July 22, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 360 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ साठवाँ अध्याय स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग स्वर्गपातालादिवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — कात्यायन ! स्वर्ग आदि के नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरि का मैं वर्णन करता हूँ — स्वः [अव्यय ], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [ पुंलिङ्ग], द्यो, दिव् — ये दो स्त्रीलिङ्ग और त्रिविष्टप [ नपुंसक ] — ये सब ‘स्वर्गलोक’ के नाम हैं । देव, वृन्दारक और लेख — ये (पुंल्लिङ्ग शब्द) देवताओं के नाम हैं । ‘रुद्र’ आदि 1 शब्द गणदेवता के वाचक हैं। विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किंनर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत — ये सब ‘देवयोनि’ के अन्तर्गत हैं । देवद्विट् असुर और दैत्य — ये असुरों के तथा सुगत और तथागत — ये बुद्ध के नाम हैं । ब्रह्मा, आत्मभू और सुरज्येष्ठ— ये ब्रह्माजी के; विष्णु, नारायण और हरि — ये भगवान् विष्णु के; रेवतीश, हली और राम — ये बलभद्रजी के तथा काम, स्मर और पञ्चशर — ये कामदेव के नाम हैं। लक्ष्मी, पद्मालया और पद्मा — ये लक्ष्मीजी के तथा शर्व, सर्वेश्वर और शिव — ये भगवान् शंकर के नाम हैं। उनकी बँधी हुई जटा के दो नाम हैं— कपर्द और जटाजूट। उनके धनुष के भी दो नाम हैं — पिनाक और अजगव । शिवजी के पार्षद प्रमथ कहलाते हैं । मृडानी, चण्डिका और अम्बिका — ये पार्वतीजी के; द्वैमातुर और गजास्य (गजानन) — ये गणेशजी के तथा सेनानी, अग्निभू और गुह — ये स्वामी कार्तिकेयजी के नाम हैं । ‘आखण्डल, शुनासीर, सुत्रामा और दिवस्पति— ये इन्द्र के तथा पुलोमजा, शची और इन्द्राणी — ये उनकी प्रियतमा शची देवी के नाम हैं । इन्द्र के महल का नाम वैजयन्त, पुत्र का नाम जयन्त और पाकशासनि तथा हाथी के नाम ऐरावत, अभ्रमातङ्ग, ऐरावण और अभ्रमुवल्लभ हैं। ह्रादिनी (स्त्रीलिङ्ग), पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त होने वाला वज्र, कुलिश (नपुंसक), भिदुर (नपुंसक) और पवि (पुंल्लिङ्ग) — ये सब इन्द्र के वज्र के नाम हैं । व्योम — यान (नपुं०) तथा विमान (पुंल्लि० नपु० ) — ये आकाश में विचरने वाले देववाहनों के नाम हैं। पीयूष, अमृत और सुधा— ये अमृत के नाम हैं । (इनमें सुधा तो स्त्रीलिङ्ग और शेष दोनों नाम नपुंसकलिङ्ग हैं ।) देवताओं की सभा ‘सुधर्मा’ कहलाती है । देवताओं की नदी गङ्गा का नाम स्वर्गङ्गा और सुरदीर्घिका है। उर्वशी आदि अप्सराओं को अप्सरा और स्वर्वेश्या कहते हैं। इनमें अप्सरस् शब्द स्त्रीलिङ्ग एवं बहुवचन में प्रयुक्त होता है। