July 23, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 365 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय ब्रह्म-वर्ग ब्रह्मवर्गः अग्निदेव कहते हैं — वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल, अभिजन और अन्वय— ये वंश के नाम हैं । मन्त्र की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण को आचार्य कहते हैं । जिसने यज्ञ में व्रत की दीक्षा ग्रहण की हो, वह आदेष्टा, यष्टा और यजमान कहलाता है । समझ-बूझकर आरम्भ करने का नाम उपक्रम है । एक गुरु के यहाँ साथ-साथ विद्या पढ़ने वाले छात्र परस्पर सतीर्थ्य और एकगुरु कहलाते हैं । सभ्य, सामाजिक, सभासद और सभास्तार — ये यज्ञ के सदस्यों के नाम हैं। ऋत्विक् और याजक — ये यज्ञ कराने वाले ऋत्विजों के वाचक हैं। यजुर्वेद के ज्ञाता ऋत्विज् को अध्वर्यु, सामवेद के जानने वाले को उद्गाता और ऋग्वेद के ज्ञाता को होता कहते हैं । चषाल और यूपकटक — ये यज्ञीय स्तम्भ पर लगाये जाने वाले काठ के छल्ले के नाम हैं । स्थण्डिल और चत्वर — ये दोनों शब्द समान लिङ्ग और समान अर्थ के बोधक हैं । खौलाये हुए दूध में दही मिला देने से जो हवन के योग्य वस्तु तैयार होती है, उसे आमिक्षा कहते हैं । दही मिलाये हुए घी का नाम पृषदाज्य है । परमान्न और पायस — ये खीर के वाचक हैं जो पशु यज्ञ में अभिमन्त्रित करके मारा गया हो, उसको उपाकृत कहते हैं। परम्पराक, शमन और प्रोक्षण — ये शब्द यज्ञीय पशु का वध करने के अर्थ में आते हैं । पूजा, नमस्या, अपचिति, सपर्य्या, अर्चा और अर्हणा — ये समानार्थक शब्द हैं। वरिवस्या, शुश्रूषा, परिचर्या और उपासना — ये सेवा के नाम हैं । नियम और व्रत — ये एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। इनमें ‘व्रत’ शब्द पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में प्रयुक्त होता है।’ उपवास आदि के रूप में जाने वाले व्रत का नाम पुण्यक है। जिसका प्रथम किये या प्रधानरूप से विधान किया गया हो, उसे ‘मुख्यकल्प’ कहते हैं और उसकी अपेक्षा अधम या अप्रधानरूप से जिसकी विधि हो, उसका नाम अनुकल्प है। कल्प के अर्थ में विधि और क्रम — इन शब्दों का प्रयोग समझना चाहिये । वस्तु का पृथक्-पृथक् ज्ञान (अथवा जड़-चेतन या द्रष्टा- दृश्य के पार्थक्य का निश्चय) विवेक कहलाता है। (श्रावणीपूर्णिमा आदि के दिन ) संस्कारपूर्वक वेद का स्वाध्याय आरम्भ करना उपकरण या उपाकर्म कहलाता है । भिक्षु, परिव्राट्, कर्मन्दी, पाराशरी तथा मस्करी — संन्यासी के पर्यायवाची शब्द हैं। जिनकी वाणी सदा सत्य होती है, वे ऋषि और सत्यवचा कहलाते हैं । जिसने वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्य व्रत को विधिवत् समाप्त कर लिया है, किंतु अभी दूसरे आश्रम को स्वीकार नहीं किया है, उसको स्नातक कहते हैं । जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, वे ‘यती’ और ‘यति’ कहलाते हैं। शरीर — साध्य नित्यकर्म का नाम यम है तथा जो कर्म अनित्य एवं कभी-कभी आवश्यकतानुसार किये जाने योग्य होता है, वह ( जप, उपवास आदि) नियम कहलाता है । ब्रह्मभूय, ब्रह्मत्व और ब्रह्मसायुज्य — ये ब्रह्मभाव की प्राप्ति के नाम हैं ॥ १-११ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशगत ब्रह्मवर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६५ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe