July 20, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 343 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय शब्दालंकारों का विवरण शब्दालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ पद एवं वाक्य में वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ 1 कहते हैं। वृत्त्यनुप्रास के वर्णसमुदाय दो प्रकार के होते हैं — एकवर्ण और अनेकवर्ण2 ॥ १ ॥ एकवर्णगत आवृत्ति से पाँच वृत्तियाँ निर्मित होती हैं — मधुरा, ललिता, प्रौढ़ा, भद्रा तथा परुषा 3 ॥ २ ॥ मधुरावृत्ति की रचना में वर्गान्त पञ्चम वर्ण के नीचे उसी वर्ग के अक्षर तथा ‘र ण म न’ — ये वर्ण ह्रस्व स्वर से अन्तरित होकर प्रयुक्त होते हैं तथा दो नकारों का संयोग भी रहा करता है ॥ ३ ॥’ वर्ग्य वर्णों की आवृत्ति पाँच से अधिक बार नहीं करनी चाहिये। महाप्राण (वर्ग के दूसरे और चौथे अक्षर) और ऊष्मा (श ष स ह) इनके संयोग से युक्त उत्तरोत्तर लघु अक्षरवाली रचना मधुरा 4 कही गयी है ॥ ४ ॥ ललिता में वकार और लकार का अधिक प्रयोग होता है। (वकार से दन्त्योष्ट्य वर्ण और लकार से दन्त्यवर्ण समझने चाहिये। 5 ) जिसमें ऊर्ध्वगत रेफ से संयुक्त पकार, णकार एवं वर्ग्य वर्ण प्रयुक्त होते हैं, किंतु टवर्ग और पञ्चम वर्ण नहीं रहते, वह ‘प्रौढा’ 6 वृत्ति कही जाती है। जिसमें अवशिष्ट, असंयुक्त, रेफ, णकार आदि कोमल वर्ण प्रयुक्त होते हैं, वह ‘भद्रा’ अथवा ‘कोमला वृत्ति’ 7 मानी जाती है। जिसमें ऊष्मा वर्ण (श ष स ह) विभिन्न अक्षरों से संयुक्त होकर प्रयुक्त होते हैं, उसको ‘परुषा’ 8 कहते हैं। परुषावृत्ति में अकार के सिवा अन्य स्वरों की अत्यधिक आवृत्ति होती है। अनुस्वार, विसर्ग निरन्तर प्रयुक्त होने पर परुषता प्रकट करते हैं। रेफसंयुक्त श, ष, स का प्रयोग, अधिक अकार का प्रयोग, अन्तःस्थ वर्णों का अधिक निवेश तथा रेफ और अन्तःस्थ से भेदित एवं संयुक्त ‘हकार’ भी परुषता का कारण होता है। और प्रकार से भी जो गुरु वर्ण है, वह यदि माधुर्यविरोधी वर्ण से संयुक्त हो, तो परुषता लाने वाला होता है। उस परुष-रचना में वर्ग का आदि अक्षर ही संयुक्त एवं गुरु हो तो श्रेष्ठ माना गया है। पञ्चम वर्ण यदि संयुक्त हो तो परुष-रचना में उसे प्रशस्त नहीं माना गया है। किसी पर आक्षेप करना हो या किसी कठोर शब्द का अनुकरण करना हो, तो वहाँ ‘परुषा वृत्ति’ भी प्रयोग में लायी जाती है। क च ट त प — इन पाँच वर्गों, अन्तःस्थ वर्णों और ऊष्मा अक्षरों के क्रमशः आवर्तन से जो वृत्ति होती है, उसके बारह भेद हैं — कर्णाटी, कौन्तली, कौंकी, कौंकणी, वाणवासिका, द्राविडी, माथुरी, मात्सी, मागधी, ताम्रलिप्तिका, औण्ड्री तथा पौण्ड्री 9 ॥ ५-१०१/२ ॥ अनेक वर्णों की जो आवृत्ति होती है, वह यदि भिन्न-भिन्न अर्थों की प्रतिपादिका हो, तो उसे ‘यमक’ 10 कहते हैं। यमक दो प्रकार का होता है — ‘अव्यपेत’ और ‘व्यपेत’। निरन्तर आवृत्त होने वाला ‘अव्यपेत’ और व्यवधान से आवृत्त होने वाला ‘व्यपेत’ कहा जाता है। स्थान और पाद के भेद से इन दोनों के दो-दो भेद होने पर कुल चार भेद हुए। आदि पाद के आदि, मध्य और अन्त में एक, दो और तीन वर्णों की पर्याय से आवृत्ति होने पर कुल सात भेद होते हैं। यदि सात पादों में उत्तरोत्तर पाद एक, दो और तीन पदों से आरम्भ हो तो अन्तिम पाद छः प्रकार का हो जाता है। तीसरा पाद पाद के आदि, मध्य और अन्त में आवृत्ति होने से तीन प्रकार का होता है। श्रेष्ठ यमक के निम्नलिखित दस भेद होते हैं —पादान्त यमक, काञ्जी यमक, समुद्ग यमक, विक्रान्त्य यमक, वक्रवाल यमक, संदष्ट यमक, पादादि यमक, आम्रेडित यमक, चतुर्व्यवसित यमक तथा माला 11 यमक। इनके भी अन्य अनेक भेद 12 होते हैं ॥ ११-१७ ॥ सहृदयजन भिन्नार्थवाची पद की आवृत्ति को ‘स्वतन्त्र’ एवं ‘अस्वतन्त्र’ पद के आवर्तन से दो प्रकार की मानते हैं। दो आवृत्त पदों का समास होने पर ‘समस्ता’ और उनके समासरहित रहने पर ‘व्यस्ता’ आवृत्ति कही जाती है। एक पाद में विग्रह होने से असमासत्वप्रयुक्त ‘व्यस्ता’ जानी जाती है। यथासम्भव वाक्य की भी आवृत्ति इस प्रकार होती है। अनुप्रास, यमक आदि अलंकार लघु होनेपर भी इस प्रकार सुधीजनोंद्वारा सम्मानित होते हैं। आवृत्ति पदकी हो या वाक्य आदिकी, जिस किसी आवृत्तिसे भी जो वर्णसमूह ‘समान’ अनुभवमें आता है, उस आवृत्तरूपको आदिमें रखकर जो सानुप्रास पदरचना की जाती है, वह सहृदयजनोंको रसास्वाद करानेवाली होती है। सहृदयजनोंकी गोष्ठीमें जिस वाग्बन्ध (पदरचना) को कौतूहलपूर्वक पढ़ा और सुना जाता है, उसे ‘चित्र 13 कहते हैं ॥ १८-२११/२ ॥ इनके मुख्य सात भेद होते हैं — प्रश्न, प्रहेलिका, गुप्त, च्युताक्षर, दत्ताक्षर, च्युतदत्ताक्षर और समस्या। जिसमें समानान्तरविन्यासपूर्वक उत्तर दिया जाय, वह ‘प्रश्न’ कहा जाता है और वह ‘एकपृष्टोत्तर’ और ‘द्विपृष्टोत्तर ‘के भेद से दो प्रकार का होता है। ‘एकपृष्ट’ के भी दो भेद ‘समस्त’ हैं – और ‘व्यस्त’। जिसमें दोनों अर्थों के वाचक शब्द गूढ रहते हैं, उसे ‘प्रहेलिका’ कहते हैं। वह प्रहेलिका ‘आर्ची’ और ‘शाब्दी ‘ के भेद से दो प्रकार की होती है। अर्थबोध के सम्बन्ध से ‘आर्थी’ कही जाती है। शब्दबोध के सम्बन्ध से उसको ‘शाब्दी’ कहते हैं। इस प्रकार प्रहेलिका के छः भेद बताये गये 14 हैं। वाक्याङ्ग के गुप्त होने पर भी सम्भाव्य अपारमार्थिक अर्थ जिसके अङ्ग में आकाङ्क्षा से युक्त स्थित रहता है, वह ‘गुप्त’ कही जाती है। इसी को ‘गूढ़’ भी कहते हैं। जिसमें वाक्याङ्ग की विकलता से अर्थान्तर की प्रतीति विकलित अङ्ग में साकाङ्क्ष रहती है, वह ‘च्युताक्षरा’ कही जाती है। वह चार प्रकार की होती है — स्वर, व्यञ्जन, बिन्दु और विसर्ग की च्युति के भेद