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वों के नाम हैं। अग्नि, वह्नि, धनंजय, जातवेदा, कृष्णवर्त्मा, आश्रयाश, पावक, हिरण्यरेताः, सप्तार्चि, शुक्ल, आशुशुक्षणि, शुचि और अप्पित्त — ये अग्नि के नाम हैं तथा और्व, वाडव और वडवानल — ये समुद्र के भीतर जलने वाली आग के नाम हैं। आग की ज्वाला के पाँच नाम हैं — ज्वाल, कील, अर्चिष्, हेति और शिखा । इनमें पहले दो शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुंल्लिङ्ग दोनों में प्रयुक्त होते हैं। अर्चिष् नपुंसकलिङ्ग है तथा हेति और शिखा स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं । आग की चिनगारी के दो नाम हैं — स्फुलिङ्ग और अग्निकण । इनमें पहला तीनों लिङ्गों में और दूसरा केवल पुँल्लिङ्ग में प्रयुक्त होता है । धर्मराज, परेतराट्, काल, अन्तक, दण्डधर और श्राद्धदेव — ये यमराज के नाम हैं। राक्षस, कौणप, अश्रप, क्रव्याद, यातुधान और नैर्ऋति — ये राक्षसों के नाम हैं । प्रचेता, वरुण और पाशी— ये वरुण के तथा श्वसन, स्पर्शन, अनिल, सदागति, मातरिश्वा, प्राण, मरुत् और समीरण — ये वायु के नाम हैं । जव, रंहस् और तरस्—ये वेग के वाचक हैं। (इनमें पहला पुंल्लिङ्ग और शेष दोनों शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं।) लघु, क्षिप्र, अर, द्रुत, सत्वर, चपल, तूर्ण, अविलम्बित और आशु — ये शीघ्रता के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । (क्रियाविशेषण होनेपर इन सबका नपुंसकलिङ्ग एवं एकवचनमें प्रयोग होता है ।) सतत, अनारत, अश्रान्त, संतत, अविरत, अनिश, नित्य, अनवरत और अजस्त्र — ये निरन्तर के वाचक हैं। (ये भी प्रायः क्रियाविशेषण में ही प्रयुक्त होते हैं, केवल ‘नित्य’ शब्द का ही अन्य विशेषणों में भी प्रयोग होता है ।) अतिशय, भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ, बाढ और दृढ — ये अतिशय (अधिकमात्रा) — के वाचक हैं। गुह्यकेश, यक्षराज, राजराज और धनाधिप — ये कुबेर के नाम हैं। किंनर, किम्पुरुष, तुरंगवदन और मयु—ये किंनरों के वाचक शब्द हैं । निधि और शेवधि—ये दोनों पुंल्लिङ्ग शब्द निधि के वाचक हैं। व्योम, अभ्र, पुष्कर, अम्बर, द्यो, दिव्, अन्तरिक्ष और ख — ये आकाश के पर्याय हैं । (इनमें द्यो और दिव् शब्द स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं और शेष सब नपुंसकलिङ्गमें।) काष्ठा, आशा, ककुभ् और दिश् — ये दिशा-अर्थ के बोध हैं। अभ्यन्तर और अन्तराल शब्द मध्य के तथा चक्रवाल और मण्डल शब्द गोलाकार । मण्डल एवं समुदाय के वाचक हैं । तडित्वान्, वारिद, मेघ, स्तनयित्नु और बलाहक — ये मेघ पर्याय हैं ॥ १-२१ ॥ बादलों की घटा का नाम है कादम्बिनी और मेघमाला तथा स्तनित और गर्जित — ये (नपुंसकलिङ्ग) शब्द मेघगर्जना के वाचक हैं। शम्पा, शतह्रदा, ह्रादिनी, ऐरावती, क्षणप्रभा, तडित्, सौदामिनी ( सौदामनी), विद्युत्, चञ्चला और चपला — ये बिजली के पर्याय हैं । स्फूर्जथु और वज्र-निर्घोष — ये दो बिजली की गड़गड़ाहट के नाम हैं । वर्षा की रुकावट को वृष्टिघात और अवग्रह कहते हैं । धारा – सम्पात और आसार – ये दो मुसलाधार वृष्टि के नाम हैं। जल के छींटों या फुहारों को शीकर कहते हैं । वर्षा के साथ गिरने वाले ओलों का नाम करका है। जब मेघों की घटा से दिन छिप जाय तो उसे दुर्दिन कहते हैं । अन्तर्धा, व्यवधा, पुँल्लिङ्ग में प्रयुक्त होने वाला अन्तर्धि तथा (नपुंसकलिङ्ग) अपवारण, अपिधान, तिरोधान, पिधान और आच्छादन — ये आठ अन्तर्धान ( अदृश्य होने ) – के नाम हैं। अब्ज, जैवात्रिक, सोम, ग्लौः ; मृगाङ्क, कलानिधि, विधु तथा कुमुद-बन्धु — ये चन्द्रमा के पर्याय हैं । चन्द्रमा और सूर्य के मण्डल का नाम है — बिम्ब और मण्डल । इनमें बिम्ब शब्द का पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में तथा मण्डल – शब्द का तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । चन्द्रमा के सोलहवें भाग को कला कहते हैं । भित्त, शकल और खण्ड — ये टुकड़े के वाचक हैं। चाँदनी को चन्द्रिका, कौमुदी और ज्योत्स्ना कहते हैं । प्रसाद और प्रसन्नता — ये निर्मलता और हर्ष के बोधक हैं। लक्षण, लक्ष्म और चिह्न — ये चिह्न के तथा शोभा, कान्ति, द्युति और छवि — ये शोभा के नाम हैं । उत्तम शोभा को सुषमा कहते हैं । तुषार, तुहिन, हिम, अवश्याय, नीहार, प्रालेय, शिशिर और हिम — ये पाले के वाचक हैं। नक्षत्र, ऋक्ष, भ, तारा, तारका और उडु— ये नक्षत्र के पर्याय हैं । इनमें उडु शब्द विकल्प से स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक होता है । गुरु, जीव और आङ्गिरस — ये बृहस्पतिके; उशना, भार्गव और कवि—ये शुक्राचार्य के तथा विघुँतुद, तम और राहु—ये तीन राहु के नाम हैं। राशियों के उदय को लग्न कहते हैं। मरीचि और अत्रि आदि 2 सप्तर्षि ‘चित्रशिखण्डी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं । हरिदश्व, ब्रध्न, पूषा, घुमणि, मिहिर और रवि — ये सूर्य के नाम हैं। परिवेष, परिधि, उपसूर्यक और मण्डल — ये उत्पात आदि के समय दिखायी देने वाले सूर्यमण्डल के घेरे का बोध कराने वाले हैं। किरण, उस्र, मयूख, अंशु, गभस्ति, घृणि, धृष्णि, भानु, कर, मरीचि और दीधिति — ये ग्यारह सूर्य की किरणों के नाम हैं । इनमें मरीचि शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुंल्लिङ्ग दोनों में प्रयुक्त होता है तथा दीधिति शब्द का प्रयोग केवल स्त्रीलिङ्ग में होता है । प्रभा, रुक्, रुचि, त्विट्, भा, आभा, छबि, द्युति, दीप्ति, रोचिष् और शोचिष् — ये प्रभा के नाम हैं । इनमें रोचिष् और शोचिष्—ये दो शब्द केवल नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं (शेष सभी स्त्रीलिङ्ग हैं) । प्रकाश, द्योत और आतप — ये तीन धूप या घाम के नाम हैं । कोष्ण, कवोष्ण, मन्दोष्ण और कदुष्ण — ये थोड़ी गरमी का बोध कराने वाले हैं। यद्यपि स्वरूप से ये नपुंसकलिङ्ग हैं, तथापि जब थोड़ी गरमी रखने वाली किसी वस्तु के विशेषण होते हैं तो विशेष्य के अनुसार इनका तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । तिग्म, तीक्ष्ण और खर — ये अधिक गर्मी के वाचक हैं। ये भी पूर्ववत् गुणबोधक होने पर नपुंसक में और गुणवान् के विशेषण होने पर विशेष्य के अनुसार तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त होते हैं । दिष्ट, अनेहा और काल समय के पर्याय हैं। घस्र, दिन और अहन् — ये दिन के, सायं शब्द सायंकाल का और संध्या तथा पितृप्रसू — ये दो संध्या के नाम हैं। प्रत्यूष, अहर्मुख, कल्य, उषस् और प्रत्यूषस् — ये प्रभातकाल के वाचक हैं। दिन के प्रथम भाग को प्राह्ण, अन्तिम भाग को