अग्निपुराण — अध्याय 361
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ एकसठवाँ अध्याय
अव्यय—वर्ग
अव्ययवर्गाः

अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठजी ! ‘आङ्’ अव्यय ईषत् (स्वल्प), अभिव्याप्ति तथा मर्यादा (सीमा) अर्थ में प्रयुक्त होता है। साथ ही धातु से उसका संयोग होने पर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन सभी अर्थों में उसका प्रयोग समझना चाहिये । ‘आ’ प्रगृह्यसंज्ञक अव्यय है । इसका वाक्य और स्मरण अर्थ में प्रयोग होता है । ‘आः’ अव्यय कोप और पीड़ा का भाव द्योतित करने के लिये प्रयुक्त होता है । ‘कु’ पाप, कुत्सा (घृणा) और ईषत् अर्थ में तथा ‘धिक्’ फटकार और निन्दा के अर्थ में आता है। ‘च’ अव्यय का प्रयोग समुच्चय 1 , समाहार 2  अर्थ में होता है । अन्वाचय 3 , इतरेतरयोग 4  और ‘स्वस्ति’ आशीर्वाद, क्षेम और पुण्य आदि के अर्थ में तथा ‘अति’ अधिकता एवं उल्लङ्घन के अर्थ में आता है । ‘स्वित्’ प्रश्न और वितर्क का भाव व्यक्त करने में तथा ‘तु’ भेद और निश्चय के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘सकृत् ‘ का एक ही साथ और एक बार के अर्थ में तथा ‘आरात् ‘का दूर और समीप के अर्थ में प्रयोग होता है । ‘पश्चात्’ अव्यय पश्चिम दिशा और पीछे के अर्थ में तथा ‘उत’ शब्द ‘अपि ‘ के अर्थ (समुच्चय और प्रश्न) — में एवं विकल्प अर्थ में आता है । ‘शश्वत्’ पुनः और सदा के अर्थ में तथा ‘साक्षात्’ प्रत्यक्ष एवं तुल्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘ बत’ अव्यय का प्रयोग खेद, दया, संतोष, विस्मय और सम्बोधन का भाव व्यक्त करने में होता है । ‘हन्त’ पद हर्ष, अनुकम्पा, वाक्य के आरम्भ और विषाद के अर्थ में आता है । ‘प्रति’ का प्रतिनिधि, वीप्सा एवं लक्षण आदि के अर्थ में प्रयोग किया जाता है ।’
‘इति’ शब्द हेतु, प्रकरण, प्रकाश आदि और समाप्ति के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘पुरस्तात् ‘ पद पूर्व दिशा, प्रथम और पुरा ( पूर्वकाल ) — के अर्थ में आता है।‘अग्रतः’ (आगे) — के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है । ‘यावत्’ और ‘तावत्’ पद समग्र, अवधि (सीमा), माप और अवधारण के अर्थ में आते हैं। ‘अथो’ एवं ‘अथ’ शब्द का प्रयोग मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न और समग्रता के अर्थ में होता है । ‘वृथा’ शब्द निरर्थक और अविधि अर्थ का द्योतक है । ‘नाना’ शब्द अनेक और उभय अर्थ में आता है। ‘नु’ प्रश्न और विकल्प में तथा ‘अनु’ पश्चात् एवं सादृश्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘ननु’ शब्द प्रश्न, निश्चय, अनुज्ञा, अनुनय और सम्बोधन में तथा ‘अपि’ शब्द निन्दा, समुच्चय, प्रश्न, शङ्का तथा सम्भावना में प्रयुक्त होता है । ‘वा’ शब्द उपमा और विकल्प में तथा ‘सामि’ पद आधे एवं निन्दा के अर्थ में आता है। ‘अमा’ शब्द साथ एवं समीप का तथा ‘कम्’ जल और मस्तक का बोध कराने वाला है। ‘एवम्’ पद इव और इत्थं के अर्थ में तथा ‘नूनम्’ तर्क तथा वस्तु के निश्चय करने में प्रयुक्त होता है। ‘जोषम् ‘का अर्थ है मौन और सुख। ‘किम्’ अव्यय प्रश्न और निन्दा के अर्थ में आता है। ‘नाम’ पद प्राकाश्य (प्रकाशित होने ), सम्भावना, क्रोध, स्वीकार तथा निन्दा अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘अलम्’ शब्द भूषण, पर्याप्ति, सामर्थ्य तथा निवारण का वाचक है । ‘हुम्’ वितर्क और प्रश्न अर्थ में तथा ‘समया’ निकट और मध्य के अर्थ में आता है । ‘पुनर्’ अव्यय प्रथम को छोड़कर द्वितीय, तृतीय आदि जितनी बार कोई कार्य हो, उन सबके लिये प्रयुक्त होता है। साथ ही भेद —अर्थ में भी इसका प्रयोग देखा जाता है । ‘निर्’ निश्चय और निषेध के अर्थ में आता है। ‘पुरा’ शब्द बहुत पहले की बीती हुई तथा निकट भविष्य में आने वाली बात को व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त होता है । ‘उररी’, ‘ऊरी’, ‘ऊररी’ — ये तीन अव्यय विस्तार और अङ्गीकार के अर्थ में आते हैं । ‘स्वर्’ अव्यय स्वर्ग और परलोक का वाचक है । ‘किल ‘का प्रयोग वार्ता और सम्भावना के अर्थ में आता है। मना करने, वाक्य को सजाने तथा जिज्ञासा के अवसर पर ‘खलु’ का प्रयोग होता है । ‘अभितस्’ अव्यय समीप, दोनों ओर, शीघ्र, सम्पूर्ण तथा सम्मुख अर्थ का बोध कराता है। ‘प्रादुस्’ शब्द नाम अव्यय के अर्थ में तथा व्यक्त या प्रकट होने में प्रयुक्त होता है । ‘मिथस्’ शब्द परस्पर तथा एकान्त का वाचक है। ‘तिरस्’ शब्द अन्तर्धान होने तथा तिरछे चलने के अर्थ में आता है । ‘हा’ पद विषाद, शोक और पीड़ा को व्यक्त करने वाला है । ‘अहह’ अथवा ‘अहहा’ अद्भुत एवं खेद के अर्थ में तथा हेतु और निश्चय अर्थ में प्रयुक्त होता है ॥ १-१८ ॥

चिराय, चिररात्राय और चिरस्य इत्यादि 5  अव्यय चिरकाल के बोधक हैं। मुहुः, पुनः-पुनः, शश्वत्, अभीक्ष्ण और असकृत् — ये सभी अव्यय समान अर्थके वाचक हैं— इन सबका बारंबार के अर्थ में प्रयोग होता है । स्राक्, झटिति, अञ्जसा, अह्नाय, सपदि, द्राक् और मड्क्षु— ये शीघ्रता के अर्थ में आते हैं। बलवत् और सुष्ठु — ये दोनों शब्द अतिशय तथा शोभन अर्थ के वाचक हैं । किमुत, किम् और किम्भूत—ये विकल्प का बोध कराने वाले हैं । तु, हि, च, स्म, ह, वै — ये पादपूर्ति के लिये प्रयुक्त होते हैं। अति का प्रयोग पूजन के अर्थ में भी आता है। दिवा शब्द दिन का वाचक है तथा दोषा और नक्तम् शब्द रात्रि के अर्थ में आते हैं। साचि और तिरस् पद तिर्यक् (तिरछे ) अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । प्याट्, पाट्, अङ्ग, हे, है, भो:— ये सभी शब्द सम्बोधन के अर्थ में आते हैं। समया, निकषा और हिरुक् — ये तीनों अव्यय समीप अर्थ के वाचक हैं । सहसा अतर्कित अर्थ में आता है। (अर्थात् जिसके बारे में कोई सम्भावना न हो, ऐसी वस्तु जब