से। जिसमें वाक्याङ्ग के विकल अंश को पूर्ण कर देने पर भी द्वितीय अर्थ प्रतीत होता है, उसको ‘दत्ताक्षरा’ कहते हैं। उसके भी स्वर आदि के कारण पूर्ववत् भेद होते हैं। जिसमें लुप्तवर्णक स्थान पर अक्षरान्तर के रखने पर भी अर्थान्तर का आभास होता है, वह ‘च्युतदत्ताक्षरा’ कही जाती है। जो किसी पद्यांश से निर्मित और किसी पद्य से सम्बद्ध हो, वह ‘समस्या’ कही जाती है। ‘समस्या’ दूसरे की रचना होती है, उसकी पूर्ति अपनी कृति है। इस प्रकार अपनी तथा दूसरे की कृतियों के सांकर्य से ‘समस्या’ पूर्ण होती है। पूर्वोक्त ‘चित्रकाव्य’ अत्यन्त क्लेशसाध्य होता है एवं दुष्कर होने के कारण वह कवि की कवित्व-शक्ति का सूचक होता है। यह नीरस होने पर भी सहृदयों के लिये महोत्सव के समान होता है। यह नियम, विदर्भ और बन्ध के भेद से तीन प्रकार का होता है। रमणीय कविता के रचयिता कवि की प्रतिज्ञा को ‘नियम’ कहते हैं। नियम भी स्थान, स्वर और व्यञ्जन के अनुबन्ध से तीन प्रकार का होता है। काव्य में प्रातिलोम्य और आनुलोम्य से विकल्पना होती है। ‘प्रातिलोम्य’ और ‘आनुलोम्य’ शब्द और अर्थ के द्वारा भी होता है। विविध वृत्तों के वर्णविन्यास के द्वारा उन-उन प्रसिद्ध वस्तुओं के चित्रकर्मादि की कल्पना को ‘बन्ध’ कहते हैं। बन्ध के निम्नाङ्कित आठ भेद माने जाते हैं — गोमूत्रिका, अर्द्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, कमल, चक्र, चक्राब्जक, दण्ड और मुरज। जिसमें श्लोक के दोनों दोनों अर्द्धभागों तथा प्रत्येक पाद में एक एक अक्षर के व्यवधान से अक्षरसाम्य प्रयुक्त हो, उसको ‘गोमूत्रिका-बन्ध’ कहते हैं। ‘गोमूत्रिका बन्ध ‘ के दो भेद कहे जाते हैं- ‘पूर्वा गोमूत्रिका’ जिसको कुछ काव्यवेत्ता ‘अश्वपदा’ भी कहते हैं, वह प्रति अर्द्धभाग में एक-एक अक्षर के बाद अक्षरसाम्य से युक्त होती है। ‘अन्त्या गोमूत्रिका’ जिसको ‘धेनुजालबन्ध’ भी कहते हैं, वह प्रत्येक पद में एक-एक अक्षर के अन्तर से अक्षरसाम्यसमन्वित होती है ॥ २२-३८ ॥ गोमूत्रिका-बन्ध के पूर्वोक्त दोनों भेदों का क्रमशः अर्द्धभागों और अर्द्धपादों से विन्यास करना चाहिये ॥ ३८१/२ ॥ यहाँ क्रमशः नीचे-नीचे विन्यस्त वर्णों का, नीचे नीचे स्थित वर्णों का जबतक चतुर्थ पाद पूर्ण न हो जाय, तबतक नयन करे। चतुर्थ पाद पूर्ण हो जाने पर प्रतिलोमक्रम से अक्षरों को पादार्ध पर्यन्त ऊपर ले जाय । इस तरह तीन प्रकार का ‘सर्वतोभद्र-मण्डल’ बनता है । कमलबन्ध के तीन प्रकार हैं — चतुर्दल, अष्टदल और षोडशदल । चतुर्दल कमल को इस प्रकार से आबद्ध किया जाता है — प्रथम पाद के ऊपरी तीन पदों वाले अक्षर सभी पादों के अन्त में रखे जाते हैं । पूर्वपाद के अन्तिम वर्ण को पिछले पाद के आदि में प्रातिलोम्यक्रम से रखा जाय। अन्तिम पाद के अन्तिम दो अक्षरों को प्रथम पाद के आदि में निविष्ट