July 24, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 366 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छाछठवाँ अध्याय क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्ग क्षत्रविट्शूद्रवर्गाः अग्निदेव कहते हैं — मूर्धाभिषिक्त, राजन्य बाहुज, क्षत्रिय और विराट् — ये क्षत्रिय के वाचक हैं । जिस राजा के सामने सभी सामन्त— नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं । जिसका समुद्रपर्यन्त समूची भूमि पर अधिकार हो, उस सम्राट् का नाम चक्रवर्ती और सार्वभौम है तथा दूसरे राजाओं को (जो छोटे-छोटे मण्डलों के शासक हैं, उन्हें ) मण्डलेश्वर कहते हैं । मन्त्री के तीन नाम हैं — मन्त्री, धीसचिव और अमात्य । महामात्र और प्रधान — ये सामान्य मन्त्रियों के वाचक हैं। व्यवहार के द्रष्टा अर्थात् मामले- मुकदमे में फैसला देने वाले को प्राड्विवाक और अक्षदर्शक कहते हैं। सुवर्ण की रक्षा जिसके अधिकार में हो वह भौरिक और कनकाध्यक्ष कहलाता है । अध्यक्ष और अधिकृत — ये अधिकारी के वाचक हैं। इन दोनों का समान लिङ्ग है । जिसे अन्तःपुर की रक्षा का अधिकार सौंपा गया हो, उसका नाम अन्तर्वशिक [^1] है । सौविदल्ल, कञ्चुकी, स्थापत्य और सौविद — ये रनिवास की रक्षा में नियुक्त सिपाहियों के नाम हैं । ‘अन्तःपुर में रहने वाले नपुंसकों को षण्ढ और वर्षवर कहते हैं । सेवक, अर्थी और अनुजीवी — ये सेवा करने वाले के अर्थ में आते हैं। अपने राज्य की सीमा पर रहने वाला राजा शत्रु होता है और शत्रु की राज्य- सीमा पर रहने वाला नरेश अपना मित्र होता है । शत्रु और मित्र दोनों की राज्य सीमाओं के बाद जिसका राज्य हो, वह (न शत्रु, न मित्र) उदासीन [^2] होता है। विजिगीषु राजा के पृष्ठभाग में रहने वाले राजा को पाष्णिग्राह कहते हैं । चर, स्पश और प्रणिधि — ये गुप्तचर के नाम हैं। भविष्यकाल को आयति कहते हैं । तत्काल और तदात्व — ये वर्तमान काल के वाचक हैं। भावी कर्मफल को उदर्क कहते हैं। आग लगने या पानी की बाढ़ आदि के कारण होने वाले भय को अदृष्टभय कहते हैं। अपने या शत्रु के राज्य में रहने वाले सैनिकों या चोरों आदि के कारण जो संकट उपस्थित होता है, उसका नाम दृष्टभय है। भरे हुए घड़े को भद्रकुम्भ और पूर्णकुम्भ कहते हैं। सोने के गडुए या झारी का नाम भृङ्गार और कनकालुका है । मतवाले हाथी को प्रभिन्न, गर्जित और मत्त कहते हैं । हाथी की सूँड़ से निकलनेवाले जलकण को वमथु और करशीकर कहते हैं। सृणि और अङ्कुश — ये दो हाथी को हाँकने के काम में लाये जाने वाले लोहे के काँटे का बोध कराते हैं । इनमें सृणि तो स्त्रीलिङ्ग और अङ्कुश पुँल्लिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग है । परिस्तोम और कुथ हाथी की गद्दी और झूल के वाचक हैं । स्त्रियों के बैठने योग्य पर्देवाली गाड़ी को कर्णीरथ और प्रवहण कहते हैं । दोला और प्रेङ्खा — ये झूला अथवा डोली के नाम हैं । इनका स्त्रीलिङ्ग में प्रयोग होता