July 23, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 362 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बासठवाँ अध्याय नानार्थ-वर्ग नानार्थवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — ‘नाक’ शब्द आकाश और स्वर्ग के अर्थ में तथा ‘लोक’ शब्द संसार, जन-समुदाय के अर्थ में आता है । ‘श्लोक’ शब्द अनुष्टुप् छन्द और सुयश अर्थ में तथा ‘सायक’ शब्द बाण और तलवार के अर्थ में प्रयुक्त होता है । आनक, पटह और भेरी — ये एक दूसरे के पर्याय हैं। ‘कलङ्क’ शब्द चिह्न तथा अपवाद का वाचक है। ‘क’ शब्द यदि पुंल्लिङ्ग में हो तो वायु, ब्रह्मा और सूर्य का तथा नपुंसक में हो तो मस्तक और जल का बोधक होता है । ‘पुलाक’ शब्द कदन्न, संक्षेप तथा भात के पिण्ड अर्थ में आता है । ‘कौशिक’ शब्द इन्द्र, गुग्गुल, उल्लू तथा साँप पकड़ने वाले पुरुषों के अर्थ में प्रयुक्त होता है। बंदरों और कुत्तों को ‘शालावृक’ कहते हैं। माप के साधन का नाम ‘मान’ है। ‘सर्ग’ शब्द स्वभाव, त्याग, निश्चय, अध्ययन और सृष्टि के अर्थ में उपलब्ध होता है । ‘योग’ शब्द कवचधारण, साम आदि उपायों के प्रयोग, ध्यान, संगति ( संयोग) और युक्ति अर्थ का बोधक होता है । ‘भोग’ शब्द सुख और स्त्री ( वेश्या या दासी) आदि को उपभोग के बदले दिये जाने वाले धन का वाचक है । ‘अब्ज’ शब्द शङ्ख और चन्द्रमा के अर्थ में भी आता है । ‘करट’ शब्द हाथी के कपोल और कौवे का वाचक है ।’ ‘शिपिविष्ट’ शब्द बुरे चमड़ेवाले (कोढ़ी) मनुष्य का बोध कराने वाला है। ‘रिष्ट’ शब्द क्षेम, अशुभ तथा अभाव के अर्थ में आता है । ‘अरिष्ट’ शब्द शुभ और अशुभ दोनों अर्थों का वाचक है । ‘व्युष्टि’ शब्द प्रभातकाल और समृद्धि के अर्थ में तथा ‘दृष्टि’ शब्द ज्ञान, नेत्र और दर्शन के अर्थ में आता है । ‘निष्ठा’ का अर्थ है — निष्पत्ति (सिद्धि), नाश और अन्त तथा ‘काष्ठा’ का उत्कर्ष, स्थिति तथा दिशा अर्थ में प्रयोग होता है । ‘इडा’ और ‘इला’ शब्द गौ तथा पृथ्वी के वाचक हैं। ‘प्रगाढ’ शब्द अत्यन्त एवं कठिनाई का बोध कराने वाला है । ‘वाढम् ‘ पद अत्यन्त और प्रतिज्ञा के अर्थ में आता है । ‘दृढ’ शब्द समर्थ एवं स्थूल का वाचक है तथा इसका तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । ‘व्यूढ’ का अर्थ है — विन्यस्त (सिलसिलेवार रखा हुआ या व्यूह के आकार में खड़ा किया हुआ) तथा संहत ( संगठित ) । ‘कृष्ण’ शब्द व्यास, अर्जुन तथा भगवान् विष्णु के अर्थ में आता है। ‘पण’ शब्द जुआ आदि में दाँव पर लगाये हुए द्रव्य, कीमत और धन के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है । ‘गुण’ शब्द धनुष की प्रत्यञ्चा का, द्रव्यों का आश्रय लेकर रहने वाले रूप-रस आदि गुणों का, सत्त्व, रज और तम का, शुक्ल, नील आदि वर्णों का तथा संधि-विग्रह आदि छः प्रकार की नीतियों का