July 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 341 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय नृत्य आदि में उपयोगी आङ्गिक कर्म नृत्यादावङ्गकर्म्मनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘अभिनय’ 1 में नृत्य आदि के समय शरीर से होने वाली विशेष चेष्टा को तथा अङ्ग प्रत्यङ्ग के कर्म को बताता हूँ। इसे विद्वान् पुरुष ‘आङ्गिक कर्म’ मानते हैं। यह सब कुछ प्रायः अबलाजनों के आश्रित होने पर ‘विच्छित्ति’ विशेष का पोषक होता है। लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्बोक, ललित, विह्नत, क्रीडित तथा केलि — ये नायिकाओं के यौवनकाल में सहजभाव से प्रकट होने वाले बारह अलंकार हैं। आवरण से आवृत स्थान में प्रियजनों की चेष्टा के अनुकरण को ‘लीला’ कहते हैं। प्रियजन के दर्शन आदि से जो मुख और नेत्र आदि की चेष्टाओं में कुछ विशेष चमत्कार लक्षित होता है, उसको सहृदयजन ‘विलास’ कहते हैं। हर्ष से होने वाले हास और शुष्क रुदन आदि के मिश्रण को ‘किलकिञ्चित’ माना गया है। चित्त के किसी गर्वयुक्त विकार को ‘बिब्बोक’ कहते हैं। (इस भाव के उदय होने पर अभीष्ट वस्तु में भी अनादर प्रकट किया जाता है।) सौकुमार्य्यजनित चेष्टा-विशेष को ‘ललित’ कहते हैं। सिर, हाथ, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग — ये क्रमशः अङ्ग हैं। भूलता (भौंह) आदि को प्रत्यङ्ग या ‘उपाङ्ग’ जाना जाता है।’ अङ्ग प्रत्यङ्गों के प्रयत्नजनित कर्म (चेष्टाविशेष) के बिना नृत्य आदि का प्रयोग सफल नहीं होता। वह कहीं मुख्यरूप से और कहीं वक्ररूप से साधित होता है। आकम्पित, कम्पित, धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अञ्चित, निहञ्चित, परावृत, उत्क्षिप्त, अधोगत एवं लोलित — ये तेरह प्रकार के शिरः2 कर्म जानने चाहिये। भ्रूकर्म सात 3 प्रकार का होता है। भूसंचालन के कर्मों में पातन आदि कर्म मुख्य हैं। रस, स्थायी भाव एवं संचारी भाव के सम्बन्ध से दृष्टि4 का ‘अभिनय’ तीन प्रकार का होता है। उसके भी छत्तीस भेद होते हैं जिनमें दस भेद रस से प्रादुर्भूत होते हैं। कनीनिका का कर्म भ्रमण एवं चलनादि के भेद से नौ प्रकार 5 का माना गया है। मुख के छः6 तथा नासिकाकर्म के छः7 एवं निःश्वास के नौ भेद माने जाते हैं। ओष्ठकर्म के छः8 , पादकर्म के छः9 चिबुक क्रिया के सात10 एवं ग्रीवाकर्म के नौ11 भेद बताये गये हैं। हस्त का अभिनय प्रायः ‘असंयुत’ तथा ‘संयुत’ — दो प्रकार का होता है। पताक, त्रिपताक, कर्तरीमुख, अर्द्धचन्द्र, उत्कराल, शुकतुण्ड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, कटकामुख, सूच्यास्य, पद्मकोष, अतिशिरा, मृगशीर्षक, कामूल, कालपद्म, चतुर, भ्रमर, हंसास्य, हंसपक्ष, संदंश, मुकुल, ऊर्णनाभ एवं ताम्रचूड — ‘ असंयुत हस्त ‘ के ये चौबीस भेद कहे गये हैं 12 ॥ १-१६ ॥ ‘संयुत हस्त’ के तेरह भेद माने जाते हैं — अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटक, वर्धमान, असङ्ग, निषध, दोल, पुष्पपुट, मकर, गजदन्त एवं बहिः स्तम्भ। संयुत करके परिवर्द्धन से इसके अन्य भेद भी होते हैं ॥ १७-१८ ॥ वक्षःस्थल का अभिनय आभुग्ननर्तन आदि भेदों से पाँच13 प्रकार का होता है। उदरकर्म 14 अनतिक्षाम, खल्व तथा पूर्ण — तीन प्रकार के होते हैं। पार्श्वभागों के पाँच 15 कर्म तथा जङ्घा 16 के भी पाँच ही कर्म होते हैं। नाट्य-नृत्य आदि में पादकर्म के अनेक भेद होते हैं ॥ १९-२१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नृत्य आदि में उपयोगी विभिन्न अङ्गों की क्रियाओं का निरूपण’ नामक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४१ ॥ 1. भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ (अध्याय २२ ) – में ‘सामान्य-अभिनय-निरूपणों’ के प्रसङ्ग में ‘अभिनय’ के तीन स्वरूप वर्णित हैं — वाचिक, आङ्गिक और सात्त्विक । नाट्य में सत्त्व की प्रतिष्ठा है। सत्त्व का रूप अव्यक्त है । वह नवों रसों में स्थित रहता है। युवावस्था में स्त्रियों के मुख और अङ्ग में जो सात्त्विक विकार अधिकतर प्रकट होते हैं, उन्हें ‘अलंकार’ कहा गया है। वे अलंकार भावों के आश्रित होते हैं। उनमें से पहले तीन ‘अङ्गज अलंकार’ हैं, दस ‘स्वाभाविक अलंकार’ हैं और सात ‘अयत्नज’ हैं । वे सब-के-सब रस और भाव से उपबृंहित होते हैं । भाव, हाव और हेला — ये परस्पर उदित हो, शरीर में प्रकृतिस्थ होकर रहते हैं । ये तीनों सत्त्व के ही भेद हैं और अङ्गज अलंकार हैं। ‘सत्त्व’ देहात्मक होता है । ‘सत्त्व’ से ‘भाव’ का उत्थान होता है, ‘भाव’ से ‘हाव’ का और ‘हाव ‘ से ‘हेला ‘ का उद्भव कहा गया है । वाणी, अङ्ग और मुखराग के द्वारा तथा सत्त्व और अभिनय के द्वारा कवि के आन्तरिक अभिप्राय को भावित ( प्रकट) करने वाला तत्त्व ‘भाव’ कहलाता है । लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्बोक, ललित और विहृत — ये दस स्त्रियों के स्वभावज चेष्टाविशेष या अलंकरण हैं । इनका विशद विवेचन श्लोक १२–२५ तक उपलब्ध होता है। शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य तथा औदार्य — ये ‘अयत्नज अलंकरण’ हैं। इन सबका विवेचन श्लोक २६-३० तक उपलब्ध होता है । पुरुष में शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य, ललित, औदार्य और तेज — ये आठ सात्त्विक भाव प्रकट होते हैं । यहाँ लीला – विलास आदि जो स्त्रियों के अलंकरण कहे गये हैं, उनकी संख्या दस है; किंतु अग्निपुराण में व्यासजी ने ‘क्रीडित’ और ‘केलि’ — इन दो की उद्भावना करके स्त्रियों के स्वभावज अलंकरणों को बारह बताया है। परवर्ती साहित्यदर्पणकार ने इनके अतिरिक्त छः नूतन भावों की उद्भावना करके इन सबकी संख्या अठारह तक पहुँचा दी है । व्यासजी ने दिग्दर्शन के लिये लीला, विलास आदि कुछ ही भावों के संक्षिप्त लक्षण दिये हैं, किंतु कविराज विश्वनाथ ने अठारहों भावों या अलंकरणों के उदाहरणसहित विस्तृत लक्षण प्रस्तुत किये हैं । 2. ‘नाट्यशास्त्र’ के आठवें अध्याय में श्लोक १७ से ४० तक शिरः संचालन के विविध प्रकारों की विशद व्याख्या दृष्टिगोचर होती है । ‘आकम्पित’ आदि जो तेरह प्रकार हैं, उनके नाममात्र अग्निपुराण में वहीं से ज्यों-के-त्यों ले लिये गये हैं । इन सबके लक्षणों का विवेचन वहीं द्रष्टव्य है । 3. ‘ भ्रूसंचालन ‘ के जिन सात कर्मों की यहाँ चर्चा की गयी है, उनके नाम ‘नाट्यशास्त्र’ में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं — उत्क्षेप, पातन, भ्रुकुटी, चतुर, कुञ्चित, रेचित तथा सहज । दोनों ओर की भौंहों को एक साथ या बारी-बारी से ऊपर को उठाना ‘उत्क्षेप’ है। इसी तरह उन्हें एक साथ या एक-एक करके नीचे लाना ‘पातन’ है । भौंहों के मूलभाग को ऊपर उठाना ‘भ्रुकुटी’ कही गयी है। दोनों ओर की मनोहर और विस्तृत भौंहों को तनिक-सा उठाने से ‘चतुर’ कर्म सम्पादित होता है। एक या दोनों भौंहों को मृदुलभाव से सिकोड़ना ‘कुञ्चित’ कहा गया है। एक ही भौंह के ललित उत्क्षेप से ‘रेचित’ का सम्पादन होता है और भौंहों का जो स्वाभाविक कर्म है, उसे ‘सहज’ कहा गया है । (नाट्य० ८ । ११८-१२३) 