है। आधोरण, हस्तिपक, हस्त्यारोह और निषादी — ये हाथीवान के अर्थ में आते हैं । लड़ने वाले सिपाहियों को भट और योद्धा कहते हैं । कञ्चुक और वारण — ये कवच (बख्तर) — के नाम हैं। इनका प्रयोग स्त्रीलिङ्ग के सिवा अन्य लिङ्गों में होता है । शीर्षण्य और शिरस्त्र — ये सिर पर रखे जाने वाले टोप के नाम हैं । तनुत्र, वर्म और दंशन — ये भी कवच के अर्थ में आते हैं । आमुक्त, प्रतिमुक्त, पिनद्ध और अपिनद्ध — ये पहने हुए कवच के वाचक हैं। सेना की मोर्चाबंदी का नाम व्यूह और बल — विन्यास है। चक्र और अनीक—ये नपुंसकलिङ्ग शब्द सेना के वाचक हैं। जिस सेना में एक हाथी, एक रथ, तीन घोड़े और पाँच पैदल हों, उसे पत्ति कहते हैं। पत्ति के समस्त अङ्गों को लगातार सात बार तीन गुना करते जायँ तो उत्तरोत्तर उसके ये नाम होंगे — सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी । हाथी आदि सभी अङ्गों से युक्त दस अनीकिनी सेना को अक्षौहिणी [^3] कहते हैं । धनुष, कोदण्ड और इष्वास — ये धनुष के नाम हैं । धनुष के दोनों कोणों को कोटि और अटनी कहते हैं। उसके मध्य भाग का नाम नस्तक ( या लस्तक) है । प्रत्यञ्चा को मौर्वी, ज्या, शिञ्जिनी और गुण कहते हैं । पृषत्क, बाण, विशिख, अजिह्मग, खग और आशुग — ये वाचक पर्याय शब्द हैं ॥ १-१६ ॥ तूण, उपासङ्ग, तूणीर, निषङ्ग और इषुधि— ये तरकस के नाम हैं। इनमें इषुधि शब्द पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों लिङ्गों में आता है। असि, ऋष्टि, निस्त्रिंश, करवाल और कृपाण — ये तलवार के वाचक हैं। तलवार की मुष्टि को सरु कहते हैं । ईली और करपालिका ( करवालिका) — ये गुप्ती के नाम हैं। कुठार और सुधिति (या स्वधिति) — ये कुल्हाड़ी के अर्थ में आते हैं । इनमें कुठार शब्द का प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में होता है । छुरी को क्षुरिका और असिपुत्रिका कहते हैं । प्रास और कुन्त भाले के नाम हैं । सर्वला और तोमर गँड़ासे के अर्थ में आते हैं। तोमर शब्द पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग — दोनों में प्रयुक्त होता है । (यह बाण — विशेष का भी बोधक है ) । जो प्रातःकाल मङ्गल—गान करके राजा को जगाते हैं, उन्हें वैतालिक और बोधकर कहते हैं । स्तुति करने वालों का नाम मागध और वन्दी है । जो शपथ लेकर संग्राम से पीछे पैर नहीं हटाते, उन योद्धाओं को संशप्तक कहते हैं । पताका और वैजयन्ती — ये पताका के नाम हैं। केतन और ध्वज — ये ध्वजा के वाचक हैं और इनका प्रयोग नपुंसकलिङ्ग तथा पुंल्लिङ्ग में भी होता है । ‘मैं पहले’ ‘मैं पहले’ ऐसा कहते हुए जो योद्धाओं की युद्ध आदि में प्रवृत्ति होती है, उसे अहम्पूर्विका कहते हैं। इसका प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में होता है । ‘मैं समर्थ हूँ’ ऐसा कहकर जो परस्पर अहंकार प्रकट किया जाता है, उसका नाम अहमहमिका है । शक्ति, पराक्रम, प्राण, शौर्य, स्थान (स्थामन्) सहस् और बल — ये सभी शब्द बल