अग्निपुराण – अध्याय 339
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय
शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदि का निरूपण
शृङ्गारादिरसनिरूपणं

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! वेदान्तशास्त्र में जिस अक्षर (अविनाशी), सनातन, अजन्मा और व्यापक परब्रह्म परमेश्वर को अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप और ज्योतिर्मय कहते हैं, उसका सहज (स्वरूपभूत) आनन्द कभी-कभी व्यञ्जित होता है, उस आनन्द की अभिव्यक्ति का ही ‘चैतन्य’, ‘चमत्कार’ और ‘रस ‘ के नाम से वर्णन किया जाता है [^1]  । आनन्द का जो प्रथम विकार है, उसे ‘अहंकार’ कहा गया है। अहंकार से ‘अभिमान’ का प्रादुर्भाव हुआ। इस अभिमान में ही तीनों लोकों की समाप्ति हुई है ॥ १-३ ॥’

अभिमान से रति की उत्पत्ति हुई और वह व्यभिचारी आदि भाव-सामान्य के सहकार से पुष्ट होकर ‘शृङ्गार ‘ के नाम से गायी जाती है। शृङ्गार के इच्छानुसार हास्य आदि अनेक दूसरे भेद प्रकट हुए हैं [^2] । उनके अपने-अपने विशेष स्थायी भाव होते हैं, जिनका परिपोष (अभिव्यक्ति) ही उन उन रसों का लक्षण है ॥ ४-५ ॥

वे रस परमात्मा के सत्त्वादि गुणों के विस्तार से प्रकट होते हैं। अनुराग से शृङ्गार, तीक्ष्णता से रौद्र, उत्साह से वीर और संकोच से बीभत्स रस का उदय होता है। शृङ्गार रस से हास्य, रौद्र रस से करुण रस, वीर रस से अद्भुत रस तथा बीभत्स रस से भयानक रस की निष्पत्ति होती है। शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त — ये नौ रस माने गये हैं। वैसे सहज रस तो चार (शृङ्गार, रौद्र, वीर एवं बीभत्स) ही हैं। जैसे बिना त्याग के धन की शोभा नहीं होती, वैसे ही रसहीन वाणी की भी शोभा नहीं होती। अपार काव्यसंसार में कवि ही प्रजापति है। उसको संसार का जैसा स्वरूप रुचिकर जान पड़ता है, उसके काव्य में यह जगत् वैसे ही रूप में परिवर्तित होता है। यदि कवि शृङ्गाररस का प्रेमी है, तो उसके काव्य में रसमय जगत्‌ का प्राकट्य होता है। यदि कवि शृङ्गारी न हो तो निश्चय ही काव्य नीरस होगा। ‘रस’ भावहीन नहीं है और ‘भाव’ भी रस से रहित नहीं है; क्योंकि इन भावों से रस की भावना (अभिव्यक्ति) होती है। ‘भाव्यन्ते रसा एभिः।’ (भावित होते हैं रस इनके द्वारा) — इस व्युत्पत्ति के अनुसार वे ‘भाव’ कहे गये हैं [^3] ॥ ६-१२ ॥

‘रति’ आदि आठ स्थायी भाव होते हैं तथा ‘स्तम्भ’ आदि आठ सात्विक भाव माने जाते हैं। सुख के मनोऽनुकूल अनुभव (आनन्द की मनोरम अनुभूति) को ‘रति’ कहा जाता है। हर्ष आदि के द्वारा चित्त के विकास को ‘हास’ कहा जाता है। अभीष्ट वस्तु के नाश आदि से उत्पन्न मन की विकलता को ‘शोक’ कहते हैं। अपने प्रतिकूल आचरण करने वाले पर कठोरता के उदय को ‘क्रोध’ कहते हैं। पुरुषार्थ के अनुकूल मनोभाव का नाम ‘उत्साह’ है ॥ १३-१५ ॥

