह है कि ‘पूर्वरङ्ग ‘ का विधिवत् सम्पादन किया जाय। ‘पूर्वरङ्ग ‘ के नान्दी आदि बाईस अङ्ग होते हैं [^3]  ॥ १-८ ॥’

देवताओं को नमस्कार, गुरुजन की प्रशस्ति तथा गौ, ब्राह्मण और राजा आदि के आशीर्वाद ‘नान्दी’ कहलाते हैं। रूपकों में ‘नान्दीपाठ ‘ के पश्चात् यह लिखा जाता है कि ‘नान्द्यन्ते [^4]  सूत्रधारः’ (नान्दीपाठ के अनन्तर सूत्रधार का प्रवेश)। इसमें कवि की पूर्व गुरुपरम्परा का, वंशप्रशंसा, पौरुष तथा काव्य के सम्बन्ध और प्रयोजन — इन पाँच विषयों का निर्देश करे। नटी, विदूषक और पारिपार्श्वक — ये सूत्रधार के साथ जहाँ अपने कार्य से सम्बद्ध, प्रस्तुत विषय को उपस्थित करने वाले विचित्र वाक्यों द्वारा परस्पर संलाप करते हैं, पण्डितजन उसको ‘आमुख’ जानें। उसको ‘प्रस्तावना’ भी कहा जाता है ॥ ९-१२ ॥

‘आमुख ‘के तीन भेद [^5]  होते हैं — प्रवृत्तक, कथोद्धात और प्रयोगातिशय। जब सूत्रधार उपस्थित काल (ऋतु आदि) का वर्णन करता है, तब उसका आश्रयभूत पात्र प्रवेश ‘प्रवृत्तक’ कहलाता है। इसका बीजांशों में ही प्रादुर्भाव होता है। जब पात्र सूत्रधार के वाक्य अथवा वाक्यार्थ को ग्रहण करके प्रवेश करता है, तब उसको ‘कथोद्धात’ कहा जाता है। जिस समय सूत्रधार एक प्रयोग में दूसरे प्रयोग का वर्णन करे, उस समय यदि पात्र वहाँ प्रवेश करे, तो वह ‘प्रयोगातिशय’ होता है। ‘इतिवृत्त’ (इतिहास) को नाटक आदि का शरीर कहा जाता है। उसके दो भेद माने गये हैं — ‘सिद्ध’ और ‘उत्प्रेक्षित’। शास्त्रों में वर्णित इतिवृत्त ‘सिद्ध’ और कवि की कल्पना से निर्मित ‘उत्प्रेक्षित’ कहा जाता है। बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य — ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ (प्रयोजनसिद्धि की हेतुभूता) हैं। [^6]  चेष्टा (कार्यावस्थाएँ) भी पाँच ही मानी गयी हैं। इनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं — प्रारम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति-सद्भाव, नियतफलप्राप्ति और पाँचवाँ फलयोग। रूपक में मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण ये क्रमशः पाँच संधियाँ हैं [^7]  

जो अल्पमात्र वर्णित होने पर भी बहुधा विसर्पण – अनेक अवान्तर कार्यों को उत्पन्न करता है, फल की हेतुभूत उस अर्थप्रकृति को ‘बीज’ कहा जाता है। जिसमें विविध वृत्तान्तों और रस से बीज की उत्पत्ति होती है, काव्य के शरीर में अनुगत उस संधि को ‘मुख’ कहते हैं। अभीष्ट अर्थ की रचना, कथावस्तु को अखण्डता, प्रयोग में अनुराग, गोपनीय विषयों का गोपन, अद्भुत वर्णन, प्रकाश्य विषयों का प्रकाशन — ये काव्याङ्गों के छः फल हैं। जैसे अङ्गहीन मनुष्य किसी कार्य में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार अङ्गहीन काव्य भी प्रयोग के योग्य नहीं माना जाता। देश-काल के बिना किसी भी इतिवृत्त की प्रवृत्ति नहीं होती, अतः नियमपूर्वक उन दोनों का उपादान ‘पद’ कहलाता है। देशों में भारतवर्ष और काल में सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुग को ग्रहण करना चाहिये। देश-काल के बिना कहीं भी प्राणियों के सुख-दुःखका उदय नहीं होता। सृष्टि के आदिकाल की वार्ता अथवा सृष्टिपालन आदि की वार्ता प्राप्त हो तो वह वर्णनीय है। ऐसा करने में कोई दोष नहीं है [^8]  ॥ १३-२७ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नाटक का निरूपण’ नामक तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३८ ॥

