July 22, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 357 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय उणादिसिद्ध शब्दरूपों का दिग्दर्शन व्याकरणे उणादिसिद्धरूपं कुमार स्कन्द कहते हैं — कात्यायन ! अब ‘उणादि’ प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातु से परे होते हैं। ‘कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।’ (१) — इस सूत्र के अनुसार ‘कृ’ आदि धातुओं से ‘उण्’ प्रत्यय होता है । ‘करोतीति कारुः । ‘ ( जो शिल्पकर्म करता है, वह ‘कारु’ कहलाता है । लोकभाषा में उसे ‘शिल्पी ‘ या ‘ कारीगर’ कहते हैं)। ‘कृ’ धातु से ‘उण्’ प्रत्यय होने पर अनुबन्धलोप, वृद्धि तथा विभक्तिकार्य किये जाते हैं। इससे ‘कारु ः ‘ — इस पद की सिद्धि होती है । ‘जि’ धातु से ‘उण्’ होने पर ‘जायुः’ रूप बनता है । ‘जायुः’ का अर्थ है — औषध । इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये — ‘जयति रोगान् इति जायुः’। ‘मि’ धातु से वही (उण्) प्रत्यय करने पर ‘मायुः’ — यह पद सिद्ध होता है। ‘मायुः ‘का अर्थ है — ‘पित्त’। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है — ‘मिनोति’ — प्रक्षिपति देहे ऊष्माणम् इति मायुः ।’ इसी प्रकार ‘स्वदते — रोचते इति स्वादुः।’, ‘साध्नोति परकार्यमिति साधुः ।’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। गोमायुः, आयुः — इत्यादि प्रयोग भी इसी तरह सिद्ध होते हैं । ‘गोमायु’ का अर्थ है — गीदड़ तथा ‘आयुः’ शब्द आयुर्वेद के लिये भी प्रयुक्त होता है । ‘उणादयो बहुलम् ।’— (३ । ३ । १) इस सूत्र के अनुसार ‘उण्’ आदि बाहुल्येन होते हैं। कहीं होते हैं, कहीं नहीं होते। ‘आयुः’, ‘स्वादुः’ तथा ‘हेतु’ आदि शब्द भी उणादिसिद्ध हैं ।’ ‘किंशारु’ नाम है— धान्य के शूक “अनाज के बाल” या “अनाज की बालियां” का । ‘किं शृणातीति किंशारुः’। यहाँ ‘किं’ पूर्वक ‘शृ’ धातु से ‘ञण्’ होता है। ‘ञ्’ तथा ‘ण्’ अनुबन्ध हैं। किंशृ+ उ । वृद्धि होकर ‘किंशारुः’ बनता है। ‘कृकवाकुः’ का अर्थ है — मुर्गा या मोर । ‘कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः ।’ ‘कृके वचः कश्च’ — इस उणादिसूत्र से ‘ञण्’ प्रत्यय होने पर कृक+वच्+जुण् — इस अवस्था में अनुबन्धलोप, चकार को ककार और ‘अत उपधायाः।’ (पा० सू० ७ । २ । ११६ ) से वृद्धि होती है। ‘भरत बिभर्ति वा भरुः ।’ ‘भृ’ धातु से ‘उ’ प्रत्यय, गुण; विभक्तिकार्य — भरुः । इसका अर्थ है — भर्त्ता (स्वामी) । मरुः — जलहीन देश । मृ+ उ गुणादेश, विभक्तिकार्य = मरुः । शी+उ = शयुः । इसका अर्थ है — सोया पड़ा रहने वाला अजगर । त्सर+उ = त्सरुः —अर्थात् खड्ग की मूठ । ‘स्वर्यन्ते प्राणा अनेन’ इस लौकिक विग्रहमें ‘उ’ प्रत्यय होता है । फिर गुण होकर ‘स्वरुः ‘ पद बनता है । ‘स्वरु’ का अर्थ है— वज्र । त्रप्+उ=त्रपु। ‘त्रपु’ नाम है शीशे का । फल्ग् + उ = फल्गुः — सारहीन । अभिकाङ्क्षार्थक ‘गृध्’ धातु से ‘सुसुधागृधिभ्यः क्रन्’, (१९२) — इस सूत्र के अनुसार ‘क्रन् ‘ प्रत्यय होने पर गृध्+क्रन्, ककार — नकार की इत्संज्ञा गृध्रः1 अर्थात् गीध पक्षी । मदि+ किरच्= मन्दिरम् । तिमि + किरच्= तिमिरम् । ‘मन्दिर’ का अर्थ गृह तथा ‘तिमिर’ का अर्थ अन्धकार है । ‘सलिकल्य— निमहिभडिभण्डिशण्डिपिण्डितुण्डिकु कि भूभ्य इलच्।’ (५७) — इस उणादि सूत्र के अनुसार गत्यर्थक ‘षल्’ धातु से ‘इलच्’ प्रत्यय करने पर ‘सलिलम्’ यह रूप बनता है । ‘सलति गच्छति निम्नमिति सलिलम्’ — यह इसकी व्युत्पत्ति है । ‘सलिल’ शब्द वारि—जल का वाचक है । ( इसी प्रकार उक्त सूत्र से ही कलिलम्, अनिलः, महिला — पृषोदरादित्वात् महेला — इत्यादि शब्द निष्पन्न होते हैं ।) भण्डि + इलच् = भण्डिलम्। इसका अर्थ है — कल्याण । ‘ भण्डिल’ शब्द दूत के अर्थ में भी आता है। ज्ञानार्थक ‘विद्’ धातु से औणादिक ‘क्वसु’ प्रत्यय होने पर विद् + क्वसु — इस अवस्था में ‘लशक्वतद्धिते।’ (१।३।८) से ककार की इत्संज्ञा तथा ‘उपदेशेऽजनुनासिक इत् । ‘ (१।३।२) से उकार की इत्संज्ञा होती है; तत्पश्चात् विभक्ति—कार्य करने पर ‘विद्वान्’ 2 — यह रूप बनता है। ‘विद्वान्’ का अर्थ है — बुध या पण्डित । ‘शेरतेऽस्मिन् राजबलानि इति शिविरम् ।’ — इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘शीङ्’ धातु से ‘किरच्’ प्रत्यय, ‘शीङ्’ से ‘वुक्’ का आगम तथा ‘शी’ के दीर्घ ईकार के स्थान में ह्रस्व आदेश होने पर ‘शिविर’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘शिविर’ कहते हैं— सेना की छावनी को । अग्निपुराण के अनुसार गुप्त निवासस्थान को ‘शिविर’ कहते हैं ॥ १-५ ॥ ‘अव्’ धातु से ‘सितनिगमिमसि ।’ (७२) इत्यादि सूत्र के अनुसार ‘तुङ्’ प्रत्यय होने पर वकार के स्थान में ‘ऊठ्’ होकर गुण होने से ‘ओतु’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘ओतु’ कहते हैं — बिलाव को । अभिधानमात्र से उणादि प्रत्यय होते हैं । ‘कृ’ धातु से ‘न’ प्रत्यय करने पर गुण होता है और नकार का णकारादेश हो जाने पर ‘कर्ण’ शब्द की सिद्धि होती है। ‘कर्ण’ का अर्थ है — कान अथवा कन्यावस्था में कुन्ती से उत्पन्न सूर्यपुत्र कर्ण। ‘वस्’ धातु से ‘तुन्’ प्रत्यय, अगार अर्थ में उसका ‘णित्व’ होकर वृद्धि होने से ‘वास्तु’ शब्द बनता है। ‘वास्तु’ का अर्थ है — गृहभूमि । ‘जीव’ शब्द से ‘आतृकन्’ प्रत्यय और वृद्धि होकर ‘जैवातृक’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘जैवातृक’ का अर्थ है — चन्द्रमा । ‘अनः शकटं वहति ।’ — इस लौकिक विग्रह में ‘वह’ धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय, ‘अनस्’के सकार का डकार आदेश तथा ‘वह’ के वकार का सम्प्रसारण होने पर ‘अनडुह्’ शब्द बनता है, उसके सुबन्तमें अनड्वान्, अनड्वाहौ इत्यादि रूप होते हैं। ‘जीव्’ धातुसे ‘जीवेरातुः ‘ । (८२) — इस सूत्र के अनुसार ‘आतु’ प्रत्यय करने पर ‘जीवातु’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘जीवातु’ नाम है — संजीवन औषध का । प्रापणार्थक ‘वह्’ धातु से ‘वहिश्रिश्रुयुगुग्लाहात्वरिभ्यो नित् । ‘ ( ५०१ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘नित्’ प्रत्यय करने पर विभक्ति कार्य के पश्चात् ‘वह्निः ‘ — इस रूप की सिद्धि होती है । (इसी प्रकार श्रेणिः, श्रोणिः, योनिः, द्रोणिः, ग्लानिः, हानिः, तूर्णिः बाहुलकात् म्लानिः — इत्यादि पदों की सिद्धि होती है ।) ‘हृ’ धातु से ‘इनच्’ प्रत्यय होने पर और अनुबन्धभूत चकार का लोप कर देने पर ‘हृ + इन’, गुण तथा विभक्ति — कार्य — हरिणः — इस रूप की सिद्धि होती है । ‘श्यास्त्याहृञ्विभ्य इनच् ।’ (२१३ ) — इस औणादिक सूत्र से यहाँ ‘इनच्’ प्रत्यय हुआ है। ‘हरिण’ कहते हैं — मृग को । यह शब्द कामी तथा पात्रविशेष के लिये भी प्रयुक्त होता है । ‘अण्डन् कृसृभृवृञः।’ (१३४) — इस सूत्र के अनुसार ‘कृ’ आदि धातुओं से ‘अण्डन्’ प्रत्यय करने पर क्रमशः — करण्डः, सरण्डः, भरण्डः, वरण्डः — ये रूप सिद्ध होते हैं । ‘करण्ड’ शब्द भाजन और भाण्ड का वाचक है। मेदिनीकोश के अनुसार यह शहद के छत्ते के लिये भी प्रयुक्त होता है। ‘सरण्ड’ शब्द चौपाये का वाचक है। कुछ विद्वान् ‘सरण्ड’ का अर्थ पक्षी मानते हैं । ‘बाहुलकात् तृ प्लवनतरणयोः।’ इस धातु से भी ‘अण्डन् ‘ प्रत्यय होकर ‘तरण्ड’ पद की सिद्धि होती है। ‘तरण्ड’ शब्द काठ के बेड़े के लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग मछली फँसाने के लिये बनायी गयी बंसी के डोरे को भी ‘तरण्ड’ कहते हैं ‘वरण्ड’ शब्द सामवेद के लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग ‘साम’ और ‘यजुष्’ — दो वेदों के लिये इसका प्रयोग मानते हैं । कुछ लोगों के मत में ‘वरण्ड’ शब्द मुखसम्बन्धी रोग का वाचक है । ‘स्फायितञ्चिवञ्चि० (१७८)।’ इत्यादि सूत्र से वृद्ध्यर्थक ‘स्फायि’ धातु से ‘रक्’ प्रत्यय होने पर ‘स्फार’ पद की सिद्धि होती है । ‘स्फार’ शब्द का अर्थ होता है — प्रभूत अर्थात् अधिक। ‘मेदिनीकोश’ के अनुसार ‘स्फार’ शब्द विकट अर्थ में आता है और करका या करवा आदि पात्र के भरते समय पानी में जो बुलबुले उठते हैं, उनका वाचक भी ‘स्फार’ शब्द है । ‘शुसिचिमीनां दीर्घश्च ( १९३) । ‘ इस सूत्र से ‘क्रन्’ प्रत्यय और पूर्व ह्रस्वस्वर के स्थान में दीर्घ कर देने पर क्रमशः शूरः, सीरं, चीरं, मीरः — ये प्रयोग बनते हैं । ‘चीर’ शब्द गाय के थन, वस्त्र विशेष तथा वल्कल के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘भी’ धातु से ‘भियः क्रुकन् ‘ — (१९९) इस सूत्र से ‘क्रुकन्’ प्रत्यय करने पर ‘भीरुकः ‘ — इस पद की सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं— ‘ भीरु’ और ‘कातर’ । ‘उच समवाये’ — इस धातु से ‘रन्’ प्रत्यय करने पर ‘उग्र’ पद की सिद्धि होती है। ‘उग्रः’ का अर्थ है — प्रचण्ड। ‘वहियूभ्यां णित् । ‘ — इस सूत्र के अनुसार ‘णित् असच्’ प्रत्यय करने पर ‘वाहसः’, ‘यावसः ‘ ये दो रूप सिद्ध होते हैं । ‘वाहसः’ का अर्थ है — अजगर और ‘यावसः ‘का अर्थ है — तृणसमूह । ‘वर्तमाने पृषद्बृहन्महद्जगच्छत्रिवच्च।’ — इस सूत्र के अनुसार ‘गम्’ धातु से ‘अत्’ प्रत्यय का निपातन हुआ। ‘गम्’ के स्थान में ‘जग्’ आदेश हुआ। इस प्रकार ‘जगत्’ शब्द की सिद्धि हुई। ‘जगत्’ का अर्थ है — भूलोक । ‘ऋतन्यञ्जिवन्यञ्ज्यर्षि०’ इत्यादि (४५०) सूत्र के अनुसार ‘कृश’ धातु से ‘आनुक्’ प्रत्यय करने पर ‘कृशानुः ‘ — इस पद की सिद्धि होती है। ‘कृशानुः ‘का अर्थ है — अग्नि । द्योतते इति ज्योतिः । ‘द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः । ‘ (२७५ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘द्युत्’, धातु से ‘इसिन्’ प्रत्यय, द्यकार का कारादेश तथा गुण होने पर ‘ज्योतिः’ इस पद की सिद्धि होती है । ‘ज्योतिः’ का अर्थ है — अग्नि और सूर्य । ‘अर्च’ धातुसे’ कृदाधारार्चिकलिभ्यः ।’ (३२७ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘क’ प्रत्यय होने पर ‘अर्कः’ पद की सिद्धि होती है । ‘अर्क एवं अर्ककः’। स्वार्थे कः।‘अर्कः’ पद सूर्य का वाचक है। ‘कृगृशृवृञ्चतिभ्यः ष्वरच् ।’ (२८६) — इस सूत्र के अनुसार वरणार्थक ‘वृ’ धातु से तथा याचनार्थक ‘चते’ धातु से ‘ष्वरच्’ प्रत्यय करने पर क्रमशः ‘वर्वरः’, ‘चत्वरम्’— इन दो पदों की सिद्धि होती है। ‘वर्वर’ का अर्थ है — प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य । ‘हसिमृग्रिण्वाऽमिदमिलूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) — इस सूत्र के अनुसार हिंसार्थक ‘धूर्वि ‘ धातु से ‘तन्’ प्रत्यय करने पर ‘ धूर्त्तः’ — इस पद की सिद्धि होती है। ‘धूर्त्त’ शब्द का अर्थ है — शठ । ‘ चत्वरम्’ का अर्थ है — चौराहा । ‘लित्वरचत्वरधीवर’ इत्यादि औणादिक सूत्र से ‘चीवरम्’ इस पद का निपातन हुआ है । ‘चीवरम्’ का अर्थ है — चिथड़ा अथवा भिक्षुक का वस्त्र । स्नेहनार्थक ‘ञिमिदा’ अथवा ‘मिद्’ धातुसे ‘अमिचिमिदिशसिभ्यः क्त्रः ।’ (६१३) — इस सूत्र के अनुसार ‘क’ प्रत्यय हुआ । ककार का इत्यसंज्ञालोप हुआ — ‘मिद + त्र = मित्र । विभक्ति — कार्य करने पर ‘मित्रः ‘ — इस पद की सिद्धि हुई । ‘मित्र’ का अर्थ है — सूर्य । नपुंसकलिङ्ग में इसका अर्थ — सुहृद् होता है। ‘कुवोह्रस्वश्च।’ इस सूत्र के अनुसार ‘पुनातीति’ इस लौकिक विग्रह में ‘पू’ धातु से ‘क’ प्रत्यय और दीर्घ के स्थान में ह्रस्व होने पर ‘पुत्र’ शब्द की सिद्धि होती है । ‘पुत्र’ का अर्थ — बेटा । ‘सुवः कित् । ‘ ( ३२८ ) — इस सूत्र के अनुसार प्राणिप्रसवार्थक ‘ षूङ्’ धातुसे ‘नु’ प्रत्यय होता है और वह ‘कित्’ माना जाता है। धातु के आदि षकार को सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार ‘सूनु’ शब्द की सिद्धि