किया जाय। यह स्थिति चतुर्दल कमल में होती है । अष्टदल कमल में अन्त्य पाद के अन्तिम तीन अक्षरों को प्रथम पाद के आदि में विन्यस्त किया जाता है । षोडशदल कमल में दो अक्षरों के बीच में कर्णिका – मध्यवर्ती एक अक्षर का उच्चारण होता है। कर्णिका के अन्त में ऊपर पत्राकार अक्षरों की पङ्क्ति लिखे और उसे कर्णिका में प्रविष्ट कराये । यह बात चतुर्दल कमल के विषय में कही गयी है। कर्णिका में एक अक्षर लिखे और दिशाओं तथा विदिशाओं में दो-दो अक्षर लिखे ; प्रवेश और निर्गम का मार्ग प्रत्येक दिशा में रखे । यह बात ‘अष्टदल कमल के विषय में कही गयी है । चारों ओर विषम वर्णों का उतनी ही पत्रावली बनाकर न्यास करे और मध्यकर्णिका में सम अक्षरों का एक अक्षर के रूप में न्यास करे । यह बात ‘ षोडशदल कमल’ के विषय में बतायी गयी है। ‘चक्रबन्ध’ दो प्रकार का होता है — एक चार अरों का और दूसरा छः अरों का । उनमें जो आदिम, अर्थात् चार अरों वाला चक्र है, उसके पूर्वार्द्ध में समवर्णों की स्थापना करे और प्रत्येक पाद के जो प्रथम, पञ्चम आदि विषमवर्ण हैं, उनको एवं चौथे और आठवें, दोनों समवर्णों को क्रमशः उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम के अरों में रखे ॥ ३९–४९ ॥ उत्तर पादार्ध के चार अक्षरों को नाभि में रखे और उसके आदि अक्षर को पिछले दो अरों में ले जाय। शेष दो पदों को नेमि में स्थापित करे। तृतीय अक्षर को चतुर्थ पाद के अन्त में तथा प्रथम दो समवर्णों को तीनों पादों के अन्त में रखे। यदि दसवाँ अक्षर सम हो तो उसे प्रथम अरे पर रखे और छः अक्षरों को पश्चिम अरे पर स्थापित करे। वे दो-दो के अन्तर से स्थापित होंगे। इस प्रकार ‘बृहच्चक्र ‘का निर्माण होगा। यह ‘बृहच्चक्र’ बताया गया। सामने के दो अरों में क्रमशः एक एक पाद लिखे। नाभि में दशम अक्षर अङ्कित करे और नेमि में चतुर्थ चरण को ले जाय। श्लोक के आदि, अन्त और दशम अक्षर समान हों तथा दूसरे और चौथे चरणों के आदि और अन्तिम अक्षर भी समान हों। प्रथम और चौथे चरण के प्रथम, चतुर्थ और पञ्चम वर्ण भी समान हों। द्वितीय चरण को विलोमक्रम से पढ़ने पर यदि तृतीय चरण बन जाता हो तो उसे पत्र के स्थान में स्थापित करे तो उस रचना का नाम ‘दण्डचक्राब्जबन्ध’ समझना चाहिये। पूर्वदल (पूर्वार्द्ध) में दोनों चरणों के द्वितीय अक्षर एक समान हों और उत्तरार्द्ध में दोनों चरणों के सातवें अक्षर समान हों। साथ ही द्वितीय अक्षरों की दृष्टि से भी पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध परस्पर समता रखते हों। दूसरे, छठे तथा चौथे, पाँचवें भी एक-दूसरे के तुल्य हों। उत्तरार्द्ध भाग के सातवें अक्षर प्रथम और चतुर्थ चरणों के उन्हीं अक्षरों के समान हों तो उन तुल्य रूपवाले चतुर्थ और पञ्चम अक्षर की क्रमशः योजना करनी चाहिये। क्रमपादगत जो