के वाचक हैं । मूर्च्छा के तीन नाम हैं — मूर्च्छा, कश्मल और मोह । विपक्षी को अच्छी तरह रगड़ने या कष्ट पहुँचाने को अवमर्द तथा पीडन कहते हैं । शत्रु को धर दबाने का नाम अभ्यवस्कन्दन तथा अभ्यासादन है । जीत को विजय और जय कहते हैं । निर्वासन, संज्ञपन, मारण और प्रातिघातन — ये मारने के नाम हैं। पञ्चता और कालधर्म —ये मृत्यु के अर्थ में आते हैं। दिष्टान्त, प्रलय और अत्यय — इनका भी वही अर्थ है ॥ १७-२२१/२ ॥ विश्, भूमिस्पृश् और वैश्य — ये शब्द वैश्यजाति का बोध कराने वाले हैं । वृत्ति, वर्तन और जीवन — ये जीविका के वाचक हैं । कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य — ये वैश्य की जीविका-वृत्तियाँ हैं । ब्याज ( सूद) — से चलायी जाने वाली जीविका का नाम कुसीद-वृत्ति है । ब्याज के लिये धन देने को उद्धार और अर्थप्रयोग कहते हैं । अनाज की बाल का नाम ‘कणिश’ है । जौ आदि के तीखे अग्रभाग को किशारु तथा सस्यशूक कहते हैं । तृण आदि के गुच्छ का नाम स्तम्ब है । धान्य, व्रीहि और स्तम्बकरि — ये अनाज के वाचक हैं । अनाज के डंठलों से होने वाले भूसे को कडंगर और बुष कहते हैं। शमीधान्य अर्थात् फली या छीमी से निकलने वाले अनाज के अंदर उड़द, चना और मटर आदि की गणना है तथा शूकधान्य में जौ आदि की गिनती है । तृणधान्य अर्थात् तीना को नीवार कहते हैं । सूप का नाम है — शूर्प और प्रस्फोटन । सन या वस्त्र के बने हुए झोले अथवा थैले को स्यूत और प्रसेव कहते हैं । कण्डोल और पिट टोकरी के तथा कट और किलिञ्जक चटाई के नाम हैं । इन दोनों का एक ही लिङ्ग है । रसवती, पाकस्थान और महानस — ये रसोईघर के अर्थ में आते हैं । रसोई के अध्यक्ष का नाम पौरोगव है । रसोई बनाने वाले को सूपकार, बल्लव, आरालिक, आन्धसिक, सूद, औदनिक तथा गुण कहते हैं । नपुंसकलिङ्ग अम्बरीष तथा पुंल्लिङ्ग भ्राष्ट्र शब्द भाड़ के वाचक हैं। कर्करी, आलु तथा गलन्तिका — ये कठौते के नाम हैं। बड़े घड़े या माट को आलिञ्जर एवं मणिक कहते हैं । काले जीरे का नाम सुषवी है। आरनाल और कुल्माष — ये काँजी के नाम हैं। वाह्लीक, हिङ्गु तथा रामठ — ये हींग के अर्थ में आते हैं । निशा, हरिद्रा और पीता — ये हल्दी के वाचक हैं । खाँड़ को मत्स्यण्डि तथा फाणित कहते हैं । दूध के विकार अर्थात् खोवा या मावा का नाम कूर्चिका और क्षीरविकृति है । स्निग्ध, मसृण और चिक्कण — ये तीनों शब्द चिकने के अर्थ में आते हैं। पृथुक और चिपिटक— ये चिउड़ा के वाचक हैं। भूने हुए जौ को धाना कहते हैं । यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है । जेमन, लेह (लेप) और आहार — ये भोजन का बोध कराने वाले हैं। माहेयी, सौरभी और गौ — ये गाय के पर्याय हैं। कंधे पर जुआ ढोने वाले बैल को युग्य और प्रासङ्गय तथा गाड़ी खींचने वाले को शाकट कहते हैं। बहुत दिनों की ब्यायी हुई गाय का नाम वष्कयणी (बकेना) तथा थोड़े दिनों की ब्यायी हुई का नाम धेनु है । साँड़ से लगी हुई गौ को संधिनी कहते हैं । गर्भ गिराने वाली गाय की ‘वेहद्’ संज्ञा है ॥ २३-३३ ॥ पण्याजीव तथा आपणिक व्यापारी के अर्थ में आते हैं । न्यास और उपनिधि — ये धरोहर के वाचक हैं । ये दोनों शब्द पुंल्लिङ्ग हैं। बेचने का नाम है विपण और विक्रय । संख्यावाचक शब्द एक से लेकर ‘दश’ शब्द के श्रवण होने तक (अर्थात् एक से अष्टादश तक) केवल संख्येय द्रव्य का बोध कराने के लिये प्रयुक्त होते हैं, अतः उनका तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । जैसे — एकः पटः, एका स्त्री, एकं पुष्पम् इत्यादि; परंतु ‘पञ्चन्’ से ‘दशन्’ शब्द तक के रूप तीनों लिङ्गों में समान होते हैं । यथा — दश स्त्रियः, दश पुरुषाः, दश पुष्पाणि इत्यादि । इसी प्रकार अष्टादश तक समझना चाहिये । संख्या मात्र का बोध कराने के लिये इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता; अतएव ‘विप्राणां शतम्’ इत्यादि के समान ‘विप्राणां दश’ यह प्रयोग नहीं हो सकता । विंशति आदि सभी संख्यावाची शब्द संख्या और संख्येय दोनों अर्थों में आते हैं तथा वे नित्य एक वचनान्त माने जाते हैं । (यथा संख्येय में — विंशतिः पटाः । संख्यामात्र में — विंशतिः पटानाम् इत्यादि । परंतु इनकी एकवचनान्तता केवल संख्येय अर्थ में ही मानी गयी है ।) संख्यामात्र में ये द्विवचन और बहुवचन भी होते हैं (यथा दो बीस, तीन बीस आदि के अर्थ में— द्वे विंशती, त्रयो विंशतयः — इत्यादि) । ऊनविंशति से लेकर नवनवति तक सभी संख्याशब्द स्त्रीलिङ्ग हैं (अतएव ‘विंशत्या पुरुषैः’ इत्यादि प्रयोग होते हैं) । ‘पङ्कि’ से लेकर शत, सहस्र आदि शब्द क्रमशः दस गुने अधिक हैं (यथा पङ्क्तिः (१०), शतम् (१००), सहस्त्रम् (१०००), अयुतम् (१००००) इत्यादि) । मान तीन प्रकार के होते हैं — तुलामान, अङ्गुलिमान और प्रस्थमान । पाँच गुंजे ( रत्ती ) — का एक माषक ( माशा) होता है ॥ ३४-३६ ॥ सोलह माषक का एक अक्ष होता है, इसी को कर्ष भी कहते हैं । कर्ष पुंल्लिङ्ग भी है और नपुंसकलिङ्ग भी । चार कर्ष का एक पल होता है। एक अक्ष सोने को ‘सुवर्ण’ और बिस्त कहते हैं तथा एक पल सुवर्ण का नाम ‘कुरुबिस्त’ है । सौ पल की एक ‘तुला’ होती है, यह स्त्रीलिङ्ग शब्द है । बीस तुला को ‘भार’ कहते हैं । चाँदी के रुपये का नाम कार्षापण और कार्षिक है । ताँबे के पैसे को ‘पण’ कहते हैं । द्रव्य, वित्त, स्वापतेय, रिक्थ, ऋक्थ, धन और वसु — ये धन के वाचक हैं । स्त्रीलिङ्ग रीति शब्द और पुँल्लिङ्ग आरकूट — ये पीतल के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ताँबा का नाम — ताम्रक, शुल्ब तथा औदुम्बर है । तीक्ष्ण, कालायस और आयस — ये लोहे के अर्थ में आते हैं । क्षार और काँच—ये काँच के नाम हैं । चपल, रस, सूत और पारद — ये पारा के वाचक हैं। भैंसे के सींग का नाम गरल (या गवल) है। त्रपु, सीसक और पिच्चट — ये सीसा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । [^4] हिण्डीर, अब्धिकफ तथा फेन — ये समुद्रफेन के वाचक हैं । मधूच्छिष्ट और सिक्थक — ये मोम के नाम हैं। रंग और वंग— राँगा के, पिचु और तूल — रुई के तथा कूलटी ( कुनटी) और मनः शिला — मैनसिल के नाम हैं । यवक्षार और पाक्य — पर्यायवाची शब्द हैं। त्वक्क्षीरा और वंशलोचना — वंशलोचन के वाचक हैं ॥ ३७-४२ ॥ वृषल, जघन्यज और शूद्र — ये शूद्रजाति के नाम हैं। चाण्डाल एवं अन्त्यज जातियाँ वर्णसंकर कहलाती हैं । शिल्पकर्म के ज्ञाता को कारु और शिल्पी कहते हैं (इनमें बढ़ई, थवई आदि सभी आ जाते हैं।) समान जाति के शिल्पियों के एकत्रित हुए समुदाय को श्रेणि कहते हैं । यह स्त्रीलिङ्ग और पुंल्लिङ्ग दोनों में प्रयुक्त होता है। चित्र बनाने वाले को रङ्गाजीव और चित्रकार कहते हैं । त्वष्टा, तक्षा और वर्धकि — ये बढ़ई के नाम नाडिन्धम और स्वर्णकार — ये सुनार के वाचक हैं। नाई (हजाम ) — का नाम है नापित तथा अन्तावसायी । बकरी बेंचने वाले गडरिये का नाम जाबाल और अजाजीव है। देवाजीव और देवल — ये देवपूजा से जीविका चलाने वाले के अर्थ में आते हैं। अपनी स्त्रियों के साथ नाटक दिखाकर जीवन – निर्वाह करने वाले नट को जायाजीव और शैलूष कहते हैं। रोजाना मजदूरी लेकर गुजर करने वाले मजूरे का नाम भृतक और भृतिभुक् है । विवर्ण, पामर, नीच, प्राकृत, पृथग्जन, विहीन, अपसद और जाल्म — ये नीच के वाचक हैं। दास को भृत्य, दासेर और चेटक भी कहते हैं । पटु, पेशल और दक्ष — ये चतुर के अर्थ में आते हैं । मृगयु और लुब्धक — ये व्याध के नाम हैं । चाण्डाल को चाण्डाल और दिवाकीर्ति कहते हैं । पुताई आदि के काम में पुस्त शब्द का प्रयोग होता है । पञ्चालिका और पुत्रिका — पे पुतली या गुडिया के नाम हैं। वर्कर शब्द जवान पशुमात्र के अर्थ में आता है ( साथ ही वह बकरे का भी वाचक है)। गहना रखने के डब्बे को या कपड़े रखने की पेटी को मञ्जूषा, पेटक तथा पेडा कहते हैं । तुल्य और साधारण — ये समान अर्थ के वाचक हैं। इनका सामान्यतः तीनों लिङ्गों में प्रयोग होता है । प्रतिमा और प्रतिकृति — ये पत्थर आदि की मूर्तिके वाचक हैं । इस प्रकार ब्राह्मण आदि वर्गों का वर्णन किया गया ॥ ४३-४९ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘कोशगत क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रवर्ग का वर्णन’ नामक तीन सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६६ ॥ [^1]: ‘ अन्तर्वशिक’ के स्थान में ‘ अन्तर्वेश्मिक’ नाम भी प्रयुक्त होता है । [^2]: रामोक्त नीति के उपदेशानुसार विजिगीषु के सम्मुखवर्ती पाँच राज्य क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र तथा अरिमित्र — मित्र होते हैं; आगे भी ऐसा ही क्रम है। दोनों पार्श्वगत राज्यों में क्रमशः मध्यम तथा उदासीन होते हैं । [^3]: सेनामुख आदि विभागों में हाथी, रथ आदि की संख्या जानने के लिये यह नक्शा दिया जा रहा है— [^4]: अमरकोष में इस श्लोक के ‘त्रपु’ और ‘पिच्चट’ शब्द को राँगे के अर्थ में लिया गया है तथा सीसक के नाग, योगेष्ट और वप्र — ये तीन पर्याय अन्य दिये गये हैं । अग्निपुराणम् षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः क्षत्रविट्शूद्रवर्गाः ॥ अग्निरुवाच ॥ मूर्द्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट् । राजा तु प्रणताशेपसामन्तः । स्यादधीश्वरः ॥ १ ॥ चक्रवर्त्ती सार्वभौमो नृपोऽन्यो मण्डलेश्वरः । मन्त्री धीसचिवोऽमात्यो महामात्राः प्रधानकाः ॥ २ ॥ द्रष्टरि व्यवहाराणां प्राड्विवाकाऽक्षदर्शकौ । भौरिकः कनकाध्यक्षोऽथाद्यक्षाधिकृतौ समौ ॥ ३ ॥ अन्तःपुरे त्वधिकृतः स्यादन्तर्वंशिको जनः । सौविदल्लाः कञ्चुकिनः स्थापत्याः सौविदाश्च ते ॥ ४ ॥ षण्डो वर्षवरस्तुल्याः सेवकार्थ्यनुजीविनः । विषयानन्तरो राजा शत्रुमित्रमतः परं ॥ ५ ॥ उदासीनः परतरः पार्ष्णिग्राहस्तु पृष्ठतः । चरः स्पशः स्यात्प्रणिधिरुत्तरः काल आयतिः ॥ ६ ॥ तत्कालस्तु तदात्वं स्यादुदर्कः फलमुत्तरं । अदृष्टं वह्नितोयादि दृष्टं स्वपरचक्रजम् ॥ ७ ॥ भद्रकुम्भः पूर्णकुम्भो भृङ्गारः कनकालुका । प्रभिन्नो गर्जितो मत्तो वमथुः करशीकरः ॥ ८ ॥ स्त्रियां श्रृणिस्त्वङ्कुशोऽस्त्री परिस्तोमः कुथो द्वयोः । कर्णीरथः प्रवहणं दोला प्रेङ्खादिका स्त्रियां ॥ ९ ॥ आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निषादिनः । भटा योधाश्च योद्धारः कञ्चुको वारणोऽस्त्रियां ॥ १० ॥ शीर्षण्यञ्च शिरस्त्रेऽथ तनुत्रं वर्म्म दंशनं । आमुक्तः प्रतिमुक्तश्च पिनद्धश्चापिनद्धवत् ॥ ११ ॥ व्यूहस्तु बलविन्यासश्चक्रञ्चानीकमस्त्रियां । एकेभैकरथा त्र्यश्वाः पत्तिः वञ्चपदातिकाः ॥ १२ ॥ पत्त्यङ्गैस्त्रिगुणैः सर्वैः क्रमादाख्या यथोत्तरं । सेनामुखं गुल्मगणै वाहिनी पृतना चमूः ॥ १३ ॥ अनीकिनी दशानीकिन्योऽक्षोहिण्यो गजीदिभिः । धनुः कोदण्डइष्वासौ कोटिरस्याटनी स्मृता ॥ १४ ॥ नस्तकस्तु धनुर्मध्यं मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः । पृषत्कबाणविशिखा अजिह्मगखगाशुगाः ॥ १५ ॥ तूणोपासङ्गतूणीरनिषङ्गा इषुधिर्द्वयोः। असिर्ऋष्टिश्च निस्त्रिशः करवालः कृपाणवत् ॥ १६ ॥ सरुः खङ्गस्य मुष्टौ स्यादीली तु करपालिका । द्वयोः कुठारः सुधितिः छुरिका चासिपुत्रिका ॥ १७ ॥ प्रासस्तु कुन्तो विज्ञेयः सर्वला तोमरोऽस्त्रियां । वैतालिका बोधकरा मागधा वन्दिनस्तुतौ ॥ १८ ॥ संशप्तकास्तु समयात्सङ्ग्ग्रामादनिवर्त्तिनः । पताका वैजयन्ती स्यात् केतनं ध्वजमस्त्रियां ॥ १९ ॥ अहं पूर्वमहं पूर्व्वमित्यहंपूर्व्विका स्त्रियां । अहमहमिका सा स्याद्योऽहङ्कारः परस्परम् ॥ २० ॥ शक्तिः पराक्रमः प्राणः शौर्य्यं स्थानसहोबलं । मूर्छा तु कश्मलं मोहोऽप्यवमर्द्दस्तु पीड़़नं ॥ २१ ॥ अभ्यवस्कन्दनन्त्वभ्यासादनं विजयो जयः । निर्वासनं संज्ञपनं सारणं प्रतिघातनं ॥ २२ ॥ स्यात्पञ्चता कालधर्भो दिष्टान्तः प्रलयोऽत्य्यः । विशो भूमिस्पृशो वैश्या वृत्तिर्वर्तनजीवने ॥ २३ ॥ कृष्यादिवृत्तयो ज्ञेयाः कुसीदं वृद्धिजीविका । उद्धारोऽर्थप्रयोगः स्यात्कणिशं सस्यमञ्जरी ॥ २४ ॥ सिंशारुः सस्यशूकं स्यात् स्तम्बो गुत्सस्तृणादिनः । धान्यं व्रीहिः स्तम्बकरिः कड़ङ्गरो वुषं स्मृतं ॥ २५ ॥ माषादयः शमीधान्ये शुकधान्ये यवादयः । तृणधान्यानि नीवाराः शूर्पं प्रस्फोटनं स्मृतं ॥ २६ ॥ स्यूतप्रसेवौ कण्डोलपिटौ कटकिनिञ्जकौ । समानौ रसवत्यान्तु पाकस्थानमहानसे ॥ २७ ॥ पौरोगवस्तदध्यक्षः सूपकारास्तु वल्लवाः । आरालिका आन्धसिकाः सूदा औदनिका गुणाः ॥ २८ ॥ क्लीवेऽग्वरीषं भ्राष्टो ना कर्कर्य्यालुर्गलन्तिका । आलिञ्जरः स्यान्मणिकं सुषवी कृष्णजीरके ॥ २९ ॥ आरनालस्तु कुल्माषं वाह्लीकं हिङ्गु रामठं । निशा हरिद्रा पीता स्त्री खण्डे मत्स्यण्डिफाणिते ॥ ३० ॥ कूर्चिका क्षीरविकृतिः स्निग्धं मसृणचिक्कणं । पृथुकः स्याच्चिपिटको धाना भ्रष्टयवास्त्रियः ॥ ३१ ॥ जेमनं लेप आहारो माहेयी सौरभी च गौः । युगादीनाञ्च वोढारो युग्यप्रासङ्ग्यशाटकाः ॥ ३२ ॥ चिरसूता वष्कयणी धेनुः स्यान्नवसूतिका । सन्धिनी वृषभाक्रान्ता वेहद्गर्भोपघातिनी ॥ ३३ ॥ पण्याजीवो ह्यापणिको न्यासश्चोपनिधिः पुमान् । विपणो विक्रयः सङ्ख्या सङ्ख्येये ह्यादश त्रिषु ॥ ३४ ॥ विंशत्याद्याः सदैकत्वे सर्व्वाः संख्येयसंख्ययोः । संख्यार्थे द्विबहुत्वे स्तस्तासु चानवतेः स्त्रियः ॥ ३५ ॥ पङ्क्तेः शतसहस्रादि क्रममाद्दशगुणोत्तरं । मानन्तुलाङ्गुलिप्रस्थैर्गुञ्जाः पञ्चाद्यमाषकः ॥ ३६ ॥ ते षोड़शाक्षः कर्षोऽस्त्री पलं कर्षचतुष्टयम् । सुवर्णविस्तौ हेम्नोऽक्षे कुरुविस्तस्तु तत्पले ॥ ३७ ॥ तला स्त्रियां पलशतं भारः स्याद्विंशतिस्तुलाः । कार्षापणः कार्षिकः स्यात् कार्षिके ताम्रिके पणः ॥ ३८ ॥ द्रव्यं वित्तं स्वापतेयं रिक्थमृक्थं धनं वसु । रीतिः स्त्रियामारकूटो न स्त्रियामथ ताम्रकम् ॥ ३९ ॥ शुल्वमौदुम्बरं लौहे तीक्ष्णं कालायसायसी । क्षारं काचोऽथ चपलो रसः सूतश्च पारदे ॥ ४० ॥ गरलं माहिषं श्रृङ्गं त्रपुसीसकपिच्चटं । हिण्डीरोऽब्धिकफः फेणो मधूच्छिष्टन्तु सिक्थकम् ॥ ४१ ॥ रङ्गवङ्गे पिचुस्थूलो कूलटी तु मनःशिला । यवक्षारश्च पाक्यः स्यात् त्वक्क्षीरा वंशलोचना ॥ ४२ ॥ वृषला जघन्यजाः शूद्राश्चाण्डालान्त्याश्च शङ्कराः । कारुः शिल्पी संहतैस्तैर्द्वयोः श्रेणिः सजातिभिः ॥ ४३ ॥ रङ्गाजीवश्चित्रकरस्त्वष्टा तक्षा च वर्धकिः । नाडिन्धमः स्वर्णकारो नापितान्तावसायिनः ॥ ४४ ॥ जावालः स्यादजाजीवो देवाजीवस्तु देवलः । जायाजीवास्तु शैलूषा भृतको भृतिभुक्तथा ॥ ४५ ॥ विवर्णः पामरो नीचः प्राकृतश्च पृथग्जनः । विहीनोपसदो जाल्मो भृत्ये दासेरचेटकाः ॥ ४६ ॥ पटुस्तु पेशलो दक्षे मृगयुर्लुब्धकः स्मृतः । चण्डालस्तु दिवाकीर्त्तिः पुस्तं लेप्यादिकर्म्मणि ॥ ४७ ॥ पञ्चालिका पुत्रिका स्याद्वर्करस्तरुणः पशुः । मञ्जूषा पेटकः पेडा तुल्यसाधारणौ समौ ॥ प्रतिमा स्यात् प्रतिकृतिर्वर्गा ब्रह्मादयः स्मृताः ॥ ४८ ॥ ॥ इत्यादिम्हापुराणे आग्नेये क्षत्रविट्शूद्रवर्गा नाम षट्षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६६ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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