[^1]: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र (१८।२) में ‘रूपक’ के दस भेद बताये गये हैं — नाटक, प्रकरण, अङ्क, व्यायोग, भाण, समवकार, वीथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग। अग्निपुराण में ये दस भेद तो मिलते ही हैं, सत्रह भेद और उपलब्ध होते हैं। इन्हीं में ‘विलासिका’ नामक एक भेद और जोड़कर विश्वनाथ ने सब भेदों की सम्मिलित संख्या अट्ठाईस कर दी है। उन्होंने प्रथम दस भेदों को ‘रूपक’ और शेष अठारह भेदों को ‘उपरूपक’ बताया है। अग्निपुराणोक्त ‘कर्णा’ नामक भेद ‘साहित्यदर्पण’ में ‘प्रकरणी ‘ के नाम से और ‘भाणी’ नामक भेद ‘संलापक’ नाम से लिखा गया है।
[^2]: ‘रङ्ग’ कहते हैं — ‘रङ्गशाला’ या ‘नृत्यस्थान ‘को। वहाँ जो सम्भावित विघ्न या उपद्रव हों, उनकी शान्ति के लिये सूत्रधार और नट आदि जो ‘नान्दीपाठ’ और ‘स्तुति’ आदि करते हैं, उसका नाम ‘पूर्वरङ्ग’ है।
[^3]: नाट्यशास्त्र के पाँचवें अध्याय (९-१७ तक के श्लोकों) में प्रत्याहार, अवतरण, आरम्भ, आश्रावणा, वक्त्रपाणि, परिघट्टना, संघोटना, मार्गासारित, ज्येष्ठासारित, मध्यासारित, कनिष्ठासारित — ये ग्यारह ‘बहिर्गीत’ कहे गये हैं, जो परदे के भीतर ही रहकर अभिनेता या प्रयोगकर्ता प्रयोग में लाते हैं। तदनन्तर परदा उठाकर सब लोग एक साथ गीत की योजना करते हैं। उसके गीतक, वर्द्धमान, ताण्डव, उत्थापन, परिवर्तन, नान्दी, शुष्कावकृष्टा, रङ्गद्वार, चारी, महाचारी और प्ररोचना — ये ग्यारह अङ्ग हैं। इन बाईस अङ्गों का पूर्वरङ्ग में प्रयोग होता है।
[^4]: नाटकों में सबसे प्रथम ‘नान्दीपाठ ‘का विधान भरतमुनि ने किया है। जैसा कि नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में उल्लेख है — नान्दी कृता मया पूर्वमाशीर्वचनसंयुता । अष्टाङ्गपदसंयुक्ता विचित्रा देवसम्मता ॥
[^5]: विश्वनाथ ने अग्निपुराण के ‘सहिताः सूत्रधारेण’ इत्यादि से लेकर ‘प्रस्तावनापि सा’ तक की पङ्क्तियों को अपने ग्रन्थ में अविकलरूप से उद्धृत किया है। अग्निपुराण में प्रस्तावना के ‘प्रवृत्तक’, ‘कथोद्धात’ और ‘प्रयोगातिशय’ — ये तीन भेद माने गये हैं। परंतु विश्वनाथ ने ‘उद्घातक’ और ‘अवलगित’ — ये दो भेद और जोड़कर पाँच भेद स्वीकार किये हैं।
[^6]: इन पाँचों अर्थप्रकृतियों को विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ में ज्यों-का-त्यों ग्रहण किया है।
[^7]: विश्वनाथ ने ‘निर्वहण ‘के स्थान में ‘उपसंहृति ‘का उल्लेख किया है।
[^8]: इस प्रसङ्ग के अनुशीलन से यह स्पष्ट जान पड़ता है कि व्यासदेव पर भरतमुनि का प्रभाव पड़ा है और परवर्ती आलोचकों के ग्रन्थ भरतमुनि एवं व्यासदेव से भी प्रभावित हैं।

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