अग्निपुराण – अध्याय 353
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय
नपुंसकलिङ्ग शब्दों के सिद्ध रूप
व्याकरणे नपुंसकशब्दसिद्धरूपं

भगवान् स्कन्द कहते हैं — नपुंसकलिङ्ग में ‘किम्’ शब्द के ये रूप होते हैं — (प्रथमा) किम्, के, कानि । (द्वितीया) किम्, के, कानि । शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। जलम् (प्र० ए०), सर्वम् (प्र० ए० ) । पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व और अन्तर — इन सब शब्दों के रूप इसी प्रकार होते हैं। सोमपम् (प्र० द्वि० ए० ), सोमपानि (प्र० द्वि० ब० ) — ये ‘सोमप’ शब्द के रूप हैं। ‘ग्रामणी’ शब्द के नपुंसकलिङ्ग में इस प्रकार रूप होते हैं — ग्रामणि (प्र० द्वि० – ए०), ग्रामणिनी (प्र० द्वि० – द्वि०), ग्रामणीनि (प्र०, द्वि० ) । इसी प्रकार ‘वारि’ शब्द के रूप होते हैं — वारि (प्र० द्वि० ए० ), वारिणी (प्र०, द्वि०- द्वि०), वारीणि (प्र० द्वि० – ब ० ), वारीणाम् ( ष० – ब० ), वारिणि (स० ए० ) । शुचये-शुचिने ( च० ए० ) और मृदुने – मृदवे ( च० – ए० ) ये क्रम से ‘शुचि’ और ‘मृदु’ शब्द के रूप हैं। त्रपु (प्र०, द्वि० – ए० ), त्रपुणी (प्र०, द्वि० – द्वि० ), त्रपूणाम् ( ष० – ब ० )  – ये ‘ त्रपु ‘ शब्द के कतिपय रूप हैं । ‘खलपुनि’ तथा ‘खलप्वि’ — ये दोनों नपुंसक ‘खलपू’ शब्द के सप्तमी, एकवचन के रूप हैं । कर्त्रा – कर्तृणा (तृ० – ए०), कर्तृणे – कर्त्रे ( च० ए० ) – ये ‘कर्तृ’ शब्द के रूप हैं। अतिरि (प्र० द्वि० – ए० ), अतिरिणी (प्र०, द्वि० – द्वि० ) — ये ‘अतिरि’ शब्द के रूप हैं । अभिनि (प्र०, द्वि०- ए० ), अभिनिनी ( प्र०, द्वि० – द्वि० ) – ये ‘अभिनि’ शब्दके रूप हैं । सुवचांसि (प्र०, द्वि० – ब ० ), यह ‘सुवचस्’ शब्द का रूप है । सुवाक्षु (स० – ब ० ) यह ‘सुवाच्’ शब्द का रूप है।’ ‘यत्’ शब्द के दो यत्-यद् (प्र० द्वि० ए०) हैं। ‘तत्’ शब्द के ‘तत्- तद् ( प्र०, द्वि०- ए०), ‘कर्म’ शब्द के कर्माणि (प्र० द्वि० – ब०), ‘इदम्’ शब्द के इदम् (प्रo, द्वि० – ए०), इमे (प्र० द्वि० – द्वि०), इमानि (प्र०, द्वि० – ब ० ) — ये रूप हैं । ईदृक्- ईदृग् (प्र०, द्वि०- ए० ) — यह ‘ईदृश्’ शब्द का रूप है । अदः ( प्र०, द्वि० – ए० ), अमुनी (प्र०, द्वि० – द्वि० ), अमूनि (प्र०, द्वि० ब० ) । अमुना (तृ- ए०), अमीषु (स० – ब ० ) — ‘ अदस्’ शब्द के ये रूप भी पूर्ववत् सिद्ध होते हैं । ‘युष्मद्’ और ‘अस्मद् ‘ शब्द के रूप इस प्रकार होते हैं — अहम् (प्र० ए० ), आवाम् (प्र० – द्वि०), वयम् (प्र०- ब० ) । माम् (द्वि०- ए०), आवाम् ( द्वि० – द्वि० ), अस्मान् (द्वि०-ब०) । मया (तृ० – ए ० ), आवाभ्याम् (तृ०, च० – द्वि०), अस्माभिः (तृ० – ब ० ) । मह्यम् ( च० – ए० ), अस्मभ्यम् ( च० – ब ० ) । मत् ( प० – ए० ), आवाभ्याम् (प० – द्वि०), अस्मत् (प० ब० ) । मम ( ष० ए०), आवयोः ( ष०, स०- द्वि०), अस्माकम् ( ष० – ब० ) । अस्मासु (स०- ब०) – ये ‘अस्मद्’ शब्दके रूप हैं । त्वम् (प्र०- ए ० ), युवाम् (प्र० – द्वि०) यूयम् (प्र०- ब०)। त्वाम् (द्वि०-ए०), युवाम् ( द्वि० – द्वि० ), युष्मान् (द्वि०- ब० ) । त्वया (तृ० ए० ), युष्माभिः (तृ० – ब० ) । तुभ्यम् ( च०- ए ० ), युवाभ्याम् (तृ०, च० – द्वि० ), युष्मभ्यम् ( च० – ब ० ) । त्वत् (प०- ए०) युवाभ्याम् (प० – द्वि०) युष्मत् (प०- ब० ) । तव ( ष० – ए० ), युवयोः (ष०, स०- द्वि०), युष्माकम् ( ष० – ब ० ) । त्वयि (स०- ए ० ), युष्मासु (स० – ब० ) – ये ‘युष्मद्’ शब्द के रूप हैं । यहाँ ‘ अजन्त’ और ‘हलन्त’ शब्दोंका दिग्दर्शन- मात्र कराया गया है ॥ १-९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपों का वर्णन’ नामक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५३ ॥

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