बोध कराने वाला है। ‘ग्रामणी’ शब्द श्रेष्ठ (मुखिया) तथा गाँव के स्वामी का वाचक है। ‘घृणा’ शब्द जुगुप्सा और दया— दोनों अर्थों में आता है । ‘तृष्णा’ का अर्थ हैं — इच्छा और प्यास । ‘विपणि’ शब्द बाजार या बनिये के दूकान के अर्थ में आता है । ‘ तीक्ष्ण’ शब्द नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त होने पर विष, युद्ध तथा लोहे का वाचक होता है और प्रखर या प्रचण्ड के अर्थ में उसका तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । प्रमाण’ शब्द कारण, सीमा, शास्त्र, इयत्ता ( निश्चित माप) तथा प्रामाणिक पुरुष के अर्थ में आता है । ‘करुण’ शब्द क्षेत्र और गात्र का तथा ‘ईरिण’ शब्द शून्य (निर्जन) एवं ऊसर भूमि का वाचक है ॥ १-१२ ॥ ‘ यन्ता’ पद हाथीवान और सारथि का वाचक है । ‘हेति’ शब्द का प्रयोग आग की ज्वाला के अर्थ में होता है । ‘श्रुत’ शब्द शास्त्र एवं अवधारण (निश्चय)-का तथा ‘कृत’ शब्द सत्ययुग और पर्याप्त अर्थ का बोधक है । ‘प्रतीत’ शब्द विख्यात तथा दृष्ट के अर्थ में और ‘अभिजात’ शब्द कुलीन एवं विद्वान् के अर्थ में आता है । ‘विविक्त’ शब्द पवित्र और एकान्त का तथा ‘मूर्च्छित’ शब्द मूढ़ ( संज्ञाशून्य) और फैले हुए या उन्नति को प्राप्त हुए का बोध कराने वाला है । ‘अर्थ’ शब्द अभिधेय ( शब्द से निकलने वाले तात्पर्य), धन, वस्तु, प्रयोजन और निवृत्ति का वाचक है । ‘तीर्थ’ शब्द निदान ( उपाय), आगम ( शास्त्र), महर्षियों द्वारा सेवित जल तथा गुरु के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘ककुद् ‘ शब्द स्त्रीलिङ्ग के सिवा अन्य लिङ्गों में प्रयुक्त होता है । यह प्रधानता, राजचिह्न तथा बैल अङ्गविशेष का बोध कराने वाला है । ‘संविद्’ शब्द स्त्रीलिङ्ग है। इसका ज्ञान, सम्भाषण, क्रिया के नियम, युद्ध और नाम अर्थ में प्रयोग होता है । ‘उपनिषद्’ शब्द धर्म और रहस्य के अर्थ में तथा ‘शरद्’ शब्द ऋतु और वर्ष के अर्थ में आता है । ‘पद’ शब्द व्यवसाय ( निश्चय), रक्षा, स्थान, चिह्न, चरण और वस्तु का वाचक है । ‘स्वादु’ शब्द प्रिय एवं मधुर अर्थ का तथा ‘मृदु’ शब्द तीखेपन से रहित एवं कोमल अर्थ का बोध कराने वाला है । ‘स्वादु’ और ‘मृदु’ – दोनों शब्द तीनों ही लिङ्गों में प्रयुक्त होते हैं। ‘सत्’ शब्द सत्य, साधु, विद्यमान, प्रशस्त तथा पूज्य अर्थ में उपलब्ध होता है । ‘विधि’ शब्द विधान और दैव का वाचक है । ‘प्रणिधि’ शब्द याचना और चर (दूत) – के अर्थ में आता है। ‘वधू’ शब्द जाया, पतोहू तथा स्त्री का बोधक है । ‘सुधा’ शब्द अमृत, चूना तथा शहद के अर्थ में आता है । श्रद्धा’ शब्द आदर, विश्वास एवं आकाङ्क्षा के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘समुन्नद्ध’ शब्द अपने को पण्डित मानने वाले और घमंडी के अर्थ में आता है। ‘ब्रह्मबन्धु’ शब्द का प्रयोग