July 21, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 354 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवनवाँ अध्याय कारकप्रकरण व्याकरणे कारकं भगवान् स्कन्द कहते हैं — अब मैं विभक्त्यर्थों से युक्त ‘कारक’ का वर्णन करूँगा 1 । ‘ग्रामोऽस्ति’ ( ग्राम है) – यहाँ प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रथमा विभक्ति हुई है । विभक्त्यर्थ में प्रथमा होने का विधान पहले कहा जा चुका है । ‘ हे महार्क’ — इस वाक्य में जो ‘महार्क’ शब्द है, उसमें सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति हुई है । सम्बोधन में प्रथमा का विधान पहले आ चुका है । ‘इह नौमि विष्णुं श्रिया सह । ‘ ( मैं यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु का स्तवन करता हूँ।) — इस वाक्य में ‘विष्णु’ शब्द की कर्म -संज्ञा हुई है । और ‘द्वितीया कर्मणि स्मृता’ — इस पूर्वकथित नियम के अनुसार कर्म में द्वितीया हुई है । ‘श्रिया सह ‘ — यहाँ ‘ श्री ‘ शब्द में ‘सह’ का योग होने से तृतीया हुई है। सहार्थक और सदृशार्थक शब्दों का योग होने पर तृतीया विभक्ति होती है, यह सर्वसम्मत मत है । क्रिया में जिसकी स्वतन्त्रता विवक्षित हो, वह ‘कर्ता’ या ‘स्वतन्त्र कर्ता’ कहलाता है । जो उसका प्रयोजक हो, वह ‘प्रयोजक कर्ता’ और ‘हेतुकर्ता’ भी कहलाता है । जहाँ कर्म ही कर्ता के रूप में विवक्षित हो, वह कर्मकर्ता’ कहलाता है। इनके सिवा ‘अभिहित’ और ‘अनभिहित’ — ये दो कर्ता और होते हैं। ‘अभिहित’ उत्तम और ‘अनभिहित’ अधम माना गया है। स्वतन्त्रकर्ता का उदाहरण ‘कृतिनः तां विद्यां समुपासते।’ (विद्वान् पुरुष उस विद्या की उपासना करते हैं) यहाँ विद्या की उपासना में विद्वानों की स्वतन्त्रता विवक्षित है, इसलिये वे ‘स्वतन्त्रकर्ता’ हैं। हेतुकर्ता का उदाहरण ‘चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।’ (चैत्र मैत्र को हित की प्राप्ति कराता है।) ‘मैत्रो हितं लभते तं चैत्रः प्रेरयति इति चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।’ (मैत्र हित को प्राप्त करता है और चैत्र उसे प्रेरणा देता है। ‘अतः यह कहा जाता है कि ‘चैत्र मैत्र को हित की प्राप्ति कराता है’ — यहाँ ‘चैत्र’ प्रयोजककर्ता या हेतुकर्ता है। कर्मकर्ता का उदाहरण ‘प्राकृतधीः स्वयं भिद्यते।’ (गँवार बुद्धि वाला मनुष्य स्वयं ही फूट जाता है।), ‘तरुः स्वयं छिद्यते।’ (वृक्ष स्वयं कट जाता है)। यहाँ फोड़ने वाले और काटने वाले कर्ताओं के व्यापार को विवक्षा का विषय नहीं बनाया गया। जहाँ कार्य के अतिशय सौकर्य “सुविधा” या “सुगमता”को प्रकट करने के लिये कर्तृव्यापार अविवक्षित हो, वहाँ कर्म आदि अन्य कारक भी कर्ता – जैसे हो जाते हैं और तदनुसार ही क्रिया होती है। इस दृष्टि से यहाँ ‘प्राकृतधीः’ और ‘तरुः’ पद कर्मकर्ता के रूप में प्रयुक्त हैं। अभिहित कर्ता का उदाहरण — ‘रामो गच्छति।’ (राम जाता है।) यहाँ ‘कर्ता’ अर्थ में तिङन्त का प्रयोग है, इसलिये कर्ता उक्त हुआ। जहाँ कर्म में प्रत्यय हो, वहाँ ‘कर्म’ उक्त और ‘कर्ता’ अनुक्त या अनभिहित हो जाता है। अनभिहित कर्ता का उदाहरण ‘गुरुणा शिष्ये धर्मः व्याख्यायते।’ (गुरु द्वारा शिष्य के निमित्त धर्म की व्याख्या की जाती है।) यहाँ कर्म में प्रत्यय होने से ‘धर्म’ की जगह ‘धर्मः’ हो गया; क्योंकि उक्त कर्म में प्रथमा विभक्ति होने का नियम है। अनभिहित कर्ता में पहले कथित नियम के अनुसार तृतीया विभक्ति होती है, इसीलिये ‘गुरुणा’ पद में तृतीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इस तरह पाँच प्रकार के ‘कर्ता’ बताये गये। अब सात प्रकार के कर्म का वर्णन सुनो ॥ १-४ ॥ १-ईप्सितकर्म, २-अनीप्सितकर्म, ३- ईप्सितानीप्सित-कर्म, ४-अकथितकर्म, ५-कर्तृकर्म, ६-अभिहितकर्म तथा ७-अनभिहितकर्म। ईप्सितकर्म का उदाहरण — ‘यतिः हरि श्रद्दधाति ।’ (विरक्त साधु या संन्यासी हरि में श्रद्धा रखता है।) यहाँ कर्ता यति को हरि अभीष्ट हैं, इसलिये वे ‘ईप्सितकर्म’ हैं। अतएव हरि में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। अनीप्सितकर्म का उदाहरण — ‘अहिं लङ्घयते भृशम्।’ (उससे सर्प को बहुधा लँघवाता है।) यहाँ ‘अहि’ यह ‘अनीप्सितकर्म’ है। लाँघनेवाला सर्प को लाँघना नहीं चाहता। वह किसी के हठ या प्रेरणा से सर्पलङ्घन में प्रवृत्त होता है। ईप्सितानीप्सितकर्म का उदाहरण — ‘दुग्धं संभक्षयव्रजः भक्षयेत्।’ (मनुष्य दूध पीता हुआ धूल भी पी जाता है।) यहाँ दुग्ध ‘ईप्सितकर्म’ है और धूल ‘अनीप्सितकर्म’। अकथितकर्म — जहाँ अपादान आदि विशेष नामों से कारक को व्यक्त करना अभीष्ट न हो, वहाँ वह कारक ‘कर्मसंज्ञक’ हो जाता है। यथा — गोपालः गां पयः दोग्धि। (ग्वाला गाय से दूध दुहता है।) यहाँ ‘गाय’ अपादान है, तथापि अपादान के रूप में कथित न होने से अकथित हो गया और उसमें पञ्चमी विभक्ति न होकर द्वितीया विभक्ति हुई। कर्तृकर्म — जहाँ प्रयोजक कर्ता का प्रयोग होता है, वहाँ प्रयोज्य कर्ता कर्म के रूप में परिणत हो जाता है। यथा — ‘गुरुः शिष्यं ग्रामं गमयेत्।’ (गुरु शिष्य को गाँव भेजें।) ‘शिष्यो ग्रामं गच्छेत् तं गुरुः प्रेरयेत् इति गुरुः शिष्यं ग्रामं गमयेत्।’ (शिष्य गाँव को जाय, इसके लिये गुरु उसे प्रेरित करे, इस अर्थ में गुरु शिष्य को गाँव भेजें, यह वाक्य है।) यहाँ गुरु ‘प्रयोजक कर्ता’ है, और शिष्य प्रयोज्य कर्ता या ‘कर्मभूत कर्ता’ है। अभिहितकर्म — ‘श्रियै हरेः पूजा क्रियते।’ (लक्ष्मी की प्राप्ति के लिये श्रीहरि की पूजा की जाती है।) यहाँ कर्म में प्रत्यय होने से पूजा ‘उक्त कर्म’ है, इसी को ‘अभिहितकर्म’ कहते हैं, अतएव इसमें प्रथमा विभक्ति हुई। अनभिहित कर्म जहाँ कर्ता में प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म अनभिहित हो जाता है, अतएव उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। उदाहरण के लिये यह वाक्य है — ‘हरेः सर्वदं स्तोत्रं कुर्यात्’ (श्रीहरि की सर्वमनोरथदायिनी स्तुति करे।) करण दो प्रकार का बताया गया है — ‘बाह्य’ और ‘आभ्यन्तर’। ‘तृतीया करणे भवेत्।’ — इस पूर्वोक्त नियम के अनुसार करण में तृतीया होती है। आभ्यन्तर करण का उदाहरण देते हैं — ‘चक्षुषा रूपं गृह्णाति।’ (नेत्र से रूप को ग्रहण करता है।) यहाँ नेत्र ‘आभ्यन्तर करण’ हैं, अतः इसमें तृतीया विभक्ति हुई। ‘बाह्य करण’ का उदाहरण है — ‘दात्रेण तल्लुनेत्।‘ (हँसुआ से उसको काटे।) यहाँ दात्र ‘बाह्य करण’ है। अतः उसमें तृतीया हुई है। सम्प्रदान तीन प्रकार का बताया गया है — प्रेरक, अनुमन्तृक और अनिराकर्तृक। जो दान के लिये प्रेरित करता हो, वह ‘प्रेरक’ है। जो प्राप्त हुई किसी वस्तु के लिये अनुमति या अनुमोदनमात्र करता है, वह ‘अनुमन्तृक’ है। जो न ‘प्रेरक’ है, न ‘अनुमन्तृक’ है, अपितु किसी की दी हुई वस्तु को स्वीकार कर लेता है, उसका निराकरण नहीं करता, वह ‘अनिराकर्तृक सम्प्रदान’ है। ‘सम्प्रदाने चतुर्थी।’ इस पूर्वोक्त नियम के अनुसार सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। तीनों सम्प्रदानों के क्रमशः उदाहरण दिये जाते हैं — १-‘नरो ब्राह्मणाय गां ददाति।’ (मनुष्य ब्राह्मण को गाय देता है।) यहाँ ब्राह्मण ‘प्रेरक सम्प्रदान’ होने के कारण उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। ब्राह्मण लोग प्रायः यजमान को गोदान के लिये प्रेरित करते रहते हैं, अतः उन्हें ‘प्रेरक सम्प्रदान’ की संज्ञा दी गयी है। २-‘नरो नृपतये दास ददाति।’ (मनुष्य राजा को दास अर्पित करता है।) यहाँ राजा ने दास अर्पण के लिये कोई प्रेरणा नहीं दी है। केवल प्राप्त हुए दास को ग्रहण करके उसका अनुमोदनमात्र किया है, इसलिये वह ‘अनुमन्तृक सम्प्रदान’ है; अतएव ‘नृपतये’ में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। ३-‘सज्जनः भत्रै पुष्पाणि दद्यात्।’ (सज्जन पुरुष स्वामी को पुष्प दे) यहाँ स्वामी ने पुष्पदान की मनाही न करके उसको अङ्गीकारमात्र कर लिया है, इसलिये ‘भर्तृ’ शब्द ‘ अनिराकर्तृक सम्प्रदान’ है। सम्प्रदान होने के कारण ही उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। अपादान दो प्रकार का होता है —’चल’ और ‘अचल’। कोई भी अपादान क्यों न हो, ‘अपादाने पञ्चमी स्यात्।’ – इस पूर्वकथित नियम के अनुसार उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है। ‘धावतः अश्वात् पतितः।’ (दौड़ते हुए घोड़े से गिरा) – यहाँ दौड़ता हुआ घोड़ा ‘चल अपादान’ है। अतः ‘धावतः अश्वात्’ में पञ्चमी विभक्ति हुई है। ‘स वैष्णवः ग्रामादायाति।’ (वह वैष्णव गाँव से आता है) यहाँ ग्राम शब्द ‘अचल अपादान’ है, अतः उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई है ॥ ५-११ ॥ अधिकरण चार प्रकार के होते हैं —अभिव्यापक, औपश्लेषिक, वैषयिक और सामीप्यक। जो तत्त्व किसी वस्तु में व्यापक हो, वह आधारभूत वस्तु अभिव्यापक ‘अधिकरण’ है। यथा — ‘दध्नि घृतम्।’ (दही में घी है)। ‘तिलेषु तैलं देवार्थम्।’ (तिल में तेल है, जो देवता के उपयोग में आता है।) यहाँ घी दही में और तैल तिल में व्याप्त है। अतः इनके आधारभूत दही और तिल अभिव्यापक अधिकरण हैं। ‘ आधारो योऽधिकरणं विभक्तिस्तत्र सप्तमी ।’ – इस पूर्वोक्त नियम के अनुसार अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है । प्रस्तुत उदाहरण में ‘दध्नि’ और ‘ तिलेषु’ – इन पदों में इसी नियम से सप्तमी विभक्ति हुई है। अब ‘औपश्लेषिक अधिकरण’ बताया जाता है — ‘कपिर्गृहे तिष्ठेद् वृक्षे च तिष्ठेत् । ‘ ( बंदर घर के ऊपर स्थित होता है और वृक्ष पर भी स्थित होता है ।) कपि के आधारभूत जो गृह और वृक्ष हैं, उन पर वह सटकर बैठता है । इसीलिये वह ‘औपश्लेषिक अधिकरण’ माना गया है। अधिकरण होने से ही ‘गृहे’ और ‘वृक्षे’ – इन पदों में सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। अब ‘वैषयिक अधिकरण’ बताते हैं — विषयभूत अधिकरण को ‘वैषयिक’ कहते है । यथा – ‘जले मत्स्यः । ‘, ‘वने सिंहः । ‘ (जल में मछली, वन में सिंह ।) यहाँ जल और वन ‘विषय’ हैं और मत्स्य तथा सिंह ‘विषयी’ । अतः विषयभूत अधिकरण में सप्तमी विभक्ति हुई। अब ‘सामीप्यक अधिकरण’ बताते हैं — ‘गङ्गायां घोषो वसति ।’ (गङ्गा में गोशाला बसती है।) यहाँ ‘गङ्गा’ का अर्थ है — गङ्गा के समीप । अतः ‘सामीप्यक अधिकरण’ होने के कारण गङ्गा सप्तमी विभक्ति हुई। ऐसे वाक्य ‘औपचारिक’ माने जाते हैं। जहाँ मुख्यार्थ बाधित होने से उसके सम्बन्ध से युक्त अर्थान्तर की प्रतीति होती है, वहाँ ‘लक्षणा’ होती है । ‘गौर्वाहिकः’ इत्यादि स्थलों में ‘गो’ शब्द का मुख्यार्थ बाधित होता है, अतः वह स्वसदृश को लक्षित कराता है। इस तरह के वाक्यप्रयोग को ‘औपचारिक’ कहते हैं । ‘ अनभिहित कर्ता’ में तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती है। यथा — ‘विष्णुः सम्पूज्यते लोकैः । ‘ ( लोगों द्वारा विष्णु पूजे जाते हैं ।) यहाँ कर्म में प्रत्यय हुआ है । अतः कर्म उक्त है और कर्ता अनुक्त। इसलिये अनुक्त कर्ता ‘लोक’ शब्द में तृतीया विभक्ति हुई है। ‘तेन गन्तव्यम्, तस्य गन्तव्यम्’ (उसको जाना चाहिये) यहाँ उपर्युक्त नियम के अनुसार तृतीया और षष्ठी — दोनों का प्रयोग हुआ है । षष्ठी का प्रयोग कृदन्त के योग में ही होता है । अभिहित कर्ता और कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है । इसीलिये ‘विष्णुः’ में प्रथमा विभक्ति हुई है। ‘भक्तः हरिं प्रणमेत् । ‘ (भक्त भगवान् को प्रणाम करे ।) यहाँ अभिहित कर्ता ‘भक्त’ में प्रथमा विभक्ति हुई है और अनुक्त कर्म ‘हरि’ में द्वितीया विभक्ति। ‘हेतु’ में तृतीया विभक्ति होती है । यथा — ‘अन्नेन वसेत् । ‘ ( अन्न के हेतु कहीं भी निवास करे ।) यहाँ हेतुभूत अन्न में तृतीया विभक्ति हुई है । ‘तादर्थ्य’ में चतुर्थी विभक्ति कही गयी है । यथा — ‘वृक्षाय जलम्’ ‘वृक्ष के लिये पानी । ‘ यहाँ ‘वृक्ष’ शब्द में ‘तादर्थ्यप्रयुक्त’ चतुर्थी विभक्ति हुई है। परि, उप, आङ् आदि के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा — ‘परि ग्रामात् पुरा बलवत् वृष्टोऽयं देवः।’ (गाँव से कुछ दूर हटकर दैव ने पूर्वकाल में बड़े जोर की वर्षा की थी ।) – इस वाक्य में ‘परि’ के साथ योग होने के कारण ‘ग्राम’ शब्द में पञ्चमी विभक्ति हुई है। दिग्वाचक शब्द, अन्यार्थक शब्द तथा ‘ऋते’ आदि शब्दों के योग में भी पञ्चमी विभक्ति होती है । यथा — ‘ पूर्वो ग्रामात् । ऋते विष्णोः । न मुक्तिः इतरा हरेः । ‘ ‘पृथक्’ और ‘विना’ आदि के योग में तृतीया एवं पञ्चमी विभक्ति होती है — जैसे ‘पृथग् ग्रामात् । ‘ यहाँ ‘पृथक्’ शब्द के योग में ‘ग्राम’ शब्द से पञ्चमी और ‘पृथग् विहारेण’ – यहाँ ‘पृथक्’ शब्द के योग में ‘विहार’ शब्द से तृतीया विभक्ति हुई । इसी प्रकार ‘विना’ शब्द के योग में भी जानना चाहिये । ‘विना श्रिया’ – यहाँ ‘विना ‘ के योग में ‘ श्री ‘शब्द से द्वितीया, ‘विना श्रिया’ – यहाँ ‘विना ‘के योग में ‘श्री’ शब्द से तृतीया और ‘विना श्रियः ‘ – यहाँ ‘विना’ के योग में श्री’ शब्द से पञ्चमी विभक्ति हुई है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है — जैसे ‘अन्वर्जुनं योद्धारः – योद्धा अर्जुन के संनिकट प्रदेश में हैं।’ – यहाँ ‘ अनु’ कर्मप्रवचनीय-संज्ञक है – इसके योग में ‘अर्जुन’ शब्द में द्वितीया विभक्ति हुई । इसी प्रकार अभितः, परितः आदि के योग में भी द्वितीया होती है । यथा ‘अभितो ग्राममीरितम्।’— गाँव के सब तरफ कह दिया है।’ यहाँ ‘अभितः ‘ शब्द के योग में ‘ग्राम’ शब्द में द्वितीया विभक्ति हुई है । नमः, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति एवं वषट् आदि शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है — जैसे ‘नमो’ देवाय – ( देव को नमस्कार है) – यहाँ ‘नमः’ के योग में ‘देव’ शब्द में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इसी प्रकार ‘ते स्वस्ति’ – तुम्हारा कल्याण हो – यहाँ ‘स्वस्ति’ के योग में ‘युष्मद्’ शब्द से चतुर्थी विभक्ति हुई (‘युष्मद्’ शब्द को चतुर्थी के एकवचन में वैकल्पिक ‘ते’ आदेश हुआ है) । तुमुन्प्रत्ययार्थक भाववाची शब्द से चतुर्थी विभक्ति होती है — जैसे ‘पाकाय याति’ और ‘पक्तये याति’ – पकाने के लिये जाता है।’ यहाँ ‘पाक’ और ‘पक्ति’ शब्द ‘तुमर्थक भाववाची’ हैं। इन दोनों से चतुर्थी विभक्ति हुई । ‘सहार्थ’ शब्द के योग में हेतु – अर्थ और कुत्सित अङ्गवाचक में तृतीया विभक्ति होती है। सहार्थयोग में तृतीया विशेषणवाचक से होती है। जैसे ‘पिताऽगात् सह पुत्रेण’ — पिता पुत्र के साथ चले गये ।’ यहाँ ‘सह’ शब्द के योग में विशेषणवाचक ‘पुत्र’ शब्द से तृतीया विभक्ति हुई । इसी प्रकार ‘गदया हरिः ‘ (भगवान् हरि गदा के सहित रहते है ) – यहाँ ‘सहार्थक’ शब्द के न रहने पर भी सहार्थ है, इसलिये विशेषणवाचक ‘गदा’ शब्द से तृतीया विभक्ति हुई । ‘ अक्ष्णा काणः – आँख से काना है।’—यहाँ कुत्सितअङ्गवाचक ‘अक्षि’ शब्द है । उससे तृतीया विभक्ति हुई । ‘अर्थेन निवसेद् भृत्यः ।’–’ भृत्य धन के कारण से रहता है । ‘— यहाँ हेतु-अर्थ है ‘धन’। तद्वाचक ‘अर्थ’ शब्द से तृतीया विभक्ति हुई । कालवाचक और भाव अर्थ में सप्तमी विभक्ति होती है । अर्थात् जिसकी क्रिया से अन्य क्रिया लक्षित होती है, तद्वाचक शब्द से सप्तमी विभक्ति होती है । जैसे — ‘विष्णौ नते भवेन्मुक्तिः ‘ – भगवान् विष्णु को नमस्कार करने पर मुक्ति मिलती है । — यहाँ श्रीविष्णु की नमस्कार – क्रिया से मुक्ति – भवनरूपा क्रिया लक्षित होती है, अतः ‘विष्णु’ शब्द से सप्तमी विभक्ति हुई । इसी प्रकार ‘वसन्ते स गतो हरिम्’ — वह वसन्त ऋतु में हरि के पास गया ।’ – यहाँ ‘वसन्त’ कालवाचक है, उससे सप्तमी हुई । (स्वामी, ईश, पति, साक्षी, सूत और दायाद आदि शब्दों के योग में षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं —) जैसे — ‘नृणां स्वामी, नृषु स्वामी’ – मनुष्यों का स्वामी, – यहाँ ‘स्वामी’ शब्द के योग में ‘नृ’ शब्द से षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। इसी प्रकार ‘नृणामीशः ‘ – नरों के ईश’ – यहाँ ‘ईश’ शब्द के योग में ‘नृ’ शब्द से, तथा ‘सतां पतिः ‘ — सज्जनों का पति – यहाँ ‘सत्’ शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई। ऐसे ही ‘नृणां साक्षी, नृषु साक्षी — मनुष्यों का साक्षी’—यहाँ ‘नृ’ शब्द से षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। ‘गोषु नाथो गवां पतिः – गौओं का स्वामी है, यहाँ ‘नाथ’ और ‘पति’ शब्दों के योग में ‘गो’ शब्द से षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। ‘गोषु सूतो गवां सूतः — गौओं में उत्पन्न है’ – यहाँ ‘सूत’ शब्द के योग में ‘गो’ शब्द से षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति हुई। ‘इह राज्ञां दायादकोऽस्तु ।’ — यहाँ राजाओं का दायाद हो । यहाँ ‘दायाद’ शब्द के योग में ‘राजन्’ शब्द में षष्ठी विभक्ति हुई है। हेतुवाचक से ‘हेतु’ शब्द के प्रयोग होने पर षष्ठी विभक्ति होती है । जैसे ‘अन्नस्य हेतोर्वसति — अन्न के कारण वास करता है । ‘ — यहाँ ‘वास’ में अन्न ‘हेतु’ है, तद्वाचक ‘ हेतु’ शब्द का भी प्रयोग हुआ है, अतः ‘अन्न’ शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई । स्मरणार्थक धातु के प्रयोग में उसके कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे — ‘मातुः स्मरति । — माता को स्मरण करता है।’ यहाँ ‘स्मरति ‘के योग में ‘मातृ’ शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई । कृत्प्रत्यय के योग में कर्त्ता एवं कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है जैसे —’अपां भेत्ता – जल को भेदन करने वाला ।’ यहाँ-‘भेत्तृ’ शब्द ‘कृत्’ प्रत्ययान्त’ है। उसके योग में– कर्मभूत ‘अप्’ शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई । इसी प्रकार ‘तव कृतिः – तुम्हारी कृति है’ – यहाँ ‘कृति’ शब्द ‘कृत्प्रत्ययान्त’ है । उसके योग में कर्तृभूत ‘युष्मद्’ शब्द से षष्ठी विभक्ति हुई ( युष्मद्-डस्-तव ) – निष्ठा आदि अर्थात् क्त-क्तवतु, शतृ-शानच्, उ, उक, क्त, तुमुन्, खलर्थक, तृन्, शानच् चानश् आदिके योग में षष्ठी विभक्ति नहीं होती (यथा ‘ग्रामं गतः ‘ इत्यादि) ॥ १२–२६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘कारक – निरूपण’ नामक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५४ ॥ 1. अध्याय तीन सौ इक्यावन में श्लोक बाईस से अट्ठाईस तक विभक्त्यर्थों के प्रयोग का नियम बताया गया है । वे सब श्लोक यहीं होने चाहिये थे; क्योंकि वहाँ जो नियम या विधान दिये गये हैं, उनके उदाहरण यहाँ मिलते हैं । Content is available only for registered users. 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