अग्निपुराण – अध्याय 346
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय
काव्य गुण-विवेक
काव्यगुणविवेकः

अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होने पर भी सहृदय के लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारी के यौवनजनित लालित्य से 1  रहित शरीर पर हार भी भारस्वरूप हो जाता है। यदि कोई कहे कि — ‘गुणनिरूपण की क्या आवश्यकता है? दोषों का अभाव ही गुण हो जायगा’ तो उसका ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि ‘श्लेष’ आदि गुण और ‘गूढार्थत्व’ आदि दोष पृथक् पृथक् कहे गये हैं। जो काव्य में महती शोभा का आनयन करता है, उसको ‘गुण’ कहा जाता है। यह सामान्य और वैशेषिक के भेद से दो प्रकार का हो जाता है। जो गुण सर्वसाधारण हो, उसे ‘सामान्य’ कहा जाता है। सामान्य गुण शब्द, अर्थ और शब्दार्थ को प्राप्त होकर तीन प्रकार का हो जाता है। जो गुण काव्य-शरीर में शब्द के आश्रित होता है, वह ‘शब्दगुण’ कहलाता है। शब्दगुण के सात 2  भेद होते हैं — श्लेष, लालित्य, गाम्भीर्य, सौकुमार्य, उदारता, ओज और यौगिकी (समाधि)। शब्दों का सुश्लिष्ट संनिवेश ‘श्लेष’ 3  कहा जाता है।’

जहाँ गुणादेश आदि के द्वारा पूर्वपदसम्बद्ध अक्षर संधि को प्राप्त नहीं होता, वहाँ ‘लालित्य’ 4  गुण माना गया है। विशिष्ट लक्षण के अनुसार उल्लेखनीय उच्चभावव्यञ्जक शब्दसमूह को श्रेष्ठ पुरुष ‘गाम्भीर्य’ 5  कहते हैं। वही अन्यत्र ‘उत्तान शब्दक’ या ‘शब्दत्व’ नाम से प्रसिद्ध है। जिसमें निष्ठुरतारहित कोमल अक्षरों का बाहुल्य हो, उस शब्दसमूह को ‘सौकुमार्य’ 6  गुणविशिष्ट माना गया है। जहाँ श्लाघ्य विशेषणों से युक्त उत्कृष्ट पद का प्रयोग हो वहाँ ‘औदार्य’ 7  गुण माना जाता है। समासों का बाहुल्य ‘ओज’ 8  कहलाता है। यह गद्य-पद्यारूप काव्य का प्राण है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्य्यन्त जो कोई भी प्राणी हैं, उनके ‘पौरुष ‘ का वर्णन एकमात्र ‘ओज’ गुणविशिष्ट पदावली से ही होता है। जिस किसी भी शब्द के द्वारा वर्ण्यमान वस्तु का उत्कर्ष वहन करने वाला गुण ‘अर्थगुण’ कहा जाता है। अर्थगुण के छः भेद प्रकाशित होते हैं — माधुर्य, संविधान, कोमलता, उदारता, प्रौढि एवं सामयिकता। क्रोध और ईर्ष्या में भी आकार की गम्भीरता तथा धैर्यधारण को ‘माधुर्य’ 9  कहते हैं। अपेक्षित कार्य की सिद्धि के लिये उद्योग ‘संविधान’ माना गया है। जो कठिनता आदि दोषों से रहित है तथा संनिवेश विशेष का तिरस्कार करके मृदुरूप में ही भासित होता है, वह गुण ‘कोमलता’ के नाम से प्रसिद्ध है ॥ १-१४ ॥