चतुर्थ अक्षर हैं, उनको तथा दलान्त वर्णों को पूर्ववत् स्थापित करना चाहिये। ‘मुरजबन्ध ‘में पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनों के अन्तिम और आदि अक्षर समान होते हैं। पादार्द्ध भाग में स्थित जो वर्ण है, उसे प्रातिलोम्यानुलोम्य-क्रम से स्थापित करे। अन्तिम अक्षर को इस प्रकार निबद्ध करे कि वह चौथे चरण का आदि अक्षर बन जाय। चौथे चरण में जो आदि अक्षर हो, उससे नवें तथा सोलहवें अक्षर से पुटक के बीच- बीच में चार-चार अक्षरों का निवेश करे। ऐसा करने से उस श्लोकबन्धद्वारा मुरज (ढोल) की आकृति स्पष्ट हो जाती है। द्वितीय चक्र ‘शार्दूलविक्रीडित’ छन्द से सम्पादित होता है। ‘गोमूत्रिकाबन्ध’ सभी छन्दों से निर्मित हो सकता है। अन्य सब बन्ध अनुष्टुप् छन्द से निर्मित होते हैं। यदि इन बन्धों में कवि और काव्य का नाम न हो तो मित्रभाव रखने वाले लोग संतुष्ट होते हैं तथा शत्रु भी खिन्न नहीं होता। बाण, धनुष, व्योम, खड्ग, मुद्गर, शक्ति, द्विशृङ्गाट, त्रिशृङ्गाट, चतुः शृङ्गाट, वज्र, मुसल, अङ्कुश, रथपद, नागपद, पुष्करिणी, असिपुत्रिका (कटारी या छुरी) — इन सबकी आकृतियों में चित्रबन्ध लिखे जाते हैं। ये तथा और भी बहुत-से ‘चित्रबन्ध’ हो सकते हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुषों को स्वयं जानना चाहिये ॥ ५०-६५ ॥15 ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘शब्दालंकार का कथन’ नामक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४३ ॥ 1. अनुप्रास का लक्षण अग्निदेव ने ‘स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययो: ।’ – इस प्रकार कहा है । इसी का आधार लेकर आचार्य मम्मट ने लिखा है कि ‘सरूपवर्णविन्यासमनुप्रासं प्रचक्षते ।’ (पूर्वे विद्वांस इति शेषः ।) ‘वर्णसाम्यमनुप्रासः ।’ (का० प्र० ९ । ७९), ‘अनुप्रासः शब्दसाम्यम् ।’ (सा० द० १० । ३) — ये मम्मट और विश्वनाथकथित लक्षण भी उक्त अभिप्राय के ही पोषक हैं। 2. ‘नाट्यशास्त्र’ १६।४० में भरत ने उपमा, दीपक, रूपक और यमक – ये चार ही अलंकार माने हैं । व्यासजी ने अनुप्रास का उल्लेख किया है। भामह ने अपने से पूर्व अनुप्रास की मान्यता स्वीकार की है। ‘वृत्त्यनुप्रास’ के अग्निपुराणोक्त लक्षण का भाव लेकर भोजराज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में इस प्रकार लिखा है — मुहुरावर्त्यमानेषु यः स्ववर्ग्येषु वर्तते । काव्यव्यापी स संदर्भो वृत्तिरित्यभिधीयते ॥ (२।७८) आचार्य मम्मट ने ‘एकस्याप्यसकृत्परः ‘ – इस सूत्रभूत वाक्य के द्वारा अग्निपुराणोक्त लक्षण की ओर ही संकेत किया है। इसी भाव को कविराज विश्वनाथ ने निम्नाङ्कित शब्दों में विशद किया है— अनेकस्यैकधा साम्यमसकृद्वाप्यनेकधा । एकस्य सकृदप्येष वृत्त्यनुप्रास उच्यते ॥ (१० । ४) 3. अग्निपुराण में जहाँ पाँच वृत्तियों का उल्लेख है, वहीं परवर्ती आलोचकों ने अन्यान्य वृत्तियों का भी उत्प्रेक्षण किया है। भोजराज ने ‘वृत्ति’ के तीन गुण बताये हैं — सौकुमार्य, प्रौढ़ि और मध्यमत्व । साथ ही वृत्ति के बारह भेदों का उल्लेख किया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं — गम्भीरा, ओजस्विनी, प्रौढ़ा, मधुरा, निष्ठुरा, श्लथा, कठोरा, कोमला, मिश्रा, परुषा, ललिता और अमिता । अग्निपुराणकथित पाँचों वृत्तियाँ भी इनके अन्तर्गत हैं । भद्रा के स्थान में कोमला वृत्ति समझनी चाहिये । 4. भोजराज ने ‘मधुरा वृत्ति’ के उदाहरण के रूप में निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत किया है — किञ्जल्कसङ्गिशिञ्जानभृङ्गलाञ्छितचम्पकः । अयं मधुरुपैति त्वां चण्डि पङ्कजदन्तुरः ॥ (२ । १९३) 5. भोजराज ने इसमें तालव्य वर्णों का भी समावेश माना है । ‘ललिता’ का उदाहरण इस प्रकार है — द्राविडीनां ध्रुवं लीलारेचितभ्रूलते मुखे । आसज्य राज्यभारं स्वं सुखं स्वपिति मन्मथः ॥ (सर० कं० २ । २००) 6. भोजराज के मत से इसमें प्रायः मूर्धन्य, अन्तःस्थ तथा संयोगपूर्व गुरुवर्णों का प्रयोग होता है । यथा — कृत्वा पुंवत्पातमुचैर्भृगुभ्यां मूर्ध्नि ग्राव्णां जर्जरा निर्झरौघाः । कुर्वन्ति द्यामुत्पतन्तं स्मरार्तं स्वर्लोकस्त्रीगात्रनिर्वाणमत्र ॥ ( सर० कं० २ । १९२) 7. कोमला या भद्रा का उदाहरण — दारुणरणे रणन्तं करिदारणकारणं कृपाणं ते । रमणकृते रणरणकी पश्यति तरुणीजनो दिव्यः ॥ ( सर० कं० २ । १९७ ) 8. परुषा । यथा- जह्ने निर्हादिह्रादोऽसौ कह्लाराह्लादितहृदः । प्रसह्य मह्या गर्ह्यत्वमर्हणार्हः शरन्मरुत् ॥ ( सर० कं० २ । १९९) 9. अग्निपुराणवर्णित इन वृत्तियों के देश-भेद से जो बारह भेद हैं, उन्हें भोजराज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में ज्यों-का-त्यों ले लिया है और अपनी ओर से उनके लक्षण तथा उदाहरण प्रस्तुत किये हैं (द्रष्टव्यः २।७८ – ८१ कारिकातक) । 10. ‘नाट्यशास्त्र’ में भरतमुनि ने ‘शब्दाभ्यासस्तु यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।’ (१।५९ ) — इस प्रकार ‘यमक’ का लक्षण किया है। इसी का आशय लेकर व्यासजी ने ‘अनेकवर्णावृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका । यमकं साव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा ॥’ — ऐसा लक्षण किया है। इसी का आश्रय लेकर दण्डी ने- ‘अव्यपेतव्यपेतात्मा याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । यमकं तत् … ॥ ‘ – ऐसा लक्षण प्रस्तुत किया है। (काव्यादर्श ३। १) इन्हीं लक्षणों को आधार बनाकर भोजराज ने ‘यमक’ का लक्षण इस प्रकार किया है — विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ (२ । ५८) 11. यमक के जो ‘ पादान्त यमक’ आदि दस भेद निरूपित हुए हैं, वे ‘नाट्यशास्त्र’ अध्याय १६, श्लोक ६०-६२ तक ज्यों-के- त्यों उपलब्ध होते हैं तथा श्लोक ६३ से ८६ तक इन सबके लक्षण और उदाहरण भी दिये गये हैं । उन सबको वहीं देखना चाहिये । केवल एक ‘ पादान्त – यमक’ का लक्षण और उदाहरण यहाँ दिग्दर्शनमात्र के लिये दिया जाता है। जहाँ चारों पादों के अन्त में एक समान अक्षर प्रयुक्त होते हैं, उसे ‘पादान्त – यमक’ जानना चाहिये । जैसे — निम्नाङ्कित श्लोक के चारों पादों के अन्त में ‘मण्डल’ – इन तीन अक्षरों की समानरूप से आवृत्ति हुई है — दिनक्षयात्संहृतरश्मिमण्डलं दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् । विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम् ॥ ( १६ | ६४) आचार्य भामह ने यमक के पाँच ही भेद दिये हैं — आदि यमक, मध्यान्त यमक, पादाभ्यास, आवली और समस्तपाद यमक (द्रष्टव्य भामह ‘काव्यालं० ‘ द्वितीय परिच्छेद) । आचार्य वामन ने ‘पाद – यमक’, एक पाद के आदिमध्यान्त्य यमक, दो पादों के आदिमध्यान्त्य यमक, एकान्तर पादान्त यमक, एकान्तर पादादि मध्य यमक, द्विविध अक्षर यमक, त्रिविध भृङ्गमार्ग – शृङ्खला, परिवर्तक और चूर्ण आदि भेद माने हैं। 12. ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ के रचयिता भोजराज ने अग्निपुराण के इसी प्रसङ्ग में अपनी सुस्पष्ट वाणी द्वारा इस प्रकार कहा है — विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ तदव्यपेतयमकं व्यपेतयमकं तथा । स्थानास्थानविभागाभ्यां पादभेदाच्च भिद्यते ॥ यत्र पादादिमध्यान्ताः स्थानं तेषुपकल्प्यते । यदव्यपेतमन्यद्वा तत्स्थानयमकं तत्स्थानयमकं विदुः ॥ चतुस्त्रिद्वयेकपादेषु यमकानां विकल्पनाः । आदिमध्यान्तमध्यान्तमध्याद्यन्ताश्च सर्वतः ॥ अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः सम्भेदयोनयः । सुकरा दुष्कराश्चैव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ (२।५८-६२) उपर्युक्त श्लोकों के अनुसार यमकों के भेद इस प्रकार बनते हैं — ‘स्थानयमक’ और ‘अस्थानयमक’ । स्थानयमकों में — चतुष्पाद यमक, त्रिपाद यमक, द्विपाद यमक और एकपाद यमक होते हैं । चतुष्पाद यमकों में अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, आद्यन्त यमक, मध्यान्त यमक तथा आदिमध्यान्त यमक । त्रिपाद यमकों में अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक । द्विपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक इत्यादि । एकपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक । इसी प्रकार सकृत् आवृत्ति और असकृत् आवृत्ति में भी अव्यपेत यमक होता है । ‘अव्यपेत’ का अर्थ है – अव्यवहित और ‘व्यपेत’ का अर्थ है – व्यवधानयुक्त | आवृत्ति की एकरूपता और अधिकता में भी अव्यपेत आदि, मध्यादि यमक होने सम्भव हैं । व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, मध्यान्त्य