ब्राह्मण की अवज्ञा में प्रयुक्त होता है । ‘भानु’ शब्द किरण और सूर्य – दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है । ‘ग्रावन्’ शब्द का अभिप्राय पहाड़ और पत्थर – दोनों से है । ‘पृथग्जन’ शब्द मूर्ख और नीच के अर्थ में आता है। ‘शिखरिन् ‘ शब्द का अर्थ वृक्ष और पर्वत तथा ‘तनु ‘ शब्द का अर्थ शरीर और त्वचा (छाल) है। ‘आत्मन् ‘ शब्द यत्न, धृति, बुद्धि, स्वभाव, ब्रह्म और शरीर के अर्थ में भी आता है । ‘उत्थान’ शब्द पुरुषार्थ और तन्त्र के तथा ‘व्युत्थान’ शब्द विरोध में खड़े होने के अर्थ का बोधक है। ‘निर्यातन’ शब्द वैर का बदला लेने, दान देने तथा धरोहर लौटाने के अर्थ में भी आता है । ‘व्यसन’ शब्द विपत्ति, अध: पतन तथा काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोषों का बोध कराने वाला है । शिकार, जुआ, दिन में सोना, दूसरों की निन्दा करना, स्त्रियों में आसक्त होना, मदिरा पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना तथा व्यर्थ घूमना — यह काम से उत्पन्न होने वाले दस दोषों का समुदाय है । चुगली, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणी की कठोरता तथा दण्ड की कठोरता — यह क्रोध से उत्पन्न होने वाले आठ दोषों का समूह है। ‘कौपीन’ शब्द नहीं करने योग्य खोटे कर्म तथा गुप्तस्थान का वाचक है । ‘मैथुन’ शब्द संगति तथा रति के अर्थ में आता है। ‘प्रधान’ कहते हैं – परमार्थबुद्धि को तथा ‘प्रज्ञान’ शब्द बुद्धि एवं चिह्न ( पहचान ) – का वाचक है । ‘क्रन्दन’ शब्द रोने और पुकारने के अर्थ में आता है । ‘वर्ष्मन् ‘ शब्द देह और परिमाण का बोधक है । ‘ आराधन’ शब्द साधन प्राप्ति तथा संतुष्ट करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘रत्न’ शब्द का स्वजाति में श्रेष्ठ पुरुष के लिये भी प्रयोग होता है और ‘लक्ष्मन् ‘ शब्द चिह्न एवं प्रधान का बोध कराने वाला है ‘कलाप’ शब्द आभूषण, मोरपंख, तरकस और संगठित के अर्थ में भी उपलब्ध होता है । ‘तल्प’ शब्द शय्या, अट्टालिका तथा स्त्रीरूप अर्थ का बोधक है। ‘डिम्भ’ शब्द शिशु और मूर्ख के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘स्तम्भ’ शब्द खंभे तथा जडवत् निश्चेष्ट होने के अर्थ में आता है । ‘सभा’ शब्द समिति तथा सदस्यों का भी वाचक है ॥ १३–२९ ॥ ‘रश्मि’ शब्द किरण तथा रस्सी का वाचक है । ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग पुण्य और यमराज आदि के लिये होता है । ‘ललाम’ शब्द पूँछ, पुण्ड्र (तिलक), घोड़ा, आभूषण, श्रेष्ठता तथा ध्वजा इत्यादि अर्थों में आता है । ‘प्रत्यय’ शब्द अधीन, शपथ, ज्ञान, विश्वास तथा हेतु के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘समय’ शब्द का अर्थ है — शपथ, आचार, काल, सिद्धान्त और संविद् (करार) । ‘अत्यय’ अतिक्रमण ( उल्लङ्घन) और कठिनाई अर्थ में तथा ‘सत्य’ शब्द शपथ और सत्यभाषण के अर्थ में आता है । ‘वीर्य’ शब्द बल और प्रभाव का तथा ‘रूप्य’ शब्द परमसुन्दर रूप का वाचक है । ‘दुरोदर’ शब्द पुंल्लिङ्ग होने पर जुआ खेलने वाले पुरुष और जुए में लगाये जाने वाले दाँव का बोध कराने वाला होता है तथा नपुंसकलिङ्ग होने पर जुए के अर्थ में आता है । ‘कान्तार’ शब्द बहुत बड़े जंगल और दुर्गम मार्ग का वाचक है तथा पुँल्लिङ्ग और नपुंसक – दोनों लिङ्गों में उसका प्रयोग होता है । ‘हरि’ शब्द यम, वायु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, विष्णु और सिंह आदि अनेकों अर्थों का वाचक है । ‘दर’ शब्द स्त्रीलिङ्ग को छोड़कर अन्य दो लिङ्गों में प्रयुक्त होता है । उसका अर्थ है — भय और खंदक । ‘जठर’ शब्द उदर एवं कठिन अर्थ का बोधक है। ‘उदार’ शब्द दाता और महान् पुरुष के अर्थ में आता है । ‘इतर’ शब्द अन्य और नीच का वाचक है । ‘मौलि’ शब्द के तीन अर्थ हैं — चूडा, किरीट और बँधे हुए केश । ‘बलि’ शब्द कर (टैक्स या लगान ) तथा उपहार ( भेंट आदि ) — के अर्थ में प्रयोग आता है । ‘बल’ शब्द सेना और स्थिरता आदि का बोधक है। ‘नीवी’ शब्द स्त्री के कटिवस्त्र के बन्धनरूप अर्थ में तथा परिपण (पूँजी, मूलधन अथवा बंधक रखने) — के अर्थ में आता है । ‘वृष’ शब्द शुक्रल (अधिक वीर्यवान्), चूहा, श्रेष्ठ पुरुष, पुण्य (धर्म) तथा बैल के अर्थ में प्रयुक्त होता है । ‘ आकर्ष’ शब्द पासा तथा चौसर की बिछाँत के अर्थ में आता है। ‘ अक्ष’ शब्द नपुंसकलिङ्ग होने पर इन्द्रिय के अर्थ में आता है तथा पुँल्लिङ्ग होने पर पासा, कर्ष ( सोलह मासे का एक माप), गाड़ी के पहिये, व्यवहार ( आय – व्यय की चिन्ता) और बहेड़े के वृक्ष के अर्थ में उपलब्ध होता है । ‘उष्णीष’ शब्द किरीट आदि के अर्थ में प्रयुक्त होता है । स्त्रीलिङ्ग ‘कर्पू’ शब्द कुल्या अर्थात् छोटी नदी का वाचक है। ‘अध्यक्ष’ शब्द प्रत्यक्ष (द्रष्टा ) और अधिकारी के अर्थ में आता है । ‘विभावसु’ शब्द सूर्य और अग्नि का वाचक है। ‘रस’ शब्द विष, वीर्य, गुण, राग, द्रव तथा शृङ्गार आदि रसों का बोध कराने वाला है । ‘वर्चस्’ शब्द तेज और पुरीष (मल) – का तथा ‘आगस्’ शब्द पाप और अपराध का वाचक है । ‘छन्दस्’ शब्द पद्य और इच्छा के तथा ‘साधीयस्’ शब्द साधु (उत्तम) और बाढ (निश्चय या हामी भरने ) — के अर्थ में आता है । ‘व्यूह’ शब्द समूह का वाचक है। ‘अहि’ शब्द वृत्रासुर के अर्थ में भी आता है । तथा ‘तमोपह’ शब्द अग्नि, चन्द्रमा एवं सूर्य का बोध कराने वाला है ॥ ३०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशविषयक नानार्थ- वर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६२ ॥ Content is available only for registered users. 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