जिसमें स्थूललक्ष्यत्व की प्रवृत्ति का लक्षण लक्षित होता है, आशय अत्यन्त सुन्दररूप में प्रकट होता है, वह ‘उदारता’ 10  नामक गुण है। इच्छित अर्थ के प्रति निर्वाह का उपपादन करने वाली हेतुगर्भिणी युक्तियों को ‘प्रौढ़ि’ 11  कहते हैं। स्वतन्त्र या परतन्त्र कार्य के बाह्य एवं आन्तरिक संयोग से अर्थ की जो व्युत्पत्ति होती है, उसको ‘सामयिकता’ कहते हैं। जो शब्द एवं अर्थ — दोनों को उपकृत करता है, वह ‘उभयगुण’ (शब्दार्थगुण) कहलाता है। साहित्यशास्त्रियों ने इसका विस्तार छः भेदों में किया है — प्रसाद, सौभाग्य, यथासंख्य, प्रशस्तता, पाक और राग । सुप्रसिद्ध अर्थ से समन्वित पदों का संनिवेश ‘प्रसाद’ 12  कहा जाता है। जिसके उक्त होने पर कोई गुण उत्कर्ष को प्राप्त हुआ प्रतीत होता है, विद्वान् उसको ‘सौभाग्य’ या ‘औदार्य बतलाते हैं। तुल्य वस्तुओं का क्रमशः कथन ‘यथासंख्य’ 13  माना जाता है। समयानुसार वर्णनीय दारुण वस्तु का भी अदारुण शब्द से वर्णन ‘प्राशस्त्य’ कहलाता है। किसी पदार्थ की उच्च परिणति को ‘पाक’ कहते हैं। ‘मृद्धीकापाक’ एवं ‘नारिकेलाम्बुपाक’ के भेद से ‘पाक’ दो प्रकार का होता है। आदि और अन्त में भी जहाँ सौरस्य हो, वह ‘मृद्धीकापाक’ है। काव्य में जो छायाविशेष (शोभाधिक्य) प्रस्तुत किया जाय, उसे ‘राग’ कहते हैं। यह राग अभ्यास में लाया जाने पर सहज कान्ति को भी लाँघ जाता है, अर्थात् उसमें और भी उत्कर्ष ला देता है। जो अपने विशेष लक्षण से अनुभव में आता हो, उसे ‘वैशेषिक गुण’ जानना चाहिये। यह राग तीन प्रकार का होता है — हारिद्रराग, कौसुम्भराग और नीलीराग। (यहाँतक सामान्य गुण का विवेचन हुआ)। अब ‘वैशेषिक’ का परिचय देते हैं। वैशेषिक उसको जानना चाहिये, जो स्वलक्षणगोचर हो— अनन्यसाधारण हो ॥ १५-२६ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘काव्यगुणविवेककथन’ नामक तीन सी छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४६ ॥