एकाएक सामने उपस्थित होती है तो उसे सहसा उपस्थित हुई कहते हैं । ऐसे ही स्थलों में सहसा का प्रयोग होता है ।) पुरः, पुरतः और अग्रतः — ये सामने के अर्थ में आते हैं। स्वाहा पद देवताओं को हविष्य अर्पण करने के अर्थ में आता है। ‘श्रौषट्’ और ‘वौषट् ‘ का भी यही अर्थ है। ‘वषट्’ शब्द इन्द्र का और स्वधा शब्द पितरों का भाग अर्पण करने के लिये प्रयुक्त होता है। किंचित्, ईषत् और मनाक् — ये अल्प अर्थ के वाचक हैं। प्रेत्य और अमुत्र— ये दोनों जन्मान्तर के अर्थ में आते हैं । यथा और तथा समता एवं अहो और हो — ये आश्चर्य के बोधक हैं। तूष्णीम् और तूष्णीकम् पद मौन अर्थ में, सद्यः और सपदि शब्द तत्काल अर्थ में, दिष्ट्या और समुपजोषम् — ये आनन्द अर्थ में तथा अन्तरा शब्द भीतर के अर्थमें  आता है । अन्तरेण पद भी मध्य अर्थ का वाचक है। प्रसह्य शब्द हठ का बोध कराने वाला है । साम्प्रतम् और स्थाने शब्द उचित के अर्थ में तथा ‘अभीक्ष्णम्’ और शश्वत् पद सर्वदा – निरन्तर के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । नहि, अ, नो और न— ये अभाव अर्थ के बोधक हैं। मास्म, मा और अलम् — इनका निषेध के अर्थ में प्रयोग होता है। चेत् और यदि पद दूसरा पद उपस्थित करने के लिये प्रयुक्त होते हैं तथा अद्धा और अञ्जसा — ये दोनों पद वास्तव के अर्थ में आते हैं । प्रादुस् और आविर् — इनका अर्थ है प्रकट होना ।

ओम्, एवम् और परमम् — ये शब्द स्वीकृति या अनुमति देने के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। समन्ततः, परितः, और विष्वक् — इनका अर्थ है चारों ओर । ‘कामम्’ शब्द अकाम अनुमति के अर्थ में आता है । ‘अस्तु’ पद असूया ( दोषदृष्टि) तथा स्वीकृति का भाव सूचित करने वाला है । किसी बात के विरोध में कुछ कहना हो तो वहाँ ‘ननु ‘का प्रयोग होता है । ‘कच्चित्’ शब्द किसी की अभीष्ट वस्तु की जिज्ञासा के लिये प्रश्न करने के अवसर पर प्रयुक्त होता है । निःषमम् और दुःषमम् — ये सर्वतः दोनों पद निन्द्य अर्थ का बोध कराते हैं । यथास्वम् और यथायथम् पद यथायोग्य अर्थ के वाचक हैं मृषा एवं मिथ्या शब्द असत्य के और यथातथम् पद सत्य के अर्थ में आता है । एवम्, तु, पुनः, वै और वा — ये निश्चय अर्थ के वाचक हैं। ‘प्राक्’ शब्द बीती बात का बोध कराने वाला है। नूनम् और अवश्यम् — ये दो अव्यय निश्चय के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । ‘संवत्’ शब्द वर्ष का, ‘अर्वाक् ‘ शब्द पश्चात् काल का, आम् और एवम् शब्द हामी भरने का तथा स्वयम् पद अपने से — इस अर्थ का बोध कराने वाला है । ‘नीचैस्’ अल्प अर्थ में, ‘उच्चैस्’ महान् अर्थ में, ‘प्रायस्’ बाहुल्य अर्थ में तथा ‘शनैस्’ मन्द अर्थ में आता है। ‘सना’ शब्द नित्य का, ‘बहिस्’ शब्द बाह्य का, ‘स्म’ शब्द भूतकाल का, ‘अस्तम्’ शब्द अदृश्य होने का, ‘अस्ति’ शब्द सत्ता का, ‘ऊ’ क्रोधभरी उक्ति का तथा ‘अपि’ शब्द प्रश्न