चित्र आदि के दर्शन से जनित मानसिक विकलता को ‘भय’ कहते हैं। दुर्भाग्यवाही पदार्थों की निन्दा ‘जुगुप्सा’ कहलाती है। किसी वस्तु के दर्शन से चित्त का अतिशय आश्चर्य से पूरित हो जाना ‘विस्मय’ कहलाता है। ‘स्तम्भ’ आदि आठ सात्त्विक भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुण से परे हैं। भय या रागादि उपाधियों से चेष्टा का अवरोध हो जाना ‘स्तम्भ’ कहलाता है। श्रम एवं राग आदि से युक्त अन्तःकरण के क्षोभ से शरीर में उत्पन्न जल को ‘स्वेद’ कहते हैं। हर्षादि से शरीर का उच्छ्वसित होना और उसमें रोंगटे खड़े हो जाना ‘रोमाञ्च’ कहा गया है। हर्ष आदि तथा भय आदि के कारण वाणी का स्पष्ट उच्चारण न होना (गद्गद हो जाना) ‘स्वरभेद’ कहा गया है। चित्त के क्षोभ से उत्पन्न कम्पन को ‘वेपथु’ कहा गया है। विषाद आदि से शरीर की कान्ति का परिवर्तन ‘वैवर्ण्य’ कहा गया है। दुःख अथवा आनन्द आदि से उद्धृत नेत्रजल को ‘अश्रु’ कहते हैं। उपवास आदि से इन्द्रियों की संज्ञाहीनता को ‘प्रलय’ कहा जाता है ॥ १६-२१ ॥

वैराग्य आदि से उत्पन्न मानसिक खेद को ‘निर्वेद’ कहा जाता है। मानसिक पीड़ा आदि से जनित शैथिल्य को ‘ग्लानि’ कहते हैं; वह शरीर में ही व्याप्त होती है। अनिष्ट प्राप्ति की सम्भावना को ‘शङ्का’ और मत्सर (दूसरे का उत्कर्ष सहन न करने) को ‘असूया’ कहा जाता है। मदिरा आदि के उपयोग से उत्पन्न मानसिक मोह ‘मद’ कहलाता है। अधिक कार्य करने से शरीर के भीतर उत्पन्न क्लान्ति को ‘श्रम’ कहते हैं। शृङ्गार आदि धारण करने में चित्त की उदासीनता को ‘आलस्य’ कहते हैं। धैर्य से भ्रष्ट हो जाना ‘दैन्य’ तथा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न होने से जो बार-बार उसकी ओर ध्यान जाता है, उसे ‘चिन्ता’ कहते हैं। किसी कार्य (भय से छूटने या इष्टवस्तु को पाने आदि) के लिये उपाय न सूझना ‘मोह’ कहलाता है ॥ २२-२५ ॥

अनुभूत वस्तु का चित्त में प्रतिबिम्बित होना ‘स्मृति’ कहलाता है। तत्त्वज्ञान के द्वारा अर्थों के निश्चय को ‘मति’ कहते हैं। अनुराग आदि से होने वाला जो कोई अकथनीय मानसिक संकोच होता है, उसका नाम ‘व्रीड़ा’ या ‘लज्जा’ है। चित्त की अस्थिरता को ‘चपलता’ और प्रसन्नता को ‘हर्ष’ कहते हैं। प्रतीकार की आशा से उद्भुत अन्तःकरण की विकलता को ‘आवेश’ कहा जाता है। कर्तव्य के विषय में कुछ प्रतिभान न होना ‘जडता’ कही जाती है। अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति से बढ़े हुए आनन्द या संतोष के अभ्युदय को ‘धृति’ कहते हैं। दूसरों में निकृष्टता और अपने में उत्कृष्टता की भावना को ‘गर्व’ कहा जाता है। इच्छित वस्तु के लाभ में दैव आदि से जनित विघ्न के कारण जो दुःख होता है, उसे ‘विषाद’ कहते हैं। अभीष्ट पदार्थ की इच्छा से जो मन की चञ्चल स्थिति होती है, उसका नाम ‘उत्कण्ठा’ या ‘उत्सुकता’ है। अस्थिर हो उठना चित्त और इन्द्रियों का ‘अपस्मार’ है। युद्ध में बाधाओं के उपस्थित होने से स्थिर न रह पाना ‘त्रास’ माना गया है तथा चित्त के चमत्कृत होने को ‘वीप्सा’ कहते हैं। क्रोध के शमन न होने को ‘अमर्ष’ तथा चेतनता के उदय को ‘प्रबोध’ या ‘जागरण’ कहते हैं। चेष्टा और आकार से प्रकट होने वाले भावों का गोपन ‘अवहित्थ’ कहलाता है। क्रोध से गुरुजनों पर कठोर वाग्दण्ड का प्रयोग ‘उग्रता’ कहलाता है। चित्त के ऊहापोह को ‘वितर्क’ तथा मानस एवं शरीर की प्रतिकूल परिस्थिति को ‘व्याधि’ कहते हैं। काम आदि के कारण असम्बद्ध प्रलाप करने को ‘उन्माद’ कहा गया है।