अपराह्न और मध्यभाग को मध्याह्न कहते हैं — इन तीनों का समुदाय त्रिसंध्य कहलाता है । शर्वरी, यामी ( यामिनी) और तमी — ये रात्रि के वाचक हैं । अँधेरी रात को तमिस्रा और चाँदनी रात्रि को ज्योत्स्नी कहते हैं । आगामी और वर्तमान— इन दो दिनोंसहित बीच की रात्रि का बोध कराने के लिये पक्षिणी शब्द का प्रयोग किया जाता है । आधी रात के दो नाम हैं — अर्धरात्र और निशीथ । रात्रि के प्रारम्भ को प्रदोष और रजनीमुख कहते हैं । प्रतिपदा और पूर्णिमा या अमावास्या के बीच में जो संधि का समय है उसे पर्वसंधि कहते हैं। दोनों पञ्चदशियों अर्थात् पूर्णिमा और अमावास्या को पक्षान्त कहा जाता है। पूर्णिमा के दो नाम हैं — पौर्णमासी तथा पूर्णिमा । यदि पूर्णिमा को चन्द्रोदय के समय प्रतिपद् का योग लग जाने से एक कला से हीन चन्द्रमा का उदय हो तो उस पूर्णिमा की ‘अनुमति’ संज्ञा है तथा पूर्ण चन्द्रमा के उदय लेने पर उसे ‘राका’ कहते हैं । अमावस्या, अमावास्या दर्श और सूर्येन्दुसंगम — ये चार अमावास्या के नाम हैं । यदि सबेरे चतुर्दशी का योग होने से अमावास्या के प्रातःकाल चन्द्रमा का दर्शन हो जाय तो उस अमावास्या को ‘सिनीवाली’ कहते हैं। किंतु चन्द्रोदयकाल में अमावस्या का योग हो जाने से यदि चन्द्रमा की कला बिलकुल न दिखायी दे तो वह अमा ‘कुहू’ कहलाती है ॥ २२-४० ॥ संवर्त, प्रलय, कल्प, क्षय और कल्पान्त — ये पाँच प्रलय के नाम हैं। कलुष, वृजिन, एनस्, अघ, अंहस्, दुरित और दुष्कृत शब्द पाप के वाचक हैं। धर्म शब्द का प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों में होता है। इसके पर्याय हैं — पुण्य, श्रेयस्, सुकृत और वृष । (इनमें आरम्भ के तीन नपुंसक और वृष शब्द पुँल्लिङ्ग है।) मुत्, प्रीति, प्रमद, हर्ष, प्रमोद, आमोद, सम्मद, आनन्दथु, आनन्द, शर्म्म, शात और सुख — ये सुख एवं हर्ष के नाम हैं । स्वः श्रेयस, शिव, भद्र, कल्याण, मङ्गल, शुभ, भावुक, भविक, भव्य, कुशल और क्षेम — ये कल्याण – अर्थ का बोध कराने वाले हैं। ये सभी शब्द केवल स्त्रीलिङ्ग में नहीं प्रयुक्त होते । दैव, दिष्ट, भागधेय, भाग्य, नियति और विधि — ये भाग्य के नाम हैं। इनमें नियति — शब्द स्त्रीलिङ्ग है (और विधि पुंल्लिङ्ग तथा आरम्भ के चार शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं) । क्षेत्रज्ञ, आत्मा और पुरुष — ये आत्मा के पर्याय हैं । प्रकृति या माया के दो नाम हैं — प्रधान और प्रकृति । इनमें प्रकृति स्त्रीलिङ्ग है और प्रधान नपुंसकलिङ्ग । हेतु, कारण और बीज — ये कारण के वाचक हैं। इनमें पहला पुँल्लिङ्ग और शेष दो शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं। कार्य की उत्पत्ति में प्रधान हेतु के दो नाम हैं — निदान और आदिकारण । चित्त, चेतस्, हृदय, स्वान्त, हृत्, मानस और मनस् — ये चित्त के पर्याय हैं। बुद्धि, मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्ति और चेतना — ये बुद्धि के वाचक शब्द हैं। धारणाशक्ति से युक्त बुद्धि को ‘मेधा’ कहते हैं और मानसिक व्यापार का नाम संकल्प है । संख्या, विचारणा और चर्चा — ये विचार के, विचिकित्सा