4. कान्ता, भयानका, हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री वीरा तथा बीभत्सा — ये आठ ‘रसदृष्टियाँ’ हैं। स्निग्धा, हृष्टा, दीना, क्रुद्धा, दृप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता — ये आठ ‘स्थायिभाव – सम्बन्धिनी’ दृष्टियाँ हैं । शून्या, मलिना, श्रान्ता, ललिता, ग्लाना, शङ्किता, विषण्णा, मुकुला, कुञ्चिता, अभितप्ता, जिह्मा, ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विशोका, त्रस्ता तथा मदिरा — ये संचारीभाव से सम्बन्ध रखने वाली बीस प्रकार की दृष्टियाँ हैं । इन सबका विवेचन ‘नाट्यशास्त्र’ में बड़े विस्तार के साथ किया गया है । (द्रष्टव्य – अध्याय आठ, श्लोक ४१ – ११४ तक) 5. भ्रमण, वलन, पात, चलन, सम्प्रवेशन, विवर्तन, समुद्वृत्त, निष्कास तथा प्राकृत — ये कनीनिका के नौ कर्म हैं। नेत्रपुट के भीतर दोनों पुतलियों का मण्डलाकार आवर्तन ‘भ्रमण’ माना गया है। त्रिकोणगमन ‘वलन’ कहलाता है। नीचे की ओर खिसकना ‘पातन’ है। उनके कम्पन को ‘चलन’ जानना चाहिये । उनको भीतर घुसा देना ‘प्रवेशन’ कहलाता है। कटाक्ष करने की क्रिया को ‘विवर्तन’ कहते हैं। पुतलियों का ऊँचे उठना ‘समुद्वृत्त’ कहलाता है, निकलना ‘निष्काम’ है और स्वाभाविकरूप से उनकी स्थिति ‘प्राकृत’ कहलाती है । 6. विधुत, विनिवृत्त, निर्भुग्न, भुग्न, निवृत्त तथा उद्वाहि — ये मुख के छः कर्म हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ८, श्लोक १५३ से ५७ तक) 7. नता, मन्दा, विकृष्टा, सोच्छ्वासा, विघूर्णिता तथा स्वाभाविकी — ये छ: प्रकार की ‘नासिका’ मानी गयी हैं । (इसका लक्षण द्रष्टव्य – नाट्य० ८, श्लोक १२९ – १३६ तक) 8. विवर्तन, कम्पन, विसर्ग, विनिगूहन, संदष्टक तथा समुद्र — ये ‘ओष्ठ ‘के छः कर्म हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ८, श्लोक १४१ – १४७ ) 9. नाट्यशास्त्र में ‘पादकर्म’ के छः भेदों का उल्लेख है । उद्घट्टित, सम, अग्रतलसंचर, अञ्चित, कुञ्चित तथा सूचीपाद — ये उन छहों के नाम हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ९, श्लोक २६५ – २८० ) 10. कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चुक्कित, लेहन, सम तथा दन्तक्रियादष्ट — ये सात प्रकार की ‘चिबुकक्रिया’ हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ८, श्लोक १४७ – १५३) 11. समा, नता, उन्नता, त्र्यश्रा, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता, वलिता और निवृत्ता — ये ‘ग्रीवा’ के नौ भेद हैं। (द्रष्टव्य – श्लोक १७० – १७६ ) 12. हस्तकर्म के विशद विवेचन के लिये द्रष्टव्य – नाट्यशास्त्र, नवम अध्याय । 13. आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकम्पित, उद्वाहित तथा सम — ये ‘वक्षःस्थल’ के पाँच भेद हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ९, श्लोक २२३ – २३२) 14. कुछ लोग क्षाम, खल्व, सम तथा पूर्ण — ये ‘उदर ‘ के चार भेद मानते हैं। 15. नत, समुन्नत, प्रसारित, विवर्तित तथा अपसृत — ये ‘पार्श्वभाग के पाँच कर्म हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ९, श्लोक २३३ – २४०) 16. नाट्यशास्त्र में ‘ऊरुकर्म’ और ‘जङ्घाकर्म’ दोनों ही पाँच-पाँच बताये हैं। कम्पन, वलन, स्तम्भन, उद्वर्तन और विवर्तन — ये पाँच ‘ ऊरुकर्म’ हैं तथा आवर्तित, नत, क्षिप्त, उद्वाहित तथा परिवृत्त – ये पाँच ‘जङ्घाकर्म’ हैं । (द्रष्टव्य – अध्याय ९, श्लोक २५० – २६५ ) Content is available only for registered users. 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