1. इसी भाव को लेकर वामन ने कहा है —
यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः ।
अपि जनदयितानि दुर्भगत्वं नियतमलंकरणानि संश्रयन्ते ॥
अर्थात् — ‘गुणरहित वचन नारी के यौवनरहित रूप की भाँति मनोरम नहीं होता । यदि उसे अलंकृत भी किया जाय तो वे अलंकार अपना दुर्भाग्य सूचित करते हैं ।’
2. भरतमुनि ने काव्यार्थ-गुण दस माने हैं —
श्लेषः प्रसादः समता समाधिर्माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम् ।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च काव्यार्थगुणा दशैते ॥
अग्निदेव ने शब्दगुण सात, अर्थगुण छः और शब्दार्थ-गुण छः माने हैं । काव्यादर्शकार दण्डी ने भी भरतोक्त दस गुणों का ही उल्लेख किया है । वामन ने बीस और भोज ने अड़तालीस गुण प्रदर्शित किये हैं ।
3. भामह ने माधुर्य, प्रसाद और ओज — इन तीन गुणों को ही स्वीकार किया है । वामन ने शब्दगुण दस और अर्थगुण भी दस माने हैं। नाम दोनों विभागों के एक ही हैं, केवल लक्षण में अन्तर है। उन्होंने ‘शब्दश्लेष’ का लक्षण इस प्रकार किया है — ‘ मसृणत्वं श्लेषः ‘ । इसकी व्याख्या करते हुए वे स्वयं लिखते हैं — “मसृणत्वं नाम यस्मिन् सति बहून्यपि पदानि एकवद् भासन्ते । — अर्थात् जिसके होने पर बहुत-से पद एकपद के तुल्य प्रतीत होते हैं, उसका नाम ‘मसृणत्व’ है।” उदाहरण के लिये ‘अस्त्युत्तरस्याम् ‘ — यह पद्यांश है। इसमें दो पद संधियुक्त होकर एकपदवत् प्रतीत होते हैं । दण्डी ने ‘श्लिष्टमस्पृष्टशैथिल्यम् ‘ — यह श्लेष का लक्षण लिखा है। इसके अनुसार जिस वाक्य में शिथिलता छू भी न गयी हो, वह ‘श्लेष’ है । इसका और वामनोक्त लक्षण का आधार अग्निपुराण का ‘सुश्लिष्टसंनिवेशत्वं शब्दानां श्लेषः । ‘ — यह लक्षण ही है । भोजराज ने इसी का भाव लेकर ‘सुश्लिष्टपदता श्लेषः । ‘ — यह लक्षण लिखा है ।
4.5. लालित्य’ नामक गुण का उल्लेख अन्यत्र नहीं मिलता । गाम्भीर्य का लक्षण भोजराज ने इस प्रकार किया है — ‘ ध्वनिमत्ता तु गाम्भीर्यम्’ । इसमें भी अग्निपुराणोक्त लक्षण की भावच्छाया दीख पड़ती है ।
6. भोजराज के ‘अनिष्ठुराक्षरप्रायं सुकुमारमिति स्मृतम् । ‘ — इस लक्षण में अग्निपुराण की शब्दावली का ही समावेश किया गया है। दण्डी ने भी इसी आनुपूर्वी में ‘सुकुमारता’ को लक्षित कराया है । वामन ने बन्ध की अकठोरता को ही ‘सौकुमार्य’ कहा है। उसका आधार भी अग्निपुराणोक्त लक्षण ही है ।
7. काव्यादर्शकार दण्डी ने ‘औदार्यका’ यही लक्षण थोड़े-से पदों के हेर-फेर के साथ अपने ग्रन्थ में ले लिया है। भोजराज ने वैभव के उत्कर्ष का प्रतिपादन ‘औदार्य’ माना है, किंतु यह उनका अर्थगुण है — ‘भूत्युत्कर्ष उदारता । ‘ — शब्दगुणान्तर्गत उदारता का लक्षण उनके मत में ‘विकटाक्षरबन्धत्व’ है, जो वामनोक्त लक्षण से मेल खाता है । वामन ने ग्राम्यत्वदोष से रहित रचना को ‘औदार्यगुणशालिनी’ स्वीकार किया है । यथा — ‘अग्राम्यत्वमुदारता ।’ (३ । २ । १२) किंतु यह उनके ‘अर्थगुण’ का लक्षण है। शब्दगुण के लक्षण में वे बन्ध की विकटता को ही ‘उदारता’ मानते हैं। जिसके होने पर पद नृत्य करते-से प्रतीत होते हैं ।
8. ‘काव्यादर्श ‘ में भी ‘ओज’ का यही लक्षण उद्धृत किया गया है । वामन ने निबन्ध के गाढ़त्व को ‘ओज’ कहा है। यह गाढ़त्व समास-बाहुल्य से ही आता है । अतः वामन ने कोई नयी बात नहीं कही है। ‘ सरस्वतीकण्ठाभरण ‘ के निर्माता भोजराज ने भी अग्निपुराण की आनुपूर्वी में ही ‘ओज : ‘ समासभूयष्ट्वम् ।’ – इस प्रकार ‘ओज’ का लक्षण लिखा है।
9. वामन ने ‘पृथक्-पदत्वं माधुर्यम् ।’ – यह लिखकर बताया है, जहाँ पद्य में सभी पद पृथक्-पृथक् हों, समास में आबद्ध होने के कारण विकट या जटिल न हो जायँ, वहा ‘माधुर्य’ है । यह शब्दगत माधुर्य का लक्षण है । अर्थगत माधुर्य वे वहाँ मानते हैं, जहाँ उक्ति-वैचित्र्य हो। दण्डी ने सरस वाक्य को ‘मधुर’ बताया है, परंतु राजा भोज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में अग्निपुराणोक्त लक्षण का ही भाव लेकर लिखा है – ‘माधुर्यमुक्तमाचार्यैः क्रोधादावप्यतीव्रता ‘ । यह अर्थगत माधुर्य है । शब्दगत माधुर्य का लक्षण वे भी वामन की भाँति ‘पृथक्पदत्व’ ही मानते हैं ।
10. दण्डी ने शब्दान्तर से अपने लक्षण में कुछ ऐसा ही भाव प्रकट किया है। उनका कहना है कि — “जिस वाक्य का उच्चारण करने पर उसमें किसी उत्कृष्ट गुण की प्रतीति हो, वहाँ ‘उदारता’ नामक गुण है। उसके द्वारा काव्यपद्धति ‘कृतार्थ’ (चमत्कारकारिणी) होती है । ”
11. भोजराज ने इसी अभिप्राय को और भी सरल रीति से व्यक्त किया है — ‘ विवक्षितार्थनिर्वाहः काव्ये प्रौढिरिति स्मृता’ ।
12. दण्डी ने इसी लक्षण का भाव लेकर प्रसादवत् प्रसिद्धार्थम् ।’ – ऐसा लक्षण किया है । वामन ने भी ‘अर्थवैमत्यं प्रसादः । ‘ — यों कहकर इसी अभिप्राय की पुष्टि की है। भोजराज ने भी ‘ यत्तु प्राकट्यमर्थस्य प्रसादः सोऽभिधीयते ‘ — यों लिखकर पूर्वोक्त अभिप्राय का ही पोषण किया है।
13. ‘यथासंख्य’ को अर्वाचीन आलंकारिकों ने गुण नहीं माना है, उसे अलंकार की कोटि में रखा है ।

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