तथा अनुनय का बोधक है। ‘उम्’ तर्क का, ‘उषा’ रात्रि के अन्त का, ‘नमस्’ प्रणाम का, ‘अङ्ग’ पुन — अर्थ का, ‘दुष्ठु’ निन्दा का तथा ‘सुष्ठु’ शब्द प्रशंसा का वाचक है। ‘ सायम्’ शब्द संध्याकाल का, ‘प्रगे’ और ‘प्रातर् ‘ शब्द प्रभातकाल का, ‘निकषा’ पद समीप का, ‘ऐषमः ‘ शब्द वर्तमान वर्ष का, ‘परुत्’ शब्द गतवर्ष का और ‘परारि’ शब्द उसके भी पहले के गतवर्ष का बोध कराने वाला है । ‘आज के दिन’ इस अर्थ में ‘अद्य’ का प्रयोग देखा जाता है। पूर्व, उत्तर, अपर, अधर, अन्य, अन्यतर और इतर शब्द से ‘ पूर्वेऽह्नि’ ( पहले दिन) आदि के 6  अर्थ में ‘पूर्वेद्युः ‘ आदि 7  अव्ययपद निष्पन्न होते हैं। ‘उभयद्युः’ और ‘उभयेद्युः ‘ — ये ‘दोनों दिन ‘के अर्थ में आते हैं। ‘परस्मिन्नहनि ‘ (दूसरे दिन ) — के अर्थ में ‘परेद्यवि ‘का प्रयोग होता है। ‘ह्यस्’ बीते हुए दिन के अर्थ में, ‘श्वस्’ आगामी दिन के अर्थ में तथा ‘परश्वस्’ शब्द उसके बाद आने वाले दिन के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘तदा’ ‘तदानीम् ‘ शब्द ‘तस्मिन् काले’ (उस समय)—के अर्थ में आते हैं । ‘युगपत् ‘ और ‘एकदा ‘ का अर्थ है — एक ही समय में । ‘सर्वदा’ और ‘सदा’ — ये हमेशा के अर्थ में आते हैं । एतर्हि, सम्प्रति, इदानीम् अधुना तथा साम्प्रतम् — इन पदों का प्रयोग ‘इस समय ‘ के अर्थ में होता है ॥ १९-३८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में कोशविषयक ‘अव्ययवर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६१ ॥

1. आपस में अनपेक्षित अनेक शब्दों का एक क्रिया में अन्वय होना ‘समुच्चय’ कहलाता है। जैसे ‘ईश्वरं’ ‘गुरुं च भजस्व।’ (ईश्वर और गुरु को भजो) यहाँ ‘ईश्वरम्’ और ‘गुरुम् ‘ — इन दो पदों का एक ही भजन – क्रिया में अन्वय है ।
2. समूह को ‘समाहार’ कहते हैं । जैसे ‘संज्ञापरिभाषम्’ (संज्ञा और परिभाषाओंका समूह ) ।
3. एक प्रधान कार्य के साथ-साथ दूसरे अप्रधान कार्य का भी साधन करना ‘अन्वाचय’ है। जैसे किसी से कहा जाय — ‘भिक्षामट गां चानय’ (भिक्षा माँगने जाओ, गाय भी लेते आना) । यहाँ मुख्य कार्य है — भिक्षा माँगना; उसके साथ गाय लाने का कार्य गौण है ।
4. परस्पर अपेक्षा रखने वाले अनेक पदों का एक क्रिया में अन्वय ‘इतरेतर – योग’ कहलाता है । जैसे — ‘ धवखदिरौ छिन्धि’ (धव और खदिर को काटो) । यहाँ धव और खदिर — दोनों का साहचर्य्य अपेक्षित है।
5. आदि शब्द से ‘चिरम्’, ‘चिरेण’, ‘चिरात्’ तथा ‘चिरे’ — इन पदों का ग्रहण होता है।
6. यहाँ ‘आदि’ शब्द से उत्तर आदि शब्दों का ग्रहण होता है — जैसे उत्तरस्मिन्नह्नि, अपरस्मिन्नह्नि, अन्यस्मिन्नहनि अन्यतरस्मिन्नहनि तथा इतरस्मिन्नहनि ।
7. ‘आदि’ शब्दसे ‘उत्तरेद्युः’, ‘अपरेद्युः’, ‘अवरेद्युः’, ‘अन्येद्युः’, ‘अन्यतरेद्युः ‘ तथा ‘इतरेद्युः ‘ — इन अव्यय — पदोंका ग्रहण करना चाहिये ।

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