यमक और आदिमध्यान्त्य यमक — ये चतुष्पाद यमकों में होते हैं । त्रिपाद और द्विपाद यमकों में भी व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक और अन्त्य यमक होते हैं। आवृत्ति की अधिकता में भी आदि, मध्य यमक के व्यपेतरूप देखे जाते हैं । इसी तरह आवृत्ति की एकरूपता में भी आदि, मध्य तथा मध्यान्त्य यमक कविजनों की रचनाओं में उपलब्ध हैं। इन सबमें आवृत्ति व्यवहित होती है, इसलिये इनको ‘व्यपेत यमक’ कहा जाता है । जहाँ आदि, मध्य और अन्त का नियम न हो, ऐसे यमकों को ‘अस्थानयमक’ कहते हैं । इनके भी व्यपेत और अव्यपेत आदि बहुत से स्थूल सूक्ष्म भेद हैं । इन सबका विस्तार ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’, द्वितीय परिच्छेद में देखना चाहिये । 13. चित्र के छः भेद हैं — वर्ण, स्थान, स्वर, आकार, गति और बन्ध । वर्णचित्र के चतुर्व्यञ्जन, त्रिव्यञ्जन, द्विव्यञ्जन, एकव्यञ्जन, क्रमस्थसर्वव्यञ्जन, छन्दोऽक्षरव्यञ्जन, षड्जादिस्वरव्यञ्जन, मुरजाक्षर व्यञ्जन । चतुःस्थान चित्रों में निष्कण्ठ्य, निस्तालव्य, निर्दन्त्य, निरोष्ठ्य, निर्मूर्धन्य । चतुः स्वरों में दीर्घस्वर, प्रतिव्यञ्जनविन्यस्त स्वर, अपास्तसमस्तस्वर | आकार – चित्रों में अष्टदल कमल, चतुर्दल कमल, षोडशदल कमल, चक्र, चतुरङ्क । गतिचित्रों में गतप्रत्यागत, तुरङ्गपद, अर्द्धभ्रम, श्लोकार्द्धभ्रम, सर्वतोभद्र । बन्धचित्रों में द्विचतुष्कचक्रबन्ध, द्विशृङ्गारबन्धक, विविडितबन्ध, षड्यन्त्रबन्ध, व्योमबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध, मुरजबन्ध, एकाक्षर मुरजबन्ध, मुरजप्रस्तार, पादगोमूत्रिका, अयुग्मपादगोमूत्रिका, युग्मपादगोमूत्रिका, श्लोकगोमूत्रिका, विपरीतगोमूत्रिका, भिन्नछन्दोगोमूत्रिका, संस्कृतप्राकृतगोमूत्रिका, अर्धमूत्रिकाप्रस्तार, गोमूत्रिकाधेनु, शतधेनु, सहस्त्रधेनु, अयुतधेनु, लक्षधेनु, कोटिधेनु, कामधेनु इत्यादि परिगणित चित्रों के अतिरिक्त भी अनेक बन्ध होते हैं, जैसे — शरबन्ध, धनुर्बन्ध, मुसलबन्ध, खड्गबन्ध, क्षुरिकाबन्ध आदि । इनके अतिरिक्त भी अनेकानेक बन्ध विद्वानों द्वारा ऊहनीय हैं। चित्रकाव्यों की चर्चा दण्डी के ‘काव्यादर्श’ में भी मिलती है और भोजराज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में उनका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। 14. भोजराजके मतमें ‘प्रहेलिका ‘के छः भेद यों होते हैं- च्युताक्षरा, दत्ताक्षरा, च्युतदत्ताक्षरा, अक्षरमुष्टिका, विन्दुमोती तथा अर्थवती । (सरस्वतीकण्ठाभरण, परिच्छेद २ । १३३ ) 15. इस अध्यायके अन्तिम बीस-पचीस श्लोकोंका मूल अधिक स्पष्ट नहीं है। इनका आधार अन्वेषणीय है। Content is available only for registered users. 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