तत्त्वज्ञान होने पर चित्तगत वासना की शान्ति को ‘शम’ कहते हैं। कविजनों को काव्यादि में रस एवं भावों का निवेश करना चाहिये। जिसमें ‘रति’ आदि स्थायी भावों की विभावना हो, अथवा जिसके द्वारा इनकी विभावना हो, वह ‘विभाव’ कहा गया है; यह ‘आलम्बन’ और ‘उद्दीपन ‘के भेद से दो प्रकार का माना जाता है। ‘रति’ आदि भावसमूह जिसका आश्रय लेकर निष्पन्न होते हैं, वह ‘आलम्बन’ नामक विभाव है। यह नायक आदि का आलम्बन लेकर आविर्भूत होता है। धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त — ये चार प्रकार के नायक माने गये हैं। ये धीरोदात्तादि नायक अनुकूल, दक्षिण, शठ एवं धृष्ट के भेद से सोलह प्रकार के कहे जाते हैं। पीठमर्द, विट और विदूषक —ये तीनों शृङ्गार रस में नायक के नर्मसचिव- अनुनायक होते हैं। ‘पीठमर्द’ श्रीमान् एवं ‘नायक ‘के समान बलशाली (सहायक) होता है। ‘विट’ (धूर्त) नायक के देश का कोई व्यक्ति होता है। ‘विदूषक’ प्रहसन से नायक को प्रसन्न करने वाला होता है। नायक की नायिकाएँ भी तीन प्रकार की होती हैं — स्वकीया, परकीया एवं पुनर्भू। ‘पुनर्भू’ नायिका कौशिकाचार्य के मत से है। कुछ ‘पुनर्भू’ नायिका को न मानकर उसके स्थान पर ‘सामान्य ‘की गणना करते हैं। इन्हीं नायिकाओं के अनेक भेद होते हैं। ‘उद्दीपन विभाव’ विविध संस्कारों के रूप में स्थित रहते हैं। ये ‘आलम्बन विभाव ‘में भावों को उद्दीत करते हैं ॥ २६-४२ ॥

चौंसठ कलाएँ कर्मादि एवं गीतिकादि के भेद से दो प्रकारकी होती हैं। ‘कुहक’ और ‘स्मृति’ प्रायः हासोपहारक हैं। आलम्बन विभाव के उ‌द्बुद्ध संस्कारयुक्त भावों के द्वारा स्मृति, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न के संयोग से किये हुए मन, वाणी, बुद्धि तथा शरीर के कार्य को विद्वज्जन ‘अनुभाव’ मानते हैं – ‘स अत्र अनुभूयते उत अनुभवति।’ (आलम्बन में जो अनुभूयमान है, अथवा आलम्बन में जो दर्शन के बाद प्रकट होता है) इस प्रकार ‘अनुभाव’ शब्द की निरुक्ति (व्युत्पत्ति) की जाती है। मानसिक व्यापार की बहुलता से युक्त कार्य ‘मन का कार्य’ कहा जाता है। वह ‘पौरुष’ (पुरुष सम्बन्धी) एवं ‘स्त्रैण’ (स्त्री-सम्बन्धी) – दो प्रकार का होता है। वह इस प्रकार भी प्रसिद्ध है — ॥ ४३-४६ ॥

शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य, ललित, औदार्य तथा तेज — ये आठ ‘पौरुष कर्म’ हैं। नीच जनों की निन्दा, उत्तम पुरुषों से स्पर्धा, शौर्य और चातुर्य — इनके कारण मानसिक कार्य के रूप में शोभा का आविर्भाव होता है। जैसे – ‘भवन की शोभा होती है’ ॥ ४७-४८ ॥

भाव, हाव, हेला, शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, शौर्य, प्रगल्भता, उदारता, स्थिरता एवं गम्भीरता — ये बारह ‘स्त्रियों के विभाव’ कहे गये हैं। विलास और हाव को ‘भाव’ कहते हैं। यह ‘भाव’ किंचित् हर्ष से प्रादुर्भूत होता है। वाणी के योग को ‘वागारम्भ’ कहते हैं। उसके भी बारह भेद होते हैं। उनमें भाषण को ‘आलाप’, अधिक भाषण को ‘प्रलाप’, दुःखपूर्ण वचन को ‘विलाप’, बारंबार कथन को ‘अनुलाप’, कथोपकथन को ‘संलाप’, निरर्थक भाषण को ‘अपलाप’, वार्ता के परिवहन को ‘संदेश’ और विषय के प्रतिपादन को ‘निर्देश’ कहते हैं। तत्त्वकथन को ‘अतिदेश’ एवं निस्सार वस्तु के वर्णन को ‘अपदेश’ कहा जाता है। शिक्षापूर्ण वचन को ‘उपदेश’ और व्याजोक्ति को ‘व्यपदेश’ कहते हैं। दूसरों को अभीष्ट अर्थ का ज्ञान कराने के लिये उत्तम बुद्धि का आश्रय लेकर वागारम्भ का व्यापार होता है। उसके भी रीति, वृत्ति और प्रवृत्ति — ये तीन भेद होते हैं ॥ ४९-५४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदि का निरूपण’ नामक तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३९ ॥

[^1]: भरतमुनि ने रसनिष्पत्ति पर विचार किया, भावों का भी विशद विवेचन किया, किंतु रस को ब्रह्मचैतन्य से अभिन्न नहीं कहा; इस विषय में वेदव्यास की वाणी ‘अग्निपुराण ‘ में अधिक स्पष्ट हुई है। इन्होंने ब्रह्म के सहज आनन्द की अभिव्यक्ति को ही ‘चैतन्य’, ‘चमत्कार’ तथा ‘रस’ नाम दिया है। वेदान्त-सूत्रकार वेदव्यास के समक्ष अवश्य ही ‘रसो वै सः ।’ — यह औपनिषद वाणी भी रही है। भरतसूत्र के व्याख्याकार आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने, जिनके मत का विशद विवेचन आचार्य मम्मट ने अपनी पीयूषवर्षिणी वाणी द्वारा ‘काव्यप्रकाश’ में किया है, यह वेदान्तदृष्टि ही अपनायी है, तथा ‘रसो वै सः’ का प्रमाणरूप में उल्लेख करके ‘चिदावरणभङ्ग’ या ‘भग्ग्रावरणा चित्’ को ही ‘रस’ माना है। भामह ने महाकाव्य के लक्षण में ‘युक्तं लोकस्वभावेन रसैश्च सकलैः पृथक्।’ – यों लिखकर रस का योग तो स्वीकार किया है, किंतु रस के भव्य स्वरूप का कोई विवेचन नहीं किया है। अभिनवगुप्त, मम्मट तथा विश्वनाथ ने भी व्यास द्वारा निर्दिष्ट स्वरूप को ही स्वीकार किया है। ध्वनिवादी या व्यञ्जनावादी सहृदयों ने रसके उक्त महामहिम स्वरूपको ही आदर दिया तथा ‘ब्रह्मास्वादसहोदर’ कहकर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ायी है।
[^2]: इस कथन के उपजीव्य हैं — भरतमुनि। उन्होंने श्रृंगार, रौद्र, वीर और बीभत्स रसों से क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत तथा भयानक रस की उत्पत्ति मानी है। यथा —
शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः । वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्तिर्वीभत्साच्च भयानकः ॥ (नाट्यशास्त्र ६। ३९)
[^3]: भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में यह प्रश्न उठाया है कि ‘किं रसेभ्यो भावानामभिनिर्वृत्तिरुताहो भावेभ्यो रसानाम्।’ (क्या रसों से भावों की अभिव्यक्ति होती है अथवा भावों से रसों की।) इसके उत्तर में वे कहते हैं कि ‘भावों से ही रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती है, रसों से भावों की नहीं।’ रस के उद्भावक होने के कारण ही वे ‘भाव’ कहे जाते हैं। यह उत्तर ही अग्निपुराण की उक्तियों में मुखरित हुआ है। ‘न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः ।’- यह उक्ति भी नाट्यशास्त्र की कारिकाका ही अंश है। (देखिये ६।३६) ।

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