और संशय संदेह के तथा अध्याहार, तर्क और ऊह — ये तर्क-वितर्क के नाम हैं । निश्चित विचार को निर्णय और निश्चय कहते हैं । ‘ईश्वर और परलोक नहीं है ‘ — ऐसे विचार को मिथ्या-दृष्टि और नास्तिकता कहते हैं । भ्रान्ति, मिथ्यामति और भ्रम — ये तीन भ्रमात्मक ज्ञान के वाचक हैं। अङ्गीकार, अभ्युपगम, प्रतिश्रव और समाधि—ये स्वीकार अर्थ का बोध कराने वाले हैं। मोक्षविषयक बुद्धि को ज्ञान और शिल्प एवं शास्त्र के बोध को विज्ञान कहते हैं । मुक्ति, कैवल्य, निर्वाण, श्रेयस्, निःश्रेयस, अमृत, मोक्ष और अपवर्ग — ये मोक्ष के वाचक शब्द हैं। अज्ञान, अविद्या और अहम्मति — ये तीन अज्ञान के पर्याय हैं। इनमें पहला नपुंसक और शेष दो शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। एक-दूसरे की रगड़ से प्रकट हुई मनोहारिणी गन्ध के अर्थ में ‘परिमल’ शब्द का प्रयोग होता है । वही गन्ध जब अत्यन्त मनोहर हो तो उसे ‘आमोद’ कहते हैं । घ्राणेन्द्रिय को तृप्त करने वाली उत्तम गन्ध का नाम ‘सुरभि’ है । शुभ्र, शुक्ल, शुचि, श्वेत, विशद, श्येत, पाण्डर, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल और अर्जुन — ये श्वेत वर्ण के वाचक हैं। कुछ पीलापन लिये हुए सफेदी को हरिण, पाण्डुर और पाण्डु कहते हैं। यह रंग भी बहुत हलका हो तो उसे धूसर कहते हैं । नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक — ये कृष्णवर्ण (काले रंग) के बोधक हैं । पीत, गौर तथा हरिद्राभ — ये पीले रंग के और पालाश, हरित तथा हरित् — ये हरे रंग के वाचक हैं। रोहित, लोहित और रक्त — ये लाल रंग का बोध कराने वाले हैं। रक्त कमल के समान जिसकी शोभा हो, उसे ‘शोण’ कहते हैं। जिसकी लालिमा जान न पड़ती हो, उस हलकी लाली का नाम ‘अरुण’ है। सफेदी लिये हुए लाली अर्थात् गुलाबी रंग को ‘पाटल’ कहते हैं । जिसमें काले और पीले — दोनों रंग मिले हों वह ‘श्याव’ और ‘कपिश’ कहलाता है । जहाँ काले के साथ लाल रंग का मेल हो, उसे धूम्र तथा धूमल कहते हैं । कडार, कपिल, पिङ्ग, पिशङ्ग, कद्रु तथा पिङ्गल — ये भूरे रंग के वाचक हैं। चित्र, किर्मीर, कल्माष, शबल, एत और कर्बुर — ये चितकबरे रंग का बोध कराने वाले हैं ॥ ४१-५६१/२ ॥ व्याहार, उक्ति तथा लपित —ये वचन के समानार्थक शब्द हैं। व्याकरण के नियमों से च्युत — अशुद्ध शब्द को ‘अपभ्रंश’ तथा ‘अपशब्द’ कहते हैं। सुबन्त पदों का समुदाय (‘चैत्रेण शयितव्यम्’ इत्यादि), तिङन्त पदों का समूह ( ‘ पश्य पश्य गच्छति’ इत्यादि), सुबन्त और तिङन्त — दोनों पदों का समुदाय (‘चैत्रः पचति’ इत्यादि) अथवा कारक से अन्वित क्रिया का बोध कराने वाला पद — समूह (‘घटमानय’ ) इत्यादि — ये सभी ‘वाक्य’ कहलाते हैं । पूर्वकाल में बीती हुई सच्ची घटनाओं का वर्णन करने वाले ग्रन्थ को ‘इतिहास’ तथा ‘पुरावृत्त’ कहते हैं । (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित — इन ) पाँच लक्षणों से युक्त व्यासादि मुनियों के ग्रन्थ का नाम ‘पुराण’ है । सच्ची घटना को लेकर लिखी हुई पुस्तक ‘आख्यायिका’ कहलाती है । कल्पित प्रबन्ध को ‘कथा’ कहते हैं। संग्रह के वाचक दो शब्द