July 22, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 358 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय तिविभक्त्यन्त सिद्धरूपों का वर्णन तिङ्विभक्तिसिद्धरूपं कुमार कार्तिकेय कहते हैं — कात्यायन ! अब मैं ‘तिङ् — विभक्ति’ तथा ‘आदेश’ का संक्षेप से वर्णन करूँगा। तिङ्—प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता — तीनों में होते हैं । सकर्मक तथा अकर्मक धातु से कर्ता में आत्मनेपद तथा परस्मैपद — दोनों पदों के ‘तिप्रत्यय’ होते हैं । (सकर्मक से कर्ता और कर्म में तथा अकर्मक से भाव और कर्ता में वे ‘तिङ्’ प्रत्यय हुआ करते हैं — यह विवेक कर्तव्य है) ‘तिङादेश’ सकर्मक धातु से कर्म तथा कर्ता बताये गये हैं। वर्तमानकाल की क्रिया के बोध के लिये धातु से ‘लट्’ लकार का विधान कहा गया है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट (सत्कारपूर्वक व्यापार), सम्प्रश्न तथा प्रार्थना आदि अर्थ का प्रतिपादन अभीष्ट हो तो धातु से ‘लिङ्’ लकार होता है । ‘विधि’ आदि अर्थों में तथा आशीर्वाद में भी ‘लोट्’ लकार का प्रयोग होता है। अनद्यतन भूतकाल का बोध कराने के लिये ‘लङ्’ लकार प्रयुक्त होता है। सामान्य भूतकाल में ‘लुङ्’, परोक्ष — भूत में ‘लिट्’ अनद्यतन भविष्य में ‘लुट्’ आशीर्वाद में ‘लिङ्’ शेष अर्थ में अर्थात् सामान्य भविष्यत् अर्थ के बोध के लिये धातु से ‘लृट् लकार होता है — क्रियार्था क्रिया हो तो भी, न हो तो भी । हेतुहेतुमद्भाव आदि ‘लिङ्’ का निमित्त होता है; उसके होने पर भविष्यत् अर्थ का बोध कराने के लिये धातु से ‘लृङ्’ लकार होता है — क्रिया की अतिपत्ति (असिद्धि) गम्यमान हो, तब । ‘तङ्’ प्रत्यय तथा ‘शानच्’, ‘कानच्’ — इनकी आत्मनेपद संज्ञा होती है। ‘तिङ्’ विभक्तियाँ अठारह हैं । इनमें पूर्व की नौ विभक्तियाँ ‘परस्मैपद’ कही जाती हैं । वे प्रथमपुरुष आदि के भेद से तीन भागों में बँटी हैं। ‘तिप् तस् अन्ति’— ये तीन प्रथमपुरुष हैं। ‘सिप्, थस्, थ’ — ये तीन मध्यमपुरुष हैं। तथा ‘मिप्, वस्, मस्’ — ये उत्तमपुरुष कहे गये हैं ॥ १-५ ॥’ ‘त, आताम्, झ’ —ये आत्मनेपद के प्रथमपुरुषसम्बन्धी प्रत्यय हैं । ‘थास्, आथाम्, ध्वम्’ — ये मध्यमपुरुष हैं । ‘इ, वहि, महिङ्’— ये उत्तमपुरुष हैं। आत्मनेपद के नौ प्रत्यय ‘तङ् ‘ कहलाते हैं और दोनों पदों के प्रत्यय ‘तिङ्’ शब्द से समझे जाते हैं। क्रियावाची ‘भू’, वा आदि धातु कहे गये हैं। भू, एध्, पच्, नन्द्, ध्वंस्, स्रंस्, पद्, अद्, शीङ्, क्रीड, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह, षूज्, तुद्, मृश्, मुच, रुध्, भुज, त्यज, तन, मन और कृ — ये सब धातु शप् आदि विकरण होने पर क्रियार्थबोधक होते हैं । ‘क्रीड, वृङ्, ग्रह, चुर, पा, नी तथा अचि’ — ये तथा उपर्युक्त धातु ‘नायक’ (प्रधान) हैं। इन्हीं के समान अन्य धातुओं के भी रूप होते हैं । ‘भू’ धातुसे क्रमशः ‘ तिङ्’ प्रत्यय होने पर ‘भवति, भवतः, भवन्ति ‘ — इत्यादि रूप होते हैं । इनका वाक्य में प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये — ‘ स भवति । तौ भवतः । ते भवन्ति । त्वं भवसि । युवां भवथः । यूयं भवथ । अहं भवामि । आवां भवावः। वयं भवामः।’ ये ‘भू’ धातु के ‘लट्’ लकार में परस्मैपदी रूप हैं । ‘भू’ धातु का अर्थ है— ‘होना’ । ‘एध्’ धातु ‘वृद्धि’ अर्थ में प्रयुक्त होता है। यह आत्मनेपदी धातु है। इसका ‘लट्’ लकार में प्रथमपुरुष के एकवचन में ‘एधते’ रूप बनता है। वाक्य में प्रयोग — ‘एधते कुलम्।’ (कुल की वृद्धि होती है) — इस प्रकार होता है । ‘लट्’ लकार में ‘एध्’ धातु के शेष रूप इस प्रकार होते हैं — ‘ द्वे एधेते’ । (दो बढ़ते हैं) । यह द्विवचन का रूप है। बहुवचन में ‘एधन्ते’ रूप होता है। इस प्रकार प्रथमपुरुष के एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप बताये गये । अब मध्यम और उत्तम पुरुषों के रूप प्रस्तुत किये जाते हैं — ‘एधसे’ यह मध्यमपुरुष का एकवचनान्त रूप है। वाक्य में इसका प्रयोग इस प्रकार हो सकता है — ‘त्वं हि मेधया एधसे।’ (निश्चय ही तुम बुद्धि से बढ़ते हो।) ‘एधेये, एधध्वे’ ये दोनों मध्यमपुरुष के क्रमशः द्विवचनान्त और बहुवचनान्त रूप हैं । ‘एधे, एधावहे, एधामहे’ — ये उत्तमपुरुष में क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप हैं । वाक्य में प्रयोग—‘अहं धिया एधे । ‘ ( मैं बुद्धि से बढ़ता हूँ।) ‘आवां मेधया एधावहे।’ (हम दोनों मेधा से बढ़ते हैं ।) ‘वयं हरेर्भक्त्या एधामहे ।’ (हम श्रीहरि की भक्ति से बढ़ते हैं ।) ‘पाक’ अर्थ में ‘पच्’ धातु का प्रयोग होता है। उसके ‘पचति’ इत्यादि रूप पूर्ववत् (‘भू’ धातु के समान) होते हैं। ‘भू’ धातु से भाव में और ‘अनु + भू’ धातु से कर्म में ‘यक्’ प्रत्यय होने पर क्रमशः ‘भूयते’ और ‘अनुभूयते’ रूप होते हैं । भाव में प्रत्यय होने पर क्रिया केवल एकवचनान्त ही होती है और सभी पुरुषों में कर्ता तृतीयान्त होने के कारण एक ही क्रिया सबके लिये प्रयुक्त होती है। यथा — ‘त्वया मया अन्यैश्च भूयते ।’ जहाँ कर्म प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म उक्त होने के कारण उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और तदनुसार सभी पुरुषों तथा सभी वचनों में क्रिया के रूप प्रयोग में लाये जाते हैं। यथा — ‘असौ अनुभूयते । तौ अनुभूयेते। ते अनुभूयन्ते । त्वम् अनुभूयसे। युवाम् अनुभूयेथे । यूयम् अनुभूयध्वे । अहम् अनुभूये। आवाम् अनुभूयावहे। वयम् अनुभूयामहे’ ॥ ६-१३ ॥ अर्थविशेष को लेकर धातु से ‘णिच्’, ‘सन्’, ‘यङ्’ तथा ‘यङ्लुक्’ होते हैं। इन्हें क्रम से ‘ण्यन्त’, ‘सन्नन्त’, ‘यडन्त’ और ‘यङ्लुगन्त’ कहते हैं। जहाँ किसी क्रिया के कर्ता का कोई प्रेरक या प्रयोजक कर्ता होता है, वहाँ प्रयोजक कर्ता की ‘हेतु’ संज्ञा होती है और प्रयोज्य कर्ता ‘कर्म’ बन जाता है । प्रयोजक के व्यापार प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातु से ‘णिच्’ प्रत्यय होता है। उसके होने पर ‘भू’ धातु के ‘लट्’ लकार में ‘भावयति’ इत्यादि रूप होते हैं। उदाहरण के लिये — ‘ईश्वरो भवति, तं यज्ञदत्तो ध्यानादिना प्रेरयति इत्यस्मिन्नर्थे यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति इति प्रयोगो भवति’ ( ईश्वर होता है और यज्ञदत्त उसको ध्यानादि के द्वारा प्रेरित करता है — इस अर्थ को व्यक्त करने के लिये ‘यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति’ यह प्रयोग बनता है ) ।’ जहाँ कोई धातु इच्छाक्रिया का कर्म बनता है तथा इच्छाक्रिया का कर्ता ही उस धातु का भी कर्ता होता है, वहाँ उस धातु से इच्छा की अभिव्यक्ति के लिये ‘सन्’ प्रत्यय होता है । ‘भू’ धातु के सन्नन्त में ‘बुभूषति’ इत्यादि रूप होते हैं । यथा — ‘भवितुम् इच्छति बुभूषति । ‘ ( होना चाहता है ।) वक्ता चाहे तो ‘बुभूषति’ कहे अथवा ‘भवितुम् इच्छति’ — इस वाक्य का प्रयोग करे। यह स्मरणीय है कि ‘सन्’ और ‘यङ्’ प्रत्यय परे रहने पर धातु का द्वित्व हो जाता है। शेष कार्य व्याकरण की प्रक्रिया के अनुसार होते हैं । जहाँ क्रिया का समभिहार हो, अर्थात् पुनः-पुनः या अतिशयरूप से क्रिया का होना बताया जाय, वहाँ उक्त अभिप्राय का द्योतन या प्रकाशन करने के लिये धातु से ‘यङ्’ प्रत्यय होता है । ‘यङ्’ और ‘यङ्लुगन्त’ में धातु का द्वित्व होने पर पूर्वभाग के, जिसे ‘अभ्यास’ कहते हैं, ‘इक्’ का ‘गुण’ हो जाता है। ‘भू’ धातु के ‘यडन्त’ में ‘बोभूयते’ इत्यादि रूप होते हैं । ‘पुनः पुनः अतिशयेन वा भवति’ — इस अर्थ में ‘बोभूयते’ क्रिया का प्रयोग होता है । यथा — ‘ वाद्यं बोभूयते । ‘ (वाद्यवादन बार-बार या अधिक मात्रा में होता है) । ‘यङ्लुगन्त’ में ‘भू’ धातु के ‘बोभोति’ इत्यादि रूप होते हैं। अर्थ वही है, जो ‘यङन्त’ क्रिया का होता है । ‘यङन्त’ में आत्मनेपदीय प्रत्यय होते हैं और ‘यङ्लुगन्त’ में परस्मैपदीय ॥ १४ ॥ कहीं-कहीं ‘नाम’ या ‘सुबन्त’ शब्द से ‘क्यच्’ आदि प्रत्यय होने पर उस शब्द की ‘धातु’ संज्ञा होती है और उसके धातु के ही समान रूप चलते हैं। ऐसे प्रकरण को ‘नामधातु’ कहते हैं । जो इच्छा का कर्म हो और इच्छा करने वाले का सम्बन्धी हो, ऐसे ‘सुबन्त’ से इच्छा —अर्थ में विकल्प से ‘क्यच्’ प्रत्यय होता है। ‘आत्मनः पुत्रम् इच्छति ।’ (अपने लिये पुत्र चाहता है) — इस अर्थ में ‘पुत्रम्’ इस ‘सुबन्त’ पद से ‘क्यच्’ प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होने पर ‘पुत्र अम् य’ हुआ । ‘सनाद्यन्ता धातवः।’ ( ३ । १ । ३२ ) से धातुसंज्ञा होकर ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः । ‘ (२ । ४ । ७०) से ‘अम्’ का लोप हो गया । पुत्र =य — इस स्थितिमें ‘क्यचि च।’ (७।४ । ३३) — इस सूत्र के अनुसार ‘अकार के स्थान में ‘ईकार’ हो गया। इस प्रकार ‘पुत्रीय’ से ‘तिप्’ ‘ शप्’ आदि कार्य होने पर ‘पुत्रीयति’ इत्यादि रूप होते हैं । इसी अर्थ में ‘काम्यच्’ प्रत्यय भी होता है और ‘पुत्र’ शब्द से ‘काम्यच्’ प्रत्यय होने पर ‘पुत्रकाम्यति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘पटत् भवति इति पटपटायते । ‘ यहाँ ‘अव्यक्तानुकरणाद्द्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच् ।’ (५।४।५७) — इस सूत्र के अनुसार ‘भू’ के योग में ‘डाच्’ प्रत्यय होने पर ‘पटत् डा’ इस स्थिति में ‘डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम् ।’ इस वार्तिक से द्वित्व होकर ‘नित्यमाम्रेडितं डाचि ।’ इस वार्तिक से पररूप हुआ तो टि-लोप के अनन्तर ‘पटपटा + भू’ — यह अवस्था प्राप्त हुई। इसके बाद ‘लोहितादिडाज्भ्यः क्यष्।’ (३ । १ । १३)— इस सूत्र से ‘भवति’ इस अर्थ में ‘क्यष्’ प्रत्यय हुआ तो ‘पटपटा+क्यष्’ बना। फिर अनुबन्धलोप, धातु संज्ञा तथा धातुसम्बन्धी कार्य होने से ‘पटपटायते’ — यह रूप सिद्ध हुआ । इसका अर्थ है कि ‘पटपट’ की आवाज होती है । ‘घटं करोति । ‘ — इस अर्थ में ‘तत्करोति तदाचष्टे’ के अनुसार ‘घटयति’ रूप बनता है । ‘सन्नन्त’ से ‘णिच्’ प्रत्यय किया जाय तो ‘भू’ धातु के सन्नन्त रूप ‘बुभूषति’ की जगह ‘बुभूषयति’ रूप ये बनेगा। प्रयोग —‘गुरुः शिष्यं बुभूषयति’ ॥ १५ ॥ ‘भू’ धातु के ‘विधिलिङ् लकार में क्रमशः रूप होते हैं — ‘भवेत्, भवेताम् भवेयुः । भवेः, भवेतम्, भवेत। भवेयम्, भवेव, भवेम’ । ‘एध’ धातु के ‘विधिलिङ्—’ में इस प्रकार रूप बनते हैं — एधेत, एधेयाताम्, एधेरन्। एधेथाः, एधेयाथाम्, एधेध्वम् । एधेय, एधेवहि, एधेमहि।’ वाक्यप्रयोग — ‘ते मनसा एधेरन्’ (वे मनसे बढ़ें — उन्नति करें ) । ‘त्वं श्रिया एधेथाः । ‘ (तुम लक्ष्मी के द्वारा बढ़ो इत्यादि) । ‘भू’ धातु के ‘लोट् लकार में ये रूप होते हैं — ‘ भवतु, भवतात्, भवताम् भवन्तु । भव—भवतात्, भवतम् भवत । भवानि भवाव, भवाम।’ ‘एध्’ धातु के ‘लोट्’ लकार में ये रूप जानने चाहिये —’एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्। एधस्व, एधेथाम् एधध्वम् । एधै, एधावहै, एधामहै।’ ‘पच्’ धातु के भी आत्मनेपद में ऐसे ही रूप होते हैं । यथा उत्तमपुरुष में — ‘पचै, पचावहै, पचामहै ।’ ‘अभि’ पूर्वक ‘नदि’ धातु का ‘लङ्’ लकार में प्रथमपुरुष के एकवचन में ‘अभ्यनन्दत्’ — यह रूप होता है । ‘पच्’ धातु के ‘लङ् लका रमें — ‘अपचत्, अपचताम्, अपचन्’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘भू’ धातु के ‘लङ्’ लकार में ‘अभवत्, अभवताम्, अभवन्’ इत्यादि रूप होते हैं । ‘पच्’ धातु के ‘लङ् लकार के उत्तमपुरुष में — ‘अपचम्, अपचाव, अपचाम’ — ये रूप होते हैं । ‘एध्’ धातु के ‘लङ् लकारमें — ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त । ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधष्वम् । ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि—ये रूप होते हैं । ‘भू’ धातु के ‘लुङ्’ कारमें अभूत्, अभूताम्, अभूवन् । अभूः, अभूतम्, अभूत। अभूवम्, अभूव, अभूम’ — ये रूप होते हैं । ‘एध्’ धातु के ‘लुङ् लकार में ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, ऐधिषत । ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिध्वम् । ऐधिषि, ऐधिष्वहि, ऐधिष्महि’ — ये रूप जानने चाहिये वाक्यप्रयोग—‘नरौ ऐधिषाताम् ‘ (दो मनुष्य बढ़ें) । ‘भू’ धातु के ‘परोक्षलिट्’ में ‘बभूव, बभूवतुः, बभूवुः । बभूविथ, बभूवथुः बभूव । बभूव, बभूविव, बभूविम ।’ — ये रूप होते हैं । ‘पच्’ धातु के आत्मनेपदी ‘लिट्’ लकार में प्रथमपुरुष के रूप इस प्रकार हैं — ‘पेचे, पेचाते, पेचिरे ।’ ‘एध्’ धातु के ‘लिट्’ लकार में इस प्रकार रूप समझने चाहिये — ‘एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे । एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृध्वे । एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे ।’ ‘पच्’ धातु के ‘परोक्षलिट्’ में प्रथमपुरुष के रूप बताये गये हैं । मध्यम और उत्तम पुरुष के रूप इस प्रकार होते हैं — ‘पेचिषे, पेचाथे पेचिध्वे । पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे।’ ‘भू’ धातुके ‘अनद्यतन भविष्य लुट् ‘ कार में इस प्रकार रूप जानने चाहिये — ‘ भविता, भवितारौ, भवितारः । भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ । भवितास्मि भवितास्वः, भवितास्मः ।’ वाक्यप्रयोग — ‘हरादयो भवितारः ।’ (हर आदि होंगे।) ‘वयं भवितास्मः ।’ (हम होंगे।) ‘पच्’ धातु के ‘लुट्’ लकार में ‘परस्मैपदीय’ रूप इस प्रकार हैं — ‘पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि । (शेष भूधातु की तरह) । वाक्यप्रयोग — ‘ त्वं शुभौदनं पक्तासि।’ (तुम अच्छा भात राँघोगे।) ‘पच्’ धातु के ‘लुट्’ लकार में ‘आत्मनेपदीय’ रूप इस प्रकार हैं — प्रथमपुरुषमें तो ‘परस्मैपदीय’ रूप के समान ही होते हैं, मध्यम और उत्तम पुरुष में — ‘पक्तासे, पक्तासाथे, पक्ताध्वे । पक्ताहे, पक्तास्वहे, पक्तास्महे ।’ वाक्यप्रयोग — ‘ अहं पक्ताहे । ‘ ( मैं पकाऊँगा।) ‘वयं हरेश्चरुं पक्तास्महे ।’ (हम श्रीहरि के लिये चरु पकावेंगे या तैयार करेंगे।) ‘आशीर्लिङ् में ‘भू’ धातु के रूप इस प्रकार जानने चाहिये — ‘भूयात्, भूयास्ताम् भूयासुः । भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त । भूयासम् भूयास्व, भूयास्म । वाक्यप्रयोग — ‘सुखं भूयात्।’ (सुख हो ।) ‘हरिशङ्करौ भूयास्ताम् । ‘ (विष्णु और शिव हों ।) ‘ते भूयासुः।’ (वे हों।) ‘त्वं भूयाः ।’ (तुम होओ।) ‘युवाम् ईश्वरौ भूयास्तम्।’ (तुम दोनों ईश्वर — ऐश्वर्यशाली होओ।) ‘यूयं भूयास्त ।’ (तुम सब होओ।) ‘अहं भूयासम् । ‘ (मैं होऊँ।) ‘वयं सर्वदा भूयास्म ।’ ‘यक्ष’ धातु के आत्मनेपदीय आशिष् लिङ् में इस प्रकार रूप होते हैं — ‘यक्षीष्ट, यक्षीयास्ताम्, यक्षीरन् । यक्षीष्ठाः, यक्षीयास्थाम्, यक्षीध्वम् । यक्षीय, यक्षीवहि, यक्षीमहि ।’ इसी प्रकार ‘एध्’ धातु के ‘आशीर्लिङ्’ में ये रूप जानने चाहिये — ‘एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन् । एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम् । एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि । ‘यक्ष’ धातु के ‘लृङ्’ लकार में ये रूप होते हैं — ‘अयक्ष्यत, अयक्ष्येताम्, अयक्ष्यन्त । अयक्ष्यथाः, अयक्ष्येथाम्, अयक्ष्यध्वम् । अक्ष्ये, अयक्ष्यावहि, अयक्ष्यामहि ।’ ‘एध्’ धातु के ‘लृङ्’ लकार के रूप इस प्रकार हैं — ‘ ऐधिष्यत, ऐधिष्येताम् ऐधिष्यन्त । ऐधिष्यथाः, ऐधिष्येथाम्, ऐधिष्यध्वम् । ऐधिष्ये, ऐधिष्यावहि, ऐधिष्यामहि । ‘ वाक्यप्रयोग — काचिद् बाधा नाभविष्यच्चेद् वयम् अरे ऐधिष्यामहि । (यदि कोई बाधा न पड़े तो हम अवश्य शत्रु से बढ़ जायँ ।) ‘भू’ धातु के ‘लृट्’ लकार में ‘भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति’— इत्यादि रूप होते हैं।‘एध्’ धातु के ‘लृट्’ लकारमें —’एधिष्यते, एधिष्येते, एधिष्यन्ते। एधिष्यसे, एधिष्येथे, एधिष्यध्वे । एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे ।’ ये रूप होते हैं ॥ १६-२९ ॥ इसी प्रकार ‘णिजन्त’ वि— पूर्वक ‘भू’ धातु के ‘लृट्’ लकार में —‘विभावयिष्यति, विभावयिष्यतः, विभावयिष्यन्ति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘यङ्लुगन्त’ ‘भू’ धातु के ‘लृट्’ लकार में ‘बोभविष्यति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘नामधातु’ में घटं करोति, पटं करोति’ इत्यादि अर्थ में जिनके ‘घटयति, पटयति’ इत्यादि रूप कह आये हैं, उन्हीं के ‘विधिलिङ्—’ में ‘घटयेत्, पटयेत्’ इत्यादि रूप होते हैं । इसी तरह ‘पुत्रीयति’ और ‘पुत्रकाम्यति’ इत्यादि नामधातु—सम्बन्धिनी क्रियाओं के रूपों की ऊहा कर लेनी चाहिये ॥ ३० ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘तिङ् — विभक्त्यन्त सिद्ध रूपों का वर्णन’ नामक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५८ ॥ Content is available only for registered users. 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