होती है । विभक्तिकार्य होने पर ‘सूनुः’ पद बनता है । ‘विश्वकोश’ के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है ‘नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोतृ०’ (२६०) इत्यादि सूत्र के अनुसार ‘पितृ’ शब्द निपातित होता है । ‘पातीति पिता’ । ‘पा’ धातु से ‘तृच्’ होकर आकार के स्थान में इकार हो जाता है । पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं । जन्मदाता या बाप को ‘पिता’ कहते हैं। विस्तारार्थक ‘तन्’ धातु से ‘वुतनिभ्यां दीर्घश्च।’ — इस सूत्र के अनुसार ‘तन्’ प्रत्यय तथा ह्रस्व के स्थान में दीर्घ होने पर ‘तात’ शब्द की सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। ‘तात’ शब्द कृपापात्र तथा पिता के लिये प्रयुक्त होता है । कुत्सितशब्दार्थक ‘पर्द’ धातु से ‘काकु’ प्रत्यय होता है और वह ‘नित्’ माना जाता है। धातु के रेफ का सम्प्रसारण और अका रका लोप हो जाता है। जैसा कि सूत्र है— ‘पर्देर्नित् सम्प्रसारणमल्लोपश्च । ‘ (३६७) ‘काकु’ प्रत्यय के आदि ककार का ‘लशक्वतद्धिते । ‘ (१ । ३ । ८ ) — इस सूत्र लोप हो जाता है। इस प्रक्रिया से ‘पृदाकु’ शब्द की सिद्धि होती है । पर्दते — कुत्सितं ‘शब्दं करोति इति पृदाकुः।’ इसका अर्थ है — सर्प, बिच्छू या व्याघ्र । ‘हसिमृग्रिण्वाऽमिद—मिलूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) इस सूत्र के द्वारा ‘गृ’ धातु से ‘तन्’ प्रत्यय और गुणादेश करने पर ‘गर्त्त’ शब्द की सिद्धि होती है। यह ‘अवट’ अर्थात् गड्ढे का वाचक है। ‘भृमृशितृ० ‘ इत्यादि (७) सूत्र के अनुसार ‘भृ’ धातु से ‘अतच्’ प्रत्यय तथा गुणादेश करने पर ‘भरत’ शब्द निष्पन्न होता है। जो भरण—पोषण करे, वह ‘भरत’ है। । ‘नमतीति नटः ‘ — इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘जनिदाच्युसृवृमदि०’ इत्यादि (५५४) सूत्र के द्वारा ‘नम’ धातु से ‘डट्’ प्रत्यय करने पर ‘टि’ लोप होने के पश्चात् ‘नट’ शब्द बनता है। इसका अर्थ है—वेषधारी अभिनेता। ये थोड़े—से उणादि प्रत्यय यहाँ प्रदर्शित किये गये। इनके अतिरिक्त भी बहुत—से उणादि प्रत्यय होते हैं ॥ ६-१२ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘उणादिसिद्ध रूपोंका वर्णन’ नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५७ ॥ 1. गृध्+उ=’गृधुः’ रूप होता है। ‘गृधुः ‘ का अर्थ है — कामदेव । 3. ‘विद्’ धातु से ‘शतृ ‘ प्रत्यय करने पर ‘विदेः शतुर्वसुः । ‘ ( ७ । १ । ३६ ) — इस सूत्र के अनुसार ‘विद्’ धातु से परे विद्यमान ‘शतृ ‘ के स्थान में ‘वसु’ आदेश हो जाता है। यह आदेश वैकल्पिक होता है । अतः ‘विदन् और ‘विद्वान्’ — ये दोनों रूप विशुद्ध कृदन्त हैं। औणादिक ‘विद्वान्’ का अर्थ बुध है और कृदन्त ‘विद्वान्’ का अर्थ जानता हुआ है। Content is available only for registered users. 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