हैं — समाहार तथा संग्रह । अबूझ पहेली को ‘प्रवह्निका’ और ‘प्रहेलिका’ कहते हैं । पूर्ण करने के लिये दी हुई संक्षिप्त पदावली का नाम ‘समस्या’ और ‘समासार्था’ है। वेदार्थ के स्मरणपूर्वक लिखे हुए धर्मशास्त्र को ‘स्मृति’ और ‘धर्मसंहिता’ कहते हैं। आख्या, आह्ना और अभिधान — ये नाम के वाचक हैं। ‘वार्ता’ और ‘वृत्तान्त’ — दोनों समानार्थक शब्द हैं। हूति, आकारणा और आह्वान — ये पुकारने के अर्थ में आते हैं। वाणी के आरम्भ को ‘उपन्यास’ और ‘वाङ्मुख’ कहते हैं। विवाद और व्यवहार मुकदमेबाजी का नाम है । प्रतिवाक्य और उत्तर — ये दोनों समानार्थक शब्द हैं । उपोद्घात और उदाहार — ये भूमिका के नाम हैं। झूठा कलङ्क लगाने को मिथ्याभिशंसन और अभिशाप कहते हैं। यश और कीर्ति — ये सुयश के नाम हैं । प्रश्न, पृच्छा और अनुयोग — इनका पूछने के अर्थ में प्रयोग होता है। एक ही शब्द के दो-तीन बार उच्चारण करने को ‘आम्रेडित’ कहते हैं । परायी निन्दा के अर्थ में कुत्सा, निन्दा और गर्हण शब्द का प्रयोग होता है । साधारण बातचीत को आभाषण और आलाप कहते हैं । पागलों की तरह कहे हुए असम्बद्ध या निरर्थक वचन का नाम प्रलाप है । बारंबार किये जाने वाले वार्तालाप को अनुलाप कहते हैं। शोकयुक्त उद्गार का नाम विलाप और परिदेवन है। परस्पर विरुद्ध बातचीत को विप्रलाप और विरोधोक्ति कहते हैं। दो व्यक्तियों के पारस्परिक वार्तालाप का नाम संलाप है । सुप्रलाप और सुवचन—ये उत्तम वाणी के वाचक हैं। सत्य को छिपाने के लिये जिस वाणी का प्रयोग किया जाता है, उसे अपलाप तथा निह्नव कहते हैं। अमङ्गलमयी वाणी का नाम उशती है । हृदय में बैठने वाली युक्तियुक्त बात को संगत और हृदयंगम कहते हैं । अत्यन्त मधुर वाणी में जो सान्त्वना दी जाती है, उसे सान्त्व कहते हैं । जिन बातों का परस्पर कोई सम्बन्ध न हो, वे अबद्ध और निरर्थक कहलाती हैं । निष्ठुर और परुष शब्द कठोर वाणी के तथा अश्लील और ग्राम्य शब्द गंदी बातों के बोधक हैं । प्रिय लगने वाली वाणी को सूनृत कहते हैं । सत्य, तथ्य, ऋत और सम्यक् — ये यथार्थ वचन का बोध कराने वाले हैं । नाद, निस्वान, निस्वन, आरव, आराव, संराव और विराव — ये अव्यक्त शब्द के वाचक हैं। कपड़ों और पत्तों से जो आवाज होती है, उसे मर्मर कहते हैं। आभूषणों की ध्वनि का नाम शिञ्जित है। वीणा स्वर को निक्वण और क्वाण कहते हैं तथा पक्षियों के कलरव का नाम वाशित है। एक समूह की आवाज को कोलाहल और कलकल कहते हैं । गीत और गान — ये दोनों समान अर्थ के बोधक हैं। प्रतिश्रुत् और प्रतिध्वान — ये प्रतिध्वनि के वाचक हैं । इनमें पहला स्त्रीलिङ्ग (और दूसरा नपुंसकलिङ्ग) है। वीणा के कण्ठ से निषाद आदि स्वर प्रकट होते हैं ॥ ५७-६९ ॥ मधुर एवं अस्फुट ध्वनि को ‘कल’ कहते हैं और सूक्ष्म कल का नाम काकली है । गम्भीर स्वर को ‘मन्द्र’ तथा बहुत ऊँची आवाज को ‘तार’ कहते हैं। कल, मन्द्र और तार — इन तीनों शब्दों का तीनों ही लिङ्गों में प्रयोग होता है। गाने और बजाने की मिली हुई लय को एकताल कहते हैं। वीणा के तीन नाम हैं — वीणा, वल्लकी और विपञ्ची। सात तारों से बजने वाली वीणा का (जिसे हिंदी में सतार या सितार कहते हैं ) परिवादिनी नाम है। (बाजों के चार भेद हैं—तत, आनद्ध, सुषिर और घन । इनमें ) वीणा आदि बाजे को तत, ढोल और मृदङ्ग आदि को आनद्ध, बाँसुरी आदि को सुषिर और काँस की झाँझ आदि को घन कहते हैं । इन चारों प्रकार के बाजों का नाम वाद्य, वादित्र और आतोद्य है । ढोल के दो नाम हैं — मृदङ्ग और मुरज । उसके तीन भेद हैं — अङ्कय, आलिङ्गय और ऊर्ध्व । सुयश का ढिंढोरा पीटने के लिये जो डंका होता है, उसे यशः पटह और ढक्का कहते हैं। भेरी के अर्थ में आनक और दुन्दुभि शब्दों का प्रयोग होता है। आनक और पटह — ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। झर्झरी (झाँझ) और डिण्डिम (ढिंढोरा) आदि बाजों के भेद हैं । मर्दल और पणव— ये दोनों समानार्थक हैं (इन्हें भी एक प्रकार का बाजा ही समझना चाहिये) । जिससे गाने-बजाने की क्रिया और काल का विवेक हो, उस गति का नाम ‘ताल’ है । गीत और वाद्य आदि का समान अवस्था में होना ‘लय’ कहलाता है । ताण्डव, नाट्य, लास्य और नर्तन — ये सब ‘नृत्य’ के वाचक हैं। नृत्य, गान और वाद्य — इन तीनों को ‘तौर्यत्रिक’ एवं ‘नाट्य’ कहते हैं। नाटकमें राजाको भट्टारक और देव कहा जाता है तथा उनके साथ जिसका अभिषेक हुआ हो, उस महारानी को देवी कहते हैं । शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स तथा रौद्र — ये आठ रस हैं । इनमें शृङ्गार रस के तीन नाम हैं — शृङ्गार, शुचि और उज्ज्वल । वीर-रस के दो नाम हैं — उत्साहवर्धन और वीर । करुण का बोध कराने वाले सात शब्द हैं — कारुण्य, करुणा, घृणा, कृपा, दया, अनुकम्पा तथा अनुक्रोश । हस, हास और हास्य — ये हास्यरस के तथा बीभत्स और विकृत शब्द बीभत्स रस के वाचक हैं। ये दोनों शब्द तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त होते हैं। अद्भुत का बोध कराने वाले चार शब्द हैं — विस्मय, अद्भुत, आश्चर्य और चित्र । भैरव, दारुण, भीष्म, घोर, भीम, भयानक, भयंकर और प्रतिभय — ये भयानक अर्थ का बोध कराने वाले हैं। रौद्र का पर्याय है — उग्र । ये अद्भुत आदि चौदह शब्द तीनों लिङ्गों में प्रयुक्त होते है दर, त्रास, भीति, भी, साध्वस और भय — ये भय के वाचक हैं । रति आदि मानसिक विकारों को भाव कहते हैं । भाव को व्यक्त करने वाले रोमाञ्च आदि कार्यों का नाम अनुभाव है । गर्व, अभिमान और अहंकार— ये घमंड के नाम हैं । ‘मेरे समान दूसरा कोई नहीं है’ ऐसी भावना को मान और चित्तसमुन्नति कहते हैं । अनादर, परिभव, परिभाव और तिरस्क्रिया — ये अपमान के वाचक हैं । व्रीडा, लज्जा, त्रपा और ह्री — ये लाज का बोध कराने वाले हैं। दूसरे के धन को लेने की इच्छा का नाम अभिध्यान है । कौतूहल, कौतुक, कुतुक और कुतूहल — ये चार कौतुक के पर्याय हैं । विलास, विव्वोक, विभ्रम, ललित, हेला और लीला — ये शृङ्गार और भाव से प्रकट होने वाली स्त्रियों की चेष्टाएँ ‘हाव’ कहलाती हैं। द्रव, केलि, परिहास, क्रीडा, लीला तथा कूर्दन — ये खेल — कूद और हँसी—परिहास के वाचक हैं। दूसरों पर आक्षेप करते हुए जो उनकी हँसी उड़ायी जाती है, उसका नाम ‘आच्छुरितक’ है । मन्द मुस्कान को ‘स्मित’ कहते हैं ॥ ७०-८५ ॥ नीचे के लोक का नाम अधोभुवन और पाताल है । छिद्र, श्व, वपा और सुषि — ये छिद्र के वाचक हैं। पृथ्वी के भीतर जो छेद (खंदक आदि) होता है, उसे गर्त और अवट कहते हैं । तमिस्र, तिमिर और तम — ये अन्धकार के वाचक हैं। सर्प, पृदाकु, भुजग, दन्दशूक और बिलेशय— ये साँपों के नाम हैं। विष, क्ष्वेड और गरल — ये जहर का बोध कराने वाले हैं । निरय् और दुर्गति — ये नरक के नाम हैं । इनमें दुर्गति शब्द स्त्रीलिङ्ग है। पयस्, कीलाल, अमृत, उदक, भुवन और वन — ये जल के पर्याय हैं । भङ्ग, तरंग, ऊर्मि, कल्लोल और उल्लोल — ये लहर के नाम हैं । पृषत्, बिन्दु और पृषत — ये जल की बूँदों के नाम हैं। कूल, रोध और तीर — ये तट के वाचक हैं । जल से तुरंत के बाहर हुए किनारे को ‘पुलिन’ कहते हैं। जम्बाल, पङ्क और कर्दम — ये कीचड़ के नाम हैं। तालाब या नदी आदि के भर जाने पर जो अधिक जल बहने लगता है, उसे ‘जलोच्छ्वास’ और ‘परीवाह’ कहते हैं। सूखी हुई नदी आदि के भीतर जो गहरे गड्ढे में बचा हुआ जल रहता है, उसका नाम ‘कूपक’ और ‘विदारक’ है। नदी पार करने के लिये जो उतराई या खेवा दिया जाता है, उसे आतर एवं तरपण्य कहते हैं। काठ की बनी हुई बाल्टी या जल रखने के पात्र का नाम द्रोणी है (इससे नाव का पानी बाहर निकालते हैं) । मैले जल को ‘कलुष’ और ‘आविल’, साफ पानी को ‘ अच्छ’ और ‘प्रसन्न’ तथा गहरे जल को ‘गम्भीर’ और ‘अगाध ‘ कहते हैं । दाश और कैवर्त — ये मल्लाह के नाम हैं । शम्बूक और जलशुक्ति — ये सीप के वाचक हैं। सौगन्धिक और कह्लार — ये श्वेत कमल के वाचक हैं । नील कमल को इन्दीवर कहते हैं । उत्पल और कुवलय — ये कमल और कुमुद आदि के साधारण नाम हैं। श्वेत उत्पल को कुमुद और कैरव कहते हैं। कुमुद की जड़ का नाम शालूक (सेरुकी) है। पद्म, तामरस और कञ्ज — ये कमल के पर्याय हैं। नील उत्पल का नाम कुवलय और रक्त उत्पल का नाम कोकनद बताया गया है। पद्मकंद अर्थात् कमल की जड़ का नाम करहाट और शिफाकंद है । कमल के केसर को किञ्जल्क और केसर कहते हैं। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्ग के सिवा अन्य लिङ्गों में प्रयुक्त होते हैं । स्त्रीलिङ्ग खनिशब्द और आकर — ये खान के वाचक हैं । बड़े-बड़े पर्वतों के आसपास जो छोटे-छोटे पर्वत होते हैं, उन्हें पाद और प्रत्यन्तपर्वत कहते हैं । पर्वत के निकट की नीची भूमि ( तराई ) — को उपत्य का तथा पहाड़ के ऊपर की जमीन को अधित्यका कहते हैं । इस प्रकार मैंने स्वर्ग और पाताल आदि वर्गों का वर्णन किया। अब अनेक अर्थवाले शब्दों को श्रवण कीजिये ॥ ८६-९५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में कोशविषयक ‘स्वर्ग— पाताल आदि वर्गों का वर्णन’ नामक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६० ॥ 1. आदि शब्दसे वसु और आदित्य आदि नामोंको ग्रहण करना चाहिये । रुद्र ११, वसु ८ और आदित्य १२ हैं । 2. आदि पद से अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ का ग्रहण होता है । Content is available only for registered users. 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