July 24, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण — अध्याय 368 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय नित्य, नैमित्तिक और प्राकृत प्रलय का वर्णन नित्यनैमित्तिकप्राकृतप्रलयाः अग्निदेव कहते हैं — मुनिवर ! ‘प्रलय’ चार प्रकार का होता है — नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक । जगत् में उत्पन्न हुए प्राणियों की जो सदा ही मृत्यु होती रहती है, उसका नाम ‘नित्य प्रलय’ है । एक हजार चतुर्युग बीतने पर जब ब्रह्माजी का दिन समाप्त होता है, उस समय जो सृष्टि का लय होता है, वह ‘ब्राह्म लय’ के नाम से प्रसिद्ध है । इसी को ‘नैमित्तिक प्रलय’ भी कहते हैं । पाँचों भूतों का प्रकृति में लीन होना ‘प्राकृत प्रलय’ कहलाता है तथा ज्ञान हो जाने पर जब आत्मा परमात्मा के स्वरूप में स्थित होता है, उस अवस्था का नाम ‘आत्यन्तिक प्रलय’ है। कल्प के अन्त में जो नैमित्तिक प्रलय होता है, इसके स्वरूप का मैं आपसे वर्णन करता हूँ । जब चारों युग एक हजार बार व्यतीत हो जाते हैं, उस समय यह भूमण्डल प्रायः क्षीण हो जाता है, तब सौ वर्षों तक यहाँ बड़ी भयंकर अनावृष्टि होती है। उससे भूतल के सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं का विनाश हो जाता है । तदनन्तर जगत् के स्वामी भगवान् विष्णु सूर्य की सात किरणों में स्थित होकर पृथ्वी, पाताल और समुद्र आदि का सारा जल पी जाते हैं। इससे सर्वत्र जल सूख जाता है । ‘तत्पश्चात् भगवान् की इच्छा से जल का आहार करके पुष्ट हुई वे ही सातों किरणें सात सूर्य के रूप में प्रकट होती हैं । वे सातों सूर्य पातालसहित समस्त त्रिलोकी को जलाने लगते हैं ।’ उस समय यह पृथ्वी कछुए की पीठ के समान दिखायी देती है । फिर भगवान् शेष के श्वासों से ‘कालाग्नि रुद्र’ का प्रादुर्भाव होता है और वे नीचे के समस्त पातालों को भस्म कर डालते हैं । पाताल के पश्चात् भगवान् विष्णु भूलोक को, फिर भुवर्लोक को तथा सबके अन्त में स्वर्गलोक को भी दग्ध कर देते हैं । उस समय समस्त त्रिभुवन जलते हुए भाड़-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर भुवर्लोक और स्वर्ग — इन दो लोकों के निवासी अधिक ताप से संतप्त होकर ‘महर्लोक’ में चले जाते हैं तथा महर्लोक से जनलोक में जाकर स्थित होते हैं । शेषरूपी भगवान् विष्णु के मुखोच्छ्वास से प्रकट हुए कालाग्निरुद्र जब सम्पूर्ण जगत् को जला डालते हैं, तब आकाश में नाना प्रकार के रूपवाले बादल उमड़ आते हैं, उनके साथ बिजली की गड़गड़ाहट भी होती है । वे बादल लगातार सौ वर्षों तक वर्षा करके बढ़ी हुई आग को शान्त कर देते हैं। जब सप्तर्षियों के स्थान तक पानी पहुँच जाता है, तब विष्णु के मुख से निकली हुई साँस से सौ वर्षों तक प्रचण्ड वायु चलती रहती है, जो उन बादलों को नष्ट कर डालती है । फिर ब्रह्मरूपधारी भगवान् उस वायु को पीकर एकार्णव के जल में शयन करते हैं । उस समय सिद्ध और महर्षिगण जल में स्थित होकर भगवान् की स्तुति करते हैं और भगवान् मधुसूदन अपने ‘वासुदेव’ संज्ञक आत्मा का चिन्तन करते हुए, अपनी ही दिव्य मायामयी योगनिद्रा का आश्रय ले एक कल्प तक सोते रहते हैं। तदनन्तर जागने पर वे ब्रह्मा के रूप में स्थित होकर पुनः जगत् की सृष्टि करते हैं । इस प्रकार जब ब्रह्माजी के दो परार्द्ध की आयु समाप्त हो जाती है, तब यह सारा स्थूल प्रपञ्च प्रकृति में लीन हो जाता है ॥ १-१५ ॥ इकाई – दहाई के क्रम से एक के बाद दस गुने स्थान नियत करके यदि गुणा करते चले जायँ तो अठारहवें स्थान तक पहुँचने पर जो संख्या बनती है, उसे ‘परार्द्ध’ कहते हैं 1 । परार्द्ध का दूना समय व्यतीत हो जाने पर ‘प्राकृत प्रलय’ होता है । उस समय वर्षा के एकदम बंद हो जाने और सब ओर प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित होने के कारण सब कुछ भस्म हो जाता है । महत्तत्त्व से लेकर विशेषपर्यन्त सभी विकारों (कार्यों ) — का नाश हो जाता है । भगवान् के संकल्प से होने वाले उस प्राकृत प्रलय के प्राप्त होने पर जल पहले पृथ्वी के गन्ध आदि गुण को ग्रस लेता है— अपने में लीन कर लेता है । तब गन्धहीन पृथ्वी का प्रलय हो जाता है —उस समय जल में घुल-मिलकर वह जलरूप हो जाती है। उसके बाद रसमय जल की स्थिति रहती है । फिर तेजस्तत्त्व जल के गुण रस को पी जाता है। इससे जल का लय हो जाता है । जल के लीन हो जाने पर अग्नितत्त्व प्रज्वलित होता रहता है । तत्पश्चात् तेज के प्रकाशमय गुण रूप को वायुतत्त्व ग्रस लेता है। इस प्रकार तेज के शान्त हो जाने पर अत्यन्त प्रबल एवं प्रचण्ड वायु बड़े वेग से चलने लगती है । फिर वायु के गुण स्पर्श को आकाश अपने में लीन कर लेता है। गुण के साथ ही वायु का नाश होने पर केवल नीरव आकाशमात्र रह जाता है । तदनन्तर भूतादि ( तामस अहंकार) आकाश के गुण शब्द को ग्रस लेता है तथा तैजस अहंकार इन्द्रियों को अपने में लीन कर लेता है। इसके बाद महत्तत्त्व अभिमान स्वरूप भूतादि एवं तैजस अहंकार को ग्रस लेता है । इस तरह पृथ्वी जल में लीन होती है, जल तेज में समा जाता है, तेज का वायु में, वायु का आकाश में और आकाश का अहंकार में लय होता है । फिर अहंकार महत्तत्त्व में प्रवेश कर जाता है । ब्रह्मन् ! उस महत्तत्त्व को भी प्रकृति ग्रस लेती है । प्रकृति के दो स्वरूप हैं — ‘व्यक्त’ और ‘अव्यक्त’ । इनमें व्यक्त प्रकृति का अव्यक्त प्रकृति में लय होता है । एक, अविनाशी और शुद्धस्वरूप जो पुरुष है, वह भी परमात्मा का ही अंश है, अतः अन्त में प्रकृति और पुरुष — ये दोनों परमात्मा में लीन हो जाते हैं । परमात्मा सत्स्वरूप ज्ञेय और ज्ञानमय है । वह आत्मा (बुद्धि आदि) — से सर्वथा परे है । वही सबका ईश्वर — ‘सर्वेश्वर’ कहलाता है। उसमें नाम और जाति आदि की कल्पनाएँ नहीं हैं ॥ १६–२७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नित्य, नैमित्तिक तथा प्राकृत प्रलय का वर्णन’ नामक तीन सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६८ ॥ 1. इन अठारह संख्याओं में यदि एक को भी गिन लें, अर्थात् एक के बाद सत्रह शून्य लगावें तो वर्तमान गणना के अनुसार यह संख्या एक शंख के बराबर होती है और यदि एक के बाद अठारह शून्य लगाये जायँ तो यह संख्या महाशंख के बराबर होती है । यह शंख और महाशंख ही ‘परार्द्ध’ है । Content is available only for registered users. 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